शादी की शहनाइयों का शोर अभी थमा भी नहीं था कि सुमेधा के कानों में एक अलग ही सुर घोला जाने लगा था। वह सुर था उसकी ममीरी सास, यानी उसके पति आलोक की बुआ, सरला जी का।
सुमेधा जब ब्याह कर ‘शांति-निवास’ में आई, तो उसे लगा था कि संयुक्त परिवार में रहना थोड़ा मुश्किल होगा। घर में सास-ससुर नहीं थे,
आलोक के बड़े भैया (जेठ जी) राघव और भाभी (जेठानी) मृदुला ही घर के मुखिया थे। मृदुला भाभी देखने में बेहद शांत और सौम्य थीं, लेकिन सरला बुआ, जो शादी के बहाने महीने भर के लिए रुक गई थीं, उन्होंने सुमेधा को कुछ और ही चश्मा पहना दिया था।
शादी के चौथे दिन की बात है। सुमेधा अपने कमरे में साड़ियाँ जमा रही थी। मृदुला भाभी अभी-अभी उसे नाश्ता देकर नीचे गई थीं। तभी सरला बुआ दबे पाँव कमरे में आईं और दरवाज़ा सटा दिया।
“अरे सुमेधा बिटिया, यह क्या? भाभी ने नाश्ते में सिर्फ़ पोहा दिया? और साथ में मेवे नहीं दिए?” बुआ ने प्लेट की ओर देखते हुए नाक सिकोड़ी।
सुमेधा ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं बुआ जी, भाभी ने पूछा था, पर मुझे ही सुबह-सुबह भारी नाश्ता पसंद नहीं है।”
बुआ जी सुमेधा के पास बेड पर बैठ गईं और आवाज़ धीमी करते हुए बोलीं, “तुम अभी नादान हो बिटिया। नई-नई हो, सबका मन रखने के लिए हाँ-में-हाँ मिला देती हो। पर यह मृदुला उतनी सीधी नहीं है जितनी दिखती है। मैं तो घर की बेटी हूँ, सब जानती हूँ। जब राघव की शादी हुई थी, तब पिताजी ने (सुमेधा के ससुर ने) सारी तिजोरी की चाबी मृदुला को दे दी थी। सोचा था घर की लक्ष्मी है। पर इसने तो उस चाबी का ऐसा इस्तेमाल किया कि आलोक का हिस्सा ही डकार गई।”
सुमेधा का हाथ साड़ी की तह पर रुक गया। “क्या मतलब बुआ जी?”
“मतलब यह,” बुआ ने आँखों को नचाते हुए कहा, “कि आलोक की नौकरी लगने से पहले घर की जो पुश्तैनी ज़मीन बिकी थी, उसका सारा पैसा राघव और मृदुला ने अपने नाम फिक्स डिपाजिट करवा लिया। और तुम्हें जो यह चढ़ावे में हल्का सा नेकलेस मिला है न, यह मत सोचना कि इनके पास पैसे नहीं थे। अरे, मृदुला के पास अपनी माँ के दिए और ससुराल के मिलाकर इतने गहने हैं कि तुम सोच भी नहीं सकती। पर देवरानी को देने में जान निकलती है इसकी। चाहती ही नहीं कि तुम इस घर में रानी बनकर रहो। चाहती है कि तुम हमेशा इसके नीचे दबी रहो।”
सुमेधा के मन में शक का बीज पड़ गया। वह शहर की पढ़ी-लिखी लड़की थी, उसे लगा कि बुआ जी सही कह रही होंगी, आखिर वह तो घर की बुजुर्ग हैं, उन्हें झूठ बोलने की क्या ज़रूरत?
अगले कुछ हफ़्तों में यह सिलसिला रोज़ का हो गया। मृदुला भाभी अगर सुमेधा को काम करने से मना करतीं, तो बुआ कहतीं—”देखा, तुम्हें घर के मामलों से दूर रख रही है ताकि तुम तिजोरी का हिसाब न मांग लो।” अगर मृदुला भाभी आलोक को कुछ समझातीं, तो बुआ सुमेधा के कान भरतीं—”देखा, पति-पत्नी के बीच में दरार डाल रही है।”
धीरे-धीरे सुमेधा का व्यवहार बदलने लगा। वह मृदुला भाभी से खिंची-खिंची रहने लगी। रसोई में अगर भाभी मदद के लिए आतीं, तो वह रूखा सा जवाब दे देती। बात-बात पर वह अपना हक़ जताने की कोशिश करती, यह दिखाने के लिए कि वह किसी से कम नहीं है। मृदुला सब महसूस करती, पर अपनी मर्यादा में चुप रहती। वह सोचती कि शायद नई बहू है, समय के साथ ढल जाएगी।
एक दिन हद हो गई। घर में सत्यनारायण की कथा थी। सुमेधा तैयार होकर नीचे आई। उसने अपनी शादी का भारी लहंगा पहना था। तभी उसने देखा कि मृदुला भाभी ने एक बहुत ही साधारण सी सूती साड़ी पहनी है और कानों में छोटे से टॉप्स।
सरला बुआ सुमेधा के पास आईं और फुसफुसाईं, “देखो ज़रा नाटक। खुद के पास नवलखा हार है लॉकर में, पर आज साध्वी बनकर घूम रही है ताकि रिश्तेदारों को लगे कि सारा पैसा नई बहू पर लुटा दिया और खुद बेचारी बन गई। यह सब तुम्हें नीचा दिखाने की चाल है। वह दिखाना चाहती है कि तुम कितनी खर्चीली हो और वह कितनी त्यागी।”
सुमेधा का खून खौल उठा। पूजा के बाद जब सब मेहमान चले गए और घरवाले खाना खाने बैठे, तो सुमेधा से रहा नहीं गया।
“भाभी,” सुमेधा ने तल्खी से कहा, “आज पूजा में आप थोड़ी ढंग की साड़ी पहन लेतीं तो क्या बिगड़ जाता? हमारे मायके से आए लोग क्या सोच रहे होंगे? कि हम आपका सारा ज़ेवर छीन कर बैठ गए हैं?”
राघव भैया और आलोक खाना खाते-खाते रुक गए। मृदुला का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“सुमेधा, यह तुम किस लहज़े में बात कर रही हो?” आलोक ने डांटते हुए कहा।
“मैं सही कह रही हूँ आलोक,” सुमेधा फट पड़ी। “मैं देख रही हूँ जब से आई हूँ। भाभी हर चीज़ में अपनी मनमानी करती हैं। और सुना है कि पुश्तैनी ज़मीन का पैसा भी इन्होने ही दबा रखा है। बुआ जी ने मुझे सब बताया है कि कैसे मेरा हक़ मारा गया है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सरला बुआ, जो कोने में बैठीं मज़े ले रही थीं, अचानक घबरा गईं कि मेरा नाम क्यों ले लिया।
राघव भैया ने गहरी सांस ली। उन्होंने मृदुला की ओर देखा, जिनकी आँखों में आंसू तैर रहे थे।
“बुआ जी ने बताया है?” राघव ने गंभीर स्वर में पूछा।
“हाँ!” सुमेधा ने बुआ की तरफ इशारा किया। “इन्होने मेरी आँखें खोली हैं। वरना मैं तो समझ ही नहीं पाती कि मेरे भोलेपन का फायदा उठाया जा रहा है।”
आलोक ने गुस्से में चम्मच पटक दिया। “भाभी, आप कुछ बोलती क्यों नहीं? बताइए न सुमेधा को सच।”
मृदुला ने सिर झुका लिया। “जाने दे आलोक। छोटी है, किसी के बहकावे में आ गई।”
“नहीं भाभी, अब बहुत हो गया,” आलोक उठा और अपने कमरे से एक पुरानी डायरी और कुछ बैंक के कागज़ात ले आया। उसने उन्हें सुमेधा के सामने पटक दिया।
“पढ़ो इसे सुमेधा,” आलोक की आवाज़ कांप रही थी।
सुमेधा ने डायरी खोली। वह उनके ससुर जी की डायरी थी। उसमें हिसाब-किताब लिखा था।
“सुमेधा,” राघव भैया ने शांत स्वर में बोलना शुरू किया, “जिस पुश्तैनी ज़मीन की बात तुम कर रही हो, वह पिताजी की बीमारी के इलाज में बिक गई थी। आलोक तब कॉलेज में था। पिताजी को कैंसर था। उनके जाने के बाद हमारे पास फूटी कौड़ी नहीं बची थी। घर गिरवी पड़ा था।”
सुमेधा के हाथ कांपने लगे।
राघव ने आगे कहा, “आलोक की एमबीए की फीस के लिए पैसे नहीं थे। तब मृदुला नई-नई ब्याह कर आई थी। इसने… इसने अपने मायके से मिला सारा स्त्री-धन, अपने सारे भारी ज़ेवर, यहाँ तक कि अपनी शादी का हार भी बेच दिया था। ताकि आलोक की पढ़ाई न रुके और यह घर नीलाम होने से बच जाए।”
सुमेधा ने झटके से सिर उठाया और मृदुला भाभी को देखा। वह अब भी सिर झुकाए बैठी थीं, जैसे कोई अपराध किया हो।
“और आज जो तुम यह साधारण साड़ी देख रही हो न,” आलोक की आँखों में आंसू आ गए, “यह इसलिए नहीं कि भाभी नाटक कर रही हैं। यह इसलिए है क्योंकि उनके पास अब कोई भारी ज़ेवर बचा ही नहीं है। जो थोड़ा बहुत बचा था, उसे तुड़वाकर, उसमें अपनी बची-खुची जमा पूंजी मिलाकर, उन्होंने तुम्हारे लिए वह नेकलेस बनवाया जो तुमने रिसेप्शन में पहना था। भाभी ने मुझसे कसम ली थी कि मैं तुम्हें यह कभी न बताऊँ, ताकि तुम्हें यह न लगे कि तुम किसी के एहसान तले हो।”
सुमेधा को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारा हो। ज़मीन उसके पैरों तले खिसक गई। वह जिन जेवरों के लिए भाभी को कोस रही थी, वे तो भाभी के त्याग की राख से बने थे।
उसने पलटकर सरला बुआ को देखा। बुआ अब नज़रे चुरा रही थीं।
“और बुआ जी,” आलोक ने बुआ की ओर मुड़कर कड़काई से कहा, “आप किस मुंह से सुमेधा को यह सब पट्टियां पढ़ा रही थीं? जब पिताजी बीमार थे, तब भैया ने आपसे पचास हज़ार रुपये उधार मांगे थे। आपने साफ़ मना कर दिया था यह कहकर कि आपके पास पैसे नहीं हैं। जबकि उसी महीने आपने नई गाड़ी खरीदी थी। और आज आप यहाँ आकर मालकिन बनकर, इस घर को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं?”
सरला बुआ का चेहरा पीला पड़ गया। उनकी पोल सबके सामने खुल चुकी थी। वह बड़बड़ाते हुए उठीं, “भलाई का तो ज़माना ही नहीं है। मैं तो बस बहू को सचेत कर रही थी,” और तेज़ी से अपने कमरे में चली गईं।
सुमेधा वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई। उसे अपनी हर कही बात, हर ताना, हर रूखा व्यवहार याद आ रहा था। वह उस देवी जैसी औरत को ‘चोर’ और ‘चालाक’ समझती रही जिसने अपने हिस्से के सुख को जलाकर इस घर को रौशन किया था।
मृदुला उठी और सुमेधा के पास आई। उन्होंने सुमेधा के कंधे पर हाथ रखा। “उठो सुमेधा।”
सुमेधा ने भाभी के पैर पकड़ लिए। वह फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दीजिये भाभी। मैं… मैं बहुत बुरी हूँ। मैंने बुआ की बातों में आकर आपको क्या-क्या नहीं समझा। आपने मेरे लिए इतना किया और मैंने…”
मृदुला ने उसे ज़बरदस्ती उठाया और गले लगा लिया। “पगली, तू बुरी नहीं है, बस कच्ची है। कान की कच्ची। घर के लोग जब कहते हैं न, तो उन पर विश्वास करना चाहिए, लेकिन इतना भी नहीं कि अपनी आँखों देखी सच्चाई भूल जाओ। बुआ जी तो मेहमान थीं, चली जाएंगी। रहना तो तुझे और मुझे साथ में है न।”
सुमेधा, भाभी के सीने से लगकर रोती रही। उसे आज एहसास हुआ कि ‘जेठानी’ सिर्फ़ पति की बड़ी भाभी नहीं होती, वह माँ के बाद दूसरी माँ होती है जो अपनी छांव में देवरानी को पालती है।
अगले दिन सुबह, सरला बुआ अपना सामान समेटकर बिना नाश्ता किए चली गईं। किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।
रसोई में सुमेधा नाश्ता बना रही थी। मृदुला आई। “अरे, तू क्यों बना रही है? मैं बना देती।”
सुमेधा ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं भाभी, आज से नाश्ता मैं बनाउंगी। आप बस डाइनिंग टेबल पर बैठिए। और हाँ… अगले महीने मेरी पहली सैलरी आने वाली है।”
“तो?” मृदुला ने पूछा।
“तो हम सुनार के पास जाएंगे,” सुमेधा ने दृढ़ता से कहा। “मुझे डिज़ाइन नहीं पता, पर आपके लिए एक वैसा ही हार बनवाना है जैसा आपने बेचा था। यह मेरा हक़ है और आपकी ज़िम्मेदारी कि आप मना नहीं करेंगी।”
मृदुला की आँखों में पानी भर आया, पर चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। ‘शांति-निवास’ में जो ज़हर बुआ ने घोला था, वह सुमेधा और मृदुला के आंसुओं ने धो दिया था। अब वहां सिर्फ़ विश्वास की नींव बची थी।
मूल लेखिका : सावित्री गोंड