शिखा ने आगे कहा, “पापा, हम आपको यहाँ ‘बोझ’ समझकर नहीं लाए हैं। सच तो यह है कि हमें आपकी ज़रूरत थी। उस घर की चारदीवारी में हम सिर्फ़ ‘ज़िम्मेदारियाँ’ निभा रहे थे, ‘रिश्ते’ नहीं। रवि को अपना बचपन याद आ रहा था, जब आप उसे कंधे पर बिठाकर घुमाते थे। आज वो आपको घुमाना चाहता है, कर्ज़ उतारने के लिए नहीं, बल्कि वो सुकून पाने के लिए जो सिर्फ़ पिता के साये में मिलता है।”
शाम की चाय का कप हाथ में थामे दीनानाथ जी अपनी बालकनी में बैठे थे। सामने पार्क में खेलते बच्चों का शोर था, लेकिन उनके कानों में एक अजीब सा सन्नाटा गूंज रहा था। 75 साल की उम्र, घुटनों का दर्द और पत्नी सुधा की यादें—बस यही उनकी कुल जमा-पूंजी थी।
सुधा को गए तीन साल हो चुके थे। जब वो थी, तो घर, घर लगता था। अब यह सिर्फ ईंट-गारे का एक ढांचा था, जिसमें तीन लोग रहते थे—दीनानाथ जी, उनका बेटा रवि और बहू शिखा।
रवि और शिखा अपनी कॉर्पोरेट दुनिया में व्यस्त थे। सुबह भागमभाग, रात को थकान। दीनानाथ जी की दिनचर्या तय थी—सुबह उठना, अखबार पढ़ना, नहा-धोकर पूजा करना, और फिर अपने कमरे में पुराने गानों का ट्रांजिस्टर बजाकर लेटे रहना। उन्हें लगता था कि वो इस घर के ‘फर्नीचर’ का वो पुराना टुकड़ा बन गए हैं, जिसे न फेंका जा सकता है और न ही ड्राइंग रूम में सजाया जा सकता है।
उस शाम, दीनानाथ जी ने ड्राइंग रूम में रवि और शिखा की दबी हुई आवाज़ें सुनीं।
“रवि, इस बार तो हमें ब्रेक चाहिए ही चाहिए। मैं बहुत थक गई हूँ। चलो न, केरला चलते हैं। मुन्नार की वादियों में… कितना रिलैक्सिंग होगा,” शिखा कह रही थी।
“हाँ यार, मैं भी सोच रहा था। टिकट चेक करता हूँ,” रवि ने जवाब दिया।
दीनानाथ जी ने चुपचाप अपने कमरे का दरवाज़ा सटा लिया। उन्हें पता था अब क्या होगा। यात्रा की तारीख तय होगी, और फिर एक रस्मी संवाद होगा—“पापा, हम लोग चार दिन के लिए बाहर जा रहे हैं। मेड को बोल दिया है, वो टाइम पर खाना बना जाएगी। और शर्मा अंकल को भी बता दिया है, कोई एमरज़ेंसी हो तो वो आ जाएंगे।”
दीनानाथ जी ने अपने मन को समझा लिया। “ठीक ही तो है। बुढ़ापे में दौड़-भाग मुझसे होती नहीं। बेकार में बच्चों के रंग में भंग पड़ेगा। कबाब में हड्डी बनकर क्या करूँगा?”
दो दिन बाद रात के खाने पर रवि ने गला साफ़ किया।
“पापा, वो… हम लोग अगले हफ्ते केरला जाने का प्लान कर रहे हैं।”
दीनानाथ जी ने निवाला तोड़ा और बिना नज़रें उठाए कहा, “बहुत अच्छी बात है बेटा। ज़रूर जाओ। घूमो-फिरो, यही उम्र है। मेरी चिंता मत करना, मैं मेड से बात कर लूँगा।”
तभी शिखा बोली, “पापा, मेड से क्या बात करनी? पैकिंग आप करेंगे या मैं कर दूँ?”
दीनानाथ जी का हाथ हवा में रुक गया। उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए शिखा की ओर देखा। “पैकिंग? मेरी?”
“हाँ पापा,” रवि ने मुस्कुराते हुए कहा। “हम तीन टिकट बुक करा रहे हैं। आप भी चल रहे हैं हमारे साथ।”
दीनानाथ जी हड़बड़ा गए। “अरे नहीं-नहीं! मैं क्या करूँगा तुम दोनों के बीच? तुम लोग नए ज़माने के बच्चे हो, मौज-मस्ती करोगे। मैं बूढ़ा आदमी, मेरे घुटने भी साथ नहीं देते। मैं तुम लोगों की स्पीड कम कर दूँगा। बेकार में तुम्हारे मज़े किरकिरे होंगे।”
दीनानाथ जी को अपने दोस्त रामशरण की बात याद आ गई—“अरे दीनानाथ, बच्चों के साथ चिपके रहना शोभा नहीं देता। उन्हें उनकी स्पेस (Space) चाहिए होती है। हम पुराने लोग उनके गले की घंटी बन जाते हैं।”
“पापा, प्लीज़ न!” शिखा ने ज़िद की। “हमने सब प्लान कर लिया है। हम ज़्यादा ट्रेकिंग नहीं करेंगे, आराम से रिज़ॉर्ट में रहेंगे। और मुन्नार के चाय के बाग़ान आपको बहुत पसंद आएंगे। मम्मी जी को हमेशा से दक्षिण भारत जाना था न? उनके लिए ही सही, चलिए न।”
सुधा का नाम आते ही दीनानाथ जी का प्रतिरोध पिघल गया। वे मना नहीं कर पाए।
यात्रा शुरू हुई। फ्लाइट में दीनानाथ जी खिड़की वाली सीट पर बैठे बादलों को देखते रहे। वे खुश थे, पर मन में एक डर था—कहीं वो सचमुच ‘बोझ’ न बन जाएं।
केरला पहुँचकर, पहले दिन वे होटल के कमरे से बाहर ही नहीं निकलना चाह रहे थे।
“तुम लोग जाओ, घूम आओ। मैं यहीं टीवी देख लेता हूँ,” उन्होंने कहा।
रवि ने उनका हाथ पकड़ा। “पापा, टीवी देखने के लिए इतनी दूर नहीं आए हैं। चलिए, नीचे गार्डन में बैठते हैं।”
अगले दो दिन दीनानाथ जी ने खुद को बहुत समेट कर रखा। जब रवि और शिखा फोटो खींच रहे होते, वे दूर खड़े हो जाते। जब वे किसी कैफ़े में जाते, तो दीनानाथ जी जल्दी-जल्दी खा लेते ताकि बच्चों को देर न हो। वे कोशिश कर रहे थे कि वे ‘अदृश्य’ रहें।
तीसरे दिन शाम को वे लोग एक हाउस-बोट (Houseboat) पर थे। डूबते सूरज की नारंगी रोशनी पानी पर तैर रही थी। माहौल बेहद रोमांटिक और शांत था। दीनानाथ जी डेक के एक कोने में कुर्सी डालकर बैठे थे, ताकि रवि और शिखा को प्राइवेसी मिल सके।
तभी शिखा दो कप कॉफ़ी लेकर उनके पास आई।
“पापा, यहाँ अकेले क्यों बैठे हैं?” शिखा ने पास वाली कुर्सी खींचते हुए पूछा।
“कुछ नहीं बेटा, बस नज़ारा देख रहा था। तुम लोग एन्जॉय करो,” दीनानाथ जी ने सकुचाते हुए कहा।
शिखा वहीं बैठ गई। “पापा, आपको पता है रवि ने यह ट्रिप क्यों प्लान किया?”
“क्यों? थक गए थे काम से, इसलिए,” दीनानाथ जी ने साधारण सा जवाब दिया।
“नहीं पापा,” शिखा ने उनकी आँखों में देखा। “पिछले महीने जब आपकी तबियत ख़राब हुई थी और आप रात भर खांस रहे थे, तब रवि बहुत डर गए थे। उन्होंने मुझसे कहा था—’शिखा, मैंने माँ को वक़्त नहीं दिया, काम के पीछे भागता रहा। अब पापा भी एकदम शांत हो गए हैं। वो उसी घर में हैं, पर मुझसे बहुत दूर हो गए हैं। मुझे डर लगता है कि कहीं मैं उन्हें भी खो न दूँ बिना यह बताए कि मैं उनसे कितना प्यार करता हूँ’।”
दीनानाथ जी का गला रुंध गया। वे अवाक शिखा को देखते रहे।
शिखा ने आगे कहा, “पापा, हम आपको यहाँ ‘बोझ’ समझकर नहीं लाए हैं। सच तो यह है कि हमें आपकी ज़रूरत थी। उस घर की चारदीवारी में हम सिर्फ़ ‘ज़िम्मेदारियाँ’ निभा रहे थे, ‘रिश्ते’ नहीं। रवि को अपना बचपन याद आ रहा था, जब आप उसे कंधे पर बिठाकर घुमाते थे। आज वो आपको घुमाना चाहता है, कर्ज़ उतारने के लिए नहीं, बल्कि वो सुकून पाने के लिए जो सिर्फ़ पिता के साये में मिलता है।”
दीनानाथ जी की आँखों से एक आंसू टपक कर कॉफ़ी के मग में गिर गया। वे जिसे अपनी ‘उपेक्षा’ समझ रहे थे, वह दरअसल उनके बेटे का ‘मौन प्रेम’ था। वे जिसे ‘जनरेशन गैप’ समझकर डर रहे थे, वह सिर्फ़ उनके संकोच की एक दीवार थी।
तभी रवि भी वहां आ गया। उसके हाथ में गिटार था (जो बोट वाले का था)।
“पापा, वो पुराना वाला गाना सुनाओ न, जो आप मम्मी के लिए गाते थे—’ये रातें, ये मौसम’,” रवि ने बच्चे की तरह ज़िद की।
दीनानाथ जी हंसे। तीन साल बाद वो खुलकर हंसे थे।
“अरे, अब आवाज़ कहाँ रही वैसी,” उन्होंने टाला।
“अरे गाइए न पापा!” शिखा ने ताली बजाई।
और उस शाम, केरला के बैकवाटर्स में, 75 साल के दीनानाथ जी ने गाना शुरू किया। उनकी आवाज़ थोड़ी कांप रही थी, लेकिन उसमें जो मिठास थी, उसने उस शाम को जादुई बना दिया। रवि ने गिटार पर बेसुरी धुन बजाने की कोशिश की और तीनों जोर-जोर से हंसे।
उस रात डिनर पर दीनानाथ जी ने खुद मेनू कार्ड उठाया।
“आज मैं आर्डर करूँगा। तुम लोग तो वही पिज़्ज़ा-बर्गर खाओगे। आज हम यहाँ की स्पेशल ‘करी’ खाएंगे,” उन्होंने हक़ से कहा।
रवि और शिखा ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुराए। उनका ‘पुराने वाले पापा’ वापस आ गए थे। वो झिझक, वो ‘कबाब में हड्डी’ वाला भाव अब गायब हो चुका था।
वापसी की फ्लाइट में दीनानाथ जी बीच वाली सीट पर बैठे थे। एक तरफ रवि, दूसरी तरफ शिखा।
दीनानाथ जी ने रवि के कंधे पर सिर रखा और आँखें मूंद लीं। उन्हें महसूस हुआ कि जिसे वो ‘बुढ़ापा’ और ‘अकेलापन’ समझ रहे थे, वो सिर्फ़ उनके मन का वहम था। बच्चे उन्हें छोड़कर आगे नहीं बढ़ना चाहते थे, बस बच्चे इंतज़ार कर रहे थे कि कब पापा अपना हाथ बढ़ाएं।
घर पहुँचकर जब वे लोग टैक्सी से उतरे, तो पड़ोस के रामशरण जी मिल गए। वही रामशरण जिन्होंने कहा था कि बच्चों के साथ मत जाना।
“अरे दीनानाथ, आ गए? कैसा रहा सफ़र? थक गए होगे? मैंने तो कहा था, इस उम्र में ये सब…” रामशरण ने अपनी पुरानी टेप बजानी शुरू की।
दीनानाथ जी ने अपना सूटकेस उठाया, अपनी नई ख़रीदी हुई हैट ठीक की और एक चौड़ी मुस्कान के साथ बोले, “रामशरण, थकान तो शरीर को होती है। रूह तो मेरी दस साल जवान होकर लौटी है। और रही बात उम्र की, तो याद रखना दोस्त—घर की नींव अगर छत के साथ न चले, तो घर बिखर जाता है। मैं इनके साथ ‘लटक’ कर नहीं गया था, मैं इनका ‘एंकर’ (लंगर) बनकर गया था।”
रवि ने आगे बढ़कर पिता के हाथ से सूटकेस ले लिया। “चलिए पापा, चाय बनाते हैं। आपकी वाली अदरक की चाय।”
दीनानाथ जी ने घर में कदम रखा। आज उन्हें वो घर खाली नहीं लगा। आज उन्हें दीवारों पर लगी सुधा की तस्वीर मुस्कुराती हुई दिखी। उन्हें समझ आ गया था कि ‘स्पेस’ और ‘प्राइवेसी’ के नाम पर अपनों से दूर हो जाना आधुनिकता नहीं, बल्कि मूर्खता है।
सफ़र ख़त्म हो गया था, लेकिन एक नया सफ़र शुरू हुआ था—एक ऐसा सफ़र जहाँ पिता सिर्फ़ पिता नहीं, बल्कि एक दोस्त था। जहाँ बेटा सिर्फ़ श्रवण कुमार नहीं, बल्कि एक हमसफ़र था।
निष्कर्ष:
रिश्ते उम्र के मोहताज नहीं होते, बस थोड़ी सी पहल के प्यासे होते हैं। अक्सर बुजुर्ग सोचते हैं कि वे बच्चों की ज़िंदगी में बाधा हैं, और बच्चे सोचते हैं कि माता-पिता अपनी दुनिया में खुश हैं। इस ‘सोच’ के बीच में ही अकेलापन घर कर जाता है। ज़रूरत है उस दीवार को गिराने की, एक टिकट कटाने की—सिर्फ़ घूमने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दिल तक पहुँचने के लिए।
दोस्तों, क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि आपके माता-पिता आपसे कुछ कहना चाहते हैं पर झिझक रहे हैं? या आप उन्हें कहीं ले जाना चाहते हैं पर वे मना कर देते हैं?
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