स्टेशन से घर तक – एम. पी. सिंह

सन 2025, 26 दि. का दिन मैं शायद कभी भूल नहीं पाउगा.

मैं दिल्ली द्वारका मैं रहता हूँ. काम के सिलसिले मैं सहारनपुर जाना हुआ. रात को वापस आने मैं देर होने की आशंका से बाइक को स्टेशन पर पार्क करके ट्रैन से जाना उचित समझा. रात लगभग 2 बजे वापस आकर नई दिल्ली स्टेशन से बाइक लेकर अपने घर जा रहा था.

रात का सन्नाटा और दिसम्बर माह की ठंडी हवा, बाईक सम्भल कर चला रहा था, तभी धोला कुआँ रोड पर मैंने थोड़ी अजीब सी हलचल देखी. खाली सड़क होने के बावजूद एक ऑटो रिक्शा थोड़ा धीरे चल रहा था और साथ मैं दोनों तरफ एक एक बाईक चल रही थी,

जिनपर 2 लडके बैठे थे और दोनों का चेहरा हेलमेट से ढका हुआ था. मुझे कुछ शक हुआ और मैंने बाईक धीरे करके ऑटो में देखा तो मुझे एक अकेली लड़की सहमी हुई बैठी दिखी. मेरे दिमाग़ मैं कुछ अनहोनी की आशंका हुई और मैंने भी बाईक धीरे करली और साथ मै चलने लगा.

दोनों बाईक वाले मेरी तरह मुड़ मुड़ कर देखते हुए काफ़ी देर तक तो साथ मैं चलते रहे फिर एक दूसरे को इशारा करके स्पीड बढ़ाकर निकल गए. मैंने ऑटो वाले से पूछा, ये बाईक वाले कौन थे? वो बोला पता नहीं. फिर उस लड़की से पूछा, सब ठीक है न?

वो बोली, हाँ, ये स्टेशन पर ऑटो स्टेंड पर खडे हुए थे. मैंने पूछा, कहाँ जाना है? वो बोली महावीर एन्क्लेव. मुझे लगा शायद वो फिर वापस आएंगे, इसलिए मैं ऑटो के साथ साथ चलने लगा, और बोला डरो मत, मैं भी उधर ही जा रहा हूँ. घर पहुंच कर उस लड़की की आवाज सुनाई दी, थैंक्स, मैं बहुत डर गईं थी, अब मैं चली जाऊगी.

मैंने कहा, नहीं, पहले अंदर जाओ, फिर मैं जाऊगा. वो लड़की शायद अकेली रहती थी, ताला खोलकर लाइट जलाई और हाथ हिलाकर जाने का इशारा किया और मैं अपने घर चला गया. 

उस दिन के बाद मेरा कभी उस लड़की से सामना नहीं हुआ, वो कौन थी, क्या करती थी, नहीं पता, पर आज भी दिल में एक सकून है की मैंने अनजाने खतरे को भापकर एक अनजान लड़की को सुरक्षित उसके घर तक पहुंचाया. 

शायद, उस लड़की को भी आज का दिन याद होगा.

धन्यवाद 

लेखक 

एम. पी. सिंह 

स्वरचित, मौलिक 

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