ट्रेन सफर – एम. पी. सिंह

ये मेरे जीवन का पहला ट्रैन का सफर था जिसे मैं अकेला करने वाला था. इस सफर की ख़ास बात ये है कि सफर प्रारम्भ होने से पहले ही समाप्त हों गया. 

पूरा किस्सा इस प्रकार है – मैं करोलबाग दिल्ली मैं रहता था और 10वी क्लास मैं पढ़ता था. मेरे भाई साब ने भोपाल मैं नई नई नौकरी ज्वाइन की थीं. नौकरी ज्वाइन करने से पहले ही मुझे दिवाली पर भोपाल आने के लिए बोल दिया था, ओर बोला की अगर छुट्टी वगैर की प्रॉब्लम न हुई तो मैं ही आ जाउगा. जैसा भी होगा मैं टेलीग्राम कर दूँगा. मैं पहली बार अकेले कहीं घूमने जाने के बारे में सोचकर थोड़ा घबरा भी रहा था और उत्तेजित भी था.

दिवाली के दिन नजदीक आ रहे थे और आखिर एक दिन पोस्टमैन आया ओर एक टेलीग्राम दिया. उसमे लिखा था ” कम फॉर दिवाली “. मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. संडे का ट्रैन में स्लीपर का टिकट बुक कराया ओर सूटकस वगैर सब तैयार कर लिया. सुबह ही ऑटो बाले क़ो बोल दिया की दोपहर में 1 बजे आ जाना, 3 बजे की ट्रैन है. में खाना खा ही रहा था

की ऑटो की आवाज आई फिर डोर बेल बजी, मैंने घड़ी देखी तो अभी साढ़े बारह ही बजे थे, सोचा ऑटो वाला जल्दी आ गया होगा. मैंने दरवाजा खोला तो सामने भईया खडे थे. में भाई क़ो देखकर चौक गया. मुझे हैरान होता देख भाई बोला, क्या हुआ, टेलीग्राम नहीं मिला क्या? 

मैंने टेलीग्राम लाकर भईया क़ो दिया तो वो भी हैरान हों गया. अब मैंने पूछा, क्या हुआ? भाई बोला मैंने तो टेलीग्राम में लिखा था “कमिंग फॉर दिवाली ” 

जरा सी टेलीग्राम की गलत खबर ने मेरा ट्रैन का सफर शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया.

आज भी हर दिवाली पर ये किस्सा जरूर याद आ जाता हे.

लेखक

एम. पी. सिंह, कोटा

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