वह मकान बिकाऊ नहीं है – के कामेश्वरी 

दीनानाथ जी ने अपने चश्मे को कुर्ते के कोने से साफ किया और फिर से नाक पर टिका लिया। सामने गेट पर पेंटर ‘शांति-कुंज’ लिख रहा था। नीले रंग के गेट पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जा रहा वह नाम दीनानाथ जी

के लिए सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि चालीस साल की तपस्या का फल था। सरकारी स्कूल में मास्टरी करते हुए, पाई-पाई जोड़कर, अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर उन्होंने यह दो मंजिला मकान खड़ा किया था। रिटायरमेंट के बाद जो पीएफ का पैसा मिला, वह भी इसी घर की मरम्मत और सजावट में लग गया।

रसोई से उनकी पत्नी सुमित्रा की आवाज आई, “सुनते हो? पेंटर को बोलो थोड़ा जल्दी हाथ चलाए, शाम तक राहुल और उसका परिवार आ रहा है। ऐसा न हो कि बच्चे आएं और काम अधूरा मिले।”

दीनानाथ जी मुस्कुरा दिए। राहुल, उनका इकलौता बेटा, जो बेंगलुरु में एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था। पांच साल बाद वह अपने परिवार के साथ घर आ रहा था। दीनानाथ जी ने सोचा था कि अब जब घर पूरी तरह से नया हो गया है, हर कमरे में एसी लग गया है, मॉड्यूलर किचन बन गया है

, तो शायद राहुल और उसकी पत्नी श्रेया को यहाँ रहने में कोई दिक्कत नहीं होगी। उन्हें उम्मीद थी कि शायद इस बार राहुल कहेगा, “पापा, अब मैं आपको और मां को अपने साथ ले जाने नहीं, बल्कि यहीं आपके पास रहने आया हूँ।”

शाम ढलते ही एक बड़ी सी एसयूवी गेट पर आकर रुकी। दीनानाथ जी का दिल जोर से धड़कने लगा। सुमित्रा जी तो आरती की थाली लेकर पहले ही दरवाजे पर खड़ी थीं। गाड़ी से राहुल उतरा, फिर श्रेया और फिर उनके दो प्यारे बच्चे – आरव और ईशा।

“अरे पापा, यह रोड अभी तक नहीं सुधरी? गाड़ी के सस्पेंशन की धज्जियां उड़ गईं यहाँ तक आते-आते,” राहुल ने उतरते ही माथे का पसीना पोंछते हुए कहा। उसके चेहरे पर सफर की थकान और झुंझलाहट साफ दिख रही थी।

दीनानाथ जी आगे बढ़े और बेटे को गले लगाना चाहा, लेकिन राहुल ने हाथ में पकड़ा लैपटॉप बैग उन्हें थमा दिया और अपनी जेब से फोन निकालकर किसी को मैसेज करने लगा। दीनानाथ जी के फैले हुए हाथ हवा में ही रह गए, फिर उन्होंने संभलते हुए बैग थाम लिया। “आओ बेटा, अंदर आओ। सफर लंबा था, थक गए होगे।”

अंदर आते ही श्रेया ने चारों तरफ नजर दौड़ाई। “अरे मम्मी जी, आपने दीवारों का रंग पीला क्यों करवा दिया? आजकल तो पेस्टल कलर्स का ज़माना है, यह बहुत ओल्ड फैशन लग रहा है,” श्रेया ने सोफे पर बैठते हुए कहा।

सुमित्रा जी की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई। “बेटा, यह रंग तुम्हारे पापा को पसंद था। उन्हें लगता है इससे घर में रोशनी रहती है।”

“हां, ठीक है। वैसे भी हमें कौन सा यहाँ हमेशा रहना है,” राहुल ने फोन से नज़र हटाए बिना कहा।

वह एक वाक्य दीनानाथ जी के सीने में तीर की तरह चुभ गया। लेकिन उन्होंने खुद को समझाया कि बच्चा थका हुआ है।

रात को खाने की मेज पर सन्नाटा छाया हुआ था। दीनानाथ जी ने बड़े चाव से खीर बनवाई थी, जो राहुल को बचपन में बहुत पसंद थी।

“राहुल, यह लो खीर। मावे वाली है,” सुमित्रा जी ने कटोरी बढ़ाते हुए कहा।

“मॉम, प्लीज। इसमें कितनी कैलोरीज हैं आपको पता है? मैं डाइट पर हूँ और बच्चों को भी यह सब मत देना, शुगर रश हो जाएगा,” राहुल ने हाथ से कटोरी पीछे कर दी।

खाने के बाद दीनानाथ जी ने सोचा कि अब सही समय है बात करने का। उन्होंने गला साफ किया, “बेटा राहुल, देखो अब यह घर बिल्कुल वैसा हो गया है जैसा तुम चाहते थे। ऊपर वाले कमरे में मैंने तुम्हारे लिए अलग से वर्क-स्टेशन भी बनवा दिया है। इंटरनेट भी फाइबर वाला लगवा दिया है। अब तो तुम यहाँ से भी काम कर सकते हो न?”

राहुल ने पानी का गिलास मेज पर रखा और एक गहरी सांस ली। उसने श्रेया की तरफ देखा, जैसे दोनों के बीच पहले से कोई बात तय हो।

“पापा, दरअसल मुझे आपसे एक ज़रूरी बात करनी थी,” राहुल ने गंभीर स्वर में कहा।

दीनानाथ जी की आँखों में चमक आ गई। “हां-हां बोलो बेटा।”

“पापा, देखिए अब आपकी और मम्मी की उम्र हो रही है। इस इतने बड़े घर को मेंटेन करना आपके लिए मुश्किल होता जा रहा है। आज भी मैंने देखा, गार्डन में सूखे पत्ते पड़े थे, नल टपक रहा था। यहाँ अच्छे डॉक्टर्स भी नहीं हैं,” राहुल ने भूमिका बांधी।

“तो क्या हुआ बेटा? मैं कर लेता हूँ सब। और अब तो तुम आ गए हो…”

“पापा, बी प्रैक्टिकल,” राहुल ने उनकी बात काट दी। “मैं यहाँ नहीं रह सकता। मेरा करियर, बच्चों का स्कूल, हमारा सोशल सर्कल सब बेंगलुरु में है। और सच कहूं तो इस छोटे शहर में मेरा दम घुटता है।”

दीनानाथ जी चुप हो गए।

राहुल ने अपनी बात जारी रखी, “मेरा एक प्लान है। मेरे एक दोस्त को यह प्रॉपर्टी बहुत पसंद है। वह यहाँ एक नर्सिंग होम बनाना चाहता है। वह हमें इस घर की बहुत अच्छी कीमत दे रहा है – लगभग तीन करोड़। आप यह घर बेच दीजिए।”

दीनानाथ जी के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। “क्या? घर बेच दूं?”

“हां पापा, सुनिए तो। उन पैसों से मैं बेंगलुरु में हमारे फ्लैट के पास ही एक बढ़िया सोसाइटी में आपके लिए 2 BHK फ्लैट ले लूंगा। वहां लिफ्ट है, पार्क है, 24 घंटे डॉक्टर की सुविधा है। आप लोग वहां हमारे पास रहेंगे, तो हमें भी चिंता नहीं होगी। और जो पैसे बचेंगे, उन्हें फिक्स डिपॉजिट कर देंगे, आपका बुढ़ापा आराम से कटेगा।”

सुमित्रा जी रसोई के दरवाजे पर ही ठिठक गईं। उनकी आंखों में आंसू भर आए। जिस घर के हर कोने को उन्होंने अपनी यादों से सजाया था, आज बेटा उसे ‘प्रॉपर्टी’ कह रहा था।

दीनानाथ जी ने कांपती आवाज़ में पूछा, “बेटा, तुम्हें पैसों की कमी है क्या?”

श्रेया बीच में बोल पड़ी, “पापा जी, बात पैसों की नहीं है। बात समझदारी की है। यह तीन करोड़ का मकान यहाँ धूल खा रहा है। साल में हम दस दिन आते हैं। बाकी समय यह भूतों का डेरा बना रहता है। इससे तो अच्छा है कि इसे कैश करवा लें।”

दीनानाथ जी उस रात सो नहीं पाए। वह उठकर बरामदे में आ गए। अमावस की रात थी, लेकिन ‘शांति-कुंज’ की नेमप्लेट स्ट्रीट लाइट की रोशनी में चमक रही थी। उन्हें याद आया वह दिन जब नींव खोदी जा रही थी। राहुल तब पांच साल का था। उसने गीली सीमेंट में अपने नन्हे हाथ का निशान छापा था। दीनानाथ जी ने उस ईंट को दीवार में ऐसी जगह लगवाया था जहाँ वह हमेशा सुरक्षित रहे।

क्या वह ईंट भी बिक जाएगी? क्या उस तुलसी के पौधे की कीमत लगेगी जिसे सुमित्रा रोज जल देती है? क्या उन दीवारों की बोली लगेगी जिन्होंने राहुल की किलकारियां और फिर उसकी विदाई के आंसू देखे थे?

अगली सुबह नाश्ते की मेज पर माहौल तनावपूर्ण था। राहुल और श्रेया लैपटॉप पर बेंगलुरु के फ्लैट्स की तस्वीरें दिखा रहे थे।

“देखिए पापा, इसमें स्विमिंग पूल भी है और क्लब हाउस भी। आप बोर नहीं होंगे,” राहुल उत्साह से बता रहा था।

दीनानाथ जी ने चाय का कप मेज पर रखा और पहली बार बेटे की आंखों में आंखें डालकर देखा। उनकी आंखों में वह डर नहीं था जो कल रात था, बल्कि एक अजीब सी शांति थी।

“राहुल,” दीनानाथ जी की आवाज़ सख्त थी। “मैंने और तुम्हारी माँ ने सारी रात बात की।”

“तो आप मान गए न? मैं आज ही पेपर तैयार करवाता हूँ,” राहुल खुश होते हुए बोला।

“नहीं बेटा,” दीनानाथ जी ने कहा। “यह मकान बिकाऊ नहीं है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। श्रेया और राहुल हैरान रह गए।

“पापा, आप इमोशनल हो रहे हैं। यह एक डेड इन्वेस्टमेंट है,” राहुल झुंझलाया।

“बेटा, तुम्हारे लिए यह ईंट-पत्थर का इन्वेस्टमेंट हो सकता है। पर मेरे लिए यह मेरी वसीयत नहीं, मेरा अस्तित्व है,” दीनानाथ जी ने कहा। “तुम कहते हो कि हम तुम्हारे पास वहां फ्लैट में रहें। लेकिन क्या वहां मैं अपनी मर्जी से इस बरामदे में बैठकर अखबार पढ़ सकूंगा? क्या वहां तुम्हारी माँ अपनी तुलसी के पास दिया जला सकेगी बिना किसी के टोके?”

उन्होंने खिड़की की तरफ इशारा किया। “उस आम के पेड़ को मैंने तब लगाया था जब तुम पैदा हुए थे। हर गर्मी में जब इसमें आम आते हैं, तो मुझे लगता है कि तुम मेरे पास हो। तुम कहते हो इसे बेच दूं? तीन करोड़ में तुम मुझे फ्लैट तो दे दोगे राहुल, लेकिन क्या वह आसमान दे पाओगे जो इस आंगन से दिखता है?”

राहुल ने दलील दी, “लेकिन पापा, हमारे बाद इस घर का क्या होगा? यह खंडहर बन जाएगा।”

दीनानाथ जी मुस्कुराए, एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द और गर्व दोनों था। “हो जाने दो खंडहर। लेकिन जब तक मैं और तुम्हारी माँ जिंदा हैं, यह ‘शांति-कुंज’ ही रहेगा, नर्सिंग होम नहीं। तुम शहर में अपनी दुनिया बना चुके हो, मुबारक हो तुम्हें। लेकिन हमारी दुनिया यह घर है। हमें ‘सीनियर सिटीजन होम’ की सुरक्षा नहीं चाहिए, हमें अपनी यादों की गर्माहट चाहिए।”

सुमित्रा जी ने आकर दीनानाथ जी के कंधे पर हाथ रखा। वह उनका समर्थन कर रही थीं।

दीनानाथ जी ने अपनी बात खत्म की, “बेटा, घर इंसान के शरीर जैसा होता है। जब तक इसमें रहने वाले की सांसें चलती हैं, इसे बेचा नहीं जाता। मेरे मरने के बाद तुम इसका जो चाहे करना, तब यह सिर्फ एक ‘प्रॉपर्टी’ होगी। लेकिन अभी… अभी यह मेरा अभिमान है।”

राहुल निरुत्तर हो गया। उसने देखा कि उसके पिता, जो कल तक बूढ़े और लाचार दिख रहे थे, आज अपनी कुर्सी पर एक राजा की तरह बैठे थे। उनके पास दौलत नहीं थी, लेकिन संतोष का जो ताज उनके सिर पर था, वह राहुल के करोड़ों के पैकेज से कहीं ज्यादा कीमती था।

उस शाम राहुल और उसका परिवार वापस जा रहा था। दीनानाथ जी और सुमित्रा जी गेट पर खड़े थे।

गाड़ी में बैठते वक्त राहुल ने पलटकर उस घर को देखा। पीली दीवारें डूबते सूरज की रोशनी में सोने की तरह चमक रही थीं। उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह कोई “डेड इन्वेस्टमेंट” छोड़कर नहीं जा रहा, बल्कि अपनी जड़ों को पीछे छोड़ रहा है। एक ऐसी जड़, जो आंधियों में भी उसे गिरने नहीं देती थी।

गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल गई। दीनानाथ जी ने गेट बंद किया और सुमित्रा जी से बोले, “सुनो, चाय बना लो। आज हम बरामदे में बैठकर सुकून से चाय पिएंगे। अब यह डर नहीं है कि कोई हमारे घर का सौदा करने आ रहा है।”

दोनों बुजुर्ग अपनी पुरानी आरामकुर्सियों पर बैठ गए। घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन आज वह घर उन्हें किसी महल से कम नहीं लग रहा था। क्योंकि उस घर में उनकी आत्मा बसती थी, और आत्मा का कोई सौदा नहीं होता।


कहानी का सार:

दोस्तों, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर सुख-सुविधाओं को ही सब कुछ मान लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि माता-पिता को मार्बल के फर्श या एसी कमरों की ज़रूरत नहीं होती, उन्हें बस अपनेपन और अपनी पुरानी यादों के साथ जीने के हक़ की ज़रूरत होती है। घर ईंटों से नहीं, भावनाओं से बनता है। हर पुरानी चीज़ बेकार नहीं होती, और हर नए बदलाव में सुकून नहीं होता।

प्रश्न आपके लिए:

क्या दीनानाथ जी का फैसला सही था? क्या उन्हें अपने बेटे की बात मानकर शहर चले जाना चाहिए था या अपनी यादों के साथ गांव में रहकर उन्होंने सही किया? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


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मूल लेखिका : के कामेश्वरी 

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