सिंदूर का शौर्य – निधि गुप्ता

नंदिनी की आँखों में खुशी के आंसू थे जब उसने पहली बार मेजर सिद्धार्थ को अपने जीवनसाथी के रूप में देखा था। सेना की जैतून के रंग वाली (ऑलिव ग्रीन) वर्दी में सजे सिद्धार्थ किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहे थे।

नंदिनी हमेशा से एक फौजी की पत्नी बनने का सपना देखती थी। उसे उस वर्दी के रुतबे, उस अनुशासन और देश के लिए मर-मिटने वाले जज़्बे से प्यार था। शादी के दिन जब सिद्धार्थ ने उसके मांग में सिंदूर भरा, तो नंदिनी को लगा जैसे उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गई हों।

शादी के बाद का वह पहला महीना किसी खूबसूरत खुशनुमा ख्वाब की तरह बीता। घर में नई बहू के आने से जैसे रौनक छा गई थी। सिद्धार्थ के माता-पिता, देवकी जी और प्रकाश बाबू, अपनी बहू को पाकर निहाल थे।

नंदिनी ने भी बहुत ही कम समय में उस घर को अपना लिया था। सिद्धार्थ के साथ बिताया हर पल नंदिनी के लिए किसी बेशकीमती मोती जैसा था। सुबह की चाय से लेकर रात की लंबी बातों तक, दोनों ने एक-दूसरे के भीतर अपनी पूरी दुनिया बसा ली थी।

लेकिन फौजियों की दुनिया में खुशियों के साथ-साथ एक अलिखित विदाई हमेशा दरवाजे पर खड़ी रहती है। तीस दिन कैसे पंख लगाकर उड़ गए, नंदिनी को पता ही नहीं चला। जब सिद्धार्थ की छुट्टी खत्म होने में सिर्फ दो दिन बचे थे, तो घर का माहौल अचानक बदलने लगा। देवकी जी की आँखों में एक अजीब सी खामोशी छा गई और प्रकाश बाबू बार-बार अपनी चश्मा साफ़ करते हुए अपने जज्बातों को छिपाने लगे।

नंदिनी के लिए यह सब नया था। उसने फौजी की पत्नी बनने का सपना तो देखा था, लेकिन उस सपने के पीछे छिपे विदाई के इस भारी दर्द का उसे अंदाज़ा नहीं था।

रात का समय था। नंदिनी खामोशी से सिद्धार्थ का सूटकेस पैक कर रही थी। वह उसकी वर्दी को बहुत सहेज कर रख रही थी, लेकिन उसकी आँखों से गिरती हुई एक बूंद ने वर्दी के कॉलर को भिगो दिया। सिद्धार्थ जो पीछे खड़ा सब देख रहा था, धीरे से आगे आया और उसने नंदिनी के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में ले लिया।

उसने नंदिनी को अपनी ओर पलटा और उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “नंदिनी, मुझे पता था कि यह पल तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा। जब हमने फेरे लिए थे, तो तुमने सिर्फ मुझसे नहीं, मेरी इस वर्दी से भी शादी की थी। और इस वर्दी की एक ही शर्त होती है—त्याग।”

नंदिनी ने सुबकते हुए अपना सिर सिद्धार्थ के सीने पर रख दिया। “मुझे पता है सिद्धार्थ, पर मैं एक महीने में ही आपकी इतनी आदी हो गई हूँ कि अब आपके बिना इस घर में कैसे रहूँगी? मुझे डर लग रहा है।”

सिद्धार्थ ने बहुत ही प्यार से उसके माथे को चूमा और उसे बिस्तर पर बिठाते हुए कहा, “नंदिनी, मेरी तरफ देखो। दुनिया को मेरे कंधों पर लगे सितारे दिखते हैं, लेकिन मेरी असली ताकत तुम हो। जब एक सैनिक सरहद पर जाता है, तो उसका आधा ध्यान इस बात पर होता है कि पीछे उसका परिवार कैसा है। अगर तुम कमज़ोर पड़ोगी, तो मेरी बंदूक पकड़ने वाले हाथ कांप जाएंगे।”

सिद्धार्थ ने एक गहरी सांस ली और आगे कहा, “मैं अपने बूढ़े माँ-बाप को तुम्हारे भरोसे छोड़कर जा रहा हूँ। बचपन से उन्होंने मेरी हर ज़िद पूरी की, मुझे इस काबिल बनाया कि मैं देश की रक्षा कर सकूं। लेकिन आज जब उन्हें मेरी ज़रूरत है, तो मैं उनके पास नहीं हूँ। नंदिनी, क्या तुम मेरे जाने के बाद इस घर का ‘बेटा’ बन सकती हो? जब माँ को घबराहट हो, तो क्या तुम मेरा हाथ बनकर उन्हें थाम सकती हो? जब पिताजी को मेरी याद आए, तो क्या तुम उनके चेहरे की मुस्कान बन सकती हो?”

सिद्धार्थ के इन शब्दों ने नंदिनी के अंदर के उस डर को जैसे एक झटके में खत्म कर दिया। उसने अपने आंसू पोंछे। उसे एहसास हुआ कि सिद्धार्थ सिर्फ जा नहीं रहा है, बल्कि उसे एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंप कर जा रहा है।

“आप बेफिक्र होकर अपनी ड्यूटी पर जाइए सिद्धार्थ,” नंदिनी ने अपनी आवाज़ को दृढ़ करते हुए कहा। “आपने देश की रक्षा की कसम खाई है, और आज मैं आपके सामने कसम खाती हूँ कि आपके पीछे इस घर पर कोई आंच नहीं आने दूंगी। मैं सिर्फ आपकी पत्नी नहीं, इस घर की ढाल बनकर दिखाऊंगी।”

अगली सुबह जब सिद्धार्थ घर से निकला, तो नंदिनी रोई नहीं। उसने मुस्कुराते हुए उसे विदा किया, हालांकि अंदर ही अंदर उसका दिल टूट रहा था।

सिद्धार्थ के जाने के बाद घर में एक अजीब सा सूनापन छा गया। देवकी जी बीमार रहने लगीं और प्रकाश बाबू गुमसुम हो गए। नंदिनी ने अपनी कसम को याद रखा। उसने अपने सारे शौक किनारे रख दिए और पूरी तरह से घर को संभालने में जुट गई। सुबह जल्दी उठकर वह ससुर जी के साथ पार्क में टहलने जाती ताकि उनका मन लगा रहे। दोपहर में वह सास के पास बैठकर उन्हें किताबें पढ़कर सुनाती और सिद्धार्थ के बचपन की बातें करके उन्हें हंसाती। नंदिनी ने पूरे घर को एक ऐसे अदृश्य धागे में पिरो दिया था कि सिद्धार्थ की कमी महसूस होते हुए भी वे लोग एक-दूसरे के सहारे खुश रहने लगे थे।

महीने बीतते गए। सिद्धार्थ की पोस्टिंग एक बहुत ही संवेदनशील और दुर्गम इलाके में थी, जहां से फोन पर बात होना भी कभी-कभी हफ्तों तक मुमकिन नहीं हो पाता था। नंदिनी रोज़ रात को डाकिया के आने का इंतज़ार करती और सिद्धार्थ के खतों को बार-बार पढ़ती।

एक दिन सर्दियाँ अपने चरम पर थीं। रात के करीब दो बज रहे थे कि अचानक देवकी जी के कमरे से एक कराहने की आवाज़ आई। नंदिनी तुरंत भागकर उनके कमरे में गई। उसने देखा कि देवकी जी अपना सीना पकड़े हुए बिस्तर पर तड़प रही हैं और उनका पूरा शरीर पसीने से लथपथ है। प्रकाश बाबू घबराहट में कांप रहे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें।

नंदिनी का दिल एक पल के लिए बैठ गया। सिद्धार्थ का फोन पिछले पांच दिनों से नहीं लगा था क्योंकि बॉर्डर पर कुछ तनाव चल रहा था। घर में वह अकेली जवान सदस्य थी। लेकिन उसे सिद्धार्थ के कहे वो शब्द याद आए— “क्या तुम मेरे जाने के बाद इस घर का ‘बेटा’ बन सकती हो?”

नंदिनी ने तुरंत खुद को संभाला। उसने बिना एक पल गँवाए अपनी गाड़ी की चाबी निकाली। प्रकाश बाबू की मदद से उसने अपनी सास को कार की पिछली सीट पर लिटाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गई। रात के उस अंधेरे और कोहरे में वह पूरी हिम्मत के साथ गाड़ी चलाकर शहर के सबसे बड़े अस्पताल पहुँची।

अस्पताल पहुँचते ही देवकी जी को इमरजेंसी में ले जाया गया। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें एक बहुत गंभीर हार्ट अटैक आया है और तुरंत सर्जरी करनी पड़ेगी। डॉक्टर ने नंदिनी के सामने कंसेंट फॉर्म (सहमति पत्र) रख दिया और कहा, “मरीज के बेटे को बुलाइए, यह बहुत रिस्की सर्जरी है, उनके हस्ताक्षर चाहिए होंगे।”

नंदिनी ने डॉक्टर की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “मैं उनकी बहू हूँ, और उनके बेटे की गैरमौजूदगी में इस घर का बेटा भी मैं ही हूँ। आप फॉर्म मुझे दीजिए, मैं साइन करूंगी। आप बस मेरी माँ को बचा लीजिए।”

नंदिनी ने फॉर्म पर साइन किए और सर्जरी के पैसे जमा करने के लिए अपनी शादी के गहने तक गिरवी रख दिए, क्योंकि उस रात इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम करना मुमकिन नहीं था। वह रात नंदिनी के लिए किसी युग जितनी लंबी थी। वह आईसीयू के बाहर बैठी लगातार प्रार्थना कर रही थी।

सुबह होते-होते डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “आपकी हिम्मत और सही समय पर लिए गए फैसले ने इनकी जान बचा ली। सर्जरी सफल रही।”

नंदिनी वहीं ज़मीन पर बैठकर रो पड़ी। यह खुशी और राहत के आंसू थे। जब तीन दिन बाद देवकी जी को होश आया, तो उन्होंने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “नंदिनी, मैंने तो एक फौजी को जन्म दिया था, लेकिन आज मुझे मेरी बेटी के रूप में एक कमांडर मिल गया है। अगर तू उस रात हिम्मत हार जाती, तो मैं आज ज़िंदा नहीं होती।”

इस घटना के लगभग एक हफ्ते बाद सिद्धार्थ का फोन आया। बॉर्डर पर हालात सामान्य हो चुके थे। सिद्धार्थ ने जब फोन किया तो उसकी आवाज़ में वही पुरानी गर्माहट थी।

“हैलो नंदिनी, कैसी हो तुम? माँ-बाबूजी कैसे हैं?”

नंदिनी ने अपनी रुलाई को रोकते हुए सब कुछ सामान्य बताने की कोशिश की, लेकिन प्रकाश बाबू ने फोन ले लिया और सिद्धार्थ को उस रात की पूरी कहानी सुना दी। उन्होंने बताया कि कैसे नंदिनी ने अकेले सब कुछ संभाला और कैसे वह उनके लिए एक बेटे से भी बढ़कर साबित हुई।

फोन के उस पार सिद्धार्थ खामोश था। वह एक ऐसा कठोर फौजी था जिसने दुश्मनों की गोलियों के सामने भी पलक नहीं झपकाई थी, लेकिन आज अपनी पत्नी के इस अदम्य साहस को सुनकर उसकी आँखों से आंसू बह निकले।

“नंदिनी…” सिद्धार्थ की आवाज़ कांप रही थी।

नंदिनी ने फोन लिया, “जी…”

“मुझे माफ़ कर देना नंदिनी, मैं उस वक्त तुम्हारे साथ नहीं था जब तुम्हें मेरी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। लेकिन मुझे तुम पर बहुत गर्व है। मैंने सरहद पर रहकर अपना फर्ज़ निभाया, लेकिन तुमने घर पर रहकर जो जंग जीती है, वह मेरी किसी भी मेडल से बहुत बड़ी है। तुमने सचमुच साबित कर दिया कि एक सैनिक की ताकत उसके हथियारों में नहीं, उसकी पत्नी के हौसले में होती है।”

नंदिनी मुस्कुराई। उसकी आँखों में अब कोई डर नहीं था। वह समझ चुकी थी कि फौजी की पत्नी होने का मतलब सिर्फ इंतज़ार करना नहीं होता, बल्कि एक फौजी की तरह हर परिस्थिति का डटकर सामना करना होता है। उसके सिंदूर की असली चमक सिद्धार्थ के पद या रुतबे से नहीं थी, बल्कि उस ज़िम्मेदारी और साहस से थी जो उसने सिद्धार्थ के पीछे अपने परिवार को बचाने के लिए उठाई थी।

**एक सवाल आपके लिए:**

एक फौजी या ड्यूटी पर तैनात इंसान की पत्नी को किन मानसिक चुनौतियों से गुजरना पड़ता है? क्या आपने कभी किसी ऐसे परिवार को करीब से देखा है? उनके त्याग और संघर्ष के बारे में आपके क्या विचार हैं? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।

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लेखिका : निधि गुप्ता

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