आओ आओ , दीनानाथ कैसे हो? बहुत दिनों बाद आये हो, कहा गये थे? मैं कुम्भ नहाने चला गया था।पूरे पंद्रह दिन वही था,
बहुत अच्छे से दिन बिता वहाँ पर। रोज सुबह नहाना , पूजा पाठ ,दिन भर भजन मज़ा आ गया था । तुम क्यो नही गये सुभाष ?क्या बोलू,
जाना तो चाह रहा था ,लेकिन थोड़ा बहु की तवियत ठीक नही थी, इस लिए श्री मती जी ने जाने से मना कर दिया था। तभी सुभाष जी की बहु चाय नास्ता ले के आ गयी ।
दीनानाथ जी ने बहू को देख के बोला, तुम्हारी बहु स्वस्थ्य तो दिख रही है ,आज कल की बहुएं काम नही करना चाहती है, खुद तो घूमती रहेंगी, औऱ चाहती है की बूढ़े सास ससुर घर संभाले ।सब ड्रामा करती है।
,।बहु सुमन को बहुत गुस्सा आ रहा था,लेकिन दीनानाथ जी की उम्र का लिहाज करके कुछ बोली नही । औऱ चाय नास्ता टेबल पर रख कर चली गयी।
सुभाष जी ने बोला दीनानाथ तुम्हारी अधिक बोलने की आदत अभी गयी नही। नाती पोते वाले हो गये हो लेकिन समझदारी अभी तक नही आई ।
तभी दीनानाथ जी ने बोला, देखो मैं औऱ मेरी श्रीमती जी आराम से रहते है, पेंसन आती है उसी से गुजारा हो जाता है, एक काम वाली रख लिया है
सारा काम कर देती है। खूब तीर्थ धाम करते है हम दोनों । जिंदगी मजे से कट रही है । सुभाष जी ने बोला बहुत अच्छी बात है , लेकिन एक बात कहना चाहूंगा ,
दीनानाथ ,जैसे हम दोनों दोस्त है, वैसे ही तुम्हारी बहु औऱ हमारी बहु भी आपस मे पक्की सहेलिया है , इस कारण हमको भी तुम्हारे, घर के बारे मे सब कुछ पता है,की ,
एक ही घर मे दो चूल्हा जलता है, तुम्हारा अपने बेटे बहु से कोई लेना देना नही है । फिर क्या था। दीनानाथ जी “टका सा मुँह लेकर रह गये , दीनानाथ जी की आँखे भर गई ।
सुभाष जी पास आये और बोले देखो दीनानाथ , मैं तुम्हारा दोस्त हूँ , मैं तुम्हारी बातें बर्दाश्त कर लूँगा। लेकिन मेरी बहु को तुम बुरा भला बोले,
हमको ठीक नही लगा। अब तुम जाओ भाभी जी राह देख रही होगी। दीनानाथ जी उठे , औऱ अपने घर की ओर चल दिये।
आज समाज में घर घर की यही लीला है, इस लिये किसी के भी बहु, बेटी के बारे मे कुछ भी गलत कहने पहले जरूर सोच ले।सुभाष जी ने अपने दोस्त को सही समय पर रोक कर परिवार का मान रख लिया ।
रंजीता पाण्डेय
(लज्जित हो जाना)