तमाशा – अमिता कुचया

“अपने घर का धुआं जब दूसरों को दिखाओगे, तो लोग आग बुझाने नहीं, हाथ सेकने आएंगे… क्योंकि टूटे हुए मकान की ईंटें लोग अक्सर उठा ले जाते हैं।”

“तुम्हें लगता है कि मैं इस घर की मालकिन हूँ?” अंजलि ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी, आवाज़ में कड़वाहट थी। “नहीं सुमित, मैं तो बस एक सजावटी सामान हूँ। फैसले तुम लो, पैसे तुम लुटाओ, और मैं बस मूकदर्शक बनी रहूँ।”

शाम के सात बज रहे थे, लेकिन ‘वर्मा निवास’ में सन्नाटा ऐसा था जैसे रात के दो बजे हों। ड्राइंग रूम में टीवी चल रहा था, मगर आवाज़ म्यूट थी। सोफे के एक कोने पर सुमित बैठा था, जिसके हाथ में रिमोट था, लेकिन नज़रें शून्य में थीं। दूसरे कोने पर उसकी पत्नी, अंजलि, मुंह फुलाए बैठी थी। बीच में रखी चाय की प्यालियां ठंडी हो चुकी थीं, बिल्कुल उनके रिश्ते की तरह।

लड़ाई की वजह बहुत छोटी थी, लेकिन अंजलि के मन में जमा गुबार बहुत पुराना था। सुमित ने अपनी छोटी बहन की शादी के लिए अपनी एफ.डी. तुड़वा दी थी, और यह बात उसने अंजलि को आखिरी वक्त पर बताई थी। अंजलि को पैसे देने से एतराज नहीं था, एतराज इस बात से था कि उसे ‘फैसले’ में शामिल नहीं किया गया।

“तुम्हें लगता है कि मैं इस घर की मालकिन हूँ?” अंजलि ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी, आवाज़ में कड़वाहट थी। “नहीं सुमित, मैं तो बस एक सजावटी सामान हूँ। फैसले तुम लो, पैसे तुम लुटाओ, और मैं बस मूकदर्शक बनी रहूँ।”

सुमित ने माथा पकड़ा। “अंजलि, वो इमरजेंसी थी। पापा के पास कैश कम पड़ रहा था। मैं तुम्हें बताने ही वाला था, पर दिमाग से निकल गया। इसमें इतना हंगामा करने की क्या ज़रूरत है?”

“हंगामा?” अंजलि चिल्लाई। “तुम्हें मेरी बात हंगामा लगती है? अपनी बहन के लिए तुम जान दे सकते हो, और मेरी ज़रूरत के समय तुम पाई-पाई का हिसाब मांगते हो। मुझे सब समझ आ रहा है, तुम्हारी नज़र में मेरी कोई औकात नहीं है।”

आवाज़ ऊंची हो गई थी। खिड़की खुली थी। अंजलि को इस वक्त होश नहीं था कि पड़ोस वाली शर्मा आंटी या सामने वाली रीना भाभी सुन रही होंगी। उसे बस अपना गुस्सा निकालना था। सुमित ने उठकर खिड़की बंद करनी चाही, तो अंजलि ने उसे रोक दिया।

“रहने दो! दुनिया को भी तो पता चले कि सुमित वर्मा कितने महान भाई हैं और कितने घटिया पति,” अंजलि ने ताना मारा।

सुमित ने उसे एक सख्त नज़र से देखा और बिना कुछ बोले घर से बाहर निकल गया।

अंजलि अकेली रह गई। उसका मन भारी था। उसे लगा कि उसका दम घुट जाएगा। उसे किसी से बात करनी थी, अपना दिल हल्का करना था। उसने अपना फ़ोन उठाया और अपनी ‘खास सहेली’ और पड़ोसन, नीलिमा, को फ़ोन लगाया। नीलिमा कॉलोनी की वो महिला थी जिसके पास हर घर की खबर होती थी, लेकिन अंजलि को लगता था कि नीलिमा उसकी सबसे बड़ी शुभचिंतक है।

“अरे नीलिमा, तुम फ्री हो? मुझे मिलना है,” अंजलि ने रुंधे गले से कहा।

दस मिनट बाद अंजलि और नीलिमा कॉलोनी के पार्क की एक बेंच पर बैठी थीं। अंजलि रो रही थी और नीलिमा बहुत ध्यान से सुन रही थी, बीच-बीच में ‘त्स-त्स’ करती जा रही थी।

“बस इतनी सी बात पर उसने एफ.डी. तोड़ दी?” नीलिमा ने अंजलि के कंधे पर हाथ रखा। “देख अंजलि, मैं तो पहले ही कहती थी। मर्द सब एक जैसे होते हैं। सुमित बाहर से सीधा दिखता है, पर अंदर से बहुत चालाक है। वो धीरे-धीरे सारी संपत्ति अपनी बहन और माँ के नाम कर देगा, और तेरे हाथ में कटोरा आ जाएगा।”

अंजलि को नीलिमा की बातों में अपना दर्द दिखाई दिया। “वही तो नीलिमा! वो मुझे समझते ही नहीं हैं।”

“समझेंगे कैसे?” नीलिमा ने आग में घी डाला। “तूने उसे सिर चढ़ा रखा है। अगर मैं होती, तो आज ही घर में ताला लगाकर मायके चली जाती। जब तक वो नाक रगड़कर माफ़ी न मांगे, वापस नहीं आती। मर्दों को उनकी औकात दिखानी पड़ती है, वरना ये हमें पैर की जूती समझते हैं।”

अंजलि का गुस्सा, जो थोड़ा शांत हो रहा था, नीलिमा की बातों से फिर भड़क गया। उसने घर की एक-एक बात—सास के ताने, ननद की मांगें, सुमित की लापरवाही—सब नीलिमा के सामने उगल दी। उसे लग रहा था कि वह अपना बोझ हल्का कर रही है, पर उसे अंदाज़ा नहीं था कि वह अपने ही घर की नींव खोद रही है।

नीलिमा ने जाते-जाते कहा, “तू चिंता मत कर, मैं हूँ न। लेकिन तू झुकना मत। इस बार आर-पार की लड़ाई लड़नी है।”

अंजलि घर लौटी तो उसका मन सुमित के प्रति और भी कड़वाहट से भर गया था।

अगली सुबह जब सुमित ऑफिस जाने के लिए निकला, तो पड़ोसियों की नज़रों में एक अजीब सा व्यंग्य था। शर्मा आंटी, जो हमेशा सुमित को ‘बेटा’ कहकर बुलाती थीं, आज मुँह फेरकर खड़ी हो गईं।

शाम को सुमित जब वापस आया, तो उसने देखा कि कॉलोनी के गेट पर कुछ औरतें खड़ी फुसफुसा रही थीं। जैसे ही सुमित पास से गुज़रा, आवाज़ें धीमी हो गईं, लेकिन एक वाक्य सुमित के कानों में पड़ गया— *”बेचारी अंजलि, पूरा पैसा तो यह अपनी बहन पर लुटा देता है, बीवी को तो दाने-दाने को मोहताज रखता है। दिखने में शरीफ है, पर है पूरा जल्लाद।”*

सुमित के कदम रुक गए। यह बात घर की चारदीवारी के बाहर कैसे आई? एफ.डी. वाली बात तो सिर्फ़ उसे और अंजलि को पता थी।

वह घर पहुँचा। अंजलि रसोई में थी। सुमित ने बैग सोफे पर फेंका।

“अंजलि!” सुमित की आवाज़ में वो गुस्सा था जो अंजलि ने पहले कभी नहीं देखा था।

अंजलि बाहर आई। “क्या हुआ? चिल्ला क्यों रहे हो?”

“तुमने नीलिमा को हमारी एफ.डी. और झगड़े के बारे में बताया?” सुमित ने सीधे पूछा।

अंजलि सकपका गई। “हाँ… मेरा मन भारी था, तो शेयर कर लिया। वो मेरी दोस्त है।”

“दोस्त?” सुमित हताशा में हंसा। “अंजलि, जिसे तुम दोस्त समझकर अपना दुखड़ा रो रही थीं, उसने पूरे मोहल्ले में मेरा तमाशा बना दिया है। आज नीचे गार्ड से लेकर शर्मा आंटी तक, सब मुझे ऐसे देख रहे हैं जैसे मैं कोई अपराधी हूँ। तुमने हमारे घर की इज़्ज़त का जुलूस निकाल दिया।”

“तो क्या करूँ? तुम मेरी सुनते नहीं, तो मैं किसी से तो कहूँगी!” अंजलि ने बचाव किया।

“कहने और इज़्ज़त उछालने में फर्क होता है अंजलि। अब खुश हो जाओ, तुम्हारी हमदर्द नीलिमा ने तुम्हें ‘बेचारी’ और मुझे ‘ज़ालिम’ घोषित कर दिया है। रिश्तों में दरारें आती हैं, पर हम उन्हें सीमेंट से भरते हैं, अंजलि। तुमने उन दरारों में लाउडस्पीकर लगा दिया।”

सुमित अपने कमरे में चला गया और दरवाज़ा बंद कर लिया। उस रात खाना नहीं बना।

अगले दो दिन तक सुमित ने अंजलि से एक शब्द नहीं कहा। अंजलि को अपनी जीत महसूस होनी चाहिए थी, जैसा नीलिमा ने कहा था कि ‘मर्द को झुकाना चाहिए’, लेकिन अंजलि को अजीब सी बेचैनी हो रही थी। सुमित का मौन उसे काट रहा था।

तीसरे दिन शाम को अंजलि बाज़ार से लौट रही थी। वह नीलिमा के घर के पास से गुज़री। नीलिमा की खिड़की खुली थी और वहां कॉलोनी की दो-तीन और महिलाएं बैठी थीं। अंजलि को अपनी आवाज़ सुनाई दी, तो वह ठिठक गई।

“अरे छोड़ो भी,” यह नीलिमा की आवाज़ थी। “अंजलि तो है ही बेवकूफ। ज़रा सी बात का बतंगड़ बनाती है। सुमित बेचारा तो इतना सीधा है, अपनी बहन की मदद ही तो की थी। अब भाई अपनी बहन की मदद नहीं करेगा तो कौन करेगा? पर यह महारानी तो चाहती है कि सारा पैसा इसके मेकअप पर खर्च हो।”

दूसरी औरत बोली, “हाँ, सही कह रही हो। और परसों पार्क में कैसे रो-रोकर अपने पति की बुराई कर रही थी। छिः! घर की बातें ऐसे सड़क पर गाते हुए शर्म आनी चाहिए। ऐसी औरतें ही घर तोड़ती हैं।”

नीलिमा ने हंसते हुए कहा, “मैंने तो मज़े लेने के लिए थोड़ी आग और लगा दी कि ‘मायके चली जा’। अब देख रही हूँ कि कब इनके घर में ताला लटकता है। बड़ा मज़ा आएगा।”

अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके हाथ से सब्जी का थैला गिर गया। वो नीलिमा, जिसे वह अपना सबसे बड़ा हमदर्द समझती थी, जिसके कंधे पर सिर रखकर उसने अपने पति को कोस दिया था, वह आज उसी की पीठ पीछे उसका मज़ाक उड़ा रही थी?

अंजलि को सुमित की वो बात याद आई— *”रिश्तों में दरारें आती हैं, पर तुमने लाउडस्पीकर लगा दिया।”*

उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि उसने सहानुभूति की भीख मांगने के चक्कर में अपने सम्मान का सौदा कर लिया था। उसने एक पल की राहत के लिए अपने जीवनसाथी की छवि धूमिल कर दी थी।

अंजलि भागी। वह सीधे अपने घर पहुँची। सुमित घर पर ही था, अपनी फाइलों में उलझा हुआ। अंजलि को हाफते हुए देखकर वह खड़ा हो गया।

“क्या हुआ?” सुमित ने पूछा।

अंजलि ने दौड़कर सुमित को गले लगा लिया। वह फूट-फूटकर रोने लगी। “सुमित, मुझे माफ़ कर दो। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। तुम सही थे। दुनिया में कोई अपना नहीं होता, सिवाय परिवार के। मैंने घर की आग बुझाने के लिए बाहर वालों से पानी मांगा, और वो पेट्रोल लेकर खड़े थे।”

सुमित पहले तो हैरान हुआ, फिर उसने धीरे से अंजलि की पीठ थपथपाई। “शांत हो जाओ। हुआ क्या?”

अंजलि ने नीलिमा की सारी बातें बताईं। “सुमित, मुझे लगा था वो मेरा दुख समझेगी। पर वो तो तमाशा देख रही थी।”

सुमित ने उसे सोफे पर बैठाया और पानी पिलाया।

“अंजलि,” सुमित ने नरमी से समझाया। “देखो, पति-पत्नी का रिश्ता कपड़े की तरह होता है। अगर वो कहीं से फट जाए, तो उसे घर के अंदर सुई-धागे से रफू किया जाता है। अगर फटे हुए कपड़े पहनकर हम बाज़ार में जाएंगे, तो लोग रफू नहीं करेंगे, वो उस पर उंगली उठाएंगे और हसेंगे। हमारी लड़ाई हमारी थी। मेरी गलती थी कि मैंने तुम्हें नहीं बताया, तुम्हारी गलती थी कि तुम उस बात को बाहर ले गईं। जब हम एक-दूसरे की कमियां दूसरों को बताने लगते हैं, तो हम दुनिया को यह न्यौता देते हैं कि आओ और हमारे रिश्ते को तोड़ो।”

अंजलि ने सुमित का हाथ पकड़ लिया। “आज के बाद ऐसा कभी नहीं होगा सुमित। चाहे हम कितना भी लड़ें, चाहे बर्तन टूटें, लेकिन आवाज़ इस चारदीवारी से बाहर नहीं जाएगी। मैंने सबक सीख लिया है कि घर की इज़्ज़त घर के दरवाज़े के भीतर ही सुरक्षित है।”

“और वो एफ.डी….” सुमित ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैंने वो एफ.डी. तोड़ दी, लेकिन मैंने तुम्हारे लिए एक नया रिकरिंग डिपॉजिट (आर.डी.) शुरू किया है, उसी दिन। मैं तुम्हें सरप्राइज़ देना चाहता था, पर उससे पहले ही यह ‘वर्ल्ड वॉर’ हो गया।”

अंजलि को अब शर्मिंदगी और भी ज़्यादा महसूस हो रही थी। उसने तय कर लिया कि अब वह नीलिमा जैसी ‘शुभचिंतकों’ से कोसों दूर रहेगी।

अगले दिन जब अंजलि नीलिमा से मिली, तो नीलिमा ने फिर वही मीठी मुस्कान ओढ़ ली। “और अंजलि, क्या हाल है? उस ‘जल्लाद’ ने कुछ कहा तो नहीं?”

अंजलि ने एक गहरी और शांत मुस्कान के साथ जवाब दिया, “नीलिमा, मेरे पति ‘जल्लाद’ नहीं, मेरे रक्षक हैं। और हमारे बीच जो भी था, वो सिर्फ़ प्यार वाली तकरार थी। वो मेरे लिए क्या करते हैं, ये मुझे तुम्हें समझाने की ज़रूरत नहीं। और हाँ, अगली बार मेरे घर की खिड़की में झांकने की बजाय, अपने घर का दरवाज़ा संभालना, सुना है तुम्हारे पति आजकल घर देर से आ रहे हैं?”

नीलिमा का चेहरा पीला पड़ गया। अंजलि वहां से सिर उठाकर चली गई।

उस शाम वर्मा निवास में फिर से चाय बनी। इस बार प्यालियां गर्म थीं, और उनमें एक ही मिठास थी—विश्वास की। टीवी म्यूट नहीं था, बल्कि एक पुराना गाना बज रहा था— *”ये तेरा घर, ये मेरा घर…”*

अंजलि और सुमित ने सीख लिया था कि दुनिया चाहे कितनी भी हमदर्द बने, आपके आंसू पोंछने वाला हाथ सिर्फ़ आपके जीवनसाथी का ही सच्चा होता है। बाकी सब तो बस ‘खबर’ लेने आते हैं।

**कहानी का सार:**

परिवार एक किले की तरह होता है। अगर इसकी दीवारें हम खुद कमजोर करेंगे, तो बाहरी दुश्मन सेंध लगाने में देर नहीं करेंगे। पति-पत्नी के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उस मतभेद का समाधान संवाद है, न कि ‘सार्वजनिक प्रसारण’। याद रखें, दुनिया मज़े ले सकती है, लेकिन साथ सिर्फ़ परिवार देता है।

**प्रिय पाठकों,**

क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि जब हम गुस्से में अपने घर की बात किसी बाहरी इंसान को बताते हैं, तो बाद में हमें पछताना पड़ता है? क्या आपको लगता है कि आज के दौर में रिश्तों की गोपनीयता बनाए रखना सबसे ज़रूरी है?

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मूल लेखिका : अमिता कुचया 

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