टोल प्लाजा – एम. पी. सिंह

कितना अजीब लगता है ज़ब कोई रईसजादा, टोल टेक्स बचाने के लिए टोल कर्मचारियों से बहस करतें हुए ट्रैफिक जाम कर देतें है और दूसरे यात्रियों  का समय और तेल बर्बाद करतें है. कभी कभी तो टोल पर तोड़ फोड़, लाठी डंडे और पिस्तौल तक निकाल लेते है. कई बार टोल कर्मियों पर गाड़ी तक चढ़ाने की कोशिश की जाती है. टोल कर्मी, जो एक मामूली सी तनख्वाह पर ईमानदारी से अपनी काम करता है, अक्सर ऐसे हादसों का शिकार  भी हो जाता है. अगर इन सब हादसों पर गौर करे तो हर बार एस. यू. वी. / एम. यू. वी. ही मिलेगी. मिडल क्लास या छोटी कार वाले इन सब मे कभी शामिल नहीं होते. रसूलदार या राजनिती से प्रेरित लोग, जो 20-25 लाख कि गाड़ी चलाते है और हजारों रु. का तेल भी जलाते है, वो लोग 100-150 रु. के टोल के लिए हंगामा करते है. उनके लिए पैसो से ज्यादा अहमियत अपनी झूठी शान की होती है. क्या कोई इंसान आम आदमी क़ो परेशान करके या तकलीफ मैं डालकर महान हो सकता है? ऐसे लोगों क़ो कुछ नेताओं का संरक्षण प्राप्त होता है. ऐसे नेताओं क़ो हम लोग ही चुन कर लाते है, कभी जाति के नाम पर, कभी अपने शहर / गाँव के नाम पर आदि आदि. अगर किसी आदमी या किसी सिस्टम मैं सुधार लाना है, तो सबसे पहले हमें अपने आप में सुधार लाना बहुत जरूरी है. 

अगर हर व्यक्ति केवल अपने आप क़ो सुधार ले, तो ये सब अपने आप खत्म हो जायेगा. 

धन्यवाद 

एम. पी. सिंह 

(Mohindra Singh

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