“चोर! यह साड़ी मेरी है। तूने चुराकर अपनी अलमारी में रख ली थी न? मैंने रंगे हाथों पकड़ लिया आज। सब देख लो, यह बहू नहीं, चोर है!” रेवती देवी चिल्लाईं।
पूरे ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया। विकास का चेहरा शर्म से लाल हो गया। बॉस और उनकी पत्नी असहज हो गए।
रसोई से बर्तनों के गिरने की झनझनाहट और उसके तुरंत बाद रेवती देवी की तीखी आवाज़ ने पूरे घर की शांति भंग कर दी थी।
“अरे ओ महारानी! चाय में चीनी डाली है या जहर? चाहती क्या है तू? बुढ़ापे में मार डालना चाहती है मुझे ताकि पूरे घर पर राज कर सके? मैं जानती हूँ तेरे इरादे, डायन कहीं की!”
हॉल में बैठे सुमन के पति, विकास ने अपना सिर पकड़ लिया। यह रोज़ का ड्रामा था। सुबह की शुरुआत चाय की चुस्की से नहीं, बल्कि माँ की चीख-पुकार से होती थी। विकास ने गुस्से में अखबार मेज़ पर पटका और रसोई की तरफ बढ़ा।
“माँ! बस भी करो अब। सुमन सुबह 5 बजे से उठकर खट रही है। और आप हैं कि बस कमियां निकाल रही हैं। चीनी डिब्बे में खत्म हो गई थी, उसने बताया तो था आपको।”
रेवती देवी ने बेटे को देखते ही अपना पैंतरा बदला और छाती पीटने लगीं। “हाए! देख लो, जोरू का गुलाम। अब बेटा माँ को आँखें दिखा रहा है। इसने ही सिखाया होगा तुझे। मुझे तो पहले ही पता था, यह लड़की मेरे घर के टुकड़े कर देगी।”
विकास कुछ और बोलने ही वाला था कि सुमन बीच में आ गई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जैसे बाहर चल रहा तूफ़ान उस तक पहुँच ही नहीं रहा हो। उसने विकास का हाथ पकड़कर धीरे से दबाया, जिसका मतलब था—’शांत हो जाओ’।
सुमन ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, कानों में लगे अपने छोटे से ‘ब्लूटूथ इयरबड्स’ को हल्का सा टैप किया और मुस्कुराते हुए रेवती देवी की ओर मुड़ी।
“माँजी, चीनी मंगवा ली है। मैं अभी आपके लिए दूसरी चाय बना देती हूँ, अदरक वाली। और हाँ, आज आपके लिए मैंने मूंग की दाल का हलवा भी बनाया है,” सुमन ने इतनी मिठास से कहा जैसे रेवती देवी ने उसे गाली नहीं, दुआ दी हो।
रेवती देवी बड़बड़ाते हुए अपने कमरे में चली गईं। “बना ले, बना ले… मीठा खिलाकर मुँह बंद करना चाहती है मेरा।”
विकास ने सुमन को घूरकर देखा। “सुमन, तुम यह सब कैसे झेल लेती हो? मुझे तो माँ की बातें सुनकर आग लग जाती है, और तुम ऐसे मुस्कुराती हो जैसे उन्होंने कोई भजन सुनाया हो। और यह… यह क्या हर वक्त कानों में ठूंसे रहती हो?” विकास ने सुमन के इयरबड्स की ओर इशारा किया।
“संगीत, विकास… संगीत,” सुमन ने हंसते हुए कहा। “जब कानों में अच्छा संगीत हो, तो बाहर का शोर सुनाई नहीं देता। तुम भी ऑफिस जाओ, देर हो रही है।”
पड़ोसियों में भी यही चर्चा थी। मिसेज चड्ढा अक्सर कहती थीं, “सुमन तो बड़ी ढीठ है भाई। सास इतना कोसती है, पर इसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। या तो बहुत सहनशील है या फिर बहुत शातिर।”
दिन बीतते गए। रेवती देवी का व्यवहार और उग्र होता गया। उन्हें ‘डिमेंशिया’ (भूलने की बीमारी) की शुरुआती शिकायत थी, जिससे उनका स्वभाव चिड़चिड़ा और शक करने वाला हो गया था। कभी वे सुमन पर चोरी का इल्जाम लगातीं, तो कभी कहतीं कि सुमन उन्हें भूखा रखती है।
एक शाम घर पर मेहमान आए हुए थे। विकास के बॉस और उनकी पत्नी। माहौल अच्छा था, तभी रेवती देवी अपने कमरे से बाहर आईं। उनके बाल बिखरे थे और हाथ में एक पुरानी साड़ी थी।
उन्होंने आते ही वह साड़ी सुमन के मुंह पर दे मारी।
“चोर! यह साड़ी मेरी है। तूने चुराकर अपनी अलमारी में रख ली थी न? मैंने रंगे हाथों पकड़ लिया आज। सब देख लो, यह बहू नहीं, चोर है!” रेवती देवी चिल्लाईं।
पूरे ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया। विकास का चेहरा शर्म से लाल हो गया। बॉस और उनकी पत्नी असहज हो गए।
“माँ! यह क्या बदतमीजी है? यह साड़ी आपने ही पिछले साल सुमन को दिवाली पर दी थी,” विकास चिल्लाया।
“झूठ! सब झूठे हो तुम लोग। यह मेरी साड़ी है,” रेवती देवी रोने लगीं।
विकास का सब्र टूट गया। उसने माँ का हाथ पकड़कर उन्हें कमरे में ले जाना चाहा। सुमन ने फिर विकास को रोका। उसने झुककर साड़ी उठाई, उसे झाड़ा और बड़े प्यार से रेवती देवी के कंधों पर डाल दी।
सुमन ने फिर अपने कानों के इयरबड्स पर हाथ रखा, एक गहरी सांस ली और मुस्कुराई।
“माँजी, आप सही कह रही हैं। यह साड़ी आपकी ही है और आप पर ही जंचती है। मुझसे गलती हो गई जो मैंने इसे पहन लिया। आप पहनिये न, आप इसमें रानी लगेंगी।”
रेवती देवी, जो अभी आग बबूला थीं, सुमन की नरमी देखकर ठंडी पड़ गईं। “हम्म्… हाँ, रानी तो मैं लगती हूँ,” वे साड़ी को सहलाते हुए बच्चों की तरह खुश होकर अंदर चली गईं।
मेहमानों के जाने के बाद विकास फट पड़ा।
“बस बहुत हो गया सुमन! अब मैं माँ को और बर्दाश्त नहीं कर सकता। कल ही हम ओल्ड एज होम (वृद्धाश्रम) में बात करेंगे। आज उन्होंने मेरी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ा दीं। और तुम… तुम क्या पत्थर की बनी हो? वो तुम्हें चोर कह रही थीं और तुम मुस्कुरा रही थीं? और यह नौटंकी बंद करो,” विकास ने झपटकर सुमन के कान से इयरबड खींच लिया।
“दिन भर गाने सुनती रहती हो ताकि घर की कलह सुनाई न दे? इतना इग्नोर कैसे कर सकती हो तुम हकीकत को?”
विकास ने गुस्से में वो इयरबड अपने कान में लगा लिया। “देखूं तो सही, कौन सा गाना तुम्हें इतना सुकून देता है कि तुम्हें अपनी बेइज्जती भी महसूस नहीं होती।”
विकास ने जैसे ही इयरबड कान में लगाया, वह सन्न रह गया।
वहां कोई फिल्मी गाना नहीं बज रहा था। वहां कोई भजन भी नहीं था।
वहां एक पुरानी, कांपती हुई, लेकिन बेहद स्नेही आवाज़ गूंज रही थी।
*”मेरी सुमन तो हीरा है… हीरा। भगवान ऐसी बहू सबको दे। जब मुझे हार्ट अटैक आया था, तो इसने दिन-रात एक करके मेरी सेवा की। मेरी बेटियां तो दूर बैठी थीं, पर इस पराई जाई ने मुझे सगी माँ से बढ़कर मान दिया। विकास की किस्मत खुल गई जो सुमन घर आई…”*
यह आवाज़ रेवती देवी की थी। यह रिकॉर्डिंग तीन साल पुरानी थी, जब रेवती देवी अस्पताल में थीं और ठीक होने के बाद उन्होंने एक रिश्तेदार के वीडियो में यह बात कही थी।
विकास की आँखों में आंसू आ गए। वह बुत बना खड़ा रहा। इयरबड में अगली रिकॉर्डिंग बजी।
*”सुमन बेटा, तू अपना ख्याल रखा कर। तू नहीं खाती तो मुझे भी निवाला नहीं भाता। तू मेरी बहू नहीं, मेरा अभिमान है।”*
विकास ने इयरबड निकाला और सुमन की ओर देखा। सुमन की आँखों में भी नमी थी, लेकिन चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान थी।
“यह क्या है सुमन?” विकास की आवाज़ भर्रा गई।
सुमन ने धीरे से इयरबड वापस लिया। “यह मेरी ‘ताकत’ है विकास। माँजी अब बीमार हैं। उनका दिमाग अब उनके बस में नहीं है। जो वो अब बोल रही हैं, वो उनकी बीमारी बोल रही है, वो नहीं। लेकिन यह…” उसने इयरबड दिखाया, “…यह उनका असली सच है। यह वो प्यार है जो उन्होंने मुझे तब दिया था जब वो स्वस्थ थीं।”
सुमन ने विकास का हाथ थाम लिया। “जब भी वो मुझे ताना मारती हैं, या अपशब्द कहती हैं, मैं यह रिकॉर्डिंग ऑन कर लेती हूँ। उनके कड़वे बोल मेरे कानों तक पहुँचने से पहले ही उनके मीठे बोलों से टकराकर खत्म हो जाते हैं। मुझे सास के ताने सुनाई नहीं देते विकास, मुझे सिर्फ़ अपनी माँ का प्यार सुनाई देता है।”
विकास घुटनों के बल बैठ गया और रो पड़ा। “मैं कितना गलत था। मैं उन्हें बोझ समझ रहा था, और तुम… तुम उनकी यादों को ढाल बनाकर उनकी सेवा कर रही हो।”
“उठिए,” सुमन ने उसे उठाया। “वृद्धाश्रम की बात दोबारा मत करना। जिस माँ ने बचपन में आपकी हर गलती माफ़ की, आपके गीले बिस्तर साफ़ किये, आज अगर बुढ़ापे में वो थोड़ी ज़िद्दी हो गई हैं, तो हम उन्हें घर से निकाल देंगे? हमें उनके शब्दों को नहीं, उनकी स्थिति को समझना होगा।”
उस रात के बाद, घर का नक्शा बदल गया। रेवती देवी का स्वभाव नहीं बदला, वे अब भी चिल्लाती थीं। लेकिन अब विकास को गुस्सा नहीं आता था। जब भी माँ चिल्लातीं, विकास और सुमन एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते।
विकास ने भी अपने फोन में माँ की कुछ पुरानी वीडियोज़ सेव कर ली थीं। अब जब भी घर में शोर मचता, दोनों ‘बधिर’ हो जाते—नफ़रत के लिए नहीं, बल्कि उस प्यार को महसूस करने के लिए जो कहीं गहरे में आज भी ज़िंदा था।
पड़ोसी आज भी कहते हैं, “बेचारे विकास और सुमन, बुढ़िया ने जीना हराम कर रखा है।”
लेकिन वे नहीं जानते कि उस घर की दीवारों के भीतर, एक बहु ने तकनीक और प्रेम का ऐसा मेल किया है कि वहाँ सिर्फ़ ‘अमृत’ बरसता है, विष का कोई असर नहीं होता।
सुमन ने साबित कर दिया था कि अगर आप सुनने का नज़रिया बदल लें, तो दुनिया का कोई भी शोर आपके मन की शांति को भंग नहीं कर सकता।
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**प्रिय पाठकों,**
क्या आपकी आँखों में भी नमी आ गई? सुमन ने जिस तरह अपनी सास की बीमारी को समझकर उनके पुराने प्यार को अपना संबल बनाया, वह हम सबके लिए एक सीख है। अक्सर हम बुजुर्गों के चिड़चिड़ेपन को दिल पर ले लेते हैं, जबकि उन्हें उस वक्त हमारी समझ और धैर्य की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।
**सवाल:** क्या आप सुमन की जगह होते तो ऐसा ही कर पाते? या आपके पास रिश्तों को संभालने का कोई और तरीका है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
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लेखक : माता प्रसाद