शाम के छह बजते ही घर की घंटी बजी। रमेश बाबू ऑफिस से लौटते ही सोफे पर धप्प से बैठ गए और पसीने से तरबतर रूमाल से अपना माथा पोंछने लगे।
“सुधा! ओ सुधा! एक गिलास पानी लाना जरा,” उन्होंने हाँफते हुए आवाज लगाई।
रसोई से सुधा जी हाथ में पानी का गिलास और दूसरे हाथ में चाय की केतली लिए बाहर आईं। “क्या हुआ जी? आज इतना घबराए हुए क्यों हैं? सब ठीक तो है?”
रमेश बाबू ने एक ही सांस में पानी पिया और गिलास मेज पर रखते हुए बोले, “अरे, ठीक क्या बहुत बढ़िया खबर है। याद है वो खन्ना जी? जो मेरे साथ हेड ऑफिस में बैठते थे? उनके साले साहब का बेटा है, ‘रचित’। लड़का अमेरिका से लौटा है, यहाँ अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की है। खन्ना जी ने आज खुद प्रस्ताव रखा है हमारी ‘काव्या’ के लिए।”
सुधा जी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। “अरे, यह तो बहुत अच्छी बात है। लड़का सेटल है, अपना काम है। और क्या चाहिए?”
लेकिन रमेश बाबू के चेहरे पर खुशी के साथ-साथ एक गहरी चिंता की लकीरें भी थीं। उन्होंने सोफे पर आगे खिसकते हुए आवाज धीमी की, “सुधा, बात तो अच्छी है, लेकिन एक समस्या है। खन्ना जी कह रहे थे कि लड़के वाले कल शाम को ही आ रहे हैं। लड़का बहुत मॉडर्न ख्यालों का है, लेकिन उसके माता-पिता थोड़े पुराने विचारों के हैं।”
“तो इसमें समस्या क्या है?” सुधा जी ने पूछा।
“समस्या काव्या की ‘आंख’ है,” रमेश बाबू ने दबी जुबान में कहा। “तुम्हें पता है ना, जब वह तनाव में होती है या ज्यादा ध्यान से देखती है, तो उसकी बायीं आंख थोड़ी सी तिरछी हो जाती है? बचपन की वो चोट… डॉक्टर ने कहा था कि यह कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन शादी-ब्याह के बाजार में लोग राई का पहाड़ बना देते हैं।”
सुधा जी चुप हो गईं। यह सच था। काव्या बेहद खूबसूरत, सुशील और सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर थी, लेकिन उसकी आंख की उस मामूली सी कमी की वजह से पहले भी दो रिश्ते टूट चुके थे।
रमेश बाबू ने एक निर्णय सुनाते हुए कहा, “सुनो, काव्या से कह देना कि कल चश्मा पहन कर ही बैठे। वो जो मोटा वाला फ्रेम है ना, जिससे आंखें छिप जाती हैं, वही वाला। और हां, कोशिश करना कि वो ज्यादा नज़रें मिलाकर बात न करे। बस चाय लेकर आए और नज़रें झुकाकर बैठ जाए। बाकी बातें हम संभाल लेंगे।”
तभी काव्या के कमरे का दरवाजा खुला। वह अपनी किताबें समेट रही थी। उसने पिता की सारी बातें सुन ली थीं। वह बाहर आई, उसके चेहरे पर एक फीकी मुस्कान थी, लेकिन आंखों में नमी।
“पापा,” काव्या ने शांत स्वर में कहा, “फिर से वही नाटक? फिर से मुझे अपनी पहचान छिपानी पड़ेगी?”
रमेश बाबू हड़बड़ा गए। “बेटी, यह नाटक नहीं है। यह दुनियादारी है। लड़का लाखों में एक है। अगर यह रिश्ता पक्का हो गया, तो तुम्हारी जिंदगी संवर जाएगी। बस एक दिन की तो बात है, थोड़ा पर्दा कर लोगी तो क्या बिगड़ जाएगा?”
“बिगड़ यह जाएगा पापा कि मैं झूठ की बुनियाद पर रिश्ता नहीं जोड़ सकती,” काव्या की आवाज में कंपन था। “मैं प्रोफेसर हूँ, सैकड़ों बच्चों को पढ़ाती हूँ, स्टेज पर खड़ी होकर भाषण देती हूँ। वहां तो मुझे अपनी आंख छिपाने की जरूरत नहीं पड़ती। तो उस इंसान से क्यों छिपाऊं जिसके साथ मुझे पूरी जिंदगी बितानी है?”
सुधा जी ने काव्या के सिर पर हाथ फेरा। “बेटा, तेरे पापा गलत नहीं कह रहे। समाज बहुत क्रूर है। लोग गुणों से पहले रूप देखते हैं। तू बस कल के लिए उनकी बात मान ले।”
काव्या ने एक गहरी सांस ली। वह अपने माता-पिता की बेबसी समझ रही थी। “ठीक है माँ। आप लोग जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी। चश्मा पहनूँगी, नज़रें भी झुका लूँगी। लेकिन अगर फिर भी उन्हें पसंद नहीं आया, तो अगली बार से आप मुझे किसी के सामने नुमाइश के लिए नहीं बिठाएंगे।”
रात भर काव्या को नींद नहीं आई। उसे अपनी पीएचडी की डिग्री, अपने गोल्ड मेडल्स, अपनी लिखी कविताएं—सब उस एक ‘चश्मे’ के पीछे बौने नजर आ रहे थे।
अगले दिन शाम को घर में हलचल थी। खन्ना जी के साथ रचित और उसके माता-पिता, मिस्टर और मिसेज मेहरा आए हुए थे। माहौल में एक औपचारिक तनाव था। रमेश बाबू बार-बार अपनी कमीज ठीक कर रहे थे और सुधा जी समोसे और मिठाई की प्लेटें सजाने में व्यस्त थीं।
काव्या ने पापा के कहे अनुसार क्रीम कलर का सलवार-सूट पहना था और आंखों पर वह बड़ा सा काले फ्रेम वाला चश्मा लगा रखा था। वह आईने में खुद को देख रही थी—एक आत्मविश्वास से भरी प्रोफेसर आज एक डरी हुई लड़की लग रही थी।
बाहर बैठक में हंसी-ठिठोली चल रही थी। रचित बहुत सौम्य और सुलझा हुआ युवक लग रहा था। वह रमेश बाबू की बातों का बड़े आदर से जवाब दे रहा था।
“काव्या बिटिया, चाय ले आओ!” रमेश बाबू ने आवाज लगाई।
काव्या ट्रे लेकर बाहर आई। उसके हाथ हल्के कांप रहे थे। उसने सबसे पहले रचित के पिता को, फिर उसकी माँ को चाय दी। जब वह रचित के पास पहुंची, तो उसने आदतन नज़रें झुका लीं, जैसा कि पापा ने सिखाया था।
“नमस्ते,” रचित ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया।
“नमस्ते,” काव्या ने धीरे से कहा और जाकर अपनी माँ के बगल में बैठ गई। उसने सिर इतना झुका रखा था कि उसका चेहरा ठीक से दिख भी नहीं रहा था।
मिसेज मेहरा ने काव्या को ऊपर से नीचे तक देखा। “बेटी, सुना है तुम प्रोफेसर हो? हिंदी साहित्य पढ़ाती हो?”
“जी आंटी,” काव्या ने नजरें फर्श पर गड़ाए हुए ही जवाब दिया।
रमेश बाबू तुरंत बीच में बोल पड़े, “जी हाँ, बहुत होनहार है। घर और कॉलेज दोनों बखूबी संभालती है। और सबसे बड़ी बात, बहुत कम बोलती है, एकदम गाय है हमारी बेटी।” रमेश बाबू यह जताना चाह रहे थे कि वह बहस नहीं करती, ताकि कोई उसकी आंखों की तरफ गौर न करे।
तभी रचित ने चाय का कप मेज पर रखा और काव्या की ओर मुखातिब हुआ।
“काव्या जी, मैंने आपका एक आर्टिकल पढ़ा था पिछले महीने ‘साहित्य-सरिता’ पत्रिका में। ‘छायावाद और आज का स्त्री-विमर्श’। बहुत ही बेहतरीन लिखा था आपने।”
काव्या चौंक गई। उसने पहली बार सिर उठाया और रचित को देखा। उसके चश्मे के पीछे की आंखें विस्मय से भर गईं। “आपने… आपने पढ़ा है?”
रमेश बाबू का दिल जोर से धड़कने लगा। काव्या ने रचित की तरफ सीधा देख लिया था। अब पोल खुल जाएगी। वे खखारने लगे ताकि बात का रुख बदल सके।
“हाँ,” रचित ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे पढ़ने का बहुत शौक है। और सच कहूँ तो उस आर्टिकल में आपने जिस बेबाकी से अपनी बात रखी थी, उसे पढ़कर मुझे लगा था कि लेखिका बहुत निडर होगी। लेकिन आज आप बहुत शांत हैं। क्या यह चश्मा और यह चुप्पी… यह आपका असली रूप है?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। मिसेज मेहरा और खन्ना जी एक-दूसरे को देखने लगे।
रमेश बाबू के माथे पर पसीना आ गया। वे हकलाते हुए बोले, “अरे बेटा, वो क्या है ना, इसकी आँखों में थोड़ा इन्फेक्शन हो गया था कल, धूल से… इसलिए चश्मा लगाया है। वैसे इसकी आँखें बिल्कुल ठीक हैं।”
काव्या को पिता का यह झूठ शूल की तरह चुभा। उसने एक पल सोचा, फिर धीरे से अपना चश्मा उतारकर मेज पर रख दिया।
उसने अपनी बायीं आंख, जो हल्की सी तिरछी थी, उसे बिना छिपाए रचित की आंखों में सीधे देखा।
“नहीं पापा,” काव्या ने दृढ़ता से कहा, “मेरी आंखों में कोई इन्फेक्शन नहीं है। रचित जी, यह चश्मा मेरी जरूरत नहीं, मेरी ढाल बना दिया गया था। सच यह है कि मेरी बायीं आंख में जन्मजात एक दोष है। जब मैं किसी चीज को बहुत गौर से देखती हूँ या बहुत सच बोलती हूँ, तो यह थोड़ी भटक जाती है। पापा को डर था कि अगर आपने यह देख लिया, तो आप मना कर देंगे।”
रमेश बाबू ने अपना सिर पकड़ लिया। सुधा जी की सांस अटक गई। लगा कि अब सब खत्म। लड़के वाले अभी उठकर चले जाएंगे।
रचित ने एक पल के लिए काव्या की आंखों में देखा। फिर उसने अपनी जेब से अपना फोन निकाला और गैलरी खोलकर एक फोटो काव्या की तरफ बढ़ाई।
“इसे देखिए काव्या जी,” रचित ने कहा।
काव्या ने फोन हाथ में लिया। फोटो में रचित खड़ा था, लेकिन उसके दाहिने पैर में एक अजीब सा जूता था, जिसका तलवा बहुत मोटा था।
“मेरा दाहिना पैर बाएं पैर से डेढ़ इंच छोटा है,” रचित ने सहज भाव से कहा। “मैं चलता हूँ तो पता नहीं चलता क्योंकि मैं यह विशेष जूता पहनता हूँ। मेरे माता-पिता ने भी मुझसे कहा था कि रिश्ता तय होने तक यह बात मत बताना। उन्होंने कहा था कि लड़की वाले मना कर देंगे कि लड़का लंगड़ा है।”
मिसेज मेहरा शर्म से पानी-पानी हो गईं।
रचित ने अपनी बात जारी रखी, “लेकिन जब मैंने आपको चश्मे के पीछे छिपते हुए देखा, और आपके पिता की घबराहट देखी, तो मुझे लगा कि हम दोनों एक ही नाटक के पात्र बने हुए हैं। हम दोनों को अपनी-अपनी कमियों को छिपाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।”
काव्या की आंखों में आंसू आ गए।
रचित ने रमेश बाबू की ओर देखा, “अंकल, आप हीरा बेचने निकले थे, लेकिन उसे कोयले की कालिख लगाकर छिपा रहे थे। काव्या जी का आर्टिकल पढ़कर मैं उनका फैन हो गया था। मुझे ऐसी जीवनसाथी चाहिए जिसकी सोच सीधी हो, फिर चाहे नज़रें थोड़ी तिरछी ही क्यों न हों। नज़र का क्या है, वो तो चश्मे से सुधर सकती है, लेकिन नज़रिया तो अंदर से आता है न।”
फिर रचित काव्या की ओर मुड़ा, “काव्या जी, मुझे आपकी आंखों में कोई कमी नहीं दिखती। मुझे उनमें वो ईमानदारी दिखती है जो आजकल लोग मेकअप के पीछे छिपा लेते हैं। क्या आप मेरे जैसे इंसान के साथ, जो शायद कभी-कभी लड़खड़ा कर चले, कदम से कदम मिलाकर चलना पसंद करेंगी?”
रमेश बाबू की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वे अपनी जगह से उठे और रचित को गले लगा लिया। “बेटा, मुझे माफ कर दो। मैं एक पिता हूँ, डर गया था। मुझे लगा मेरी बेटी की कमी उसकी खुशियों के आड़े आएगी। पर आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं।”
सुधा जी भी अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछ रही थीं।
मिसेज मेहरा, जो अब तक चुप थीं, आगे आईं और काव्या का चश्मा उठाकर एक तरफ रख दिया। “बेटा, इसकी अब कोई जरूरत नहीं है। तू जैसी है, वैसी ही हमारे घर की लक्ष्मी बनकर आएगी।”
काव्या ने रचित की ओर देखा और मुस्कुरा दी। उस मुस्कान में एक अजीब सा सुकून था। वह ‘दोष’ जो बरसों से उसके आत्मविश्वास को दीमक की तरह चाट रहा था, आज अचानक गायब हो गया था।
चाय ठंडी हो चुकी थी, लेकिन रिश्तों में ऐसी गर्माहट आ गई थी जो शायद ताउम्र ठंडी नहीं होने वाली थी। उस दिन उस ड्राइंग रूम में सिर्फ दो लोग नहीं मिले थे, बल्कि दो सच मिले थे जिन्होंने दिखावे की दुनिया को हरा दिया था।
रमेश बाबू अब इत्मीनान से सोफे पर बैठे थे। उनकी बेटी की ‘तिरछी’ नज़र में आज उन्हें दुनिया का सबसे सीधा और साफ भविष्य दिखाई दे रहा था।
लेखक : मुकेश पटेल