तोरा मन दर्पण कहलाए पुस्तक का आज विमोचन था इस अवसर पर काव्या को सभी की बधाई मिल रही थी पुस्तक मैं काव्या ने अपने जीवन की घटनाओं को खूबसूरती से वर्णन किया था
किस तरह अवसाद से लेकर आत्मविश्वास का सफर तय किया । काव्या ने पहली प्रति अपने पापा को भेंट करी और कहा ये सब आपकी बदौलत संभव हो पाया है ।पापा ने गले लगाते हुए
कहा इसमें तुम्हारा ज्यादा योगदान है दूसरों की बातों को नजरअंदाज करके आगे बढ़ना बहुत हिम्मत का काम है जब हमारे अपने ही हमें दुखी करते है तो हिम्मत और टूट जाती है।
काव्या बहुत खुश थी उसकी मां और बहन के चेहरे देखने लायक थे उन्होंने बुझे मन से काव्या को बधाई दी काव्या मुस्कुरा कर अपने कमरे मै चली गई।
उसके आंखों के सामने सारा मंजर घूम रहा था काव्या और उसकी बहन कायरा जुड़वां थी कायरा जहां गजब की खूबसूरत थी काव्या उतनी ही विपरीत ।जब काव्या ने थोड़ा समझना सीखा तब से वो सुनती आ रही थी
ये कायरा की बहन नहीं लगती ये किस पर चली गई उसके मम्मी ,पापा भी दिखने में अच्छे लगते थे ।
धीरे धीरे काव्या ने महसूस किया अब उसकी मां उसे अपने साथ कम ले जाती वो जिद्द करती तो कहती दो दो बच्चों को सम्हालना मुश्किल हो जाता है और काव्या तुम तो समझदार हो
काव्या सब समझती थी वो रोती तो उसके पापा समझाते और वो घुमाने ले जाते ।अपनी पत्नी और कायरा की भी समझाते कि की ऐसा करना गलत है पर उन्हें समझ नहीं आता।
थोड़ी और बड़ी हुई तो एक दिन कायरा को कहते सुना मम्मी काव्या को बोल दो स्कूल में मुझसे दूर रहा करे सब मेरा मजाक उड़ाते है ।मम्मी ने उसको समझाने की जगह कहा कि तुम चिंता मत करो मैं उसे अच्छे से समझा दूंगी।
उस दिन काव्या बहुत रोई तब पापा ने गले लगाकर समझाया तुम इन सब बातों से दुखी मत हो असली ख़ूबसूरती शरीर की नहीं मन की होती है तुम्हारा मन बहुत खूबसूरत है इन सबके बावजूद तुम
उन सबसे प्रेम करती हो अपने अंदर के हुनर को पहचानो और उसे निखारो क्योंकि एक बार पहचान मिल गई तो सब उस से पहचानते है ।
तब से कायरा ने इन सब पर ध्यान देना छोड़ दिया और अपने दर्द को शब्दों में व्यक्त करना सीख लिया बड़े होते होते उसके शब्दों की पकड़ इतनी गहरी हो गई
कि सामने वाले को अपनी ही पीड़ा लगती ।और आज पहली किताब का विमोचन होने पर वो बहुत खुश थी जल्दी ही उसकी सारी प्रतियां बिक गई कायरा को काफी संदेश और बधाई प्राप्त हुई जिस से उसके अंदर आत्मविश्वास और बढ़ गया ।।
अक्सर हम लोग सामने वाले के दर्द को समझे बिना उस पर टिप्पणी करते है शरीर की सुंदरता मन की सुंदरता से छोटी होती है लेकिन हम आज भी उसे ही बेहतर मानते है यही हमारी भूल है जिससे हम सामने वाले को दुखी करते है
स्वरचित
अंजना ठाकुर