“अब एक पल भी… बस एक पल भी मैं इस गँवार और सुस्त औरत के साथ नहीं रह सकता! मेरा स्टैंडर्ड, मेरी रेप्युटेशन, सब मिट्टी में मिला दिया है इसने!”
विक्रम की दहाड़ से पूरे बंगले की दीवारें जैसे कांप उठी थीं। लिविंग रूम के बीचों-बीच इटैलियन मार्बल के फर्श पर एक टूटी हुई एंटीक मूर्ति के टुकड़े बिखरे पड़े थे। वह मूर्ति, जिसे विक्रम पिछले हफ्ते ही लंदन की एक नीलामी से जीतकर लाया था, अब मिट्टी का ढेर बन चुकी थी। सामने सोफे के पास खड़ी मीरा का चेहरा एकदम सफेद पड़ चुका था, जैसे उसके शरीर में रक्त की एक बूंद भी न बची हो।
सीढ़ियों से उतरती हुई राजेश्वरी देवी की लाठी की ‘ठक-ठक’ आवाज़ ने उस शोरगुल में एक अजीब सा विराम लगा दिया। उनकी नज़र पहले फर्श पर बिखरे टुकड़ों पर गई, फिर विक्रम के लाल-भभूका चेहरे पर और अंत में मीरा की झुकी हुई पलकों पर।
“क्या तमाशा है ये विक्रम? आज रविवार के दिन भी शांति नहीं?” राजेश्वरी देवी की आवाज़ में एक ऐसी गंभीरता थी जिसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था।
“माँ, आप इसे शांति कहती हैं?” विक्रम ने अपने बालों में उंगलियां फंसाते हुए झुंझलाकर कहा। “तीन करोड़ की विंटेज मूर्ति थी वो! मैंने इसे बस इतना कहा था कि धूल साफ करते वक्त ध्यान रखना। और नतीजा देखिए। इसके हाथ से ‘फिसल’ गई। इसे न चीज़ों की कीमत पता है, न मेरे वजूद की। मुझे डिवोर्स चाहिए, माँ। अभी के अभी। मैं अपनी लाइफ को इस तरह बर्बाद होते नहीं देख सकता।”
मीरा ने होंठ भींचे और दबी आवाज़ में कहा, “माँ जी, मैंने उसे नहीं गिराया। मैं तो बस पास से गुज़र रही थी कि अचानक विक्रम का हाथ लगा और…”
“झूठी कहीं की!” विक्रम फिर चिल्लाया। “अब तुम कहोगी कि मैंने अपनी ही चीज़ तोड़ी? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझ पर इल्ज़ाम लगाने की?”
राजेश्वरी देवी ने हाथ उठाकर दोनों को चुप कराया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसे पढ़ पाना किसी के लिए भी नामुमकिन था। वे धीरे से सोफे पर बैठ गईं।
“दिख रहा है मुझे सब कुछ। ये रोज़-रोज़ की किचकिच और ये इल्ज़ामों का दौर। घर की लक्ष्मी का अपमान और घर के मालिक का अहंकार… दोनों एक साथ नहीं रह सकते।” राजेश्वरी देवी ने एक गहरी सांस ली। “विक्रम ठीक कह रहा है। अब बर्दाश्त की हद हो चुकी है। आज शाम को पंडित जी और वकील साहब, दोनों आ रहे हैं। सूर्यास्त तक फैसला हो जाएगा कि इस घर में कौन रहेगा और कौन नहीं।”
इतना कहकर राजेश्वरी देवी उठीं और अपने कमरे की ओर बढ़ गईं। हॉल में एक भारी सन्नाटा पसर गया।
विक्रम के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान तैर गई। उसने मीरा की ओर घृणा से देखा और बुदबुदाया, “तैयारी कर लो। माँ ने भी देख लिया है कि तुम इस घर के लायक नहीं हो। शाम तक अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेना।” वह सीटी बजाता हुआ अपने स्टडी रूम में चला गया।
मीरा वहीं खड़ी रही, निशब्द। उसकी आँखों से एक भी आंसू नहीं गिरा। पिछले पांच सालों में उसने इस घर को अपना खून-पसीने से सींचा था। विक्रम एक सफल बिजनेसमैन था, दुनिया की नज़रों में एक आदर्श पुरुष, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर उसका असली चेहरा सिर्फ मीरा जानती थी। वह एक ऐसा नार्सिसिस्ट (आत्ममुग्ध) इंसान था जिसे अपनी गलती कभी दिखाई नहीं देती थी। आज भी मूर्ति विक्रम के ही कोट की आस्तीन फंसने से गिरी थी, लेकिन हमेशा की तरह उसने इसका ठीकरा मीरा के सिर फोड़ दिया था। मीरा ने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह राजेश्वरी देवी का बहुत सम्मान करती थी। उसे लगता था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। लेकिन आज… आज शायद सब खत्म होने वाला था।
दोपहर का समय मीरा के लिए किसी युग की तरह बीता। उसने अपने कमरे में जाकर अपनी अलमारी खोली। वहां उसकी साड़ियों के बीच दबी हुई कुछ पुरानी फाइलें और स्केचबुक थीं। मीरा शादी से पहले एक बेहतरीन इंटीरियर डिज़इनर थी, लेकिन विक्रम की “हाई सोसाइटी” वाली पत्नी बनने के लिए उसने अपने सपनों का गला घोंट दिया था। विक्रम चाहता था कि उसकी पत्नी सिर्फ पार्टियों में मुस्कुराए और घर सजाए, दिमाग न लगाए। मीरा ने उन स्केचबुक्स को छाती से लगा लिया। उसे लगा, शायद यही उसका असली वजूद था जिसे वह पीछे छोड़ आई थी।
उधर स्टडी रूम में विक्रम व्हिस्की का गिलास हाथ में लिए अपने दोस्त को फोन पर बता रहा था, “अरे यार, फाइनली! माँ मान गई हैं। बुढ़िया समझदार है, जानती है कि घर का खर्च कौन चलाता है। मीरा जैसी मिडिल क्लास मेंटालिटी वाली औरत मेरे स्टेटस के साथ मैच नहीं करती। आज शाम को उसे मायके का टिकट थमा दूंगा।”
शाम धीरे-धीरे घिरी। सूरज डूबने को था और घर के ड्राइंग रूम में एक अजीब सी अदालत सजी थी। राजेश्वरी देवी अपनी पसंदीदा कुर्सी पर विराजमान थीं। उनके दाईं ओर परिवार के पुराने वकील मिस्टर खन्ना बैठे थे और बाईं ओर कुछ कानूनी दस्तावेज़ रखे थे।
विक्रम बड़े आत्मविश्वास के साथ सोफे पर बैठा था, उसके हाव-भाव में एक अलग ही अकड़ थी। मीरा एक कोने में स्टूल पर बैठी थी, उसका सिर झुका हुआ था।
“तो…” राजेश्वरी देवी ने खामोशी तोड़ी। “वकील साहब, क्या कागज़ात तैयार हैं?”
“जी, राजेश्वरी जी। आपके निर्देशानुसार सब कुछ तैयार है,” वकील ने फाइल मेज पर रखते हुए कहा।
विक्रम ने आगे झुकते हुए कहा, “माँ, मुझे पता था आप सही फैसला लेंगी। मीरा को कितना एलिमनी (गुज़ारा भत्ता) देना है? मैं एक मुश्त रकम दे दूंगा ताकि भविष्य में ये दोबारा मुँह न दिखाए।”
राजेश्वरी देवी ने विक्रम की ओर देखा। उनकी नज़रों में अब ममता नहीं, बल्कि एक जज की सख्ती थी। “विक्रम, तुम्हें याद है जब तुम्हारे पिताजी ने यह कंपनी शुरू की थी, तो उनका असूल क्या था?”
विक्रम थोड़ा सकपकाया। “वही… मेहनत और ईमानदारी। पर अभी ये बातें क्यों माँ?”
“क्योंकि पिछले कुछ सालों में मैंने देखा है कि तुम मेहनत तो करते हो, लेकिन ईमानदारी और इंसानियत तुम कहीं पीछे छोड़ आए हो,” राजेश्वरी देवी की आवाज़ सख्त हो गई। “मीरा…” उन्होंने बहू की ओर देखा। “ज़रा यहाँ आओ।”
मीरा हिचकिचाते हुए पास आई।
राजेश्वरी देवी ने मेज पर रखे कागज़ात उठाए। “विक्रम, तुम्हें लगता है कि यह घर, यह कंपनी और यह पैसा तुम्हारी वजह से है? तुम भूल गए कि तुम्हारे पिता ने अपनी वसीयत में 51% शेयर मेरे नाम किए थे और बाकी 49% तुम्हारे। और इस घर का मालिकाना हक पूरी तरह मेरे पास है।”
विक्रम के माथे पर पसीना चमकने लगा। “हाँ माँ, तो? मैं आपका ही तो बेटा हूँ। मेरे पास ही तो आएगा सब।”
“विरासत खून से नहीं, संस्कारों से मिलती है,” राजेश्वरी देवी ने कड़े शब्दों में कहा। “आज सुबह मैंने देखा था विक्रम। मैं बालकनी में ही थी। तुम फोन पर किसी से बात करते हुए लापरवाही से मुड़े और तुम्हारा कोट उस मूर्ति में फंसा। मीरा तो उस वक्त कमरे के दूसरे कोने में थी। फिर भी तुमने उसे जलील किया, उसे नीचा दिखाया। और यह पहली बार नहीं है।”
विक्रम खड़ा हो गया। “तो क्या? एक मूर्ति के लिए आप अपने बेटे को सुना रही हैं?”
“बात मूर्ति की नहीं है, बात फितरत की है। जो इंसान अपनी गलती का बोझ अपनी पत्नी के कंधों पर डालकर उसे दुनिया के सामने छोटा महसूस कराए, वो न तो अच्छा पति हो सकता है और न ही एक अच्छा लीडर,” राजेश्वरी देवी ने वकील की ओर इशारा किया।
वकील ने एक लिफाफा विक्रम की ओर बढ़ाया।
“ये क्या है?” विक्रम ने घबराते हुए पूछा।
“ये तुम्हारा टर्मिनेशन लेटर है, कंपनी के सीईओ के पद से,” राजेश्वरी देवी ने बम फोड़ा। “और साथ ही इस घर को छोड़ने का नोटिस भी।”
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। मीरा की आँखें फटी की फटी रह गईं। विक्रम को लगा जैसे किसी ने उसके पैरों तले ज़मीन खींच ली हो। “क्या? आप मज़ाक कर रही हैं माँ? आप मुझे निकाल रही हैं? इस औरत के लिए?”
“मैं तुम्हें नहीं निकाल रही, मैं इस घर से ‘गंदगी’ साफ कर रही हूँ, जैसा कि तुमने सुबह कहा था,” राजेश्वरी देवी ने शांत स्वर में कहा। “मीरा इस घर की बहू है और वो यहीं रहेगी। मैंने देखा है कि कैसे उसने पिछले पांच सालों में तुम्हारे अहंकार को सहकर भी इस घर को टूटने नहीं दिया। जिस कंपनी को तुम अपनी जागीर समझते हो, उसके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने तुम्हारी मनमानी और कर्मचारियों के साथ बदसलूकी की कई शिकायतें मुझे भेजी थीं। मैं बस चुप थी, सुधरने का मौका दे रही थी। लेकिन जो इंसान अपनी पत्नी का सम्मान नहीं कर सकता, वो मेरे कर्मचारियों और क्लाइंट्स का क्या सम्मान करेगा?”
“लेकिन माँ, ये… ये कैसे मैनेज करेगी? इसे तो कुछ आता भी नहीं!” विक्रम ने मीरा की तरफ उंगली उठाई, उसका अहंकार अब भी हार मानने को तैयार नहीं था।
राजेश्वरी देवी मुस्कुराईं। “ये तुम सोचते हो। मीरा ने पिछले दो सालों में मेरे एन.जी.ओ. के लिए जो डिज़ाइन और प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स तैयार की हैं, उनकी बदौलत हमें इंटरनेशनल ग्रांट मिली है। वो बस तुम्हारे सामने चुप रहती थी क्योंकि उसे संस्कार निभाने थे। लेकिन अब और नहीं।”
उन्होंने मीरा का हाथ पकड़कर उसे अपने पास सोफे पर बैठाया। “मीरा अब से इस घर की मालकिन है और कंपनी में मेरी प्रतिनिधि भी। तुम चाहो तो अपनी 49% हिस्सेदारी के साथ अलग रह सकते हो, या उसे बेचकर अपनी ‘हाई क्लास’ दुनिया में कहीं भी जा सकते हो। लेकिन इस घर में रहने के लिए तुम्हें पहले एक ‘इंसान’ बनना होगा, जिसकी गुंजाइश मुझे कम ही लगती है।”
विक्रम हक्का-बक्का रह गया। उसका गुस्सा, उसका अहंकार, उसकी दौलत का नशा—सब कुछ एक पल में चकनाचूर हो गया था। वह अपनी माँ को जानता था, उनका फैसला पत्थर की लकीर होता था।
“अपना सामान पैक कर लो विक्रम,” राजेश्वरी देवी ने अपनी बात खत्म की। “आज रात तुम होटल में रुकोगे। जब तक तुम अपनी गलती का असली पश्चाताप नहीं करते और मीरा से बिना शर्त माफी नहीं मांगते, इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए बंद हैं।”
विक्रम ने एक बार अपनी माँ की सख्त आँखों में और फिर मीरा के झुके हुए लेकिन अब थोड़े आत्मविश्वासी चेहरे की ओर देखा। उसे एहसास हुआ कि आज उसने सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि अपना सबसे बड़ा सहारा खो दिया था। वह बिना एक शब्द कहे, सिर झुकाए बाहर निकल गया।
जैसे ही मुख्य द्वार बंद हुआ, मीरा की आँखों से आंसू छलक पड़े। वह राजेश्वरी देवी के पैरों में गिर पड़ी। “माँ जी, ये आपने क्या किया? वो आपके बेटे हैं…”
राजेश्वरी देवी ने उसे उठाया और गले से लगा लिया। उनकी भी आँखें नम थीं। “बेटा वो है, लेकिन बेटी तुम हो। और जब बात धर्म और अधर्म की हो, तो महाभारत में भी अपनों के खिलाफ खड़ा होना पड़ा था। मैं एक माँ हूँ, लेकिन उससे पहले मैं एक औरत हूँ। मैं अपनी आंखों के सामने दूसरी औरत का वजूद मिटते नहीं देख सकती, चाहे मिटाने वाला मेरा अपना खून ही क्यों न हो।”
बाहर रात गहरी हो चुकी थी, लेकिन बंगले के अंदर पहली बार मीरा को लगा कि असली सवेरा तो अब हुआ है। उस रात डिनर टेबल पर सन्नाटा नहीं था, बल्कि एक सुकून था—सम्मान का, और एक नई शुरुआत का।
मूल लेखिका
रोनिता कुंडु