वक्त की मार – गरिमा चौधरी

*”जब दौलत के नशे में चूर भाई ने चांदी के सिक्के को ‘भिखारी की भीख’ बताकर ठुकरा दिया, तब उसे नहीं पता था कि एक दिन वही ‘छोटा भाई’ अपनी पत्नी के गहने बेचकर उसकी सांसें खरीदेगा।”*

हीरे की अंगूठी से सजी उंगलियों ने व्हिस्की का गिलास टेबल पर ऐसे पटका जैसे कोई फैसला सुनाया जा रहा हो। सामने बैठे कुछ लोग सहम गए।

“अरे छोड़ो यार!” विनोद ने हँसते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा नशा था—शराब का कम और दौलत का ज्यादा। “रिश्ते-नाते सब कहने की बातें हैं। आज के ज़माने में अगर जेब में ‘गांधी’ है, तो सब आंधी की तरह तुम्हारे पीछे चलेंगे। और अगर जेब खाली, तो सगा भाई भी तुम्हें नहीं पहचानेगा। मैंने अपनी मेहनत से यह एम्पायर खड़ा किया है, किसी के एहसानों से नहीं।”

पार्टी में मौजूद सभी लोगों ने ‘हाँ में हाँ’ मिलाई। यह विनोद की 25वीं सालगिरह की पार्टी थी। शहर के सबसे महंगे होटल का बैंक्वेट हॉल बुक था। विनोद एक बहुत बड़ा बिल्डर था, जिसका सिक्का पूरे शहर में चलता था।

एक कोने में खड़ा सुधीर, जो विनोद का चचेरा भाई था, चुपचाप यह तमाशा देख रहा था। सुधीर के कपड़े साधारण थे, साफ़ थे लेकिन पुराने। वह विनोद को बधाई देने आया था। उसके हाथ में एक छोटा सा उपहार था—चांदी का एक सिक्का और घर की बनी मिठाई।

जब पार्टी अपने शबाब पर थी, सुधीर हिम्मत करके विनोद के पास पहुंचा।

“विनोद भैया, सालगिरह मुबारक हो,” सुधीर ने मुस्कुराते हुए कहा और वह छोटा सा पैकेट आगे बढ़ाया।

विनोद ने अपनी महंगी विदेशी घड़ी देखी और फिर सुधीर को ऊपर से नीचे तक घूरा। उसने वह पैकेट लिया, उसे सबके सामने खोला और जोर से हंसा।

“अरे वाह! सुधीर, तू आज भी वही का वही रहा। बीस साल पहले भी तू चवन्नी-अठन्नी गिनता था, और आज जब मैं करोड़ों में खेल रहा हूँ, तू मुझे चांदी का सिक्का दे रहा है? अरे भाई, यह सिक्का तो मैं वेटर को टिप में भी न दूँ।”

हॉल में हंसी के ठहाके गूंज उठे। सुधीर का चेहरा अपमान से लाल हो गया। उसकी पत्नी, रश्मि, ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

विनोद ने आगे कहा, “बुरा मत मानियो भाई, पर तेरी सोच और तेरी हैसियत, दोनों अभी भी ‘लोअर क्लास’ वाली ही हैं। मैंने कहा था न, मेरे साथ बिजनेस में जुड़ जा, पर तुझे तो अपनी वो ‘किराना दुकान’ और ‘ईमानदारी’ का पाठ पढ़ना था। देख आज कहाँ है तू और कहाँ हूँ मैं।”

सुधीर ने एक शब्द नहीं कहा। उसने बस हाथ जोड़े और वहां से चला गया। उस रात सुधीर को नींद नहीं आई, लेकिन उसने रश्मि से कहा, “विनोद मेरा भाई है। उसे अपनी दौलत का नशा है, पर वक्त सबका नशा उतार देता है। हम अपनी ईमानदारी की रोटी में खुश हैं।”

समय का पहिया घूमा। पांच साल बीत गए।

विनोद का अहंकार अब सातवें आसमान पर था। उसने अपनी पत्नी, शालिनी और बच्चों को भी इसी घमंड में ढाल लिया था। वह अपने पुराने रिश्तेदारों, दोस्तों, यहाँ तक कि अपने बूढ़े माता-पिता को भी “आउटडेटेड” मानकर वृद्धाश्रम छोड़ आया था।

लेकिन वक्त को जब करवट लेनी होती है, तो वह पहले से नोटिस नहीं भेजता।

शहर में एक बहुत बड़ा फ्लाईओवर बन रहा था, जिसका टेंडर विनोद की कंपनी के पास था। विनोद ने ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में घटिया सीमेंट और लोहा इस्तेमाल किया था। एक रात, बारिश के दौरान वह निर्माणाधीन पुल ढह गया। इस हादसे में कई मजदूर दब गए और बड़ा जान-माल का नुकसान हुआ।

अगली सुबह विनोद के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं थी। पुलिस जीप के सायरन ने उसके आलीशान बंगले की नींद हराम कर दी। विनोद को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बैंक खाते सीज़ (Freeze) कर दिए गए। मीडिया में उसकी थू-थू होने लगी।

कानूनी दांव-पेंच और वकीलों की फीस चुकाते-चुकाते विनोद की जमा-पूंजी पानी की तरह बहने लगी। जो “दोस्त” उसकी पार्टी में महंगी शराब पीते थे, उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया। शालिनी, जिसे एसी कार के बिना चलने की आदत नहीं थी, अब वकीलों के चक्कर काटने के लिए ऑटो रिक्शा में धक्के खा रही थी।

मुसीबत यहीं ख़त्म नहीं हुई। छह महीने जेल में रहने के बाद, तनाव के कारण विनोद को जेल में ही पैरालिसिस (लकवा) का अटैक आया। उसका दाहिना हिस्सा काम करना बंद कर दिया। कोर्ट ने मानवीय आधार पर उसे ज़मानत तो दे दी, लेकिन तब तक विनोद कंगाल हो चुका था। उसका बंगला बिक चुका था, गाड़ियाँ नीलाम हो चुकी थीं।

विनोद अब शहर के एक छोटे से किराए के मकान में पड़ा था। शालिनी ने घर के गहने बेचकर कुछ दिन घर चलाया, लेकिन अब दाने-दाने के लाले पड़ गए थे। विनोद बिस्तर पर लेटा छत को घूरता रहता। उसकी जुबान लड़खड़ाती थी, वह कुछ बोल नहीं पाता था। उसकी आँखों से बस आंसू बहते रहते। उसे अपनी वो पार्टी याद आती, वो ठहाके याद आते, और सुधीर का वो अपमान याद आता।

एक शाम, शालिनी दवा लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर खड़ी थी, लेकिन पैसे कम पड़ रहे थे। केमिस्ट ने दवाई वापस रख ली। “मैडम, उधारी नहीं चलती।”

शालिनी रोते हुए बाहर निकली। तभी एक हाथ उसके कंधे पर आया।

“भाभी?”

शालिनी ने मुड़कर देखा। सुधीर खड़ा था। वही साधारण कपड़े, वही पुरानी स्कूटर।

“सुधीर भैया…” शालिनी फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने अपनी सारी आपबीती बताई।

सुधीर ने एक पल भी नहीं सोचा। वह शालिनी को अपनी स्कूटर पर बिठाकर मेडिकल स्टोर ले गया, सारी दवाइयां खरीदीं और फिर उनके किराए के घर पहुंचा।

कमरे की हालत देखकर सुधीर का दिल भर आया। वह ‘शेर’ जैसा भाई, जो कभी करोड़ों की बातें करता था, आज मैले बिस्तर पर लाचार पड़ा था। मक्खियाँ भिनभिना रही थीं।

विनोद ने सुधीर को देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सा डर था। शायद उसे लगा कि आज सुधीर अपना बदला लेने आया है। आज सुधीर हंसेगा। आज सुधीर कहेगा—”देख, कहाँ हूँ मैं और कहाँ है तू।”

लेकिन सुधीर ने ऐसा कुछ नहीं किया।

वह विनोद के पास बैठा और उसके सिर पर हाथ फेरा। “भैया, मैं आ गया हूँ। अब सब ठीक हो जाएगा।”

सुधीर ने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और शालिनी के हाथ में रख दिए। “भाभी, यह रखिये। घर में राशन और फल मंगवा लीजियेगा।”

शालिनी ने हिचकिचाते हुए कहा, “सुधीर भैया, हम यह कैसे ले सकते हैं? विनोद ने आपके साथ…”

“भाभी, वो वक्त अलग था, यह वक्त अलग है,” सुधीर ने बात काट दी। “रिश्ते बाजार में नहीं बिकते कि मुनाफा देखा जाए। भाई हूँ, अपना फर्ज़ निभा रहा हूँ।”

अगले दिन से सुधीर ने विनोद की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। वह रोज अपनी दुकान बढ़ाने के बाद विनोद के घर आता। विनोद की मालिश करता, उसे अपने हाथ से खिचड़ी खिलाता, उसे नहलाता। सुधीर की पत्नी, रश्मि भी अक्सर आती और शालिनी की घर के कामों में मदद करती।

विनोद यह सब देखता और अंदर ही अंदर घुटता रहता। वह बोलना चाहता था, माफ़ी मांगना चाहता था, पर उसकी जुबान साथ नहीं देती थी। उसकी आँखों से पश्चाताप के आंसू बहते रहते, जिन्हें सुधीर अपने गमछे से पोंछ देता।

एक दिन, डॉक्टर ने बताया कि विनोद को एक महंगे इंजेक्शन की ज़रूरत है, वरना उसका बचना मुश्किल है। इंजेक्शन की कीमत पचास हज़ार थी। शालिनी के पास एक रुपया नहीं था।

विनोद ने इशारे से मना किया। वह मर जाना चाहता था, अब और बोझ नहीं बनना चाहता था।

लेकिन शाम को सुधीर आया। उसके चेहरे पर पसीना था, लेकिन सुकून भी था। उसके हाथ में वो इंजेक्शन था।

“लगा दीजिये डॉक्टर साहब,” सुधीर ने कहा।

इंजेक्शन लगने के बाद, जब सुधीर जाने लगा, तो शालिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“भैया, इतने पैसे कहाँ से आए? आपकी तो छोटी सी दुकान है…”

सुधीर मुस्कुराया, “भाभी, वो… रश्मि के कुछ गहने पड़े थे, वैसे भी वो पहनती कहाँ है। और दुकान की थोड़ी सेविंग्स थी। भाई की जान से बढ़कर थोड़ी है।”

बिस्तर पर लेटे विनोद के कानों में यह बात पिघले हुए शीशे की तरह उतरी। जिस भाई को उसने ‘चवन्नी छाप’ कहा था, आज उसी भाई ने अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखकर उसकी जान बचाई थी। विनोद की आत्मा झकझोर उठी। उसने पूरी ताकत लगाकर सुधीर का हाथ पकड़ा।

सुधीर रुका। उसने देखा विनोद कुछ बोलने की कोशिश कर रहा है।

“सु… सु… धी… र…” विनोद की आवाज़ टूटी-फूटी थी।

“हाँ भैया, कहो,” सुधीर झुक गया।

विनोद की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कांपते हुए हाथ से अपनी तकिये के नीचे इशारा किया। शालिनी ने वहां से एक पुराना, मुड़ा-तुड़ा लिफाफा निकाला जो विनोद ने शायद अपने अच्छे दिनों की याद में संभाल रखा था।

विनोद ने इशारे से उसे खोलने को कहा।

उसमें वही चांदी का सिक्का था, जो सुधीर ने पांच साल पहले उसे दिया था। विनोद ने उस सिक्के को नहीं फेंका था, शायद कहीं न कहीं उसे अपनी गलती का अहसास था या शायद वो सिक्का उसके सामान में रह गया था।

विनोद ने वह सिक्का सुधीर की हथेली पर रखा और बड़ी मुश्किल से बोला, “यह… यह… मेरी… सबसे… बड़ी… दौलत… है। मुझे… माफ़… कर दे… भाई।”

सुधीर की आँखों में भी आंसू आ गए। उसने विनोद को गले लगा लिया। “भैया, माफ़ी मत मांगो। खून पानी से गाढ़ा होता है। आपने मुझे सिक्का वापस दिया, इसका मतलब आपने मुझे अपना भाई मान लिया। मेरे लिए यही बहुत है।”

विनोद ठीक होने लगा। पूरी तरह तो नहीं, पर अब वह व्हीलचेयर पर बैठ सकता था और टूटी-फूटी बातें कर सकता था। सुधीर ने उसकी मदद से एक छोटी सी परचून की दुकान उसे खुलवा दी, ताकि वह अपना मन लगा सके और इज़्ज़त की रोटी खा सके।

एक शाम, दोनों भाई दुकान के बाहर बैठे चाय पी रहे थे। सामने से एक महंगी गाड़ी गुज़री और कीचड़ उछालती हुई निकल गई।

विनोद ने उस गाड़ी को जाते हुए देखा और मुस्कुराया। उसने सुधीर से कहा, “सुधीर, पता है? जब मैं उस गाड़ी में था, तो मुझे लगता था कि मैं दुनिया चला रहा हूँ। पर आज जब मैं इस प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा हूँ, तो मुझे लग रहा है कि मैं ‘जी’ रहा हूँ। उस दिन मैंने तुझे सिक्का वापस किया था, पर सच तो यह है कि तूने मुझे इंसतियत का वो सिक्का दिया है जो कभी खोटा नहीं होता।”

सुधीर हंसा, “भैया, वक्त का कोई भरोसा नहीं। यह राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है। बस आदमी को यह याद रखना चाहिए कि जब वो सीढ़ी चढ़ रहा हो, तो उतरने वाले लोगों से दुआ-सलाम करता चले, क्योंकि उतरते वक्त वही लोग दोबारा मिलेंगे।”

विनोद ने चाय का घूँट भरा। वह चाय सस्ती थी, पर उसका स्वाद उस महंगी व्हिस्की से कहीं ज्यादा मीठा था जो उसने पांच साल पहले पी थी। क्योंकि इस चाय में ‘घमंड’ नहीं, ‘भाईचारा’ घुला था।

**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या हम भी अपनी कामयाबी की दौड़ में उन रिश्तों को पीछे छोड़ रहे हैं जो मुसीबत में हमारे काम आएंगे? क्या विनोद को माफ़ करके सुधीर ने सही किया? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

**”अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही मार्मिक और पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**

लेखिका : गरिमा चौधरी 

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