स्वार्थ या अभिमान – एम. पी. सिंह

नीता छोटी बहु बनकर ससुराल पहुंची, संयुक्त परिवार मैं पति नीरज के आलावा सास ससुर और जेठ जेठानी थे.

नीरज एक पढ़ा लिखा सिविल इंजीनियर था और घर परिवार भी अच्छा था. नीता भी एक पढ़ी लिखी संस्कारी लड़की होने के साथ साथ ग्रह कार्य में दुक्ष थीं,  और आते ही घर में सबका दिल जीत लिया, पर बड़ी भाभी से करीबी नहीं बड़ा पाई.

कल तक घर में भाभी कोमल की इम्पोर्टेंस थी, पर अब नीता को ज्यादा अहमियत मिलने लगी थीं. 

जेठानी कोमल कम पढ़ी लिखी थीं और पैसे वाले बाप की बेटी होने के साथ साथ थोड़ी स्वार्थी किस्म की थीं. इसलिए उसकी बातो मैं थोड़ा अहंकार भी छलकता था. 

कोमल बड़ी बहु होने का और बड़प्पन दिखाने का मौका कभी नहीं चूकती थीं. 

कोमल अपने पति के साथ साथ देवर और सास ससुर को भी ज्ञान देती रहती थीं. नीता के आने से पहले तक सब ठीक था, पर अब सास ससुर को भी कोमल की बातें खटकने लगी थीं. लाख समझाने के बाद भी कोमल के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया. 

कोमल अक्सर नीता को किसी न किसी बात पर टोकती रहती,  कि खाने मैं तेल कम डाला करो, चाय में चीनी और खाने में नमक कम खाया करो, सेहत के लिए अच्छा होता है आदि, आदि.

नीता, भाभी की इन्ही बातो से थोड़ा परेशान रहती थी पर समय बीतता गया और वो सबके साथ घुल मिल गई.

नीता सुबह सबसे पहले उठती, चाय बनाती, मॉ बाबूजी को पिलाती, जेठ जेठानी की चाय केतली मैं रख देती ओर उसके बाद पति को  उठाती और दोनो साथ मे चाय पीते। 

कोमल देर से उठती और उठते ही कहती, नीता, आज चाय मैं मजा नहीं आया, ठंडी हो गई थीं, दुबारा बना दो, वगैरह वगैरह.

 नाश्ता सब लोग साथ मे करते और फिर आफिस के लिए निकल जाते। 

नीता सारे घर ओर घर वालों का अच्छे से खयाल रखती, फिर भी चेहरे पर कोई शिकन नही आती।

मॉ जी, सब्जी क्या बनाऊ, बाई की आवाज सुनकर नीता किचन मैं आई और बोली, अरे बाई, तुझे कितनी बार कहा है कि सुबह सुबह मॉ जी को परेशान मत किया कर, मैं आ रही हूं। 

एक दिन मोहल्ले की चाची घर आई तो बोली  की हमारे घर में कल शाम  को पूजा है, आप सभी लोग आना.

अगले दिन चाची के घर पूजा पर जाने के लिए  नीता ने सूट पहना तो कोमल ने साड़ी पहनने कि जिद कि, नई बहु हो साडी पहनो. न चाहते हुए भी नीता ने सूट उतारकर साड़ी पहन ली.

ऐसे ही समय बीतता गया और फिर एक दिन नीता और नीरज ने शिमला घूमने का प्रोग्राम बनाया.

नीता ने जाने के लिए अपना सूटकेस पैक करने के लिए कपड़े एक जगह इकट्ठा करके रख दिए. कोमल ने नीता के कमरे मैं कपड़ो को देखा और पूछा तो उस ने बताया कि वो शिमला जा रहे है. कोमल ने एक एक करके सारे कपड़े हटा दिए, ये कहते हुए कि ये पुराने फैशन का ही, इसका रंग डार्क है, ये गर्मी करेगा आदि. कबोर्ड से सारे नये कपड़े निकल कर सूटकस मैं डाल दिए.

शाम को नीता ने माँ जी को बताया तो वो बोली, रात को सूटकेस फिर से अपने हिसाब से लगा लेना, अभी जाने मैं  टाइम है.

जब नीरज ऑफिस से आया तो नीता ने उसे सारी बातें बताई. नीरज बोला, भाभी कुछ समझती ही नहीं है, और भईया भी कुछ नहीं कहते, मैं माँ से बात करता हूँ, वो ही भाभी को समझेगी.

नीरज ने माँ से सारी बात बताई और कहा कि भाभी की हरकतों से नीता को बुरा लग रहा है पर कुछ बोलती नहीं, अब आप अपने हिसाब से समझा देना.

शिमला जाने से पहले एक दिन शॉपिंग करने के लिए नीरज शाम को जल्दी आ गया. नीता ने अपने लिये काली साड़ी और नीरज के लिए काला सूट लिकला. नीता और नीरज जाने लगे तो कोमल बोली, नीरज , ये क्या काला सूट पहना है, बदलो इसे, बाहर बहुत गर्मी है. कोमल की बात सुनकर नीता का खून खोल गया.माँ जी बीच मैं बोल पड़ी, नीरज बेटा , जल्दी जाओ, नहीं तो लौटने मैं देर हो जायेगी. नीरज नीता जाने लगे तो कोमल फिर बोली, मगर काला सूट, माँ जी ने बात काटते हुए डांट कर बोला, तुम अंदर जाओ.

नीता के जाने के बाद सासू माँ बोली, कोमल तुम घर मैं हर किसी के काम मैं दखल अंदाजी करती थीं तो एक बार चल जाता था, अब तुम दूसरों के मर्द हो भी बताओगी कि क्या पहने, क्या न पहने? तुम्हे इतनी तो तमीज़ होनी चाहिए कि किसको क्या बोलना है. 

तुम्हारी बातो से किसको कितनी परेशानी होती है ये सोचा है कभी? तुम इतनी स्वार्थी कैसे हो गई हो की अपनी ज़रा सी खुशी के लिए किसी की भी भावनाओं से खेलती रहती हो? 

हाँ, हो गई हूँ मैं स्वार्थी। मैं घर कि बड़ी बहू हूँ, हर किसी को मुझ से पूछकर ही कोई फैसला लेना चाहिए. 

क्या तुम बड़ी बहू का मतलब भी जानती हो? माँ जी बोली, बड़ी बहू होती है माँ समान. अपने छोटे देवर, देवरानी, ननद को अपने बच्चों जैसा प्यार करना और उनके फैसलो का सम्मान करना ना की उनको उनकी गलतियां बताना और उनके सम्मान को ठेस पहुंचना.

पहले अपने आप को बड़ी बहू के काबिल बनाओ फिर उनपर हक जमाओ. 

कोमल को अपनी गलती का अहसास हो गया और बोली, माँ जी,  मुझे माफ कर दो, मैं बड़ी बहु की जिम्मेदारी जाने बिना ही अपने मन मैं बड़ी बहू होने का अहंकार पाल बैठी थीं. मैं आज के बाद किसी को भी शिकायत का मौका नहीं दूंगी. 

ससुराल में बड़ी बहू अक्सर अपनी जिम्मेदारी भूल कर बड़े होने का अहंकार पाल लेती है, जो परिवार में किसी के भी हित में नहीं होता।

धन्यवाद 

वाक्य कहानी प्रतियोगिता 

वाक्य – हाँ, हो गई हूँ मैं स्वार्थी 

लेखक

एम. पी. सिंह

(Mohindra Singh)

स्वरचित, अप्रकाशित

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