फर्क बस यहीं हो जाता है – रोनिता कुंडू

वेदिका, कहां रह गई तुम? इतने कामों में एक काम तुम्हें ढूंढना भी रहता है, वेदिका..! वेदिका..! अनुज चिल्लाते हुए घर के हर एक कमरे में आवाज़ लगा रहा था। 

तभी अनुज की मां अर्चना जी पूछती है, मिली क्या वेदिका? हे भगवान, बहू के बिना तो सभी के आंखों के आगे अंधेरा ही छा जाता है, पर यूं अचानक कहां गई वेदिका? राधिका उसी का इंतजार कर रही है।

अनुज:  मां! पूरे घर में ढूंढ लिया पर कहीं नहीं मिली!

कल अनुज की बहन राधिका की शादी हैं, पूरा घर मेहमानों से भरा था और वेदिका सुबह से ही कामों में लगी हुई थी। कभी इधर तो कभी उधर, सबका ध्यान रखना, ऊपर से शादी के कामों को भी संभालना, अभी राधिका की कोई रस्म होने वाली थी तो, उसकी तैयारी के लिए ही सभी कोई उसे ढूंढ रहे थे।

अर्चना जी अनुज से कहती है, ज़रा उसे फोन करके पूछ कहां है? और कब तक आएगी? और यह भी कह देना ऐसे बिना बताए कहीं ना जाए, शादी का घर है हजारों काम है, मुझ बुढ़े हड्डियों में अब इतनी ताकत कहां जो इतनी दौड़ भाग कर सके, उसी ने तो सब कुछ संभाला हुआ है।

अनुज जैसे ही अपना फोन निकाल कर, उसे फोन करने को होता है, वैसे ही वेदिका की फोन की घंटी उसके कमरे से ही बज उठती है, सभी को लगा कि वेदिका वही होगी, पर वहां तो सिर्फ उसका फोन था, जो वह वही अपने कमरे में छोड़ गई थी। शायद काम के चक्कर में भूल गई होगी। पर अब उसका इंतजार करने के अलावा और कोई रास्ता भी तो नहीं था।

ऐसे ही पूरा एक घंटा निकल गया, पर वेदिका अब तक नहीं लौटी थी। सभी लोग अब गुस्सा करने लगे, नाते रिश्तेदार कहने लगे कि जो रस्म है वह कर लेते हैं, ज़रूर कहीं फस गई होगी, आ जाएगी पर मुहूर्त से रस्में होनी चाहिए।

अर्चना जी अब तक काफी गुस्से में आ चुकी थी, फिर वह कहती है मेरी ही गलती है जो उस पर सारी जिम्मेदारियां छोड़ दी, मुझे पता होना चाहिए था, आखिर ननद की शादी है, बहन की थोड़े ना? बताओ जीजी, आज तक उसे कभी मैंने बहु नहीं, हमेशा बेटी माना, पर देखो उसने साबित कर दिया कि वह बहू है, बहू ही रहेगी, वह तो किस्मत वाली है जो ऐसा ससुराल मिला, जहां हर ऐश और आराम है, वरना फतेहाल उसका मायका, जहां एक अच्छी साड़ी को भी तरसती थी।  

अनुज:  मां! यह आप क्या सब बोले जा रही हो सबके सामने? वेदिका ने भी अपनी हर जिम्मेदारी निभाई है, आप उसके माएके  को यहां सबके सामने अपमानित क्यों कर रहीं है?

अर्चना जी:   क्या गलत बोला मैंने? और तू भी तो मानता था ना कि वह किस्मत से इस घर में ब्याही है, फिर आज तू उसकी तरफदारी क्यों कर रहा है? देख नहीं रहा कैसे अपनी जिम्मेदारी छोड़कर घूमने निकल गई है? तू चुप रह सकता है, पर मैं नहीं, आने दे बस उसे।

खैर राधिका के रस्म हो गई और अब राधिका भी गुस्से में आ गई थी। उसने कहा मां, भैया, भाभी ने मेरी रस्मों से ज्यादा ज़रूरी पता नहीं किसे समझा? पर अब मैं चाहती हूं मेरी शादी में भी वह दूर रहे, मां! आप चंदा भाभी को सारी जिम्मेदारियां दे देना। मैं नहीं चाहती आज की तरह कल भी हम उनका इंतजार करते रहे

और वह इसी बात पर इतराती रहे कि उनके बिना हमारा गुजारा नहीं होगा। यही होता है जब किसी को उसके औधे से ज्यादा इज्जत मिल जाती है। क्यों चंदा भाभी आप संभाल लोगी ना सब कुछ? अनुज के मोसेरे भाई की पत्नी थी चंदा।

चंदा:  आप चिंता मत करो राधिका! हम सब कुछ संभाल लेंगे 

रस्म के बाद एक घंटा और बीत गया पर वेदिका की कोई खबर नहीं।  जहां सारे लोगों का गुस्सा बढ़ रहा था, अनुज की चिंता बढ़ रही थी, अनुज जानता था की मां या राधिका से बात करने का कोई फायदा नहीं, तो उसने अपने पिता जगमोहन जी से कहा, पापा! मां और राधिका तो सब कुछ भूल जाते हैं,

पर आपको तो पता ही है ना कि वेदिका ऐसे जिम्मेदारी छोड़कर भागने वालों में से नहीं है। वह इतनी देर बिना बात बताएं तो साधारण दिनों पर कहीं नहीं जाती, तो शादी वाले घर में उसे भी पता है हजारों काम है, वह कहां जाएगी?

जगमोहन जी:  बेटा! यही तो मैं भी सोच रहा हूं। अंतिम बार मैंने उसे तब देखा था, जब वह मुझे दवाई देने मेरे कमरे में आई थी। इतने कामों में वह मेरी दवाई नहीं भूली,

तो राधिका की रस्म कैसे भूलेगी? बेटा, तुमने पूरे घर में अच्छे से देखा तो लिया था ना? अगर देख लिया हो तो नंदन को लेकर जाओ और बाहर देख कर आओ। अमर चाचा के दुकान के आगे सीसीटीवी कैमरा है, वह कितने बजे निकली है इसका अंदाजा हो जाएगा। क्योंकि हमारे मेन गेट से जो भी आएगा या जाएगा, उस कैमरा में ज़रूर आएगा।

अनुज:  ठीक है पापा! मैं जाता हूं, यह कह कर अनुज अपने कमरे में गया और उसने बाथरूम का दरवाजा खोलना चाहा तो, देखा दरवाजा अंदर से बंद है। उसने जब उसे पीटा, तो कोई शब्द नहीं हुआ, उसने दरवाजे का लॉक तोड़ दिया तो उसने देखा वेदिका वहीं बेहोश पड़ी हुई है।

उसे ऐसी हालत में देखकर अनुज घबरा जाता है और घर के लोगों को आवाज़ देने लगता है, सभी लोग दौड़े दौड़े जब उसे कमरे में आए तो सभी घबरा गए। तुरंत वेदिका को अस्पताल ले जाया गया, प्राथमिक चिकित्सा के बाद वेदिका को होश आ जाता है, डॉक्टर ने बताया कमजोरी की वजह से यह सब हुआ है और उस दिन वेदिका ने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था।

अनुज:  वेदिका! तुम ना जाने कब से वहां बेहोश पड़ी थी और हम समझ बैठे तुम बिन बताए कहीं चली गई हो और तुम्हें सबका खान-पान याद रहता है अपना छोड़कर?

वेदिका:  वह क्या है ना? कुछ दिनों से मैं ढंग से खाना खा ही नहीं पा रही थी। शादी घर में तो यह सब होता ही रहता है, मैं अब बिल्कुल ठीक हूं। माफ कीजिएगा मम्मी जी! मेरी वजह से राधिका की रस्मों में बाधा आई! पर….?

इससे आगे वेदिका कुछ और कह पाती, अनुज कहता है, बस करो वेदिका! किसी को कोई सफाई देने की ज़रूरत नहीं, इस घर के लोगों का कहना है कि तुम बड़ी किस्मत वाली हो जो ऐसा ससुराल पाया, पर असल में किस्मत वाले तो हम हैं, जो तुम्हें पाया। आजकल तो सास ससुर को भूखा रखने वाली बहू देखी जाती है,

खुद भूखा रहकर सबके खान-पान का ध्यान रखने वाली बहू मिल गई है ना इस घर को, इसलिए उसकी कोई कदर नहीं। मां! बस बेटी कह देने भर से, बहू अगर बेटी बन जाती तो आज यह कमजोरी के कारण बाथरूम में घंटो बेहोश ना पड़ी होती, बेटी अगर एक टाइम भी ना खाए, यह बात आप नहीं भूलते,

पर बहू ने समय से खाना खाया या नहीं यह पूछना भी ज़रूरी नहीं होता, हां पर जो कुछ वह समय से ना कर पाए, तो उसके साथ उसके पूरे मायके को सुनाया जाता है। चाहे वह हर दिन हर किसी का ध्यान बखूबी रखें, एक दिन ना किया तो वह बड़े अक्षरों में सब की जुबान पर छप जाता है।

वेदिका! यहां तुम्हारी किसी को परवाह नहीं तो अब से तुम्हें महान बनने की कोई ज़रूरत नहीं, तुम अपना ध्यान खुद ही रखोगी, कितना भी ज़रूरी काम हो उसे अल्पविराम देकर अपने खाने पीने पर पहले ध्यान दोगी, कल पूरे दिन तुम आराम करना, शाम को सीधे तैयार होकर शादी पर आना। जिम्मेदारी के लिए चंदा भाभी को चुन लिया गया है, तो तुम्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं। 

अर्चना जी:   बस कर अनुज और कितना सुनाएगा? मानती हूं मैं कुछ ज्यादा ही बोल गई गुस्से में, पर मुझे क्या पता था यह इस हालत में मिलेगी? सच कहूं जब यह आसपास नहीं होती तो मैं घबरा जाती हूं, सच कहा तूने किस्मत वाले तो हम है जो यह हमें मिली, इसी ने हमारी आदत भी बिगाड़ी है, इतने अच्छे से घर को संभाला हुआ है कि इसके रहते हमें किसी चीज़ की चिंता ही नहीं होती। तभी पीछे से राधिका आकर कहती है, भाभी! माफ कर दो मुझे भी, मेरी हालत भी मां से कुछ कम नहीं, आप नहीं होती तो लगता है सब कुछ खराब हो जाएगा।

वेदिका:   राधिका! तुम्हारी हल्दी हो गई है तो तुम्हें बाहर नहीं आना चाहिए था। मैं यही थोड़े ही ना रहूंगी, घर तो आती ना? यह अशुभ होता है।

राधिका:  हल्दी की वजह से मैं घर पर रहती? आपको जिस हालत में घर से आते हुए देखा, मैं घर पर ही कैसे बैठी रहती भाभी? मेरे लिए तो आपका पास होना ही सबसे ज्यादा शुभ होता है। भाभी! आप बस मेरे साथ रहना, बाकी के काम बाकी लोग कर लेंगे।  

अर्चना जी:  अनुज! तू डॉक्टर से बात करके अच्छे से पूछ ले कि हम अपनी बेटी को कब घर ले जाएंगे और क्या-क्या देखभाल करना है? इसको तो अब मैं देखती हूं!

वेदिका सहम कर कहती है, क्या देखती हूं मम्मी जी?

अर्चना जी:  के कैसे अपनी तबीयत को अब तुम बिगाड़ी हो और फिर उसे गले लगा लेती है। 

दोस्तों, आजकल यह बोल बड़े प्रचलित हो गए हैं के, बहू को हम बेटी बनाकर रखते हैं, पर यही बोल बहू को बेटी बनने नहीं देते, क्योंकि जब हम बेटी के लिए कुछ करते हैं उसे जगजाहिर नहीं करते, पर बहू के लिए कुछ भी कर दे ना, तो वह उसे पूरे जीवन सुनाते हैं और जगजाहिर भी करते हैं, बस फर्क यहीं हो जाता है

धन्यवाद 

लेखिका : रोनिता कुंडू 

#किस्मत वाली 

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