** “सुहागरात की वो सेज, जो फूलों से सजी थी, उस पर बैठी दुल्हन कांप रही थी—शर्म से नहीं, बल्कि एक डर से। एक ऐसा डर जो उसके अतीत के साये से जुड़ा था। क्या उसका पति उसका हाथ थामेगा या फिर समाज के तानों से डरकर उसे बीच मझधार में छोड़ देगा? जानिये राघव ने कैसे निभाया वो वादा जो सात फेरों में नहीं, बल्कि रूह के फेरों में लिया जाता है।”
“बदनामी आग लगाने वाले करते हैं माँ, जलने वाले नहीं,” राघव ने कहा। “और रही बात आपको न बताने की, तो यह झूठ है। मुझे सब पता था। शादी से पहले ससुर जी ने मुझे एक-एक बात बता दी थी। और मैंने ही उन्हें मना किया था कि घर में इस बारे में बात न करें।”
बनारस के घाटों पर शाम की आरती की गूंज अभी थमी ही थी कि ‘रघुवंशी सदन’ में शहनाई की आवाज़ गूंजने लगी। यह शहर का एक प्रतिष्ठित परिवार था और आज उनके इकलौते बेटे, राघव की शादी थी। राघव, जो स्वभाव से गंभीर, कम बोलने वाला और अपनी जिम्मेदारियों को ओढ़ने वाला इंसान था। दूसरी तरफ थी अनन्या—नाज़ुक सी, बड़ी-बड़ी डरी हुई आँखों वाली, जिसके चेहरे पर मुस्कान तो थी, लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक अजीब सी घबराहट छिपी थी।
विदाई के वक्त जब अनन्या अपने पिता के गले लगी थी, तो उसने सिर्फ एक ही बात कही थी, “पापा, अगर इस बार भी कुछ गलत हुआ तो मैं टूट जाऊंगी।” उसके पिता ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा था, “राघव हीरा है बेटा, वो तुम्हें समझेगा।”
लेकिन अनन्या का दिल नहीं मान रहा था। उसके मन में पिछले दो सालों का वो कड़वा सच किसी नासूर की तरह जमा था जिसने उसकी हंसी छीन ली थी।
अनन्या की यह दूसरी सगाई थी। पहली शादी टूटने की वजह दहेज नहीं, बल्कि एक अफवाह थी। उसके पहले मंगेतर ने शादी के मंडप से सिर्फ दो दिन पहले रिश्ता तोड़ दिया था, यह कहकर कि “लड़की के चरित्र में खोट है, उसका किसी और के साथ चक्कर है।” यह पूरी तरह झूठ था, एक पड़ोसी की ईर्ष्या से उपजा हुआ झूठ। लेकिन समाज ने सच जानने की कोशिश नहीं की। अनन्या और उसका परिवार सफाई देते रह गए, पर रिश्ता टूट गया। उस दिन अनन्या ने महसूस किया था कि एक लड़की की इज़्ज़त कांच के बर्तन से भी ज्यादा नाजुक होती है, एक कंकड़ लगे और सब चकनाचूर।
राघव के साथ रिश्ता जुड़ते वक्त अनन्या के पिता ने राघव को सब सच बता दिया था। राघव ने सिर्फ इतना कहा था, “मुझे अतीत से नहीं, आने वाले कल से मतलब है।” लेकिन राघव के परिवार को, खास तौर पर उसकी माँ सुमित्रा देवी और बुआ कांता को इस बात की भनक तक नहीं थी।
शादी की रस्में पूरी हुईं। अनन्या अब रघुवंशी सदन की बहू थी।
सुहागरात की रात। कमरे में मोगरे की खुशबू फैली थी। राघव कमरे में दाखिल हुआ। अनन्या घूंघट काढ़े बिस्तर के कोने में सिमटी बैठी थी। उसके हाथ कांप रहे थे। राघव ने दरवाज़ा बंद किया और धीरे-धीरे उसके पास आया।
उसने अनन्या के सिर से घूंघट हटाया। अनन्या की आँखें झुकी हुई थीं, उनमें आँसू तैर रहे थे।
“अनन्या?” राघव ने बहुत धीमे स्वर में पुकारा।
अनन्या ने नज़रें नहीं उठाईं।
“डर लग रहा है?” राघव ने पास पड़ी कुर्सी खींचकर बैठते हुए पूछा।
अनन्या ने बस सिर हिलाया।
राघव ने पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया। “पियो। और सुनो, यह कोई इम्तिहान नहीं है। हम पति-पत्नी हैं, लेकिन पहले हमें दोस्त बनना होगा। मैं जानता हूँ तुम्हारे मन में बहुत कुछ चल रहा है। पर विश्वास रखो, यहाँ तुम्हें कोई जज नहीं करेगा।”
राघव की आवाज़ में एक ठहराव था, एक सुरक्षा का वादा था। अनन्या ने पहली बार नज़रें उठाकर उसे देखा। राघव की आँखों में हवस नहीं, सम्मान था। उस रात उन्होंने ढेर सारी बातें कीं। अनन्या ने पाया कि राघव वो इंसान नहीं है जो सिर्फ अधिकार जताना जानता हो, बल्कि वो है जो सुनना जानता है।
अगली सुबह ‘मुँह दिखाई’ की रस्म थी। घर औरतों से भरा हुआ था। सुमित्रा देवी अपनी नई बहू की खूबसूरती पर इतरा रही थीं। सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी कांता बुआ का प्रवेश हुआ। कांता बुआ, जिनका काम ही था खुशियों में नमक डालना।
वह सोफे पर जम गईं और अनन्या को ऊपर से नीचे तक घूरने लगीं।
“अरे सुमित्रा भाभी, बहू तो चाँद का टुकड़ा है। पर मैंने सुना है इसके माथे पर पहले से ही दाग लगा हुआ है?” बुआ ने भरी महफिल में बम फोड़ा।
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा देवी के हाथ से मिठाई का डिब्बा लगभग छूटते-छूटते बचा।
“यह क्या कह रही हो जीजी?” सुमित्रा ने अविश्वास से पूछा।
“अरे, तुम्हें नहीं पता? मुझे तो मेरी समधन ने बताया जो इनके मोहल्ले के पास रहती हैं। इस लड़की की पहले कहीं और सगाई हुई थी। और वो सगाई इसलिए टूटी क्योंकि लड़के वालों ने कहा इसका चाल-चलन ठीक नहीं था। पता नहीं राघव ने क्या देख लिया इसमें जो ब्याह लाया। कहीं हमारे कुल में दाग न लग जाए।”
अनन्या का चेहरा फक पड़ गया। वही हुआ जिसका उसे डर था। उसका अतीत फिर से उसका वर्तमान निगलने आ गया था। मेहमान औरतें कानाफूसी करने लगीं।
“हाय राम! चरित्रहीन है?”
“देखो तो सूरत से कितनी भोली लगती है।”
“तभी मैं सोचूँ इतनी सुंदर लड़की हमें इतनी आसानी से कैसे मिल गई।”
सुमित्रा देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह समाज की बहुत परवाह करती थीं। वह उठीं और अनन्या के पास गईं।
“अनन्या! क्या यह सच है? तेरी सगाई टूटी थी?” सुमित्रा की आवाज़ में कड़वाहट थी।
अनन्या खड़ी हो गई, उसके होंठ कांप रहे थे। “माँ जी… वो…”
“चुप!” सुमित्रा चिल्लाईं। “मुझे सफाई नहीं, जवाब चाहिए। क्या तेरा रिश्ता चरित्र के इल्जाम पर टूटा था?”
“हाँ… पर वो झूठ था माँ जी,” अनन्या रो पड़ी।
“झूठ और सच का फैसला तो बाद में होगा। तूने हमें धोखे में रखा? हमारे घर की इज़्ज़त का क्या? राघव… राघव कहाँ है?” सुमित्रा ने आवाज़ लगाई।
राघव सीढ़ियों से उतर रहा था। उसने नीचे का माहौल देखा। अपनी माँ का गुस्सा, बुआ की कुटिल मुस्कान और बीच में खड़ी, रोती हुई अनन्या। अनन्या की आँखों में वही डर था जो उसने विदाई के वक्त देखा था— *’कि मैंने गलत इंसान चुन लिया’।*
राघव भीड़ को चीरता हुआ बीच में आया।
“क्या हो रहा है यहाँ?” राघव ने अपनी माँ से पूछा।
“तू पूछ रहा है क्या हो रहा है? तेरी बीवी… यह लड़की, कलंकिनी है! इसकी सगाई पहले टूट चुकी थी और तूने हमें बताया तक नहीं? तू इसे अभी के अभी घर से निकाल दे। मैं ऐसी बहू के साथ एक छत के नीचे नहीं रह सकती,” सुमित्रा ने फैसला सुना दिया।
अनन्या ने राघव की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक मूक प्रश्न था— *क्या तुम भी वही करोगे जो दुनिया करती है?* उसे लगा अब राघव भी उसे धिक्कारेगा, अपनी माँ का पक्ष लेगा।
राघव ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी माँ की आँखों में देखा, फिर बुआ की तरफ, और अंत में अनन्या की तरफ मुड़ा। वह धीरे से अनन्या के पास गया। अनन्या अपनी जगह से हिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।
राघव ने सबके सामने, अपनी माँ और रिश्तेदारों की परवाह किए बिना, अनन्या का हाथ अपने हाथ में ले लिया। कसकर। एक ऐसी पकड़ जो कह रही थी— *मैं हूँ।*
“माँ,” राघव की आवाज़ शांत लेकिन बेहद सख्त थी। “अनन्या की सगाई टूटी थी, यह सच है। लेकिन क्यों टूटी थी, यह आपने जानने की कोशिश की? या बुआ जी की बातों को वेद-वाक्य मान लिया?”
“वजह चाहे जो हो, बदनामी तो हुई थी न!” सुमित्रा ने तर्क दिया।
“बदनामी आग लगाने वाले करते हैं माँ, जलने वाले नहीं,” राघव ने कहा। “और रही बात आपको न बताने की, तो यह झूठ है। मुझे सब पता था। शादी से पहले ससुर जी ने मुझे एक-एक बात बता दी थी। और मैंने ही उन्हें मना किया था कि घर में इस बारे में बात न करें।”
“तुझे पता था?” सुमित्रा हैरान रह गईं। “तूने जानते हुए भी इस दागदार लड़की से शादी की?”
“दागदार?” राघव की आवाज़ अब ऊंची हो गई। “किस बात का दाग माँ? सिर्फ इसलिए कि किसी घटिया आदमी ने अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए एक लड़की के चरित्र पर उंगली उठा दी? और उस लड़के ने रिश्ता तोड़ दिया क्योंकि उसमें रीढ़ की हड्डी नहीं थी कि वो अपनी होने वाली पत्नी के लिए खड़ा हो सके? अगर अनन्या की जगह आपकी बेटी होती और उसके साथ ऐसा होता, तो क्या आप उसे दागदार कहतीं?”
पूरा हॉल सुन्न था। राघव बोल रहा था, जो कभी किसी के सामने जुबान नहीं खोलता था।
“माँ, जब हम सब्जी खरीदते हैं तो दस बार ठोक-बजा कर देखते हैं। तो क्या जीवनसाथी चुनते वक्त मैंने नहीं देखा होगा? अनन्या पवित्र है, उसका मन साफ़ है। उसने वो सहा है जो किसी को नहीं सहना चाहिए। और आज… आज उसके अपने ससुराल में, उसके पहले ही दिन, आप लोग वही कर रहे हैं जो उस पिछले मंगेतर ने किया था। आप उसे तोड़ रहे हैं।”
राघव ने अनन्या का हाथ और कसकर पकड़ा और उसे थोड़ा आगे खींचा।
“सुन लीजिये सब लोग। यह अनन्या राघव रघुवंशी है। यह मेरे घर की लक्ष्मी है, मेरी पत्नी है। इसका अपमान मेरा अपमान है। अगर किसी को लगता है कि हमने गलत बहू चुनी है, तो वो यह घर छोड़ सकता है। लेकिन मेरी पत्नी कहीं नहीं जाएगी। और बुआ जी…”
राघव ने कांता बुआ की तरफ देखा, जिनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी थी।
“आप बड़ी हैं, मैं इज़्ज़त करता हूँ। लेकिन अगर आपने मेरे परिवार में जहर घोलने की कोशिश की, तो मुझे मर्यादा लांघनी पड़ेगी। आइंदा मेरी पत्नी के बारे में एक भी गलत शब्द मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा।”
अनन्या राघव का चेहरा देख रही थी। आँसू अब भी बह रहे थे, लेकिन ये दुख के नहीं, राहत के थे। आज पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसके साथ कोई खड़ा है। कोई ऐसा जो सिर्फ पति नहीं, उसका रक्षक है।
सुमित्रा देवी अपने बेटे का यह रौद्र रूप देखकर सहम गईं। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने देखा कि कैसे उनका बेटा ढाल बनकर अपनी पत्नी के आगे खड़ा है। शायद यही वो संस्कार थे जो उन्होंने राघव को दिए थे—सच का साथ देना।
सुमित्रा धीरे से आगे बढ़ीं। उन्होंने अनन्या के सिर पर हाथ रखा।
“मुझे माफ़ कर दे बेटी,” सुमित्रा का गला भर आया। “मैं कानों की कच्ची निकली। मैंने अपनी ही बहू को पहचानने में गलती कर दी। राघव सही कह रहा है, तू सोने का टुकड़ा है।”
बुआ जी शर्मिंदा होकर वहाँ से खिसक लीं। मेहमानों ने भी चुप्पी साध ली और धीरे-धीरे रस्मों में लग गए।
बाद में, जब सब चले गए और दोपहर की धूप खिड़की से कमरे में आ रही थी, राघव कमरे में आया। अनन्या खिड़की के पास खड़ी थी। वह मुड़ी और राघव को देखती रही।
“क्या हुआ? अब भी डर लग रहा है?” राघव ने मुस्कुराते हुए पूछा।
अनन्या दौड़कर उसके पास आई और उसके सीने से लग गई। वह फूट-फूट कर रोने लगी।
“थैंक यू राघव… थैंक यू सो मच। आज आपने मुझे बचा लिया। अगर आज आप मेरा हाथ छोड़ देते, तो मैं शायद मर जाती।”
राघव ने उसके आंसू पोंछे और उसे सोफे पर बैठाया। उसने घुटनों के बल बैठकर अनन्या के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए।
“पागल हो क्या?” राघव ने प्यार से कहा। “मैंने शादी के सात वचनों में एक वचन यह भी दिया था कि हर अपमान से तुम्हारी रक्षा करूँगा। और अनन्या, एक बात हमेशा याद रखना…”
राघव ने अनन्या की आँखों में गहराई से देखा।
“मेरी ज़िंदगी की कोशिश बस इतनी सी है कि, जो मेरा हाथ पकड़े उसे कभी ये महसूस न हो कि उसने गलत इंसान चुना है। जिस दिन तुम्हें लगेगा कि मैं तुम्हारे लिए सही नहीं हूँ, उस दिन मैं अपनी हार मान लूँगा। लेकिन जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम्हें यह अफ़सोस कभी नहीं होने दूँगा कि तुमने राघव पर भरोसा क्यों किया।”
अनन्या ने राघव के हाथों को अपने गालों से लगा लिया। उसे याद आया अपने पिता का कहा हुआ वाक्य— *’राघव हीरा है’।* आज वह हीरा चमक रहा था।
उस दिन के बाद से रघुवंशी सदन में कई तूफ़ान आए, कई मुश्किलें आईं, लेकिन राघव और अनन्या के बीच की वो डोर कभी कमजोर नहीं पड़ी। बुआ ने कई बार कोशिश की, रिश्तेदारों ने कई बातें बनाईं, लेकिन राघव हमेशा अनन्या के आगे दीवार बनकर खड़ा रहा।
अनन्या ने भी उस विश्वास का मान रखा। उसने अपने प्यार और सेवा से न सिर्फ सुमित्रा देवी का दिल जीता, बल्कि पूरे घर को एक सूत्र में पिरो दिया। वह डरी हुई लड़की अब एक आत्मविश्वास से भरी महिला थी, क्योंकि उसे पता था कि अगर वह लड़खड़ाई, तो उसे थामने वाला हाथ दुनिया का सबसे मजबूत हाथ है।
वक्त बीतता गया। दोनों बूढ़े हो गए।
एक दिन अस्पताल के बिस्तर पर राघव लेटा था। अंतिम समय था। सांसे उखड़ रही थीं। अनन्या, जिसके बालों में अब चांदी उतर आई थी, उसके बगल में बैठी थी। उसने राघव का झुर्रियों भरा हाथ थाम रखा था।
राघव ने अपनी धुंधली आँखों से अनन्या को देखा और मुस्कुराया। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
“अनन्या…”
“हाँ राघव, मैं यही हूँ,” अनन्या ने रुंधे गले से कहा।
“एक बात बताओ… क्या मैं अपनी कोशिश में कामयाब रहा?”
अनन्या समझ गई कि वो किस कोशिश की बात कर रहे हैं। वही जो उन्होंने सुहागरात के अगले दिन कही थी।
अनन्या ने उसके हाथ को चूमा और आंसुओं के बीच मुस्कुराई।
“राघव, आपने सिर्फ हाथ नहीं थामा था, आपने मुझे मेरी पहचान दी थी। अगर सात जन्म होते हैं, तो मैं हर जन्म में बस यही दुआ करूँगी कि मेरा हाथ आपके ही हाथों में हो। आपने मुझे कभी, एक पल के लिए भी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैंने गलत इंसान चुना है।”
राघव के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान फैल गई। उसने अपनी आँखें मूंद लीं। उसकी पकड़ ढीली पड़ गई, लेकिन उस पकड़ की गर्माहट अनन्या की रूह में हमेशा के लिए बस गई।
वह हाथ छूट गया था, लेकिन वह साथ अमर हो गया था।
**समापन:**
दोस्तों, शादी सिर्फ दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्म-सम्मानों का गठबंधन है। अक्सर हम देखते हैं कि जब दुनिया उंगली उठाती है, तो अपने भी साथ छोड़ देते हैं। लेकिन असली जीवनसाथी वही है जो तब आपका हाथ थामे जब पूरी दुनिया आपके खिलाफ खड़ी हो। राघव जैसे पति विरले ही मिलते हैं जो पत्नी के अतीत को उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी बना लेते हैं। प्यार का असली मतलब ही यही है—सामने वाले को सुरक्षित महसूस कराना।
**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके जीवन में कोई ऐसा शख्स है जिसने मुश्किल वक्त में आपका हाथ थामकर कहा हो कि “मैं हूँ ना”? या क्या आप किसी के लिए वो शख्स बने हैं? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।
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**अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल को छुआ, तो इसे लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। रिश्तों की गहराई और विश्वास की ऐसी ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद।**
लेखिका : रमा शुक्ला