वजूद – गरिमा चौधरी 

सुधा अपनी छोटी सी बगिया में गुलाब की कलम लगा रही थी कि तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘आकृति’ का नाम देखकर उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। आकृति, उसकी इकलौती बेटी, जो पुणे में ब्याही थी।

“नमस्ते माँ!” आकृति की आवाज़ में एक अलग ही चहक थी।

“खुश रहो बेटा, आज सुबह-सुबह कैसे याद किया? सब ठीक तो है?” सुधा ने हाथ पोंछते हुए पूछा।

“माँ, एक खुशखबरी है। आप दूसरी बार नानी बनने वाली हैं!”

सुधा का दिल बल्लियों उछलने लगा। “अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी खबर है लली। भगवान तुम्हें और आने वाले बच्चे को स्वस्थ रखे।”

“लेकिन माँ…” आकृति थोड़ा हिचकिचाई, “इस बार एक बात है। कल रात सासू माँ कह रही थीं कि पिछली बार जब आरव हुआ था, तब आप सिर्फ डेढ़ महीने रहकर चली गई थीं। तब आप नौकरी करती थीं, स्कूल में प्रिंसिपल थीं, तो उन्होंने कुछ नहीं कहा। पर अब तो आप रिटायर हो चुकी हैं। घर पर अकेले ही रहती हैं। तो इस बार उन्होंने साफ कहा है कि समधन जी को कम से कम छह महीने के लिए आना होगा। डिलीवरी के एक महीना पहले और पाँच महीने बाद तक।”

सुधा के हाथ में पकड़ा खुरपा वहीं मिट्टी में धंस गया। चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी।

आकृति ने अपनी बात जारी रखी, “माँ, मुझे भी आपकी ज़रूरत होगी। सासू माँ को घुटनों में दर्द रहता है, वो दौड़-भाग नहीं कर सकतीं। और ननद की भी शादी होने वाली है छह महीने बाद, तो सासू माँ और ननद शॉपिंग और तैयारियों में व्यस्त रहेंगी। ऐसे में घर और दोनों बच्चों को संभालने के लिए आपका होना बहुत ज़रूरी है। आप तो फ्री ही हो अब, तो आ जाओगी न?”

‘आप तो फ्री ही हो अब…’ यह वाक्य सुधा के कानों में किसी पिघले हुए सीसे की तरह उतरा।

सुधा ने एक गहरी सांस ली और कहा, “बेटा, मैं बहुत खुश हूँ। मैं आऊंगी ज़रूर, लेकिन छह महीने के लिए नहीं। मैं डिलीवरी के समय आऊंगी और सवा महीने रहकर वापस आ जाऊंगी।”

“क्या? लेकिन माँ क्यों?” आकृति की आवाज़ में अविश्वास और थोड़ी नाराज़गी थी। “अब आपको कौन सी स्कूल की फाइलें चेक करनी हैं? पापा के जाने के बाद आप वैसे भी अकेले रहती हो। वहाँ अकेले दीवारों को काटने से तो अच्छा है कि यहाँ बेटी-दामाद और नाती-पोतों के बीच रहो।”

सुधा ने संयम बनाए रखा, “आकृति, मैं ‘फ्री’ नहीं हूँ। रिटायरमेंट का मतलब यह नहीं होता कि इंसान का अपना जीवन खत्म हो गया और वो सिर्फ एक ‘अतिरिक्त हाथ’ बनकर रह जाए। मैंने जो ‘संस्कार केंद्र’ शुरू किया है, जहाँ मैं बस्ती के गरीब बच्चों को पढ़ाती हूँ और औरतों को सिलाई सिखाती हूँ, वो मेरी ज़िम्मेदारी है। अगले तीन महीनों में उन बच्चों की बोर्ड परीक्षाएं हैं। मैं उन्हें बीच मंझधार में नहीं छोड़ सकती।”

“माँ!” आकृति झल्ला उठी। “वो कोई नौकरी थोड़ी है? वो तो बस आपका टाइमपास है। समाज सेवा है। आप उसे कभी भी बंद कर सकती हैं। अपनी सगी बेटी की ज़रूरत से बड़ा हो गया वो सेंटर?”

“बेटा, जिसे तुम टाइमपास कह रही हो, वो मेरे लिए ‘वजूद’ की बात है। और रही बात ज़रूरत की, तो मैं आऊंगी, मदद करूंगी, लेकिन अपनी शर्तों पर और अपनी सीमाओं में। मैं अपनी पूरी दुनिया समेटकर छह महीने के लिए नहीं आ सकती।”

फोन कट गया, लेकिन उस बातचीत की कड़वाहट हवा में घुल गई।

सुधा अपने ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ गई। सामने दीवार पर उसके पति, स्वर्गीय आलोक जी की तस्वीर टंगी थी। आलोक जी हमेशा कहते थे, “सुधा, नौकरी से रिटायर हो रही हो, ज़िंदगी से नहीं। अपने लिए जीना अब शुरू करना।”

पाँच साल पहले रिटायर होने के बाद सुधा ने अपनी जमा-पूंजी और पेंशन से अपने घर के निचले हिस्से में ‘संस्कार केंद्र’ खोला था। शुरुआत में दो-चार बच्चे आए, लेकिन सुधा की मेहनत और लगन से आज वहाँ पचास बच्चे पढ़ते थे। बीस महिलाएं सिलाई सीखकर आत्मनिर्भर बन रही थीं। यह सेंटर सुधा के लिए सिर्फ काम नहीं था, यह उसकी सांसें थीं। यह उसे एहसास दिलाता था कि वह समाज के लिए उपयोगी है, कि वह सिर्फ किसी की माँ या नानी नहीं, बल्कि ‘सुधा मैडम’ भी है।

लेकिन समाज और यहाँ तक कि उसकी अपनी बेटी की नज़र में, एक रिटायर औरत का मतलब था—’उपलब्ध नैनी’ (Available Nanny)।

कुछ दिनों बाद, सुधा पुणे पहुँची। आकृति का सातवां महीना चल रहा था। घर में घुसते ही आकृति की सास, सुमित्रा जी ने मीठी मुस्कान के साथ स्वागत किया, जो असल में एक व्यंग्य था।

“आइये-आइये समधन जी। अब तो आप ही का सहारा है। हमने तो आकृति से कह दिया था कि अपनी माँ को बुला ले। भाई, जिसके पास कोई काम-धाम नहीं, वो अपनों के काम न आए तो फिर क्या फायदा?” सुमित्रा जी ने चाय का कप बढ़ाते हुए कहा।

सुधा ने मुस्कुराकर कप लिया, “काम-धाम तो बहुत है सुमित्रा जी। ईश्वर की कृपा से साँस लेने की फुर्सत नहीं मिलती। बस बेटी के लिए समय निकालकर आई हूँ।”

सुमित्रा जी के चेहरे का भाव बदल गया। “अरे, अब बुढ़ापे में क्या काम? अब तो भजन-कीर्तन की उम्र है। और नाती-पोतों को खिलाना ही सबसे बड़ा पुण्य है।”

दिन बीतने लगे। सुधा ने देखा कि घर का माहौल कैसा था। आकृति अपनी प्रेगनेंसी और ऑफिस के वर्क-फ्रॉम-होम में उलझी थी। आरव (पहला बेटा) पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाता था। सुमित्रा जी सोफे पर पैर फैलाकर टीवी धारावाहिक देखतीं और बीच-बीच में निर्देश देतीं—”सुधा जी, आरव को जूस पिला दीजिये”, “सुधा जी, आज खाने में कोफ्ते बना लीजिये, आकृति से खड़े होकर नहीं बनेगा।”

सुधा सब करती। वह सुबह 5 बजे उठती, नाश्ता बनाती, आरव को स्कूल के लिए तैयार करती, आकृति का ध्यान रखती। लेकिन शाम को वह अपने लैपटॉप पर अपने सेंटर के टीचर्स के साथ वीडियो कॉल पर मीटिंग ज़रूर करती। वह बच्चों के नोट्स चेक करती और ऑनलाइन ही निर्देश देती।

यह बात सुमित्रा जी को खटकती थी। एक दिन खाने की मेज पर उन्होंने कह ही दिया, “समधन जी, अब ये लैपटॉप छोड़िये। घर में इतना काम पड़ा है और आप हैं कि दुनिया सुधारने में लगी हैं। वो गरीब बच्चे तो वैसे भी सरकारी स्कूल में पास हो ही जाएंगे, यहाँ घर की फिक्र कीजिये।”

सुधा ने खाने का निवाला नीचे रखा। उसकी आँखों में एक दृढ़ता थी। “सुमित्रा जी, वो बच्चे मेरे लिए फाइलें नहीं, भविष्य हैं। और रही बात घर की फिक्र की, तो मैं अपनी क्षमता से ज्यादा कर रही हूँ। लेकिन मैं अपनी पहचान को गिरवी रखकर यहाँ नहीं बैठी हूँ।”

आकृति ने कोहनी मारकर माँ को चुप रहने का इशारा किया। रात को कमरे में आकृति ने सुधा से कहा, “माँ, प्लीज़ आप सासू माँ को पलटकर जवाब मत दिया करो। वो घर की बड़ी हैं। और उनका कहना गलत भी तो नहीं है। आप रिटायर हो चुके हो, क्यों इतनी हेडएक लेते हो सेंटर की?”

सुधा ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा, “आकृति, तू पढ़ी-लिखी है, बड़ी कंपनी में मैनेजर है। अगर कल को तू रिटायर होगी, तो क्या तू सिर्फ घर के कोने में बैठकर हुक्म मानने के लिए तैयार हो जाएगी? बेटा, एक औरत का जीवन सिर्फ दूसरों की सेवा के लिए नहीं होता। मेरी भी अपनी आकांक्षाएं हैं। मैंने तुम सबको पाला, बड़ा किया, पैरों पर खड़ा किया। अब जब मेरे पास अपने लिए वक्त है, तो तुम लोग चाहते हो कि मैं उसे भी तुम लोगों पर ही न्योछावर कर दूँ?”

वक्त गुज़रा। आकृति ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। घर में खुशियां आईं, लेकिन सुधा के जाने का समय भी नज़दीक आ गया। सवा महीना पूरा होने वाला था।

जिस दिन सुधा ने अपनी वापसी की टिकट बुक कराई, घर में भूचाल आ गया।

“क्या? आप परसों जा रही हैं?” सुमित्रा जी ने ज़ोर से चाय का कप मेज पर पटका। “यह कैसे हो सकता है? अभी तो बच्ची दस दिन की है। आकृति को अभी आराम की ज़रूरत है। और मेरी बेटी (ननद) की शादी की शॉपिंग कौन कराएगा? मैंने तो रिश्तेदारों में कह दिया था कि समधन जी हैं, वो सब संभाल लेंगी।”

आकृति भी रोने लगी। “माँ, आप ऐसे कैसे जा सकती हो? आपने तो कहा था आप मदद करोगी। मुझे लगा था आप रुक जाओगी। आप इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हो?”

‘स्वार्थी’—यह शब्द सुधा के दिल को चीर गया। जिस माँ ने अपनी जवानी, अपनी नींदें, अपने शौक सब कुछ बच्चों पर वार दिए, आज अपनी शर्तों पर जीने के लिए उसे स्वार्थी कहा जा रहा था।

सुधा ने गहरी सांस ली और अपने बैग से एक लिफाफा निकाला।

“आकृति, सुमित्रा जी, बैठिये। मुझे कुछ बात करनी है,” सुधा की आवाज़ में एक अजीब सी शांति थी।

उसने वह लिफाफा मेज पर रखा। “आकृति, इसमें पचास हज़ार रुपये हैं।”

“पैसे? किसलिए?” आकृति हैरान थी।

“सुनो,” सुधा ने कहा। “मैं जानती हूँ कि तुम्हें मदद की ज़रूरत है। लेकिन तुम लोग ‘मदद’ नहीं, तुम लोग मेरा ‘जीवन’ मांग रहे हो। जो मैं नहीं दे सकती। मेरे सेंटर पर तीन लड़कियों की सगाई टूट गई क्योंकि उनके पास हुनर नहीं था, आज वो मेरे पास सीख रही हैं ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। अगर मैं छह महीने यहाँ रुक गई, तो वो सेंटर बंद हो जाएगा और उन लड़कियों की उम्मीद टूट जाएगी।”

सुधा ने सुमित्रा जी की ओर देखा। “सुमित्रा जी, आप चाहती हैं कि घर का काम और बच्चे संभलें। यह मेरी ज़िम्मेदारी नहीं, यह आपकी और आकृति-दामाद जी की संयुक्त ज़िम्मेदारी है। मैं नानी हूँ, आया (Nanny) नहीं। फिर भी, एक माँ होने के नाते, मैंने यह इंतज़ाम किया है।”

सुधा ने एक कार्ड निकाला। “यह शहर की सबसे प्रतिष्ठित ‘होम केयर एजेंसी’ का कार्ड है। मैंने बात कर ली है। वे एक प्रशिक्षित जापा-मेड (नर्स) और एक हाउस-हेल्प भेजेंगे। उनकी छह महीने की सैलरी मैं एडवांस में दे रही हूँ। वो नर्स बच्चे और आकृति का मुझसे बेहतर ख्याल रखेगी, और हाउस-हेल्प घर का काम देखेगी। रही बात प्यार की, तो मैं रोज़ वीडियो कॉल करूँगी और जब भी बच्चों को मेरी याद आएगी, मैं दौड़ी चली आऊंगी… लेकिन मेहमान बनकर, परमानेंट वर्कर बनकर नहीं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी का मुंह खुला का खुला रह गया। उन्हें उम्मीद थी कि सुधा इमोशनल ब्लैकमेल में आकर रुक जाएगी, लेकिन सुधा ने तो समस्या का व्यावहारिक हल निकालकर उनके हाथ में रख दिया था।

आकृति ने गुस्से में कहा, “माँ, पैसे से रिश्ते नहीं निभाए जाते। मेड, माँ की जगह नहीं ले सकती।”

“सही कहा तूने आकृति,” सुधा ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा। “मेड माँ की जगह नहीं ले सकती, इसीलिए मैं कह रही हूँ कि मुझे ‘मेड’ मत बनाओ। मुझे माँ ही रहने दो। जब तुम मुझसे यह उम्मीद करती हो कि मैं अपना सब कुछ छोड़कर तुम्हारे डायपर और किचन संभालूं, तो तुम मुझे माँ नहीं, एक फ्री की लेबर समझ रही हो। जिस दिन तुम मुझे एक व्यक्ति, एक इंसान के तौर पर देखोगी, उस दिन तुम्हें मेरा फैसला स्वार्थ नहीं, स्वाभिमान लगेगा।”

सुधा उठी और अपने कमरे में जाकर पैकिंग पूरी करने लगी। पीछे ड्राइंग रूम में खामोशी थी।

दो दिन बाद सुधा वापस अपने शहर लौट आई। घर का ताला खोलते ही उसे जो सुकून मिला, वह बयां से बाहर था। अगले ही दिन वह अपने सेंटर पहुँची। बच्चों ने उसे घेर लिया।

“मैडम, आप आ गईं! हमें लगा आप अब नहीं आएंगे,” एक छोटी बच्ची ने उसका हाथ पकड़कर कहा।

सुधा ने उसे गले लगाया, “मैं अपनी नन्ही कलियों को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती।”

उधर पुणे में शुरुआत में थोड़ी दिक्कतें हुईं। सुमित्रा जी ने खूब नाक-भौं सिकोड़ी। आकृति ने भी माँ से ठीक से बात नहीं की। लेकिन सुधा ने जो नर्स और हेल्प लगवाई थी, वे बहुत ही पेशेवर निकले। धीरे-धीरे घर व्यवस्थित हो गया। आकृति को भी एहसास हुआ कि प्रोफेशनल मदद होने से वह भी तनावमुक्त थी, और सासू माँ की किचकिच भी कम हो गई थी क्योंकि काम समय पर हो रहा था।

तीन महीने बाद।

सुधा के सेंटर के बच्चों का रिजल्ट आया। सभी बच्चे अच्छे नंबरों से पास हुए थे। स्थानीय अखबार ने सुधा की फोटो के साथ आर्टिकल छापा—“रिटायरमेंट के बाद जलाई शिक्षा की अलख: सुधा जी बनीं मिसाल।”

सुधा ने वह कटिंग व्हाट्सएप पर आकृति को भेजी।

शाम को आकृति का वीडियो कॉल आया। सुधा ने सोचा शायद वह आरव को दिखाने के लिए फोन कर रही है। लेकिन स्क्रीन पर आकृति अकेली थी। उसकी आँखों में आंसू थे।

“माँ…” आकृति ने भर्राई आवाज़ में कहा।

“क्या हुआ बेटा? सब ठीक है?” सुधा घबरा गई।

“माँ, मैंने आज अखबार में आपके बारे में पढ़ा। मुझे… मुझे माफ़ कर दो माँ।”

सुधा चुप रही।

“मैं कितनी खुदगर्ज़ हो गई थी,” आकृति ने आगे कहा। “मैं सिर्फ अपनी सुविधा देख रही थी। मैंने यह सोचा ही नहीं कि आपकी भी एक दुनिया है, आपके भी सपने हैं। आज जब मैंने उस आर्टिकल में पढ़ा कि आपने उन गरीब बच्चों के लिए क्या किया है, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरी माँ कितनी बड़ी हस्ती हैं। और मैं उस हस्ती को घर के बर्तनों में कैद करना चाहती थी।”

सुधा की आँखों में भी नमी आ गई। “बेटा, माँ का कद कभी कम नहीं होता। बस बच्चों को यह समझना चाहिए कि माँ का वजूद सिर्फ ‘त्याग’ नहीं होता, उसकी अपनी ‘उड़ान’ भी होती है।”

“आप सही थे माँ,” आकृति मुस्कुराई। “आपने जो नर्स भेजी, उसने बहुत अच्छे से संभाला। और अब तो सासू माँ भी खुश हैं क्योंकि उन्हें काम नहीं करना पड़ता। आपने हमें आत्मनिर्भर बनना सिखाया, और मैंने आपको ही बैसाखी बनाने की कोशिश की। आई एम सॉरी।”

“कोई बात नहीं पगली,” सुधा ने हंसते हुए कहा। “अब बता, मेरी नातिन कैसी है?”

“बहुत प्यारी है। और जानते हो माँ? जब वो बड़ी होगी, तो मैं उसे बताऊंगी कि उसकी नानी सिर्फ लोरी नहीं सुनाती थीं, वो दुनिया बदलती थीं।”

सुधा ने फोन रखा और खिड़की से बाहर देखा। शाम घिर आई थी, लेकिन उसके मन में एक नई सुबह का उजाला था। उसने साबित कर दिया था कि एक औरत की भूमिकाएं बदलती रहती हैं, लेकिन उसका आत्मसम्मान और उद्देश्य उसके साथ अंतिम सांस तक रहना चाहिए। उसने ‘नानी’ होने का धर्म भी निभाया था और ‘सुधा’ होने का भी।

वह उठी और अपनी डायरी में अगले दिन के काम की सूची बनाने लगी। क्योंकि अभी बहुत कुछ करना बाकी था। जीवन रिटायर नहीं हुआ था, बस उसने एक नया गियर बदला था।

(निष्कर्ष)

यह कहानी उन सभी माताओं के लिए है जो अपने बच्चों के जीवन को संवारने के बाद, अपने जीवन के संध्याकाल में अपनी पहचान ढूंढ रही हैं। प्यार और कर्तव्य अपनी जगह हैं, लेकिन आत्म-सम्मान और अपने सपनों को जीने का हक हर उम्र में बरकरार रहना चाहिए। सुधा ने न केवल अपनी बेटी को, बल्कि समाज को भी एक नया नज़रिया दिया—कि बुजुर्ग घर की शोभा बढ़ाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाले स्तंभ हो सकते हैं।

लेखिका : गरिमा चौधरी 

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