“कहते हैं बुढ़ापे में इंसान को सिर्फ आराम चाहिए होता है, लेकिन जब आराम की कीमत आपका आत्मसम्मान हो, तो मखमल का बिस्तर भी कांटों जैसा चुभने लगता है। क्या एक माँ अपने ही बनाए घोंसले में सिर्फ एक ‘फालतू सामान’ बनकर रह सकती है, जिसे हर कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से इस्तेमाल करे?”
रितिका की आवाज़ में फिक्र कम और झुंझलाहट ज़्यादा होती थी। देवकी जी चुपचाप अपने कमरे में लौट आतीं। उन्हें अपना कमरा खुद समेटने की इजाज़त नहीं थी। उनके कपड़ों की अलमारी से लेकर उनके नहाने के साबुन तक का फैसला रितिका करती थी। देवकी जी को क्या खाना है, यह डॉक्टर के चार्ट और रितिका के आदेश पर तय होता था। अगर कभी देवकी जी कहतीं कि आज उनका मन कुछ तीखा या अपनी पसंद का खाने का है, तो अनुभव तुरंत कहता, “माँ, आप समझती क्यों नहीं हैं? आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है। हम आपके भले के लिए ही तो कर रहे हैं। आप बस आराम कीजिए न।”
शहर की एक पॉश हाई-राइज इमारत के चौदहवें माले पर स्थित वह फोर-बीएचके (4BHK) फ्लैट किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं था। इटालियन मार्बल का फर्श, दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स, हर कमरे में एसी और काम करने के लिए तीन-तीन नौकर। यह घर था शहर के मशहूर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनुभव और उसकी पत्नी रितिका का। इसी घर के एक शानदार कमरे में रहती थीं अनुभव की माँ, देवकी जी। देवकी जी के कमरे में हर वो सुविधा थी जो एक बुज़ुर्ग को चाहिए होती है—एक बड़ी टीवी स्क्रीन, आरामदेह रिक्लाइनर कुर्सी, और समय पर दवाइयां देने के लिए एक फुल-टाइम केयरटेकर।
बाहर से देखने वालों को लगता था कि देवकी जी दुनिया की सबसे खुशनसीब माँ हैं। मोहल्ले की औरतें जब कभी मिलतीं, तो कहती थीं, “अरे देवकी जी, आपका बेटा तो श्रवण कुमार है। बुढ़ापे में आपको महारानी बनाकर रखा है। आपको तो एक गिलास पानी के लिए भी उठना नहीं पड़ता।” देवकी जी इन बातों पर सिर्फ एक फीकी सी मुस्कान दे देती थीं। कोई नहीं जानता था कि जिस चीज़ को दुनिया ‘महारानी का सुख’ कह रही थी, वह देवकी जी के लिए एक सोने का पिंजरा बन चुका था।
देवकी जी एक रिटायर्ड प्रिंसिपल थीं। उन्होंने अपने पति के जल्दी गुज़र जाने के बाद अकेले ही कड़े अनुशासन और मेहनत से अनुभव को पाल-पोस कर इतना बड़ा आदमी बनाया था। उनकी पूरी ज़िंदगी काम करते, फैसले लेते और अपनी शर्तों पर जीते गुज़री थी। लेकिन इस घर में आने के बाद, उनका वजूद सिर्फ एक ‘लाचार बुढ़िया’ तक सिमट कर रह गया था।
दिन की शुरुआत से ही इस बात का एहसास उन्हें दिलाया जाता था। सुबह अगर देवकी जी अपनी पसंद की चाय खुद बनाने के लिए किचन में जातीं, तो रितिका दूर से ही टोक देती, “मम्मी जी! आप यहाँ क्यों आ गईं? आपको कितनी बार कहा है कि किचन में मत आया कीजिए। कुक है न, वो बना देगा। आपके हाथ से कुछ गिर गया या आप फिसल गईं, तो हम पर ही मुसीबत आएगी।”
रितिका की आवाज़ में फिक्र कम और झुंझलाहट ज़्यादा होती थी। देवकी जी चुपचाप अपने कमरे में लौट आतीं। उन्हें अपना कमरा खुद समेटने की इजाज़त नहीं थी। उनके कपड़ों की अलमारी से लेकर उनके नहाने के साबुन तक का फैसला रितिका करती थी। देवकी जी को क्या खाना है, यह डॉक्टर के चार्ट और रितिका के आदेश पर तय होता था। अगर कभी देवकी जी कहतीं कि आज उनका मन कुछ तीखा या अपनी पसंद का खाने का है, तो अनुभव तुरंत कहता, “माँ, आप समझती क्यों नहीं हैं? आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है। हम आपके भले के लिए ही तो कर रहे हैं। आप बस आराम कीजिए न।”
आराम… यही वो शब्द था जिसने देवकी जी को अंदर ही अंदर खोखला कर दिया था। उन्हें महसूस होने लगा था कि इस घर में उनकी हैसियत ड्रॉइंग रूम में रखे उस महंगे एंटीक फूलदान जैसी है, जिसे रोज़ साफ तो किया जाता है, लेकिन उसकी अपनी कोई उपयोगिता नहीं है। घर के किसी भी फैसले में उनकी राय नहीं ली जाती थी। मायरा (अनुभव की बेटी) को किस स्कूल में डालना है, घर में कौन सी नई गाड़ी आनी है, यहाँ तक कि उनके खुद के कमरे के पर्दे कौन से रंग के होंगे—इन सब बातों में देवकी जी की कोई अहमियत नहीं थी।
पानी सिर के ऊपर तब गया, जब मायरा का सातवां जन्मदिन आया। अनुभव और रितिका ने एक बड़े फाइव-स्टार होटल में पार्टी रखी थी। शहर के कई नामी लोग आने वाले थे। देवकी जी ने अपनी पोती के लिए पिछले एक महीने से रात-रात भर जागकर अपने हाथों से एक बेहद खूबसूरत स्वेटर बुना था। साथ ही उन्होंने अपने हाथों से बेसन के लड्डू भी बनाए थे, जो मायरा को बहुत पसंद थे।
पार्टी वाले दिन, जब देवकी जी ने मायरा को वो स्वेटर पहनाना चाहा, तो रितिका ने तुरंत मायरा के हाथ से वो स्वेटर छीन लिया। “मम्मी जी, यह आप क्या कर रही हैं? आज की पार्टी का थीम ‘डिज्नी प्रिंसेस’ है। मैंने मायरा के लिए पेरिस से डिज़ाइनर गाउन मंगवाया है। यह हाथ का बुना हुआ पुराना सा स्वेटर पहनकर वो पार्टी में जाएगी? मेरे दोस्त क्या कहेंगे कि हम कितने आउटडेटेड हैं!”
देवकी जी का दिल बैठ गया। उन्होंने कहा, “बहू, बस थोड़ी देर के लिए पहना दे। मैंने बहुत प्यार से बुना है। और यह लड्डू…”
रितिका ने बीच में ही बात काट दी, “और ये लड्डू भी आप अपने कमरे में ही रखिए। वहां इटालियन डेसर्ट और फाइव-टियर केक आ रहा है। ये सब वहां रखेंगे तो बहुत चीप लगेगा। प्लीज मम्मी जी, आज आप कोई तमाशा मत कीजिएगा। आराम से सोफे पर बैठिएगा और मेहमानों से ज़्यादा बात मत कीजिएगा।”
देवकी जी के हाथ कांपने लगे। उन्होंने अपने बेटे अनुभव की तरफ देखा, जो अपना टाई की नॉट ठीक कर रहा था।
“अनुभव…” देवकी जी ने धीमी आवाज़ में कहा।
अनुभव ने बिना उनकी तरफ देखे कहा, “माँ, रितिका सही कह रही है। आप क्यों इन छोटी-छोटी बातों का इश्यू बनाती हैं? आपके लिए हमने इतना महंगा सिल्क का सूट मंगवाया है, आप वो पहनिए और चिल कीजिए। हमें बहुत काम है।”
उस रात पार्टी में देवकी जी सबसे पीछे एक कुर्सी पर बैठी रहीं। लोग आते, उनसे मिलते, अनुभव की तारीफ करते कि उसने अपनी माँ को कितने सुख से रखा है, और चले जाते। देवकी जी को लगा जैसे वो किसी और की ज़िंदगी जी रही हैं। वो एक ऐसी लाश बन चुकी थीं जिसे रोज़ नहला-धुलाकर एक मखमली कुर्सी पर बैठा दिया जाता था। उस रात कमरे में लौटकर देवकी जी रोईं नहीं। उनके अंदर के जमे हुए दर्द ने अब एक शांत दृढ़ता का रूप ले लिया था। उन्होंने अपने जीवन के पिछले पांच सालों का मूल्यांकन किया।
उन्होंने खुद से पूछा, “क्या मैं इतनी लाचार हूँ? क्या मैं सिर्फ एक शरीर हूँ जिसे खाने-पीने और एसी की हवा की ज़रूरत है? नहीं! मैं एक जीती-जागती इंसान हूँ। मेरा अपना एक दिमाग है, मेरी अपनी एक पहचान है। अगर मैं इस घर में रही, तो एक दिन मेरी आत्मा पूरी तरह से मर जाएगी।”
अगले दिन सुबह, जब अनुभव और रितिका नाश्ते की मेज पर बैठे थे, देवकी जी अपने हाथ में एक छोटा सा सूटकेस लिए बाहर आईं। उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी।
सूटकेस देखकर अनुभव चौंक गया। “माँ? यह क्या है? आप कहीं जा रही हैं क्या? किसी तीरथ-वीरथ का प्लान है तो मुझे बता देतीं, मैं ट्रैवल एजेंट से बोलकर फ्लाइट और अच्छे होटल का इंतज़ाम करवा देता।”
देवकी जी ने सूटकेस ज़मीन पर रखा और बहुत ही शांत स्वर में बोलीं, “नहीं अनुभव, मैं किसी तीरथ पर नहीं जा रही। मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ। हमेशा के लिए।”
रितिका के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। “क्या? आप मज़ाक कर रही हैं मम्मी जी? घर छोड़कर कहाँ जाएंगी आप?”
“अपने वजूद की तलाश में, बहू,” देवकी जी ने कहा। “मैंने देहरादून में अपनी एक पुरानी सहेली के पास एक छोटा सा घर किराए पर ले लिया है। वहाँ पास ही एक स्कूल है, जहाँ मैं बच्चों को मुफ्त में पढ़ाऊंगी।”
अनुभव गुस्से और झल्लाहट से खड़ा हो गया। “पागल हो गई हैं क्या आप इस उम्र में? वहां आपको कौन देखेगा? यहाँ आपके पास क्या कमी है? एसी कमरा है, डॉक्टर है, नौकर हैं। मैंने अपनी कमाई का इतना बड़ा हिस्सा आपके सुख-सुविधाओं पर लगा रखा है। लोग क्या कहेंगे मुझे? कि इतने बड़े आदमी ने अपनी माँ को धक्के खाने के लिए छोड़ दिया?”
“तुमने मुझे सब कुछ दिया अनुभव… सिवाय सम्मान के,” देवकी जी की आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरी सच्चाई थी। “तुमने मुझे सुख-सुविधाएं दीं, लेकिन मेरा अधिकार छीन लिया। तुमने मुझे सहारा दिया, लेकिन मेरा स्वाभिमान कुचल दिया।”
अनुभव ने कहा, “माँ, हम आपका सम्मान करते हैं। हमने कभी आपसे ऊंची आवाज़ में बात नहीं की।”
“ऊंची आवाज़ में बात न करना ही सिर्फ सम्मान नहीं होता, बेटा,” देवकी जी ने समझाया। “सम्मान का मतलब होता है सामने वाले के वजूद को स्वीकार करना। उसकी राय को अहमियत देना। उसे यह महसूस कराना कि घर में उसकी ज़रूरत है। तुमने मुझे इस घर में एक ऐसा पौधा बना दिया था जिसे पानी तो रोज़ मिलता है, लेकिन जिसे कभी धूप नहीं देखने दी जाती। मुझे तुम्हारे पैसों और इन मखमली गद्दों की ज़रूरत नहीं है। मुझे ज़रूरत थी इस अहसास की, कि मैं आज भी तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारे घर की कोई पुरानी और बेकार एंटीक घड़ी नहीं, जिसे बस शोपीस की तरह सजाकर रखा जाए।”
रितिका ने बीच में टोकते हुए कहा, “मम्मी जी, आप बात का बतंगड़ बना रही हैं। कल मैंने मायरा को स्वेटर पहनाने से मना क्या कर दिया, आप घर छोड़कर जा रही हैं?”
देवकी जी मुस्कुराईं। “बहू, बात सिर्फ कल के स्वेटर की नहीं है। बात उन हज़ारों पलों की है जब तुमने और अनुभव ने अनजाने में ही सही, मुझे यह महसूस कराया कि मैं इस घर के लिए अनफिट हूँ। मैं अनपढ़ नहीं हूँ। मैंने पूरी ज़िंदगी अपने फैसले खुद लिए हैं। लेकिन यहाँ, मुझे एक गिलास पानी लेने के लिए भी तुम्हारी इजाज़त का मोहताज बना दिया गया। तुम दोनों ने मेरी उम्र को मेरी लाचारी समझ लिया। मैं बूढ़ी ज़रूर हुई हूँ, पर अपाहिज नहीं।”
अनुभव ने माँ का हाथ पकड़ने की कोशिश की, “माँ, प्लीज। ऐसा मत कीजिए। मेरी रेपुटेशन का सवाल है।”
देवकी जी ने अपना हाथ धीरे से छुड़ा लिया। “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है अनुभव। तुम्हें आज भी अपनी रेपुटेशन की चिंता है, मेरी भावनाओं की नहीं। मुझे तुम्हारी कोई शिकायत नहीं है। तुम अपनी जगह सही हो, क्योंकि तुम्हारी दुनिया में प्यार को पैसों से तौला जाता है। लेकिन मेरी दुनिया अलग है। मुझे अपनी ज़िंदगी के बचे हुए चंद साल किसी पर निर्भर होकर, एक कमरे में टीवी स्क्रीन घूरते हुए नहीं बिताने। मुझे जीना है।”
अनुभव और रितिका निःशब्द खड़े रह गए। उनके पास देवकी जी की बातों का कोई जवाब नहीं था। देवकी जी ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गईं। आज उनके कदमों में कोई बुढ़ापे की लड़खड़ाहट नहीं थी, बल्कि एक नई आज़ादी की उड़ान थी।
महीनों बाद, अनुभव किसी काम से देहरादून गया था। उसने सोचा कि छुपकर देखे कि उसकी माँ किस हाल में हैं। उसे लग रहा था कि माँ अब तक परेशान हो चुकी होंगी और रो-रोकर वापस आने की जिद करेंगी।
लेकिन जब वो उस छोटे से स्कूल के अहाते में पहुँचा, तो उसने जो देखा, वो उसे अंदर तक झकझोर गया। देवकी जी एक सूती साड़ी पहने, पेड़ के नीचे बैठी बच्चों को गणित पढ़ा रही थीं। उनके चेहरे पर जो चमक, जो हँसी और जो आत्मविश्वास था, वो अनुभव ने पिछले पांच सालों में अपने उस करोड़ों के घर में कभी नहीं देखा था। बच्चे उन्हें ‘दादी-टीचर’ कहकर पुकार रहे थे और देवकी जी उनके बीच पूरी तरह से जीवंत लग रही थीं।
अनुभव की आँखों में आंसू आ गए। उसे समझ आ गया था कि उसने अपनी माँ को एक शानदार पिंजरा तो दिया था, लेकिन उनके आसमान छीन लिए थे। आज उसकी माँ ने वो आसमान वापस पा लिया था। वो चुपचाप वहां से लौट आया, क्योंकि वो जान गया था कि उसकी माँ अब ‘लाचार’ नहीं, बल्कि पूरी तरह से ‘स्वतंत्र’ हैं।
सच ही है, इंसान को जीवित रहने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए, लेकिन ‘जीने’ के लिए सिर्फ और सिर्फ आत्मसम्मान चाहिए। जब सम्मान नहीं रहता, तो सबसे महंगे बिस्तर पर भी नींद नहीं आती।
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