उपहार की कीमत नहीं दिल देखा जाता है। – प्रतिमा श्रीवास्तव : Moral Stories in Hindi

कुसुम जी के तेवर में आज सख्ती थी।बहू रीत की मां ने सबके लिए कुछ उपहार स्वरूप कपड़े, मिठाइयां और लिफाफे भेजे थे क्योंकि रीत की पहली दीपावली थी।

रीत ” तुम्हारी मां को हमारी हैसियत का बिल्कुल अंदाजा नहीं  है। ऐसे कपड़े हमलोग नहीं पहनते हैं, अगर देना है तो ढंग की चीजें भेजा करें।”

मम्मी जी! ” मैं गई थी साथ में मम्मी के और मैंने आप सभी के पसंद को देखते हुए ही सब खरीदा है ” रीत बोली।

रीत ” तुमने कब देखा है कि मैं इतनी सस्ती साड़ियां पहनतीं हूं?” 

मम्मी जी ” #उपहार की कीमत नहीं दिल देखा जाता है। मेरी मम्मी ने अपनी हैसियत से ज्यादा हर चीज को अच्छा से अच्छा करने की कोशिश की है।उनकी भावनाओं की इज्जत तो करनी चाहिए आपको।”रीत ने बड़ी नम्रता से कहा।

कुसुम जी को रीत की बातें अच्छी नहीं लगी और वो बोली कि” त्योहार तो मैं भी अपनी बेटी के ससुराल में भेजती हूं एक से बढ़कर एक।”

“मम्मी जी हर मां अपनी बेटी के लिए अच्छा से अच्छा करना चाहती है और आप सोचिए कि आपके इतने अच्छे उपहार के बाद भी अगर दीदी के ससुराल से आपको यही बातें सुननी पड़े तो आपको कैसा लगेगा।

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तोहफे पैसों से ज्यादा भेजने वाले की नियति पर निर्भर करतें हैं। मां बाप छोटी से छोटी चीजों में अपनी जान डाल देते हैं और कल को उनको पता चले कि उनको ऐसी बातें सुननी पड़ेगी तो उन्हें कितनी तकलीफ़ होगी।”

अरे! बहू मैंने कभी भी ऐसा नहीं सोचा। सचमुच में तुमने मेरे नजरिए को ही बदल दिया।समधन जी को फोन लगाओ मैं उन्हें धन्यवाद देना चाहती हूं। मैं सिर्फ बेटे की मां ही बनकर सोचती रही लेकिन मैं एक बेटी की भी मां हूं ऐसा नहीं सोचा।”

“धन्यवाद मम्मी जी… आपने मेरी बातों को समझा और मेरे घरवालों की भावनाओं को भी।”

रीत” अब मुझे विश्वास है कि तुम्हारी मां ने तुम्हें कितने अच्छे संस्कार दिए हैं तुम्हें इंसान के भावनाओं की कद्र है और तुमने बहुत अच्छी तरह से अपनी बात ही नहीं रक्खी बल्कि मेरी सोच को भी बदला। मैंने अपने ससुराल में ये सारी बातें बहुत झेली थी और कहीं ना कहीं वैसी ही बन गई थी ।मैंने ये नहीं सोचा कि तुमको कैसा लगेगा ये सब सुनकर। रीत बेटा मुझे माफ कर देना।”

“अरे नहीं मम्मी जी माफी की कोई बात नहीं है।कई बार इंसान की सोच में बदलाव लाना जरूरी होता है। समय बहुत बदल रहा है। त्योहारों पर तोहफें लेना देना हर मां – बाप के बस की बात नहीं होती है। चीज छोटी हो या बडी सस्ती हो या महंगी ये मायने नहीं रखती है। आपकी तो हैसियत इतनी है कि आप सबकुछ अच्छा से अच्छा खरीद सकतीं हैं पर मेरे मायके में इतना पैसा रुपया नहीं है। अगर होता भी तो भी हमें दूसरे की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए।”

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तभी रीत की मम्मी का फोन आ जाता है त्योहार की शुभकामनाएं देने के लिए।

“भाभी जी बहुत बहुत बधाई हो आप सभी को” रीत की मम्मी ने कहा।

” धन्यवाद भाभी जी आपको भी बधाई हो। आपके भेजे हुए उपहार हम सभी को बहुत पसंद आए और हां अब आप इन सब औपचारिकता में नहीं पड़िएगा।आपका आशीर्वाद ही बच्चों पर बना रहे यही बहुत है।”

रीत की मम्मी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि उन्होंने सोचा कि कितने अच्छे घर में अपनी बेटी का विवाह किया है और वो बेटी को लेकर निश्चिंत हो गई थी और अपनी समधन के लिए उनकी निगाह में इज्जत बढ़ गई थी।

सचमुच अगर हर इंसान की सोच में इतना बदलाव आ जाए तो कभी कोई रिश्ता आहत नहीं होगा,आखिर सब एक परिवार ही तो है।

                 प्रतिमा श्रीवास्तव 

                 नोएडा यूपी

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