“त्याग की आड़ में” – निधि गुप्ता

** क्या एक माँ का संघर्ष उसके बेटे की खुशियों का ‘आजीवन कारावास’ बन सकता है? क्या अतीत के दुखों की दुहाई देकर वर्तमान की खुशियों का गला घोंटना जायज़ है? जानिये सुमन की कहानी, जिसने ‘फर्ज’ और ‘गुलामी’ के बीच की लकीर खींच दी।

“बेटा! तुम मेरी बहू की उम्र की हो, इसलिए एक बात कहे बिना रह नहीं पा रही। बेटा! सावित्री बहन ने बड़ी तकलीफों से रवि बेटे को पाला है, तुम्हें तो पता ही होगा, रवि काफी छोटा था जब उसके पापा स्वर्ग सिधर गए, तो किस तरह सावित्री बहन ने सब कुछ संभाला। आज उन्हें आराम की ज़रूरत है, तो ऐसे में तुम्हारा

फर्ज बनता है, उनकी सेवा करो। देखो बेटा, हम जैसा करते हैं, वैसा ही हमारे पास वापस आता है, इससे कल को तुम्हारा ही भला होगा। तुम्हारा भी एक बेटा है, वह तुम्हें देखकर ही सीखेगा।”

पड़ोस की सरला चाची ने सोफे पर बैठते हुए, चाय की चुस्की के साथ यह प्रवचन दिया। सामने खड़ी सुमन के हाथ में गीले कपड़े थे, माथे पर पसीने की बूंदें थीं और आँखों में पिछले चार दिनों की अधूरी नींद। सरला चाची की बातें सुनकर सुमन के होंठों पर एक फीकी, कड़वी मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से सिर हिलाया, “जी चाची जी, जानती हूँ। माँ जी का त्याग बहुत बड़ा है।”

सरला चाची अपनी ज्ञान की पोटली झाड़कर चली गईं, लेकिन उनके शब्द सुमन के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंजते रहे— *’सावित्री बहन ने बड़ी तकलीफों से रवि को पाला है।’*

यह वाक्य सुमन ने शादी के सात सालों में कम से कम सात हज़ार बार सुना होगा। यह वाक्य इस घर का ‘मंत्र’ था, और सुमन के जीवन का ‘पिंजरा’।

रवि और सुमन की शादी एक अरेंज मैरिज थी। रवि एक बैंक में मैनेजर था और सुमन एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका। शादी से पहले सुमन को बताया गया था कि रवि के पिता नहीं हैं और माँ ने सिलाई-कढ़ाई करके बेटे को पढ़ाया है। सुमन के मन में अपनी सास, सावित्री देवी के लिए अपार श्रद्धा थी। उसे लगा था कि जिसने जीवन में इतना संघर्ष देखा हो, वह दूसरों के दर्द को समझेगी।

लेकिन शादी के एक महीने बाद ही सुमन का भ्रम टूट गया।

सावित्री देवी बीमार नहीं थीं, लेकिन उन्होंने ‘बीमार’ और ‘बेचारी’ होने का ऐसा अभिनय ओढ़ लिया था कि घर की हर दीवार को उनसे सहानुभूति थी। वे सुबह छह बजे उठतीं, लेकिन बिस्तर से नहीं उतरतीं। उनकी दिनचर्या तय थी—सुबह उठकर पुराने दिनों को याद करके दो आंसू बहाना, ताकि रवि का दिन ‘गिल्ट’ (आत्मग्लानि) से शुरू हो।

“रवि… मेरे घुटनों में जान नहीं बची बेटा। वो तो तेरे पापा चले गए, वरना आज मुझे यह दिन न देखना पड़ता,” सावित्री देवी सुबह की चाय के साथ यह डायलॉग जरूर बोलतीं।

रवि, जो अपनी माँ के संघर्षों की कहानियाँ सुन-सुनकर बड़ा हुआ था, पिघल जाता। वह तुरंत सुमन पर बरस पड़ता, “सुमन, माँ की चाय ठंडी क्यों है? तुम्हें पता है न उन्होंने मेरे लिए कितना सहा है? तुम थोड़ा जल्दी नहीं उठ सकती?”

सुमन सुबह पाँच बजे उठती थी। घर का झाड़ू-पोछा, खाना बनाना, टिफिन तैयार करना, अपने छह साल के बेटे आरव को स्कूल के लिए तैयार करना और फिर खुद स्कूल भागना। शाम को लौटकर फिर वही चक्की पीसना। और इस सब के बदले उसे मिलता क्या? ताने।

सावित्री देवी का ‘त्याग’ एक ऐसा हथियार था जिसका इस्तेमाल वे सुमन के हर अरमान का गला घोंटने के लिए करती थीं।

एक रविवार की बात है। सुमन और रवि ने फिल्म देखने का प्लान बनाया। बहुत दिनों बाद उन्हें वक्त मिला था। सुमन ने अपनी पसंदीदा साड़ी पहनी, बालों में गजरा लगाया। वह तैयार होकर बाहर आई, तो देखा सावित्री देवी सोफे पर लेटी जोर-जोर से कराह रही हैं।

“क्या हुआ माँ?” रवि घबरा गया।

“कुछ नहीं बेटा, बस छाती में भारीपन लग रहा है। तू जा… बहु को फिल्म दिखा ला। मेरा क्या है, मैं तो वैसे भी बोझ हूँ। आज हूँ, कल चली जाऊंगी,” सावित्री देवी ने आँखों में ग्लिसरीन वाले आंसू भरकर कहा।

रवि ने तुरंत सुमन की तरफ देखा, उसकी आँखों में गुस्सा था। “सुमन, तुम्हें दिखता नहीं माँ की तबीयत खराब है? तुम्हें फिल्म की पड़ी है? जाओ, कपड़े बदलो और माँ के लिए काढ़ा बनाओ।”

सुमन का दिल टूट गया। उसने चुपचाप साड़ी बदली और रसोई में चली गई। आधे घंटे बाद जब वह काढ़ा लेकर आई, तो देखा सावित्री देवी मजे से फोन पर सरला चाची से बात कर रही थीं और हँस रही थीं। सुमन को देखते ही उन्होंने फिर से कराहना शुरू कर दिया।

सुमन समझ गई थी कि यह बीमारी शारीरिक नहीं, मानसिक है। यह असुरक्षा की बीमारी है। सावित्री देवी को डर था कि अगर रवि अपनी पत्नी को प्यार करेगा, तो माँ के ‘त्याग’ का मोल कम हो जाएगा।

वक्त बीतता गया। सुमन मशीन बन गई थी। स्कूल और घर की दोहरी जिम्मेदारी उसे तोड़ रही थी। रवि अपनी माँ की भक्ति में इतना अंधा था कि उसे पत्नी की थकान, उसके काले घेरे और उसकी खामोशी दिखाई ही नहीं देती थी।

हद तो तब हो गई जब सुमन को टाइफाइड हो गया। डॉक्टर ने उसे पंद्रह दिन के पूर्ण आराम की सलाह दी। सुमन बिस्तर पर पड़ी थी, शरीर बुखार से तप रहा था।

पहले दो दिन तो रवि ने बाहर से खाना मंगवाया। लेकिन तीसरे दिन सावित्री देवी का धैर्य जवाब दे गया।

सुबह के दस बजे थे। रवि ऑफिस जा चुका था। सावित्री देवी सुमन के कमरे में आईं।

“बहु… ओ बहु! उठ,” उन्होंने सुमन को झकझोरा।

सुमन ने मुश्किल से आँखें खोलीं। “जी माँ जी… पानी चाहिए?”

“पानी नहीं चाहिए। रवि के आने का वक्त हो रहा है लंच के लिए। बाहर का खाना खाकर उसके पेट में दर्द हो रहा है। उठकर खिचड़ी बना दे। और देख, मशीन में मेरे कपड़े पड़े हैं, वो भी धो देना। मैं तो बुर्जुग हूँ, मुझसे नहीं होता।”

सुमन को यकीन नहीं हुआ। वह कांपते हाथों से उठी। चक्कर आ रहे थे। उसने दीवार का सहारा लिया।

“माँ जी… मुझसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा। आज आप प्लीज खिचड़ी बना लीजिये ना,” सुमन ने विनती की।

सावित्री देवी का चेहरा तमतमा गया। “अच्छा? अब तू मुझे काम बताएगी? मैंने पूरी जिंदगी कोल्हू के बैल की तरह काम किया है रवि को पालने के लिए, और तू चार दिन के बुखार में महारानी बन गई? यही संस्कार दिए हैं तेरी माँ ने?”

सुमन की आँखों से आंसू बह निकले। उसने कुछ नहीं कहा। वह गिरते-पड़ते रसोई में गई। गैस जलाई। लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था। कुकर चढ़ाते वक्त उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी।

शाम को जब रवि घर लौटा, तो घर में सन्नाटा था। रसोई में सुमन बेहोश पड़ी थी और कुकर की सीटी बज-बजकर बंद हो चुकी थी। आरव स्कूल से आकर सोफे पर ही भूखा सो गया था। और सावित्री देवी? वे अपने कमरे में टीवी देख रही थीं।

रवि ने जब सुमन को देखा, तो उसके हाथ-पांव फूल गए। उसने पानी के छींटे मारे। सुमन को होश आया, लेकिन वह बहुत कमजोर थी। रवि उसे उठाकर बिस्तर पर ले गया। डॉक्टर को बुलाया गया। ड्रिप लगाई गई।

जब रवि कमरे से बाहर निकला, तो उसने देखा सावित्री देवी इत्मीनान से चाय पी रही थीं।

“माँ, सुमन रसोई में बेहोश पड़ी थी और आपको पता भी नहीं चला?” रवि की आवाज़ में कंपन था।

सावित्री देवी ने लापरवाही से कहा, “अरे, मुझे क्या पता? मुझे लगा नाटक कर रही होगी काम से बचने के लिए। आजकल की लड़कियों में जान ही कहाँ होती है? हम तो बुखार में भी दस लोगों का खाना बनाते थे।”

तभी आरव, जो जाग चुका था, अपनी दादी के पास आया। उसके हाथ में एक गिलास पानी था। उसने पानी दादी को नहीं, बल्कि रवि को दिया।

“पापा, पानी पी लो,” आरव ने मासूमियत से कहा।

फिर उसने जो कहा, उसने पूरे घर की नींव हिला दी।

“पापा, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा ना, तो मैं भी अपनी वाइफ से ऐसे ही काम करवाऊंगा जैसे आप मम्मी से करवाते हो। दादी कहती हैं कि बहुएं तो पैर की जूती होती हैं। और पापा, सरला दादी कह रही थीं कि जैसा हम करते हैं, वैसा ही हमारे बच्चे सीखते हैं। तो मैं आपसे सीख रहा हूँ कि जब मम्मी बीमार हों, तो टीवी देखना चाहिए और उन्हें काम करने देना चाहिए।”

रवि सन्न रह गया। उसके छह साल के बेटे ने उसे वो आईना दिखा दिया था जो वह पिछले सात सालों से देखने से बच रहा था। ‘कर्म’। सरला चाची की बात सच हो रही थी—बच्चा वही सीख रहा था जो देख रहा था। रवि ने देखा कि उसका बेटा एक असंवेदनशील और क्रूर इंसान बनने की राह पर है—बिल्कुल अपने पिता की तरह।

रवि की आँखों से पर्दा हट गया। उसने अपनी माँ की तरफ देखा। सावित्री देवी का चेहरा पीला पड़ गया था। आरव की बात उनके कलेजे में तीर की तरह चुभी थी।

“आरव, अंदर जाओ,” रवि ने सख्ती से कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दर्द था।

रवि अपनी माँ के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

“माँ,” उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “आज आरव ने मुझे वो बता दिया जो मैं खुद से छिपा रहा था। आपका संघर्ष महान था माँ, इसमें कोई शक नहीं। आपने मुझे पालने के लिए बहुत कुछ सहा। लेकिन माँ… उस संघर्ष की कीमत आप सुमन से क्यों वसूल रही हैं?”

“मैं? मैं क्या वसूल रही हूँ? मैं तो बस…” सावित्री देवी ने बचाव करना चाहा।

“बस कीजिये माँ!” रवि पहली बार माँ के सामने चिल्लाया नहीं, बल्कि टूट गया। “आप बीमार नहीं हैं माँ, आप असुरक्षित हैं। आप चाहती हैं कि मैं जिंदगी भर आपका ऋणी रहूं। आपने मुझे पाला, यह आपका फर्ज था और प्यार था। लेकिन उस प्यार को आपने ‘कर्ज’ बना दिया। और उस कर्ज का ब्याज कौन भर रहा है? सुमन।”

“आज सुमन रसोई में मर भी सकती थी, और आप चाय पी रही थीं? क्या यही वो संस्कार हैं जिनके लिए आपने इतना संघर्ष किया? अगर आरव अपनी पत्नी के साथ कल यही करेगा, तो क्या आपको खुशी होगी?”

सावित्री देवी चुप थीं। उनकी आँखों में टीवी की रोशनी थी, लेकिन चेहरे पर अंधकार।

“माँ, सेवा प्यार से होती है, डर से नहीं। सुमन आपकी इज्जत करती थी, लेकिन आपने उसे मजबूर कर दिया कि वह आपसे डरे। आज मुझे शर्म आ रही है—सिर्फ खुद पर नहीं, आपकी परवरिश पर भी। क्योंकि आपने मुझे बेटा तो बनाया, लेकिन एक अच्छा पति और इंसान नहीं बनने दिया।”

रवि उठा और सुमन के कमरे में चला गया।

सावित्री देवी देर रात तक वहीं बैठी रहीं। आरव की वो बात— *”मैं भी अपनी वाइफ से ऐसे ही काम करवाऊंगा”*—उनके कानों में गूंजती रही। उन्होंने अपनी पूरी जवानी इसलिए नहीं खपाई थी कि उनका पोता एक जालिम इंसान बने। उन्हें अपनी गलती का एहसास हो रहा था, लेकिन अहंकार अभी भी आड़े आ रहा था।

अगले तीन दिन तक रवि ने ऑफिस से छुट्टी ली। उसने घर का सारा काम किया। झाड़ू, पोछा, खाना। उसने सावित्री देवी से एक गिलास पानी भी नहीं माँगा और न उन्हें दिया। जब सावित्री देवी ने कहा, “बेटा, मेरे घुटने दुख रहे हैं,” तो रवि ने बस इतना कहा, “दवा मेज पर रखी है माँ, ले लीजिये। सुमन बीमार है, मैं अभी उसे देख रहा हूँ।”

इस उपेक्षा ने सावित्री देवी को तोड़ दिया। उन्हें समझ आ गया कि ‘सत्ता’ और ‘प्यार’ में फर्क होता है। उन्होंने सत्ता तो जमा ली थी, पर प्यार खो दिया था।

चौथे दिन सुबह, सुमन थोड़ी बेहतर थी। वह उठने की कोशिश कर रही थी कि कमरे में सावित्री देवी आईं। उनके हाथ में सूप का कटोरा था।

सुमन सहम गई। “माँ जी… मैं अभी उठ रही हूँ, नाश्ता…”

“चुपचाप लेटी रह,” सावित्री देवी की आवाज़ में वही कड़कपन था, लेकिन आँखों में नमी थी।

उन्होंने सूप का कटोरा साइड टेबल पर रखा और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।

“सुमन,” उन्होंने सुमन के सिर पर हाथ रखा। वह हाथ अब आशीर्वाद देने वाला लग रहा था, हुकुम चलाने वाला नहीं।

“मैंने सरला से कहा था कि बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। पर मैं भूल गई थी कि रवि भी वही सीख रहा था जो मैं कर रही थी। मैं अपने अतीत के दुखों को ढाल बनाकर तुम दोनों के वर्तमान पर राज करना चाहती थी। मुझे डर था कि अगर तू रवि के करीब आ गई, तो मेरा क्या होगा? मैं अकेली हो जाउंगी।”

सुमन की आँखों में आंसू आ गए।

सावित्री देवी ने पल्लू से अपनी आँखें पोंछी। “उस दिन आरव ने मेरी आँखें खोल दीं। मैं नहीं चाहती मेरा पोता यह सीखे कि औरतों का सम्मान नहीं करना चाहिए। मुझे माफ़ कर दे बहु। मैंने तेरे फर्ज का बहुत फायदा उठाया। अब और नहीं।”

दरवाजे पर खड़े रवि और आरव यह सब देख रहे थे। रवि की आँखों में सुकून था।

उस दिन के बाद रायजादा परिवार में सब कुछ रातों-रात नहीं बदला, लेकिन शुरुआत हो चुकी थी। अब सावित्री देवी रोज सुबह ‘बीमार’ नहीं होती थीं। कभी-कभी वह खुद आरव को स्कूल छोड़ने जाती थीं। सुमन को अब फिल्म देखने जाने के लिए झूठ नहीं बोलना पड़ता था।

और सबसे बड़ी बात, सरला चाची ने आना कम कर दिया था, क्योंकि अब उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता था।

**समापन:**

दोस्तों, यह कहानी हर उस घर की है जहाँ ‘त्याग’ को एक तमगा बना लिया जाता है। माता-पिता का संघर्ष पूजनीय है, लेकिन उसका इस्तेमाल बच्चों को मानसिक रूप से बंधक बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। एक माँ का असली त्याग तब सफल होता है जब उसका बेटा न सिर्फ एक अच्छा पुत्र बने, बल्कि एक जिम्मेदार पति और पिता भी बने। और बहुएं… वे दूसरे घर से आती हैं, इसका मतलब यह नहीं कि वे पिछले जन्मों का कर्ज चुकाने आई हैं। रिश्ते बराबरी और सम्मान से चलते हैं, ‘अहसान’ जताने से नहीं।

**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके आसपास भी कोई ऐसी सावित्री देवी या सरला चाची है जो अतीत की दुहाई देकर आज के रिश्तों में जहर घोल रही है? और क्या रवि का अपनी माँ के खिलाफ खड़ा होना सही था? अपने विचार कमेंट में जरूर लिखें।

**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो रिश्तों की सच्चाई बयां करती ऐसी ही मार्मिक और दिल को झकझोर देने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद।**

लेखिका : निधि गुप्ता

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