सोने की मोहर – शुभ्रा बैनर्जी 

“मैं अब नहीं रहने वाली यहां।सारा दिन खटती रहती हूं,फिर भी मन नहीं भरता आपके बेटे का।रोज -रोज खाने को लेकर चिक-चिक,हद है।हर बात में तैयार रहता है आपका बेटा लड़ने को।क्या कभी मैंने अपने दायित्वों से मुंह मोड़ा है?कभी भी आप लोगों के साथ बुरा बर्ताव किया है?ससुराल में सब अपनी सास से परेशान रहतें हैं,और यहां उल्टा है।पति ही हर कमी पूरी कर देतें हैं।मां,मैं रिज्यूमे डाल चुकी हूं अपना।इंदौर के एक रेसिडेंशियल स्कूल में। इंटरव्यू के लिए बुलाएंगे,वहां से।मैं तो अब चली जाऊंगीं,बच्चों को लेकर।आप संभालना यहां रहकर अपने बेटे को।हां नहीं तो।” सीमा गुस्से में बड़बड़ाए जा रही थी,मां की प्रतिक्रिया जानने के लिए एकटक देखे भी जा रही थी उनकी तरफ।तभी दुनिया की शायद सबसे अच्छी सास ने हंसकर कहा”हां-हां, बिल्कुल चले जाना तुम।वहीं बच्चों का भी एडमिशन करवा देना।कुछ दिनों में मैं भी आ जाऊंगी तुम सब को संभालने।रहें यहां बाप-बेटे ठाठ से।तब पता चलेगा,घर कैसे चलता है।” 

सीमा को मां से इस प्रतिक्रिया की तो बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी।मुंह खुला का खुला रह गया। आश्चर्य से पूछा” हैं!!!!!!!! आप क्यों चलेंगी वहां? अपने बेटे और पति को छोड़कर।आपके बेटे को तो मुझसे परेशानी है, आपसे थोड़े ही।आपको तो सर आंखों पर रखतें हैं।कभी आपके मुंह से कुछ निकला हो, और उन्होंने पूरा नहीं किया हो, मैंने तो नहीं देखा इतने सालों में।मैं बुरी पत्नी हूं , तो मैं ही जाऊंगी ना? “मां ने मुंह बनाकर कहा” काहे का अच्छा बेटा? जब उसकी पत्नी ही छोड़कर जाने वाली है, तो मां का क्या अचार रखेगा वह? मेरे रहने से तुम भी तो सुरक्षित रहोगी वहां।तुम्हारे बेटे को दादी के बगैर नींद कहां आती है? रहूंगी मैं भी अपने पोते-पोतियों के साथ।मेरा खर्च तो तुम उठा लोगी ना बहू? अब मैं भी तुम दोनों की इस चिक-चिक से थक गई हूं।ना तो वो झुकने को तैयार होता है, ना तुम।ऐसे में नुकसान तो बच्चों का ही हो रहा है।तुम कर लो ज्वाइन वहां बहू।मैं तुम्हें इस घर में लाई थी, तो अकेले नहीं छोड़ूंगी तुम्हें।”

सीमा की अब जुबान लड़खड़ाने लगी।इकलौते बेटे से कितना प्यार करतीं हैं ये,मालूम है।तो कैसे उसे छोड़कर रह पाएगी?कैसी मां है ये?क्या वास्तव में बहू के लिए स्नेह है या , पोते-पोतियों का मोह?हे भगवान!अब मैं किसके भरोसे छोड़कर जाऊंगी,ऐसे गुस्सैल आदमी को?बच्चों के बिना चार दिन भी जो नहीं रह पाता।मायके जाते ही जल्दी वापस आने का फरमान जारी कर अपनी सास से लड़ता,घर आते ही मां-मां की रट लगाता आदमी,कैसे रह पाएगा मां के बिना?

सोचते-सोचते अचानक से मां की कहीं बात याद आ गई।स्वभाव से मुंहफट सीमा ने सास को आड़े हाथों लेते हुए पूछा” वैसे क्या कह रहीं थीं आप?मैं झुकने को तैयार नहीं होती?कब नहीं झुकी मैं?हर बार तो अपने मन की ही करतें हैं आपके बेटे।मैं तो बस बोलकर बुरी बन जाती हूं।याद नहीं आपको शादी की सालगिरह पर मेरे मना करने के बावजूद पचास लोगों को बुला लिया था घर पर।बेटे के जनेऊ में सौ बार बोलने के बाद भी अपनी मर्जी की ही चलाई आपके बेटे ने। बैठे-बिठाए चार लाख रुपये फूंक दिए पार्टी में।जिस चीज के लिए मना करती हूं,वही चीज जानबूझकर करते हैं।ये तो मुझे नीचा दिखाने के लिए करते हैं ना?आपको लगता है कि मैं नहीं झुकती,पर आपके बेटे ने हमेशा मुझे झुकाया है।कभी आपने कहा उनसे?” 

उन्होंने शांत होकर कहा”अरे!!!!मैं क्या अपने कोख के जने को नहीं जानती?सब जानती हूं मैं।आज जो कह रही हूं,ध्यान से सुनना।फिर जो फैसला करना है करो।” 

सीमा भी सोचकर बैठी थी कि आज तो फैसला कर के ही रहेगी। बहुत हुआ।ये क्या,मां तो अपनी अलमारी खोलने लगी। चुपचाप एक पोटली लाकर सीमा के हांथ में रखकर बोली” तुम्हें क्या लगता है,तुम्हारा पति ऐसा ही था पहले।नहीं -नहीं,वह भी मेरे पोते की तरह शांत और सौम्य था बचपन में।तुम्हारे ससुर जो अब तुम्हें बहुत सीधे लगते हैं ना, बहुत गुस्सैल थे जवानी में।खाने में रोज मांसाहार चाहिए होता था।जिस दिन नहीं बना पाती थी,घर सर में उठा लेते थे।मैं भी तुम्हारी तरह बहुत छटपटाती थी।एक बार गुस्सा करके भाई को बुलाकर मायके चली गई,तो अगले ही दिन जाकर लिवा लाए।फिर  मेरे भाई से बात नहीं की बहुत सालों तक।बहू, ये जो पुरुष होतें हैं ना, अपने स्वाभिमान को अपनी नाक पर लेकर चलते हैं।चाहे खरीद का कितना भी नुकसान हो जाए, पर अभिमान के लिए ये समझौता नहीं करते।मेरी मां ने तब मुझे समझाया था , कि तुम्हारे नाना ससुर भी नानी की दखल अंदाजी बर्दाश्त नहीं करते थे।तुम्हारे पति को बचपन में देखकर मुझे बड़ा संतोष होता था कि, अपने पापा पर नहीं गया।पर देखते-देखते वो भी वैसा ही बन गया।अभी जो तुम्हारा बेटा, तुम्हारे आंचल में दुबका रहता है ना।कल को वह भी अपने पिता की तरह ही हो जाएगा।यह अच्छी आदत तो नहीं, पर यही सत्य है। पुरुषों के शारीरिक बल से ज्यादा ताकतवर होता है, उनका अभियान।जिस दिन यह खत्म हो जाता है, समझ लो वो भी खत्म।”

सीमा मां की बात बीच में ही काटकर बोली” अच्छा, तो आप कहना चाहती हैं कि, हमेशा से जो होता आया है वहीं होना चाहिए।पति अपने अभिमान को पौरुष मानकर सदा ढोते रहेंगे।औरत अपने अभिमान की तिलांजलि देकर मन ही मन मरती रहे।यही ना।”

उन्होंने कहना जारी रखा” औरत तो घर की नींव होती है।औरत से ही परिवार,रिश्ता,प्रेम और संस्कार फलता फूलता है।पति तो कमाकर पैसे लाता है,घर तो पत्नी को ही चलाना पड़ता है। शुरू के कुछ साल मान लो तुम्हारे तप के हैं।पति और पत्नी के संबंध इतने प्रगाढ़ हो जातें हैं समय के साथ कि,पति अपने अभिमान को अपनी नाक से खींचकर अपने हृदय में छिपा लेता है।एक समय ऐसा जरूर आता है जब वह पत्नी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए खुशी-खुशी आत्मसमर्पण कर देता है।यह जानते हुए भी कि उसका पूरा यौवन काल परिवार के लिए पैसे कमाने में जा रहा है,वह सहर्ष अपना दायित्व निभाता है।ग़लती पता है हम क्या करतें हैं?उचित समय से पहले उनसे यह अपेक्षा करने लगते हैं कि वे बदल जाएं।उनकी कमी उन्हीं के समक्ष बताकर हम उनके अभिमान पर हथौड़ा ही चलाते हैं।तुम अपने मुंह से बार-बार अपने कमाने की बात करके  उसे उकसाती हो।वह जब भी कोई निर्णय लेता है, तुम नकार देती हो।माना तुम अच्छे के लिए कहती हो, पर तुरंत मुंह के ऊपर अपने माता-पिता, संतान के सामने पत्नी की नकारात्मक टिप्पणी किसी भी पति के लिए सहनीय नहीं होती है।मैं हमेशा तुम्हारे ही पक्ष में बोलती हूं, क्योंकि तुम्हारी पीड़ा मैं समझती हूं।पर अपने घर को, परिवार को बचाने के लिए हम औरतों को अपना अभिमान त्यागना पड़ता है।”

सीमा एक मां के मुंह से अपने बेटे की कमी सुन रही थी, या सास के मुंह से अपनी बहू को दी गई सीख, समझ ही नहीं पा रही थी।पोटली को टटोलने लगी तो मां ने कहा” यह तुम्हारे ससुर ने मुझे दिया था।साथ में यह वादा भी लिया था कि मैं कभी इसे किसी भी परिस्थिति में बेचूं ना।जानती हो इसका मतलब, यह केवल सोने की मोहर नहीं, इस घर -परिवार को संभालकर रखने का प्रशस्ति पत्र भी है।यह एक पुरुष का किया हुआ पश्चाताप भी है।यह एक पति का अपनी पत्नी के लिए अथाह प्यार और विश्वास का प्रतीक है।संसार में सुख पाने के लिए औरत को पहले स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है।देखना , कुछ सालों में मेरा बेटा भी बचपन की तरह शांत हो जाएगा।वह तुममें अपनी मां को देखेगा।तुम से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं रहेगी अभिमान की।सारे पुरुष अधिकतर ऐसे ही होतें हैं।ये घर के मुखिया का दायित्व निभाना चाहते हैं,मुखिया बनकर।तुम यदि  टीचर की तरह उससे हमेशा अनुशासन में बात करोगी, तो वह जताता रहेगा कि वह तुम्हारा छात्र नहीं पति है।समझी अब कुछ? “

अब भी सीमा को मां की बातें एकपक्षीय ही लग रहीं थीं।तब उन्होंने कहा” पति से ज्यादा अपना और कोई नहीं होता औरत के लिए।सारे रिश्ते समय के साथ कमजोर होते जातें हैं,बस पति -पत्नी का रिश्ता ही मजबूत होता जाता है।इसमें प्रेम,संयम और थोड़े से त्याग की खाद चाहिए।तुमसे बहुत प्यार करता है जो,वही लड़ाई करता है।मेरा बेटा जो,तुम्हारे साथ खाने को लेकर बहस करता है ना,वह खाने की वजह से नहीं,पिछली और कोई बात को याद कर करता है।तुम्हारे खाने की तारीफ अपनी बहनों से करता रहता है।तुम भी अब उसके उकसाने पर जवाब ना दिया करो,तो वह खुद ही शांत हो जाएगा।तुम्हारा अभिमान ही तुम्हारा अलंकरण है।इसी अभिमान का मान रखती हूं मैं।तुम मेरे बेटे के अभिमान का मान रखने की कोशिश करो।बस।

देखना,किसी दिन तुम्हारे हाथों में भी मोहर देकर वह कहेगा,कि वह ग़लत था।” 

सीमा ने मां को गले लगाकर कहा” हां-हां,दे चुका आपका बेटा मोहर,और मान चुका अपनी ग़लती।मैं क्या जानती नहीं उन्हें।”

” सीमा ओ सीमा ,चलो जल्दी तैयार हो जाओ।दस मिनट में।”दरवाजे से मां के इकलौते बेटे की आवाज गूंजी।सीमा ने शांत रहकर पूछा ” फुल्की खाने चलना है क्या?”

” अरे नहीं-नहीं,तुम्हारे लिए कार बुक की थी मैंने।अभी जाना है लेने।तुम्हारे जन्मदिन पर हम सबकी तरफ से तुम्हें उपहार।”

सीमा ने कनखियों से मां की ओर देखा ,तो वे पोटली आलमारी में रखती हुई मुस्कुराने लगीं।

शुभ्रा बैनर्जी 

कहानी-घर बचाना है तो अपना अभिमान कम कर बहू

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