तीसरा घर: एक पिता की अनोखी वसीयत – संगीता अग्रवाल 

“विदाई की बेला में जब पूरी दुनिया दुल्हन के गहने और दहेज का हिसाब लगा रही थी, तब एक पिता ने अपनी बेटी की हथेली पर कुछ ऐसा रख दिया, जिसने समाज की सदियों पुरानी रीत को हमेशा के लिए बदल दिया।”

“पगली, बाप हूँ तेरा। मेरा फ़र्ज़ है तुझे शान से विदा करूँ। तू चिंता मत कर, मैंने सब सोच रखा है। और हाँ, कल सुबह तैयार रहना, हमें रजिस्ट्रार ऑफिस जाना है।”

“रजिस्ट्रार ऑफिस? कोर्ट मैरिज के लिए?” अवंतिका हैरान थी।

“नहीं, कुछ और ज़रूरी काम है। कल पता चल जाएगा,” राघवेन्द्र जी ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा और चले गए।

घर के आंगन में शहनाई की धुन गूंज रही थी, लेकिन उस संगीत में एक अजीब सी उदासी घुली हुई थी। हलवाई कढ़ाई में पूड़ियाँ तल रहे थे, रिश्तेदारों की आवाजाही से पूरा घर भरा हुआ था। यह ‘शर्मा निवास’ था, जहाँ की लाडली बेटी, अवंतिका की शादी में अब सिर्फ़ दो दिन बचे थे।

कमरे के एक कोने में अवंतिका चुपचाप बैठी अपने सूटकेस को देख रही थी। पिछले पच्चीस सालों की यादें, खिलौने, किताबें और डायरियां—सब कुछ उस एक सूटकेस में समेटना नामुमकिन लग रहा था। उसकी माँ, सुमित्रा जी, बार-बार कमरे में आतीं, कभी साड़ियाँ तह करतीं तो कभी अपनी आँखें पोंछतीं।

“अवि, यह लाल वाला जोड़ा रख लिया न? और वो नानी के दिए कंगन? देखो, ससुराल में पहले दिन वही पहनना,” सुमित्रा जी ने हिदायत दी, लेकिन उनकी आवाज़ कांप रही थी।

अवंतिका ने सिर हिलाया। उसका मन बहुत भारी था। कल रात ही उसने अपने ससुराल वालों की दबी-छिपी बातें सुनी थीं। उसके होने वाले पति, मयंक, का परिवार अच्छा था, लेकिन मयंक की बुआ और माँ के बीच दहेज को लेकर कुछ कानाफूसी चल रही थी।

“शर्मा जी ने तो कहा था कि धूमधाम से करेंगे, पर अभी तक गाड़ी की बात पक्की नहीं हुई। सुना है रिटायरमेंट का पैसा लगा रहे हैं, पर कैश कितना देंगे, यह नहीं बताया,” मयंक की बुआ ने फोन पर किसी से कहा था, जो गलती से स्पीकर पर रह गया था।

अवंतिका को यह बात चुभ गई थी। उसके पिता, राघवेन्द्र शर्मा, एक ईमानदार सरकारी अफ़सर थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई बच्चों की पढ़ाई में लगा दी थी। अवंतिका एक आर्किटेक्ट थी और उसका भाई अभी पढ़ाई कर रहा था। पिता ने कभी रिश्वत नहीं ली, इसलिए उनके पास जो भी था, वह सफ़ेद कमाई का था।

शाम को राघवेन्द्र जी घर लौटे। उनके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में एक चमक। वे सीधे अवंतिका के कमरे में आए।

“बेटा, पैकिंग हो गई?” उन्होंने प्यार से पूछा।

“हाँ पापा,” अवंतिका ने फीकी मुस्कान के साथ कहा। “पापा, मुझे आपसे कुछ पूछना था।”

“पूछो बेटा।”

“पापा, आप शादी में कितना खर्च कर रहे हैं? मैंने सुना है आप अपनी पीएफ (PF) की रक़म निकाल रहे हैं। प्लीज पापा, मुझे महँगी शादी नहीं चाहिए। मयंक और मैं कोर्ट मैरिज भी कर सकते हैं। मुझे यह दिखावा नहीं करना। मैं नहीं चाहती कि मेरे जाने के बाद आप और माँ तंगी में रहें।”

राघवेन्द्र जी ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुरा दिए। “पगली, बाप हूँ तेरा। मेरा फ़र्ज़ है तुझे शान से विदा करूँ। तू चिंता मत कर, मैंने सब सोच रखा है। और हाँ, कल सुबह तैयार रहना, हमें रजिस्ट्रार ऑफिस जाना है।”

“रजिस्ट्रार ऑफिस? कोर्ट मैरिज के लिए?” अवंतिका हैरान थी।

“नहीं, कुछ और ज़रूरी काम है। कल पता चल जाएगा,” राघवेन्द्र जी ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा और चले गए।

अगली सुबह, शादी की रस्मों के बीच से समय निकालकर राघवेन्द्र जी अवंतिका को लेकर शहर के बीचो-बीच बनी एक नई बहुमंजिला इमारत के पास पहुँचे। अवंतिका हैरान थी। यह ‘स्काईलाइन अपार्टमेंट्स’ थे, शहर के सबसे महंगे फ्लैट्स में से एक।

“हम यहाँ क्यों आए हैं पापा?” अवंतिका ने पूछा।

राघवेन्द्र जी उसे लेकर सातवीं मंज़िल पर गए। उन्होंने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और फ़्लैट नंबर 702 का दरवाज़ा खोला।

अंदर घुसते ही अवंतिका की आँखें फटी रह गईं। यह एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत 1 BHK फ्लैट था। दीवारों पर हल्का क्रीम पेंट था, बड़ी-बड़ी खिड़कियों से पूरा शहर दिखता था। हवादार और रोशनी से भरा हुआ।

“पापा, यह किसका घर है?” अवंतिका ने पूछा।

राघवेन्द्र जी ने अपनी जेब से एक फाइल निकाली और अवंतिका के हाथ में थमा दी। “यह तुम्हारा घर है, बेटा।”

“मेरा? लेकिन पापा… मयंक का घर तो सिविल लाइंस में है। हम तो वहां रहेंगे न?” अवंतिका को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

राघवेन्द्र जी ने अवंतिका को बालकनी में खड़ी कुर्सी पर बैठाया और खुद सामने खड़े हो गए। उनकी आवाज़ आज बहुत गंभीर थी।

“अवंतिका, बेटा, हमारे समाज का एक कड़वा सच है। बेटी जब पैदा होती है, तो उसे कहा जाता है कि यह घर उसका नहीं, यह तो ‘पराया धन’ है, इसे एक दिन ससुराल जाना है। और जब वो ससुराल जाती है, तो वहां उसे हर पल यह महसूस कराया जाता है कि वो ‘बेटी’ नहीं, ‘बहू’ है। उसे उस घर के नियमों के हिसाब से ढलना पड़ता है।”

राघवेन्द्र जी ने एक गहरी सांस ली। “मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी कोर्ट-कचहरी में लोगों के झगड़े देखे हैं। मैंने देखा है कि कैसे एक स्वाभिमानी लड़की भी ससुराल में सिर्फ़ इसलिए जुल्म सहती है क्योंकि उसके पास जाने के लिए कोई ‘अपना’ ठिकाना नहीं होता। मायके वाले कहते हैं ‘एडजस्ट करो’, ससुराल वाले कहते हैं ‘बर्दाश्त करो’। इन दो छतों के बीच लड़की कहीं की नहीं रहती।”

अवंतिका की आँखों में आंसू आ गए। पिता के शब्द उसके दिल की गहराई को छू रहे थे।

“बेटा, मैं तुम्हें दहेज में सोना दे सकता था, गाड़ी दे सकता था। लेकिन वो सब मयंक या उसके परिवार के काम आता। गाड़ी पुरानी हो जाती, सोना लॉकर में बंद हो जाता। उससे तुम्हारी सुरक्षा नहीं होती। इसलिए मैंने अपनी रिटायरमेंट के पैसों से और कुछ लोन लेकर यह छोटा सा फ्लैट तुम्हारे नाम किया है।”

राघवेन्द्र जी ने अवंतिका का हाथ अपने हाथों में लिया। “यह फ्लैट तुम्हारा ‘तीसरा घर’ है। यह न मेरा है, न मयंक का। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अवंतिका शर्मा का है। यहाँ तुम किसी की बेटी या किसी की पत्नी नहीं, बल्कि सिर्फ़ ‘तुम’ हो। भगवान न करे कभी तुम्हारी ज़िंदगी में ऐसा मोड़ आए जब तुम्हें लगे कि ससुराल में तुम्हारा दम घुट रहा है, या मायके में तुम्हें बोझ समझा जा रहा है, तब तुम्हें किसी के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। तुम अपनी चाबी उठाना और यहाँ आ जाना।”

अवंतिका फफक कर रो पड़ी। उसने पिता को गले लगा लिया। “पापा, आपने मुझे सिर्फ़ घर नहीं दिया, आपने मुझे मेरी रीढ़ की हड्डी दी है। आपने मुझे आत्मसम्मान दिया है।”

“हाँ बेटा,” राघवेन्द्र जी ने आंसू पोंछते हुए कहा। “यह घर तुम्हें यह याद दिलाता रहेगा कि तुम कमज़ोर नहीं हो। अगर मयंक तुम्हें इज़्ज़त से रखे, तो यह फ्लैट किराए पर चढ़ा देना, वो पैसे तुम्हारी अपनी कमाई होगी। लेकिन अगर कभी भी आत्मसम्मान पर आंच आए, तो याद रखना, तुम्हारे पास एक छत है जो सिर्फ़ तुम्हारी है। तुम किसी की परछाई नहीं हो।”

शादी की रात आई। मयंक की बारात दरवाज़े पर थी। स्वागत, जयमाला और फेरे संपन्न हुए। विदाई का समय नज़दीक आ रहा था। मयंक की माँ और बुआ की नज़रें बार-बार उस कमरे की तरफ जा रही थीं जहाँ ‘दहेज’ का सामान रखा जाता है। लेकिन वहां न कोई बड़ी गाड़ी थी, न सोने के बिस्कुट, न ही इलेक्ट्रॉनिक सामान का पहाड़। वहां सिर्फ़ अवंतिका के कपड़ों के सूटकेस थे।

मयंक की बुआ से रहा नहीं गया। विदाई से ठीक पहले, जब सब लोग हॉल में बैठे थे, उन्होंने तंज कस ही दिया।

“समधी जी, आपने तो कहा था बेटी को बहुत नाज़ों से पाला है। खाली हाथ विदा कर रहे हैं? लड़के वालों का भी कुछ मान-सम्मान होता है। समाज क्या कहेगा कि शर्मा जी ने दामाद को एक अंगूठी तक नहीं दी?”

माहौल तनावपूर्ण हो गया। मयंक भी सिर झुकाए खड़ा था, शायद उसे भी उम्मीद थी कि कुछ ‘बड़ा’ मिलेगा। सुमित्रा जी घबरा गईं।

तभी राघवेन्द्र जी अपनी जगह से उठे। उन्होंने अवंतिका को अपने पास बुलाया। उनके हाथ में वही फाइल और चाबी थी।

उन्होंने सबके सामने वह फाइल मयंक के हाथ में नहीं, बल्कि अवंतिका के हाथ में दी।

“बहन जी,” राघवेन्द्र जी ने बुआ की आँखों में आँखें डालकर कहा। “मैंने अपनी बेटी को खाली हाथ विदा नहीं किया है। मैंने उसे वो दिया है जो शायद आज तक बहुत कम पिताओं ने अपनी बेटी को दिया होगा।”

सबकी नज़रें उस फाइल पर थीं।

“यह शहर के स्काईलाइन अपार्टमेंट में एक फ्लैट के कागज़ात हैं,” राघवेन्द्र जी ने भारी आवाज़ में घोषणा की। “यह फ्लैट पूरी तरह से मेरी बेटी अवंतिका के नाम पर रजिस्टर्ड है। यह न दहेज है, न मयंक के लिए उपहार। यह मेरी बेटी का ‘सुरक्षा कवच’ है।”

मयंक की माँ और बुआ के चेहरे का रंग उड़ गया। फ्लैट? वो भी सिर्फ़ बहू के नाम?

राघवेन्द्र जी ने आगे कहा, “हम लोग अक्सर बेटियों को विदा करते वक़्त कहते हैं कि आज से ससुराल ही तुम्हारा घर है, वहीं से अब तुम्हारी अर्थी उठेगी। यह वाक्य बेटियों को बेड़ियों में जकड़ देता है। मैं यह रीत तोड़ रहा हूँ। मेरी बेटी मयंक के साथ इसलिए रहेगी क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और साथ रहना चाहते हैं, इसलिए नहीं कि उसके पास और कोई चारा नहीं है। यह घर उसे यह आज़ादी देता है कि वह इस रिश्ते को प्यार से निभाए, मजबूरी से नहीं।”

मयंक, जो अब तक चुप था, आगे बढ़ा। उसने अवंतिका के हाथ से फाइल ली और उसे देखा। फिर उसने अवंतिका की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक नई इज़्ज़त थी।

मयंक ने अपने परिवार की तरफ मुड़कर कहा, “पापाजी सही कह रहे हैं। मुझे दहेज में गाड़ी या पैसा नहीं चाहिए था। मुझे एक आत्मनिर्भर और मज़बूत जीवनसाथी चाहिए थी। और आज पापाजी ने अवंतिका को यह घर देकर साबित कर दिया है कि वे अपनी बेटी को किसी पर बोझ बनाकर नहीं, बल्कि एक रानी बनाकर भेज रहे हैं। मुझे गर्व है कि मैं ऐसे परिवार से जुड़ रहा हूँ।”

मयंक ने बुआ और माँ को चुप रहने का इशारा किया। हॉल में सन्नाटा छा गया था, लेकिन यह सन्नाटा अपमान का नहीं, बल्कि एक नई सोच के सम्मान का था। वहां मौजूद हर शख्स, खासकर औरतें, राघवेन्द्र जी को नम आँखों से देख रही थीं। शायद हर माँ, हर बेटी यही सोच रही थी कि काश! उनके पास भी ऐसा एक ‘ठिकाना’ होता।

विदाई के वक़्त जब अवंतिका कार में बैठी, तो वह रो नहीं रही थी। आमतौर पर दुल्हनें विदाई में सहमी हुई और डरी हुई होती हैं कि आगे क्या होगा। लेकिन अवंतिका का सिर ऊंचा था। उसकी आँखों में एक आत्मविश्वास था। उसे पता था कि वह एक नए घर में जा रही है, लेकिन अगर वहां तूफ़ान आया, तो उसके पास अपनी एक छत है। वह अब बेचारी नहीं थी।

कार चलने लगी। राघवेन्द्र जी ने हाथ हिलाया। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन होठों पर एक विजयी मुस्कान थी। उन्होंने अपनी बेटी को ‘पराया धन’ बनाकर नहीं, बल्कि ‘अपना धन’ देकर विदा किया था।

सुमित्रा जी ने पति के कंधे पर हाथ रखा। “आपने सही किया। आज मेरा भी मन हल्का हो गया। कम से कम मेरी बेटी को वो सब नहीं सहना पड़ेगा जो…”

राघवेन्द्र जी ने उनकी बात पूरी की, “…जो हर उस औरत को सहना पड़ता है जिसके पास पति के घर से निकाले जाने के डर के सिवा कोई और रास्ता नहीं होता। आज मेरी बेटी ‘सुरक्षित’ है।”

उस रात, शहर में एक नई चर्चा शुरू हुई। दहेज के सोने की चमक फीकी पड़ गई थी, और एक पिता के दिए ‘आत्मसम्मान के घर’ की रोशनी दूर तक फैल गई थी। अवंतिका जब ससुराल पहुँची, तो उसने गृह-प्रवेश किया, लेकिन एक आश्रित बनकर नहीं, बल्कि एक मालकिन बनकर। उसकी जेब में पड़ी वह चाबी सिर्फ़ एक मकान की चाबी नहीं थी, वह उसकी आज़ादी और खुशहाली की चाबी थी।


मित्रों, एक पिता का अपनी बेटी को सबसे बड़ा उपहार सोना-चांदी नहीं, बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़ा करना और उसे यह अहसास दिलाना है कि वह कभी भी ‘बेघर’ नहीं है।

क्या आप भी मानते हैं कि बेटियों को दहेज की जगह एक सुरक्षित भविष्य और अपना खुद का ठिकाना मिलना चाहिए?

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धन्यवाद!

लेखिका : संगीता अग्रवाल 

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