काजल के हाथ से चाय का कप लगभग गिरते-गिरते बचा। बाहर आँगन में हो रहे शोर-शराबे ने उसके कानों में जैसे सीसा घोल दिया था।
“तूने क्या सोचा था कि हमेशा ऐसे ही चलता रहेगा? ये घर मेरा है! और अब से वही होगा जो मैं कहूँगा,” आलोक, उसका जेठ, चिल्ला रहा था।
काजल के पति, विवेक, ने शांत रहने की कोशिश की, “भैया, मैंने कब कहा कि घर आपका नहीं है? लेकिन पिताजी की वसीयत…”
“वसीयत!” आलोक ने गुस्से में मेज पर हाथ मारा। “वो वसीयत तुम लोगों ने धोखे से बनवाई थी। पिताजी के आखिरी दिनों में तुम दोनों ने ही उनका ब्रेनवॉश किया था।”
ये इल्ज़ाम नया नहीं था, लेकिन आज इसकी धार बहुत तेज़ थी।
तीन साल पहले तक ‘रघुवंशी निवास’ शहर का एक ऐसा घर था जिसकी मिसाल दी जाती थी। आलोक और विवेक—दो भाई, दो शरीर एक जान। लेकिन पिताजी की मृत्यु के बाद सब कुछ बदल गया। वसीयत में घर का बंटवारा आधा-आधा हुआ था, लेकिन आलोक और उसकी पत्नी, सिमरन, को लगता था कि विवेक को ज़्यादा मिला है। दरअसल, विवेक को शहर के बाहर वाली एक छोटी सी दुकान भी मिली थी, जहाँ पिताजी अपना पुराना किताबों का काम करते थे। आलोक को लगा कि उस दुकान की कीमत करोड़ों में है, जबकि हकीकत में वो दुकान घाटे में चल रही थी।
काजल ने खिड़की से देखा। विवेक का चेहरा उतरा हुआ था। वह जानती थी कि विवेक के लिए बड़े भाई राम से कम नहीं थे, और राम का यह रूप उसे अंदर से तोड़ रहा था।
शाम को विवेक जब कमरे में आया, तो उसने काजल से कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप लेट गया।
“विवेक,” काजल ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा। “आप चिंता मत कीजिये। भैया अभी गुस्से में हैं। सब ठीक हो जाएगा।”
“कुछ ठीक नहीं होगा काजल,” विवेक की आवाज़ भर्राई हुई थी। “भैया ने आज वकीलों को बुलाया था। वो घर का बंटवारा चाहते हैं। वो चाहते हैं कि बीच आँगन में दीवार खींची जाए।”
“दीवार?” काजल का दिल धक से रह गया। यह घर ईंटों से नहीं, भावनाओं से बना था। “लेकिन माँजी? माँजी का क्या होगा?”
“माँजी को भैया ने कहा है कि वो चुन लें किसके साथ रहना है। और तुम तो जानती हो, माँजी कभी किसी एक को नहीं चुनेंगी। वो टूट जाएंगी।”
अगले कुछ हफ्ते घर में तनाव का माहौल रहा। सिमरन ने अपनी रसोई अलग कर ली थी। अब घर में दो चूल्हे जलते थे, लेकिन किसी के भी खाने में स्वाद नहीं था। माँजी, सावित्री देवी, अपने कमरे में ही पड़ी रहती थीं। उनकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे। वो अक्सर पुरानी फोटो एल्बम निकाल कर देखती रहती थीं, जिसमें दोनों भाई एक ही साइकिल पर बैठकर स्कूल जा रहे थे।
एक दिन काजल ने देखा कि माँजी चुपके से रो रही हैं।
“माँजी,” काजल उनके पास बैठ गई।
“बहू,” सावित्री देवी ने सिसकते हुए कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे जीते जी यह दिन देखना पड़ेगा। मेरे बच्चे एक-दूसरे का चेहरा देखने को राज़ी नहीं हैं। आलोक को क्या हो गया है? वो तो विवेक के लिए अपनी जान देने को तैयार रहता था।”
“माँजी, ग़लतफ़हमी का ज़हर बहुत कड़वा होता है,” काजल ने सांत्वना दी। “लेकिन आप चिंता मत कीजिये। मैं और विवेक कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे घर टूटे।”
“पर वो दीवार…” सावित्री देवी की आवाज़ कांप गई। “जिस दिन आँगन में दीवार खिंचेगी, उस दिन मेरा दम घुट जाएगा।”
काजल ने उसी वक़्त एक फैसला लिया। उसे कुछ करना होगा। वह जानती थी कि सीधे बात करने से बात और बिगड़ेगी। उसे कोई और रास्ता निकालना होगा।
संयोग से, अगले महीने काजल की ननद, रिया की शादी की सालगिरह थी। रिया शहर से दूर रहती थी और पिछले दो सालों से घर के क्लेश की वजह से नहीं आई थी। काजल ने सोचा, शायद रिया दीदी ही कुछ कर सकती हैं।
उसने विवेक को बिना बताए रिया को फोन किया।
“रिया दीदी, घर के हालात बहुत ख़राब हैं। भैया बंटवारे की बात कर रहे हैं। माँजी की हालत देखी नहीं जाती। आपको आना होगा,” काजल ने एक सांस में सब कह दिया।
रिया भी परेशान हो गई। “काजल, मैं तो आना चाहती हूँ, पर आलोक भैया ने पिछली बार फ़ोन पर मुझसे भी ठीक से बात नहीं की थी। वो मुझसे भी नाराज़ हैं क्योंकि मैंने विवेक का पक्ष लिया था।”
“दीदी, पक्ष-विपक्ष छोड़िये। घर बचाना है। मुझे एक उपाय सूझा है, बस आपका साथ चाहिए।”
काजल ने रिया को अपना प्लान बताया। रिया पहले तो हिचकिचाई, लेकिन फिर माँजी की खातिर मान गई।
प्लान यह था कि रिया अपनी सालगिरह मनाने मायके आएगी, और वो भी अकेले नहीं, बल्कि अपने ससुराल वालों के साथ। आलोक अपनी इज़्ज़त और रुतबे का बहुत पक्का था। वो मेहमानों के सामने, ख़ासकर अपनी बहन के ससुराल वालों के सामने, घर के झगड़े नहीं आने देगा।
तय दिन पर रिया अपने पति, सास-ससुर और बच्चों के साथ आ धमकी।
आलोक गेट पर खड़ा था जब गाड़ियां रुकीं। उसे उम्मीद नहीं थी। लेकिन बहन के ससुराल वालों को देखकर उसने अपनी मुस्कान ओढ़ ली।
“अरे रिया! जीजाजी! आप लोग… अचानक? बताया भी नहीं?” आलोक ने स्वागत करते हुए कहा।
“भैया, सरप्राइज़ देना था,” रिया ने हंसते हुए आलोक को गले लगाया। “और फिर, माँजी की तबीयत की खबर मिली तो रहा नहीं गया।”
सिमरन को भी मजबूरी में बाहर आना पड़ा। मेहमानों के सामने वो भी अपनी अलग रसोई का राग नहीं अलाप सकती थी।
“भाभी,” रिया ने सिमरन को गले लगाते हुए धीरे से कहा, “सुना है आपने घर का नक्शा ही बदल दिया है? पर आज तो मेरे ससुराल वाले आए हैं, इज़्ज़त का सवाल है। खाना एक ही जगह बनेगा न?”
सिमरन ने नकली मुस्कान के साथ कहा, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं।”
अगले तीन दिन घर में एक अजीब सा नाटक चला। सब कुछ सामान्य दिखने का अभिनय कर रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर तनाव था। काजल और विवेक चुपचाप अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। काजल ने जानबूझकर पीछे रहकर सिमरन को आगे किया ताकि सिमरन को लगे कि घर की मालकिन वही है।
एक शाम, जब सब लोग हॉल में बैठे चाय पी रहे थे, रिया के ससुर, जो एक बहुत सुलझे हुए इंसान थे, ने आलोक से बात शुरू की।
“आलोक बेटा, तुम्हारा घर देखकर बहुत ख़ुशी हुई। आजकल के ज़माने में संयुक्त परिवार कहाँ देखने को मिलते हैं। हमारे पड़ोस में तो दो भाइयों ने दस फ़ीट की ज़मीन के लिए एक-दूसरे पर मुक़दमे कर रखे हैं। और यहाँ तुम दोनों भाइयों का प्यार देखकर दिल खुश हो गया।”
आलोक पानी पीते-पीते अटक गया। उसने विवेक की ओर देखा। विवेक ने नज़रें झुका लीं।
“जी अंकल, वो तो है,” आलोक ने मुश्किल से कहा।
“और विवेक की तो क्या ही तारीफ़ करूँ,” रिया के ससुर ने बात आगे बढ़ाई। “कल मैं उसकी दुकान पर गया था। मुझे पता चला कि वो दुकान तो घाटे में चल रही है, फिर भी वो उस दुकान के मुनाफ़े (जो है ही नहीं) का आधा हिस्सा हर महीने तुम्हारे नाम से एक फिक्स्ड डिपाजिट में डाल रहा है। कह रहा था कि यह बड़े भैया का हक़ है।”
आलोक सन्न रह गया। “क्या? फिक्स्ड डिपाजिट?”
“हाँ,” रिया के ससुर बोले। “शायद उसने तुम्हें बताया नहीं होगा। उसे लगा होगा कि तुम मना कर दोगे। पर बेटा, ऐसा भाई किस्मत वालों को मिलता है जो अपने हिस्से की रोटी में से भी आधा भाई के लिए रख दे।”
आलोक ने अविश्वास से विवेक की ओर देखा। विवेक अब भी चुप था। सिमरन भी यह सुनकर हैरान थी।
दरअसल, यह बात सच थी। विवेक को पिताजी ने मरते वक़्त कहा था कि आलोक का स्वभाव थोड़ा तेज़ है, लेकिन दिल का बुरा नहीं है। अगर कभी लगे कि उसे असुरक्षा हो रही है, तो उसकी मदद करना। विवेक पिछले एक साल से अपनी सैलरी में से पैसे बचाकर पिताजी की उस बंद दुकान के नाम से एक गुल्लक भर रहा था ताकि आलोक को कभी यह न लगे कि पिताजी ने उसके साथ अन्याय किया है। यह बात काजल जानती थी, और उसने ही यह बात रिया के ज़रिये रिया के ससुर तक पहुंचाई थी ताकि वो सही वक़्त पर इसे आलोक के सामने ला सकें।
उस रात, आलोक को नींद नहीं आई। वह छत पर टहल रहा था। उसे बचपन की यादें घेर रही थीं। कैसे विवेक हमेशा अपनी चॉकलेट का आधा हिस्सा उसे देता था। कैसे एक बार क्रिकेट खेलते वक़्त आलोक से पड़ोसी की खिड़की टूट गई थी और विवेक ने इल्ज़ाम अपने सिर ले लिया था।
क्या वह इतना अँधा हो गया था कि चंद ईंटों के लिए उसने उस भाई को पराया कर दिया?
अगली सुबह, रिया की सालगिरह की पूजा थी। पंडित जी आए हुए थे। हवन कुंड सजा था।
सावित्री देवी एक कोने में बैठी थीं, आज उनके चेहरे पर थोड़ी रौनक थी क्योंकि घर भरा-पूरा लग रहा था।
जब आहुति डालने का समय आया, तो पंडित जी ने कहा, “घर के दोनों बेटे और बहुएं एक साथ आहुति दें, तभी पूजा सम्पूर्ण होगी।”
सिमरन हिचकिचाई। वह उठी नहीं। आलोक भी बैठा रहा।
माहौल भारी हो गया। रिया ने आगे बढ़कर आलोक का हाथ पकड़ा। “भैया, उठो न। आज मेरी ख़ुशी के लिए ही सही।”
आलोक उठा। उसने सिमरन को इशारा किया। चारों हवन कुंड के पास बैठे।
जैसे ही अग्नि प्रज्वलित हुई, आलोक की नज़र विवेक के हाथ पर पड़ी। विवेक के हाथ में एक पुराना धागा बंधा था—वही धागा जो आलोक ने दस साल पहले वैष्णो देवी से लाकर उसे बांधा था। विवेक ने आज तक उसे नहीं खोला था, भले ही वो मैला हो चुका था।
आलोक का सब्र टूट गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“रुकिए पंडित जी,” आलोक ने भारी आवाज़ में कहा।
सब चौंक गए।
आलोक खड़ा हुआ और अंदर अपने कमरे की ओर भागा। सब हैरान थे। सिमरन को लगा कि शायद आलोक अब कोई तमाशा करेगा।
दो मिनट बाद आलोक वापस आया। उसके हाथ में एक फ़ाइल थी। वह वकीलों द्वारा तैयार किये गए बंटवारे के कागज़ात थे।
आलोक ने वो फ़ाइल उठाई और सबके सामने उसे हवन कुंड की अग्नि में डाल दिया।
“स्वाहा!” आलोक ने ज़ोर से कहा।
विवेक और काजल भौचक्के रह गए। सावित्री देवी ने अपनी छाती पर हाथ रख लिया।
आलोक ने विवेक को कॉलर से पकड़ा और उसे खड़ा किया। विवेक डर गया, उसे लगा भैया मारेंगे।
लेकिन आलोक ने उसे कसकर गले लगा लिया। और फूट-फूट कर रोने लगा।
“माफ़ कर दे छोटे… माफ़ कर दे। मुझे पैसे का नशा चढ़ गया था। मैं भूल गया था कि तू मेरा भाई है, कोई दुश्मन नहीं। उस दुकान के लिए, उस ज़मीन के लिए मैंने तुझे कितना भला-बुरा कहा। और तू… तू मेरे लिए एफडी बना रहा था?”
विवेक भी रो पड़ा। “भैया, वो दुकान आपकी ही है। पिताजी ने बस कागज़ पर मेरा नाम लिखा था, पर उस पर हक़ आपका है।”
“भाड़ में गई दुकान और भाड़ में गया बंटवारा,” आलोक ने विवेक का माथा च चूमा। “आज से इस घर में कोई लकीर नहीं खिंचेगी। जो मेरा है वो तेरा है, और जो तेरा है वो मेरा है।”
सिमरन, जो अब तक चुप थी, उसका भी दिल पसीज गया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ कि उसने कैसे आलोक के कान भरे थे। वह काजल के पास गई और उसका हाथ पकड़ लिया। “मुझे माफ़ कर दो काजल। मैं बहुत स्वार्थी हो गई थी।”
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से दोनों बेटों को अपने पास बुलाया। “आज मेरा घर फिर से घर बन गया,” उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ रखा। “तुम दोनों को अलग करने की कोशिश तो बहुतों ने की, पर खून का रिश्ता पानी नहीं होता।”
रिया और उसके ससुराल वाले यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। रिया ने काजल को आँख मारी। काजल मुस्कुरा दी। उनका ‘ऑपरेशन रीयूनियन’ सफल हो गया था।
शाम को जब मेहमान विदा हो रहे थे, तो आलोक ने रिया से कहा, “रिया, तूने बहुत अच्छा किया जो तू आई। तेरे आने से घर की हवा बदल गई।”
रिया ने हंसते हुए कहा, “भैया, हवा मैंने नहीं, काजल ने बदली है। यह सारा प्लान उसी का था। मुझे बुलाने का, पापाजी (ससुरजी) से वो बात कहलवाने का… सब कुछ।”
आलोक ने चौंककर काजल की ओर देखा। काजल चाय की ट्रे लेकर खड़ी थी, थोड़ी सहमी हुई।
आलोक उसके पास गया। उसने ट्रे मेज पर रखी और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। “काजल, मैंने तुझे क्या-क्या नहीं कहा। पर तूने… तूने इस घर को टूटने से बचा लिया। आज से तू मेरी छोटी भाभी नहीं, इस घर की बड़ी बेटी है। सिमरन से भी बड़ी।”
काजल की आँखों में ख़ुशी के आंसू थे। “भैया, आप बड़े हैं, माफ़ी मांग कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिये। बस हम सब साथ रहें, यही काफ़ी है।”
उस रात ‘रघुवंशी निवास’ में फिर से वही पुराने दिनों वाली रौनक थी। एक ही रसोई में खाना बना। डाइनिंग टेबल पर हंसी-ठिठोली गूँज रही थी। आलोक और विवेक पुरानी बातें याद करके हंस रहे थे।
आँगन में जो दीवार खिंचने वाली थी, उसकी जगह अब एक झूला पड़ा था जिस पर माँजी बैठी थीं, और उनकी गोद में रिया का बेटा खेल रहा था।
विवेक ने काजल के पास आकर धीरे से कहा, “तुम जादूगरनी हो क्या?”
काजल ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं, मैं तो बस एक बहू हूँ जिसे अपना घर प्यारा है। और वैसे भी, दीवारें तो ईंटों की होती हैं, उन्हें तोड़ा जा सकता है, पर दिलों के बीच की दीवार सिर्फ़ प्यार से ही ढहती है।”
बारिश की वो टिप-टिप, जो कहानी की शुरुआत में उदासी लाई थी, अब एक मधुर संगीत जैसी लग रही थी। घर बच गया था, और साथ ही बच गया था वो विश्वास कि जब तक परिवार में एक भी सदस्य जोड़ने वाला हो, तो तोड़ने वाले चाहे कितने भी हों, जीत हमेशा जोड़ने वाले की ही होती है।
मूल लेखिका : करुणा मलिक