टूटे भ्रम – निधि गुप्ता

अनामिका के लिए उसके पिता, प्रोफ़ेसर विद्यानाथ, किसी महापुरुष से कम नहीं थे। शहर के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज में समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष विद्यानाथ जी अक्सर मंचों से समानता, रूढ़िवाद के अंत और आधुनिक विचारों की बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे। अनामिका बचपन से ही दर्शकों की पहली कतार में बैठकर अपने पिता को तालियों की गड़गड़ाहट के बीच भाषण देते हुए सुनती आई थी। जब वे कहते कि “बेटियां समाज का गौरव हैं, और उन्हें अपनी ज़िंदगी के फैसले लेने का पूरा अधिकार होना चाहिए,” तो अनामिका का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। उसे लगता था कि वह दुनिया की सबसे भाग्यशाली बेटी है जिसे इतने खुले विचारों वाले, प्रगतिशील और समझदार पिता मिले हैं। पिता के इन्हीं विचारों ने अनामिका के व्यक्तित्व को निखारा था। वह निडर थी, आत्मविश्वास से भरी थी और मानती थी कि इंसान की पहचान उसके कर्म और विचारों से होती है, न कि उसकी जाति, धर्म या बैंक बैलेंस से।

लेकिन ज़िंदगी जब इम्तिहान लेती है, तो अक्सर सारे भ्रम शीशे की तरह टूट कर बिखर जाते हैं। अनामिका का यह भ्रम भी तब टूटा, जब उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और अहम फैसला अपने पिता के सामने रखा। यूनिवर्सिटी में मास्टर्स करने के दौरान अनामिका की मुलाकात शशांक से हुई थी। शशांक एक बेहद होनहार, ईमानदार और सुलझा हुआ युवा था। दोनों के विचार मिलते थे और धीरे-धीरे यह दोस्ती एक गहरे प्रेम में बदल गई। शशांक ने अपने बलबूते पर एक अच्छी नौकरी पा ली थी, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि विद्यानाथ जी के परिवार जितनी संभ्रांत नहीं थी। शशांक एक अलग और तथाकथित ‘निचली’ जाति से ताल्लुक रखता था और एक बहुत ही साधारण परिवार का बेटा था। 

अनामिका को पूरा यकीन था कि उसके पिता शशांक को खुशी-खुशी अपना लेंगे। आखिर मंचों पर जातिवाद के खिलाफ सबसे मुखर आवाज़ विद्यानाथ जी की ही तो होती थी! एक शाम, बहुत ही उम्मीद और प्रेम से भरकर, अनामिका ने शशांक और अपने रिश्ते की बात अपने पिता को बताई। 

पर उस शाम जो हुआ, उसके लिए अनामिका का अंतर्मन रत्ती भर भी तैयार नहीं था। विद्यानाथ जी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उनके होंठ कांपने लगे और आँखों में ऐसा तिरस्कार उभर आया जो अनामिका ने पहले कभी नहीं देखा था। मंच पर समानता का पाठ पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर विद्यानाथ एक झटके में एक ऐसे संकीर्ण और कुंठित मानसिकता वाले इंसान में बदल गए, जिसे देखकर अनामिका की रूह कांप गई। 

“क्या कहा तुमने? उस दो कौड़ी के लड़के से तुम शादी करोगी, जिसकी जाति हमारे पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है? मेरे समाज में, मेरे खानदान में मेरी क्या इज्जत रह जाएगी? लोग क्या कहेंगे कि विद्यानाथ की बेटी एक… के साथ भाग गई!” पिता के मुँह से निकले ये शब्द किसी ज़हरीले तीर की तरह अनामिका के कानों को चीर रहे थे। 

अनामिका ने रोते हुए कहा, “पापा, आप ही तो कहते हैं कि जात-पात सब ढकोसला है। इंसान की सीरत देखनी चाहिए। शशांक बहुत अच्छा इंसान है।”

“चुप रहो!” विद्यानाथ जी गरजे, “मंच की बातें और घर की हकीकत में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। अगर तुमने उस लड़के से कोई भी रिश्ता रखा, तो मैं तुम्हारे लिए मर जाऊंगा और तुम मेरे लिए।”

उस पल अनामिका को महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके पैरों तले से ज़मीन खींच ली हो। पिता के व्यवहार से उसका अंतर्मन लहूलुहान हो गया था। वह सोचने पर मजबूर हो गई कि जो पिता उम्र भर दूसरों को आदर्शों का ज्ञान बांटते रहे, उनके अपने विचार इतने कुंठित और खोखले कैसे हो सकते हैं? उस दिन अनामिका का पहली बार इंसान के दोहरे चरित्र से पाला पड़ा था। उसे समझ आ गया कि उसके पिता के हाथी के दाँत खाने के और, तथा दिखाने के कुछ और थे। यह झूठी शान, यह खोखला आदर्शवाद, सब सिर्फ दुनिया की वाहवाही लूटने का एक नाटक था। 

अनामिका ने तय कर लिया कि वह इस खोखलेपन और झूठे ढोंग के बीच घुट-घुट कर नहीं जिएगी। उसने अपने सच्चे प्यार और स्वाभिमान को चुना। शशांक और अनामिका ने एक छोटे से मंदिर में कुछ दोस्तों की मौजूदगी में शादी कर ली। पिता ने सारे रिश्ते तोड़ लिए और अनामिका वह शहर छोड़कर हमेशा के लिए शशांक के साथ पुणे चली गई।

पुणे शहर ने अनामिका को एक नई पहचान दी। उसने अपनी पुरानी यादों के घावों को अपनी गृहस्थी की नींव में दफ्न कर दिया। समय ने पंख लगा लिए। शशांक और अनामिका ने मिलकर एक बहुत ही खूबसूरत दुनिया बसाई। उनके दो प्यारे बच्चे हुए। अनामिका ने अपने बच्चों को वो संस्कार दिए जो मंच से बोले जाने वाले झूठे भाषणों से नहीं, बल्कि घर के सच्चे माहौल से पनपते थे। उसने कभी अपने अतीत की कड़वाहट को अपने वर्तमान पर हावी नहीं होने दिया। वह अपनी गृहस्थी में इतनी मगन हो गई कि पुराने शहर और पिता की यादें एक धुंधले सपने जैसी लगने लगीं। 

बीस साल बीत गए। इन बीस सालों में बहुत कुछ बदल चुका था। शशांक अब अपनी कंपनी में एक बहुत बड़े पद पर था। एक दिन शशांक घर आया और उसने अनामिका को बताया कि कंपनी ने उसका ट्रांसफर वापस उसी शहर (अनामिका के मायके वाले शहर) में कर दिया है और यह एक बहुत बड़ा प्रमोशन है। यह सुनते ही अनामिका के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। बीस साल! एक पूरी उम्र गुज़र गई थी। अनामिका अब खुद एक युवा बेटी और बेटे की माँ थी। 

वापस अपने पुराने शहर में कदम रखते ही अनामिका के मन में अजीब सी हलचल होने लगी। वो हवा, वो सड़कें, वो चौराहे—सब कुछ परिचित था, लेकिन फिर भी बहुत पराया सा लग रहा था। उम्र के इस पड़ाव पर आकर इंसान अक्सर अपनी जड़ों की तरफ लौटना चाहता है। अनामिका के मन में भी एक दबी हुई उम्मीद ने जन्म लिया। उसने सोचा, “बीस साल बहुत होते हैं। समय बड़े से बड़े घाव भर देता है। पापा अब बूढ़े हो गए होंगे। शायद उम्र के साथ उनका गुस्सा और उनका वह झूठा अहंकार भी शांत हो गया हो। शायद अब उन्हें अपनी बेटी की याद आती हो।” 

इसी उम्मीद के सहारे, एक दिन अनामिका ने अपनी पुरानी गली का रुख किया। उसके हाथों में अपने पिता की पसंदीदा मिठाई का डिब्बा था। जैसे-जैसे वह उस पुराने घर के करीब पहुँच रही थी, उसके कदम भारी हो रहे थे। घर का बाहरी रंग फीका पड़ चुका था, दीवारें कुछ पुरानी लग रही थीं। कांपते हाथों से अनामिका ने दरवाज़े की घंटी बजाई।

कुछ पलों की खामोशी के बाद दरवाज़े की कुंडी खुलने की आवाज़ आई। दरवाज़ा खुला और सामने विद्यानाथ जी खड़े थे। उम्र ने उनके बालों को पूरी तरह सफेद कर दिया था, चेहरे पर गहरी झुर्रियां थीं, लेकिन आँखों का वो कठोरपन, वो अहंकार आज भी वैसा ही था। 

अनामिका की आँखें भर आईं। बीस साल बाद अपने पिता को देखकर उसका गला रुंध गया। उसने कांपते हुए होंठों से बस इतना कहा, “पापा…”

विद्यानाथ जी की निगाहें अनामिका पर पड़ीं। उन्होंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे वो कुछ कहेंगे, लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे की रेखाएं सख्त हो गईं। उनकी आँखों में वही पुराना तिरस्कार और गुस्सा लौट आया। 

अनामिका ने आगे बढ़कर उनके पैर छूने चाहे, लेकिन विद्यानाथ जी पीछे हट गए। 

“यहाँ क्यों आई हो?” उनकी आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडक और नफरत थी।

“पापा, मैं… मैं वापस शहर आ गई हूँ। बीस साल हो गए पापा, क्या अब भी आप मुझे माफ नहीं कर पाए? मैं आपकी वही अनु हूँ…” अनामिका के आंसू गालों पर बहने लगे।

विद्यानाथ जी ने एक व्यंग्यात्मक और क्रूर मुस्कान के साथ कहा, “मेरी कोई बेटी नहीं है। मेरी जो बेटी थी, वह बीस साल पहले ही मेरी नज़रों में मर चुकी थी। तुम जिस घर की इज़्ज़त नीलाम करके गई थीं, उस घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए उसी दिन हमेशा के लिए बंद हो गए थे। चली जाओ यहाँ से, और दोबारा कभी इस चौखट पर अपनी मनहूस शक्ल मत दिखाना।”

अनामिका कुछ और कह पाती, उससे पहले ही विद्यानाथ जी ने ज़ोर से दरवाज़ा उसके मुँह पर बंद कर दिया। 

दरवाज़े के ज़ोर से बंद होने की आवाज़ पूरी गली में गूँज गई, लेकिन अनामिका के भीतर जो गूँज उठी, उसने उसके बचे-खुचे भ्रम को भी चकनाचूर कर दिया। वह बंद दरवाज़े को देखती रही। उसके हाथों में मिठाई का डिब्बा कांप रहा था। उसे लगा था कि बुढ़ापा इंसान को नरम कर देता है, लेकिन आज उसे समझ आ गया कि कुछ लोगों के लिए उनका झूठा अहंकार, उनकी जातिवादी कुंठा और समाज का दिखावा उनकी सगी औलाद से भी बढ़कर होता है। 

उस दिन के बाद भी अनामिका ने एक-दो बार दीवाली और उनके जन्मदिन पर फोन पर संपर्क करने की कोशिश की, किसी रिश्तेदार के ज़रिये बात पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन हर बार उसे सिर्फ घोर अपमान और नफरत ही मिली। विद्यानाथ जी ने अपने दिल के दरवाज़े लोहे की तरह जड़ लिए थे। 

थक-हारकर अनामिका ने अंततः समझ लिया कि एक बंद दरवाज़े पर सिर पीटने से दरवाज़ा नहीं टूटता, सिर्फ इंसान का अपना माथा लहूलुहान होता है। उसने अपने पिता के इस क्रूर सच को स्वीकार कर लिया। उसने उस दिशा में मुड़कर देखना हमेशा के लिए छोड़ दिया। उसने अपने आंसू पोंछे और अपनी उस असली दुनिया की ओर लौट आई जहाँ शशांक और उसके बच्चे उसका इंतज़ार कर रहे थे—एक ऐसी दुनिया जहाँ दिखावा नहीं, बल्कि सच्चा प्यार था। अनामिका ने जान लिया था कि कुछ रिश्ते बस नाम के होते हैं, और उनसे दूर रहना ही खुद के सम्मान और मानसिक शांति के लिए सबसे बेहतर होता है।

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लेखिका : निधि गुप्ता

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