कल्याणी देवी ने निवाला तोड़ते हुए बेटे की आँखों में देखा। “मोहित, जब तू दसवीं में फेल हुआ था और पड़ोसियों ने कहा था कि ‘शर्मा जी का लड़का तो आवारा हो गया’, तब मैंने तुझे घर से निकाला था क्या? नहीं न? तो आज जब तेरी बहन की ज़िंदगी में तूफ़ान आया है, तो मैं समाज के डर से उसे बेघर कर दूँ?”
शाम की चाय का वक्त था, लेकिन शर्मा सदन के ड्राइंग रूम में चाय की चुस्कियों की जगह बर्तनों के पटकने की आवाज़ें आ रही थीं। रसोई में नहीं, बल्कि बातों में खनखनाहट थी।
“मम्मी जी, आप यह क्या कह रही हैं? दीदी फिर से यहाँ रहने आ रही हैं? और वो भी हमेशा के लिए?” स्नेहा ने अपनी सास, कल्याणी देवी, की तरफ अविश्वास से देखते हुए पूछा। उसके हाथ से चाय की छलनी लगभग छूट ही गई थी।
कल्याणी देवी ने बहुत ही इत्मीनान से अपनी चश्मा साफ किया और अखबार को तह करके मेज़ पर रखा। उनका चेहरा शांत था, जैसे किसी गहरे समुद्र की सतह हो, जिसके नीचे तूफ़ान छिपा होता है।
“हाँ स्नेहा,” कल्याणी देवी ने कहा। “समीक्षा (ननद) का तलाक का केस फाइल हो गया है। वह उस नर्क में अब एक दिन भी नहीं रहेगी। और जब उसका अपना घर यहाँ है, तो वह किराए के मकान में धक्के क्यों खाए?”
स्नेहा का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। “अपना घर? मम्मी जी, शादी के बाद लड़कियों का घर ससुराल होता है। मायका तो बस छुट्टियों के लिए होता है। अब अगर वो यहाँ हमेशा के लिए रहेंगी, तो समाज क्या कहेगा? और फिर… यह घर तो…” स्नेहा ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया, लेकिन उसका इशारा साफ़ था—’यह घर तो अब बेटे (स्नेहा के पति, मोहित) का है।’
कल्याणी देवी ने तीखी नज़रों से बहू को देखा। “यह घर किसका है स्नेहा? पूरा बोल।”
स्नेहा हिचकिचाई, फिर हिम्मत करके बोली, “मतलब, मोहित का हक़ है इस पर। आने वाले समय में हमारे बच्चे होंगे, उन्हें जगह चाहिए होगी। और दीदी… वो तो अपना हिस्सा (दहेज) लेकर जा चुकी हैं न?”
उस शाम घर में महाभारत छिड़ गई। मोहित जब ऑफिस से आया, तो स्नेहा ने उसके कान भरने शुरू कर दिए। “तुम्हारी माँ को तो बस अपनी बेटी दिखती है। अब देखना, वो ऊपर वाला पूरा फ्लोर समीक्षा दीदी के नाम कर देंगी। हम क्या यहाँ धर्मशाला चलाने के लिए बैठे हैं?”
मोहित, जो स्वभाव से थोड़ा दब्बू था और माँ की इज़्ज़त करता था, पत्नी के दबाव में आ गया। रात के खाने पर उसने कल्याणी देवी से बात छेड़ी।
“माँ, स्नेहा कह रही थी कि दीदी आ रही हैं। अच्छी बात है, कुछ दिन रहें, मन हल्का करें। लेकिन परमानेंट शिफ्ट होना… क्या यह ठीक रहेगा? पड़ोस वाले बातें बनाएंगे कि बेटी घर में बैठी है।”
कल्याणी देवी ने निवाला तोड़ते हुए बेटे की आँखों में देखा। “मोहित, जब तू दसवीं में फेल हुआ था और पड़ोसियों ने कहा था कि ‘शर्मा जी का लड़का तो आवारा हो गया’, तब मैंने तुझे घर से निकाला था क्या? नहीं न? तो आज जब तेरी बहन की ज़िंदगी में तूफ़ान आया है, तो मैं समाज के डर से उसे बेघर कर दूँ?”
“लेकिन माँ, बात प्रॉपर्टी की है,” स्नेहा बीच में बोल पड़ी। “दीदी अगर यहाँ रहेंगी, तो कल को हिस्सेदारी भी मांगेंगी। मेरे पापा ने तो साफ़ कहा था कि जहाँ ननद का दखल हो, वहां घर कभी नहीं बसता।”
कल्याणी देवी ने अपनी थाली सरका दी। पानी पिया और खड़ी हो गईं।
“कल सुबह वकील साहब आ रहे हैं,” कल्याणी देवी ने फैसला सुनाया। “मैं ऊपर वाला फ्लोर, जो तुम्हारे पापा ने किराये के लिए बनवाया था, उसे रेनोवेट करवा रही हूँ। समीक्षा वहीँ रहेगी। और वह वहां अपना बुटीक भी खोलेगी। उसे किसी की दया पर जीने की ज़रूरत नहीं है, वह अपने पैरों पर खड़ी होगी।”
अगले दिन से घर में मिस्त्री लग गए। स्नेहा ने मुँह फुला लिया। उसने बात-बात पर ताने मारने शुरू कर दिए। कभी खाने में नमक तेज़ कर देती, तो कभी समीक्षा के आने से पहले ही उसके पुराने कमरे को कबाड़खाना बना देती।
एक हफ़्ते बाद समीक्षा आ गई। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों के नीचे काले घेरे थे। वह वो चहकने वाली समीक्षा नहीं थी जो इस घर की रौनक हुआ करती थी। वह एक टूटी हुई औरत थी जो अपनी जड़ों में पनाह ढूंढने आई थी।
स्नेहा ने उसका स्वागत तो किया, लेकिन औपचारिकता भर। “दीदी, आप आ तो गईं, पर देखियेगा, मोहल्ले वाले जीने नहीं देंगे,” स्नेहा ने पहले ही दिन मीठा ज़हर उगल दिया।
समीक्षा की आँखों में आंसू आ गए। “मैं… मैं कुछ दिन में नौकरी ढूंढ लूँगी स्नेहा, फिर चली जाऊंगी।”
यह सुन कल्याणी देवी, जो पीछे खड़ी थीं, शेरनी की तरह दहाड़ीं।
“कहाँ जाएगी तू?” कल्याणी देवी आगे आईं और समीक्षा का हाथ पकड़ लिया। फिर वो स्नेहा की तरफ मुड़ीं।
“सुन स्नेहा, और तू भी सुन मोहित। बहुत दिनों से मैं तुम दोनों की फुसफुसाहट सुन रही हूँ। आज फैसला हो ही जाने दो।”
कल्याणी देवी ने घर के बीचों-बीच खड़े होकर, जहाँ से उनकी आवाज़ बाहर गली तक जा सकती थी, बोलना शुरू किया।
“तुम लोगों को लगता है कि बेटी पराया धन है? उसे विदा कर दिया तो हमारा फ़र्ज़ पूरा हो गया? जिस दिन समीक्षा पैदा हुई थी, उस दिन तुम्हारे पापा ने पूरे शहर में मिठाई बांटी थी। उन्होंने यह नहीं कहा था कि ‘मेहमान’ आई है। उन्होंने कहा था कि ‘मेरी जान’ आई है।”
कल्याणी देवी ने अपनी अलमारी से एक पुरानी डायरी और पासबुक निकाली और मेज़ पर पटक दी।
“स्नेहा, तू कह रही थी न कि दीदी अपना हिस्सा ले जा चुकी हैं? कौन सा हिस्सा? वो 20 तोला सोना जो मैंने शादी में दिया था? अरे, वो तो उसके ससुराल वालों ने पहले ही साल गिरवी रखवा दिया था। या वो फर्नीचर जो अब तक दीमक खा चुका होगा?”
कल्याणी देवी का चेहरा गुस्से और दर्द से लाल था।
“यह घर… जिसकी ईंटें तुम दोनों गिन रहे हो… यह मेरे पति, स्वर्गीय रघुनन्दन शर्मा की कमाई है। उन्होंने अपनी जवानी की रातों की नींद बेचकर यह छत बनाई थी। और इस छत के नीचे उनका बेटा और बेटी दोनों बराबर हैं। तुम कहते हो समाज क्या कहेगा? भाड़ में गया समाज! जब मेरे पति अस्पताल में थे, तो मोहित तू तो विदेश में अपनी ट्रेनिंग कर रहा था। उस वक्त इसी समीक्षा ने अपनी जॉब छोड़ी थी, दिन-रात अस्पताल के गलियारों में भटकी थी। तब समाज ने नहीं पूछा कि बेटी क्यों सेवा कर रही है? तब किसी ने नहीं कहा कि बेटा कहाँ है?”
स्नेहा और मोहित के सिर झुक गए।
“बेटी मेरी है,” कल्याणी देवी की आवाज़ अब थोड़ी भर्रा गई थी, लेकिन उसमें चट्टान जैसी मज़बूती थी। “लोगों की नज़रों को सालती है तो सालने दो। मेरा घर है। मेरे पति की कमाई है। मैं अपनी बेटी को दूँ या पूरा ही लुटा दूँ, किसी को उसमें दखल देने का कोई हक़ नहीं है। अगर मेरे बेटे को इस घर में रहने का हक़ है, तो मेरी बेटी को भी यहाँ सिर उठाकर जीने का हक़ है। यह ‘शरण’ नहीं है, यह उसका ‘अधिकार’ है।”
समीक्षा माँ के गले लगकर रो पड़ी। कल्याणी देवी ने उसे वैसे ही भींचा जैसे बचपन में भींचती थीं।
“और सुन स्नेहा,” कल्याणी देवी ने ठंडे स्वर में कहा, “आज तू बहू है, कल तू भी सास बनेगी। भगवान न करे, लेकिन अगर कभी तेरी बेटी पर मुसीबत आए, तो क्या तू उसके लिए दरवाज़े बंद कर देगी यह सोचकर कि ‘हिस्सा’ तो दे दिया था?”
स्नेहा के पास कोई जवाब नहीं था। उसे अपनी छोटी सोच पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। उसे एहसास हुआ कि कल्याणी देवी सिर्फ़ समीक्षा की माँ नहीं, एक औरत की अस्मिता की रक्षक बनकर खड़ी थीं।
उस दिन के बाद, ऊपर वाले फ्लोर का काम दोगुनी रफ़्तार से हुआ। लेकिन इस बार, सिर्फ़ कल्याणी देवी खड़ी नहीं थीं। मोहित भी खड़ा था। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था।
“माँ, बुटीक के लिए इंटीरियर डेकोरेटर से मैंने बात कर ली है,” मोहित ने एक दिन नाश्ते की मेज़ पर कहा।
समीक्षा ने भाई को देखा। मोहित ने नज़रें झुकाकर कहा, “सॉरी दीदी। मैं… मैं भटक गया था।”
और स्नेहा? स्नेहा अभी भी पूरी तरह नहीं बदली थी, लेकिन कल्याणी देवी के उस रौद्र रूप ने उसके अंदर एक डर और इज़्ज़त दोनों पैदा कर दी थी।
छह महीने बाद, ‘समीक्षा क्रिएशन्स’ का उद्घाटन हुआ। मोहल्ले की वही औरतें, जो ताने मारती थीं कि “बेटी घर में बैठी है”, अब समीक्षा के डिज़ाइन किए कपड़े खरीदने के लिए लाइन में खड़ी थीं।
शाम को जब बुटीक बंद हुआ, तो समीक्षा माँ के पास आई और अपनी पहली कमाई उनके हाथों में रख दी।
“यह क्या है?” कल्याणी देवी ने पूछा।
“किराया,” समीक्षा मुस्कुराई। “मकान मालकिन का हक़।”
कल्याणी देवी ने वो पैसे वापस समीक्षा की मुट्ठी में बंद कर दिए।
“पागल लड़की,” कल्याणी देवी ने उसकी माथा चूमा। “माँ के घर का किराया नहीं होता। यह तेरी मेहनत है, इसे अपनी उड़ान के लिए पंख बना। मैंने तुझे छत दी है, अब आसमान तुझे खुद ढूंढना है।”
स्नेहा, जो दूर खड़ी यह देख रही थी, धीरे से आई। उसके हाथ में एक गिफ्ट था।
“दीदी, यह… यह मेरी तरफ से। बुटीक के लिए शगुन,” स्नेहा ने झिझकते हुए कहा।
समीक्षा ने उसे गले लगा लिया। घर की दीवारें अब बंटवारे की लकीरें नहीं, बल्कि सुरक्षा का घेरा बन गई थीं।
कल्याणी देवी अपनी कुर्सी पर बैठीं, संतुष्ट थीं। उन्होंने साबित कर दिया था कि एक माँ अगर चाह ले, तो वह समाज के थोपे हुए नियमों को बदलकर अपनी औलाद के लिए एक नई दुनिया बना सकती है। बेटी ब्याहने से पराई नहीं होती, वह बस एक नई ज़िम्मेदारी ओढ़ लेती है, लेकिन उसका ‘मैका’ हमेशा उसकी ढाल बनकर खड़ा रहना चाहिए।
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अक्सर हम समाज के डर से अपनी बेटियों के लिए वो कदम नहीं उठा पाते जो ज़रूरी होते हैं। कल्याणी देवी जैसी माँ हर घर में होनी चाहिए जो यह समझे कि **”हिस्सा जायदाद का होता है, जिगर के टुकड़ों का नहीं।”**
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मूल लेखिका : संगीता श्रीवास्तव