सुखद एहसास – गीता वाधवानी

 पहला प्यार, यह एक ऐसा सुखद एहसास है जो दिल को खुशी से भर देता है। दिल को गुदगुदाता है और ना चाहते हुए भी चेहरे पर मुस्कान आ जाती है फिर भले ही पहला प्यार जिससे हुआ था, वह जीवन में मिला हो या ना मिला हो। 

 पहला प्यार एक खुबसूरत एहसास, जिसे प्यार हुआ हो वही समझ सकता है। ऐसे ही एक शाम को मोबाइल में फरवरी के महीने में चॉकलेट डे देखते समय महिमा, राज की पुरानी यादों में खो गई। 

     राज, सांवले रंग रूप और मनमोहन शख्सियत वाला। जब हंसता, जोर से खिलखिला कर हंसता और सब उसके साथ मुस्कुराने लगते। कुछ साल पहले महिमा लखनऊ में नगर निगम कार्यालय में काम करती थी

और वहीं पर काम करता था राज। राज जब दसवीं कक्षा में पढ़ता था तब उसके पिताजी गुज़र गए थे और मां अधिकतर बीमार रहती थी। राज की बातों से पता चलता था कि वह मां की बहुत देखभाल करता है। 

      महिमा के पिता बहुत सख्त मिजाज थे। महिमा की बड़ी बहन नीलिमा ने मंदिर में जाकर अपनी मर्जी से शादी कर ली थी, वह भी घर वालों की मर्जी के खिलाफ। तब से उन्होंने नीलिमा से रिश्ता तोड़ दिया था

और महिमा को उन्होंने इसी शर्त पर नौकरी करने की आज्ञा दी थी कि वह कोई ऐसी हरकत नहीं करेगी, जिससे समाज में उनकी नाक कट जाए और वह जब भी विवाह करेंगी माता-पिता की मर्जी से ही करेगी। महिमा ने यह बात मान ली थी क्योंकि वह हर हाल में यह नौकरी करना चाहती थी। 

 ऑफिस में राज को सभी पसंद करते थे और वह महिमा को भी अच्छा लगता था और उसका दोस्त बन गया था। 

 एक दोपहर ऑफिस में साथ में लंच करते समय राज ने महिमा से कहा-” महिमा जी, मेरी मां कह रही है कि शादी करके घर बसा ले। ” 

 महिमा ने हंसकर कहा -” तो कर लीजिए ना शादी, आपसे तो कोई भी लड़की शादी कर लेगी। ” 

 राज-” तो क्या आप मुझसे शादी करोगी? ” 

 महिमा अचानक यह सुनकर सकपका गई और चुपचाप वहां से उठकर चली गई। पूरे सप्ताह भर वह सच में डूबी रही फिर अपनी मां को भी बताया। मां ने पिता की बात याद दिलाई। 7 दिन बाद उसने राज को पूरी बात बात कर शादी के लिए मना कर दिया, उसके बाद भी वे लोग अच्छे दोस्त बन रहे। 

 लेकिन सच तो यह था कि महिमा राज को मन ही मन चाहने लगी थी। उसे काम करते कनखियों से देखती थी और फिर राज के देखने पर नजरे चुरा लेती थी। चॉकलेट डे पर उसने राज से चॉकलेट भी ले लिया था। राज उसके प्यार को समझ गया था और उसकी मजबूरी को भी समझ रहा था। 

 कुछ समय बाद राज की माताजी गुजर गई और उसने अपना स्थानांतरण करवा लिया। उसके स्थानांतरण की बात सुनकर महिमा का मन जोर जोर से चीखना चाहता था पर आवाज घुट कर रह गई। उसकी कमी ने मानो उसकी रातों की नींद उड़ा दी थी। बहुत समय बाद वह सामान्य हो पाई या फिर सामान्य होने का दिखावा कर रही थी। शिकायत करने का भी हक कहां था उसे, राज उसकी खुशी के लिए ही तो उससे दूर हुआ था। महिमा के पिता ने अच्छा वर- घर खोज कर उसका विवाह करवा दिया। विवाह के 3 महीने के अंदर ही उसके पति गुजर गए। उसे दिल की बीमारी थी जिसे लड़के वालों ने महिमा के घर वालों से छुपाया था। 

 इस घटना से महिमा के पिता को बहुत आघात लगा। वे उदास रहने लगे और हर समय रहते रहते थे कि मेरे कारण ही यह सब हुआ है। मैंने अपनी बच्ची की जिंदगी उजाड दी। यह सब सोचते हुए ही उन्होंने अपनी बड़ी बेटी नीलिमा को माफ कर दिया था। अब माता-पिता महिमा को दूसरे विवाह के लिए कह रहे थे लेकिन महिमा ने मना कर दिया। महिमा की मां ने उसके पिता को राज वाली पूरी बात बता दी थी। 

   एक बार महिमा के माता-पिता को, दोस्त के बेटे की शादी में दूसरे शहर जाना था। उन्होंने महिमा को भी साथ चलने को कहा लेकिन उसने मना कर दिया। 

 माता-पिता के शादी में चले जाने के बाद महिमा राज की यादों में खो गई। 

 कभी अपने आप हंस पड़ती थी, तो कभी रोने लगती थी। कभी उसे अपने पति की याद आ जाती तो कभी राज की। 

 अगले दिन रविवार था। वह आराम से उठी और फिर खाना खाने के बाद रात के खाने की तैयारी में लग गई। शाम तक माता-पिता आ जाएंगे और हम सब मिलकर साथ खाना खाएंगे। 

 शाम को दरवाजे पर घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने राज को देख कर चौंक गई। अनजाने में न जाने कैसे एकदम उसके सीने से लगकर रोने लगी और फिर माता-पिता को देखकर एकदम पीछे हट गई। 

 सबके अंदर आने पर और महिमा को हैरान देखकर उसके पिताजी ने कहा-” मुझे तुम्हारी मां ने राज के बारे में सब कुछ बता दिया था। मैं तुम्हारे ऑफिस से इसका फोन नंबर और पता निकलवाया और ऑफिस वालों को इस बारे में चुप रहने को कहा। पहले मैंने राज से फोन पर बात करके पता लगाया कि कहीं उसका विवाह तो नहीं हो गया, फिर तसल्ली हो जाने पर तेरी मां और मैं शादी का बहाना करके दूसरे शहर गए और इसे साथ ले आए। क्यों अब तो करेगी ना इससे शादी? ” 

 महिमा-” नहीं, पहले मैं इसे अपनी शादी का सारा सच बताऊंगी और जो फैसला राज का होगा वही माना जाएगा। ” 

 राज ने हंसते हुए कहा -” तो राजकुमारी महिमा, आपके होने वाले पतिदेव को भूतकाल की सारी घटनाओं से अवगत करा दिया गया है और यह राजकुमार आपसे विवाह करने का इच्छुक है, अब आप अपना निर्णय बताएं। ” 

 महिमा ने गंभीरता से कहा-” प्लीज राज,मजाक मत करो। ” 

 राज ने भी गंभीरता से कहा-” मैं अपने पहले प्यार को कैसे भूल सकता हूं, मैंने तो आजीवन शादी ना करने का फैसला किया था, पर किस्मत से तुम्हारा साथ मिल रहा है तो मैं मना कैसे कर सकता हूं। ” 

 महिमा-” पागल हो तुम, बिल्कुल पागल, क्या जीवन भर अकेले रहते? ” 

 राज-” हां बिल्कुल, तुम्हें याद करते-करते। ” 

   फिर महिमा के हाँ कहने पर माता-पिता ने दोनों का विवाह प्रसन्नता पूर्वक आशीर्वाद देकर  संपन्न करवाया। 

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

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