तोहफ़ा – पुष्पा जोशी 

जब बेटे ने अपनी पहली तनख्वाह से अपनी मां को दिया सबसे बेहतरीन तोहफा..

मोबाइल की स्क्रीन पर मेसेज की बीप ने समीर का ध्यान अपनी ओर खींचा।

“आपके खाते में 45,000 रुपये जमा कर दिए गए हैं – वेतन माह अगस्त।”

समीर के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान तैर गई जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था। यह उसकी पहली कमाई थी। पिछले एक महीने की कड़ी मेहनत, रात की शिफ्ट्स, और बॉस की डांट—सब कुछ इस एक मेसेज ने धो दिया था। वह ऑफिस की कुर्सी पर पीछे की ओर झुका और आँखें बंद कर लीं।

अक्सर लोग पहली तनख्वाह से दोस्तों के साथ पार्टी करते हैं, नई बाइक लेते हैं या फिर अपनी प्रेमिका के लिए कोई महंगा तोहफा खरीदते हैं। समीर के दोस्तों के भी ऐसे ही प्लान थे। लेकिन समीर के दिमाग में पिछले पंद्रह सालों से एक छवि अटकी हुई थी, जिसे वह आज बदलना चाहता था।

वह छवि थी उसकी माँ, सावित्री की।

शाम को घर लौटते समय समीर का मन बहुत भारी और उत्साह से भरा हुआ था। घर के बाहर पहुँचकर उसने देखा कि रसोई की खिड़की से हमेशा की तरह धुएं की एक लकीर निकल रही थी और बर्तनों के खटकने की आवाज़ आ रही थी।

समीर ने दरवाज़ा खोला। ड्राइंग रूम में उसके पिता, रमेश बाबू, टीवी पर समाचार देख रहे थे।

“आ गया बेटा? कैसी रही ऑफिस में आज की दिनचर्या?” रमेश बाबू ने बिना नज़र हटाए पूछा।

“जी पापा, सब ठीक था,” समीर ने जूते उतारते हुए कहा और सीधे रसोई की ओर बढ़ा।

रसोई में सावित्री पसीने से तर-बतर थी। गैस पर रोटियाँ सिक रही थीं और सिंक में झूठे बर्तनों का ढेर लगा था। यह दृश्य समीर के लिए नया नहीं था। बचपन से उसने माँ को सिर्फ़ दो ही रूपों में देखा था—या तो रसोई में खाना बनाते हुए या फिर घर के काम करते हुए। उसके लिए ‘माँ’ का मतलब ही ‘त्याग’ और ‘काम’ बन गया था।

“माँ, पानी,” समीर ने कहा।

सावित्री ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछा और फ़्रिज से पानी की बोतल निकालकर दी। “बैठ, मैं खाना लगाती हूँ। तेरे पापा को भूख लगी होगी।”

समीर ने माँ के हाथों को गौर से देखा। वे हाथ, जो कभी बहुत कोमल हुआ करते थे (जैसा कि उसने पुरानी तस्वीरों में देखा था), अब रूखे, खुरदरे और जगह-जगह से कटे-फटे थे। उंगलियों में हल्दी और मसालों के पक्के निशान पड़ गए थे।

“माँ, आज खाना रहने दो। आज हम सब बाहर चलेंगे,” समीर ने कहा।

सावित्री हँस पड़ी। “पागल हुआ है क्या? बाहर का खाना तेरे पापा को पचता नहीं है। और पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं? चुपचाप हाथ-मुँह धो ले, मैंने भिंडी बनाई है।”

समीर ने ज़िद नहीं की। वह जानता था कि माँ को ‘मनाना’ आसान नहीं होगा।

खाना खाने के बाद, जब सब लोग हॉल में बैठे थे, समीर ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और पिता के हाथ में रख दिया।

“पापा, मेरी पहली सैलरी।”

रमेश बाबू का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्होंने लिफाफा खोला, नोटों को गिना नहीं, बस माथे से लगाया। “जुग-जुग जियो बेटा। भगवान तुझे बहुत तरक्की दे। इसमें से कुछ पैसे मंदिर में चढ़ा देना और बाकी अपनी सेविंग्स में डालना। भविष्य के लिए जोड़ना ज़रूरी है।”

समीर मुस्कुराया। “पापा, मैंने अपने लिए कुछ नहीं रखा। लेकिन मैं इस पैसे से माँ को कुछ देना चाहता हूँ।”

सावित्री, जो अभी-अभी रसोई समेट कर आई थी और सोफे के एक कोने में निढाल होकर बैठी थी, चौंक गई।

“अरे, मुझे क्या चाहिए? मेरे पास तो सब है। साड़ियाँ भरी पड़ी हैं अलमारी में, पहनती कब हूँ? तू अपने लिए कपड़े ले ले, या नया फ़ोन ले ले।”

समीर उठा और अपने कमरे से एक बड़ा सा आयताकार बॉक्स लेकर आया, जिसे उसने आते वक़्त बाहर छुपा दिया था। उसने वह बॉक्स माँ की गोद में रख दिया।

“यह क्या है?” सावित्री ने झिझकते हुए पूछा।

“खोलकर देखो,” समीर ने आग्रह किया।

सावित्री ने कांपते हाथों से पैकिंग खोली। रमेश बाबू भी उत्सुकता से देख रहे थे। शायद कोई मिक्सर-ग्राइंडर होगा या माइक्रोवेव, जो घर के काम में मदद करेगा।

जैसे ही गत्ता हटा, सावित्री की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला, बस होंठ थरथराने लगे।

बॉक्स के अंदर एक बेहद खूबसूरत, चमकदार ‘वीणा’ (एक वाद्ययंत्र) रखी थी।

कमरे में सन्नाटा छा गया। रमेश बाबू ने हैरानी से पूछा, “वीणा? इसका क्या करेगी तेरी माँ? बेटा, तुझे शायद पता नहीं, इसने तो शादी के बाद कभी इसे हाथ भी नहीं लगाया। बेकार में पैसे बर्बाद कर दिए। कोई सोने की चेन ले आता तो काम भी आती।”

समीर ने पिता की बात को अनसुना करते हुए माँ के चेहरे को देखा। सावित्री की आँखों से टप-टप आँसू गिर रहे थे और वह उस वीणा के तारों को ऐसे छू रही थी जैसे कोई माँ अपने बिछड़े हुए बच्चे को सालों बाद छू रही हो।

“तुझे… तुझे कैसे पता?” सावित्री ने रुंधे गले से पूछा।

समीर ने माँ के पास घुटनों पर बैठकर कहा, “माँ, याद है जब मैं छोटा था, दीवाली की सफ़ाई में स्टोर रूम से एक टूटी हुई वीणा निकली थी? आपने उसे कबाड़ी को देने से मना कर दिया था। उस दिन मैंने आपको उस टूटी हुई वीणा को गले लगाकर रोते हुए देखा था। मैंने नानी से पूछा था, तो उन्होंने बताया कि शादी से पहले आप राज्य स्तर की संगीत प्रतियोगिता जीत चुकी थीं। आप संगीत विशारद थीं माँ। लेकिन इस घर की रोटियाँ बेलते-बेलते आपने अपनी उंगलियों का जादू खो दिया।”

सावित्री सुबक पड़ी। “वह सब पुराना किस्सा है बेटा। अब तो उंगलियाँ भी अकड़ गई हैं। अब मैं यह सब नहीं कर सकती। लोग क्या कहेंगे? पचास साल की उम्र में बुढ़िया वीणा बजाएगी?”

“लोग नहीं सुनेंगे माँ, हम सुनेंगे,” समीर ने दृढ़ता से कहा। “और यह तोहफा सिर्फ़ यह वीणा नहीं है।”

समीर ने अपनी जेब से एक और कागज़ निकाला।

“यह देखो। मैंने शहर के सबसे अच्छे संगीत विद्यालय में तुम्हारे नाम से ‘एडवांस क्लास’ की फीस जमा कर दी है। क्लास हफ्ते में तीन दिन है, शाम को 4 से 6 बजे तक।”

अब रमेश बाबू का सब्र टूट गया। “समीर! तू होश में तो है? शाम को 4 से 6? फिर शाम का नाश्ता और रात का खाना कौन बनाएगा? घर कौन संभालेगा? तेरी माँ घर से बाहर जाएगी तो घर की व्यवस्था बिगड़ जाएगी।”

समीर ने खड़े होकर पिता की आँखों में देखा। आज उसकी आँखों में एक बेटे का लिहाज तो था, लेकिन एक पुरुष की दृढ़ता भी थी।

“पापा, पिछले पच्चीस सालों से माँ ने इस घर की व्यवस्था संभाली है। एक भी दिन छुट्टी नहीं ली। न रविवार, न त्योहार। जब हमें बुखार होता था, माँ रात भर जागती थी, फिर भी सुबह 5 बजे उठकर टिफिन बनाती थी। क्या उनका वजूद सिर्फ़ एक ‘कुक’ और ‘केयरटेकर’ तक सीमित है?”

“तो क्या हम भूखे मरेंगे?” रमेश बाबू ने झुंझलाकर कहा।

“नहीं पापा,” समीर ने मुस्कुराते हुए कहा। “मेरी तनख्वाह का बाकी हिस्सा उसी के लिए है। मैंने कमला मौसी (रसोईया) से बात कर ली है। वे कल से शाम का खाना बनाने और घर की सफ़ाई करने आएँगी। मेरी तनख्वाह से उनकी पगार जाएगी। ताकि माँ के पास वह दो घंटे सिर्फ़ ‘सावित्री’ बनने के लिए हों, ‘मिसेज रमेश’ या ‘समीर की मम्मी’ बनने के लिए नहीं।”

सावित्री ने सिर उठाया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। उसका बेटा न सिर्फ़ उसके लिए एक वाद्ययंत्र लाया था, बल्कि उसने उसे ‘समय’ और ‘आज़ादी’ खरीद कर दी थी। जो बेड़ियाँ उसने पच्चीस साल पहले रस्मो-रिवाज़ के नाम पर पहनी थीं, आज उसके बेटे ने अपनी पहली कमाई से उन बेड़ियों को काट दिया था।

“बेटा, लेकिन यह सब…” सावित्री ने संकोच किया।

“माँ,” समीर ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया, “तुमने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, मुझे पढ़ाया, इस काबिल बनाया कि मैं कमा सकूँ। आज अगर मैं उस कमाई से तुम्हें तुम्हारी खोई हुई पहचान वापस नहीं दिला सका, तो मेरी पढ़ाई और मेरी नौकरी सब बेकार है। मुझे मेरी माँ खुश चाहिए, थकी हुई नहीं।”

रमेश बाबू चुपचाप यह सब सुन रहे थे। शायद समीर की बातों ने उनके अंदर के सोए हुए इंसान को झकझोर दिया था। उन्होंने अपनी पत्नी के चेहरे को देखा। उस चेहरे पर आज एक ऐसी चमक थी जो उन्होंने शायद शादी के शुरूआती दिनों में देखी थी। वो चमक किसी सोने के गहने से नहीं, बल्कि एक उम्मीद से आई थी।

रमेश बाबू धीरे से उठे और वीणा के बॉक्स को सही से मेज पर रख दिया। फिर उन्होंने सावित्री से कहा, “बेटा सही कह रहा है। मैं भी… मैं भी स्वार्थी हो गया था। मुझे आदत पड़ गई थी हाथ में गरम चाय मिलने की। भूल गया था कि उन हाथों में संगीत भी बसता था।”

सावित्री रोते हुए उठी और वीणा को अपने सीने से लगा लिया। उसने एक तार छेड़ा।

टुन…

उस एक स्वर ने घर के सन्नाटे को तोड़ दिया। वह आवाज़ सिर्फ़ एक वाद्ययंत्र की नहीं थी, वह सावित्री की आत्मा की आवाज़ थी जो सालों बाद कैद से रिहा हुई थी।

समीर ने देखा कि माँ वीणा को गोद में रखकर, आँखें बंद करके उसे ट्यून करने की कोशिश कर रही हैं। उनकी खुरदरी, कटी-फटी उंगलियाँ जब तारों पर चलीं, तो शुरुआत में कांपीं, लेकिन फिर एक पुरानी याददाश्त ने उन उंगलियों को संभाल लिया।

उस रात घर में टीवी नहीं चला। उस रात रसोई में बर्तनों की खड़खड़ाहट नहीं हुई। उस रात समीर और रमेश बाबू सोफे पर बैठे थे और सावित्री वीणा पर ‘राग यमन’ बजा रही थी। सुर थोड़े कच्चे थे, हाथ थोड़े धीमे थे, लेकिन उस संगीत में जो सुकून था, वह उस घर ने पहले कभी महसूस नहीं किया था।

समीर ने अपनी माँ को देखा। वह अब एक साधारण गृहिणी नहीं लग रही थीं। उनके चेहरे पर एक कलाकार का तेज था। समीर को लगा कि उसकी पहली तनख्वाह पूरी तरह वसूल हो गई है।

उसने मन ही मन सोचा—दुनिया के लिए सबसे बड़ा तोहफा हीरा या सोना हो सकता है, लेकिन एक माँ के लिए सबसे बड़ा तोहफा वह है जो उसे यह याद दिलाए कि वह माँ होने के साथ-साथ एक ‘इंसान’ भी है, जिसके अपने सपने हैं।

अगले दिन जब सावित्री वीणा की क्लास के लिए तैयार होकर निकली, तो उसने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसने के बजाय सलीके से कंधे पर डाला था। उसकी चाल में थकान नहीं, आत्मविश्वास था। और गेट पर खड़े समीर ने महसूस किया कि आज उसने अपनी माँ को नहीं, बल्कि अपनी माँ ने खुद को एक नया जन्म दिया है।

मूल लेखिका : पुष्पा जोशी 

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