शक का कोहरा

 “एक छोटी सी गलतफहमी और पल भर का क्रोध कैसे सालों के विश्वास को राख कर देता है, और जब सच सामने आता है, तो इंसान अपनी ही नज़रों में कैसे गिर जाता है… यह कहानी उसी खौफनाक सच का आईना है।”

“तुम मुझसे अब और झूठ मत बोलो समीर! मेरे पास सारे सबूत हैं। ये बैंक की स्टेटमेंट और तुम्हारे फोन के ये मैसेज… क्या साबित करते हैं? तुम किसी और के साथ… छी! मुझे तो यह बोलते हुए भी घिन आ रही है।” काव्या की आवाज़ में दर्द, गुस्सा और विश्वासघात की पीड़ा एक साथ गूंज रही थी। उसने वह बैंक पासबुक और फोन समीर के मुंह पर लगभग दे मारा था।

समीर, जो दिन भर की ऑफिस की थकान के बाद अभी घर लौटा ही था, इस अचानक हुए हमले से सन्न रह गया। उसने ज़मीन पर गिरे फोन को उठाया। स्क्रीन पर मैसेज खुला था—”समीर, 50 हज़ार रुपये भेज दो। और शाम को उसी होटल के पास मिलना। मेरा इस दुनिया में तुम्हारे सिवा कोई नहीं है। – आर”

समीर ने गहरी सांस ली और काव्या के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की। “काव्या, तुम शांत हो जाओ। तुम जो सोच रही हो, वैसा बिल्कुल नहीं है। तुम बातों को गलत समझ रही हो। मुझे एक बार समझाने का मौका तो दो।”

लेकिन काव्या के सिर पर क्रोध का खून सवार था। क्रोध सचमुच इंसान की सोचने-समझने की शक्ति को शून्य कर देता है। जब दिमाग पर शक का पर्दा गिरता है, तो सच्चाई की रोशनी अंदर नहीं आ पाती। काव्या ने झटके से समीर का हाथ झटक दिया।

“मुझे अब तुम्हारी कोई झूठी कहानी नहीं सुननी है। पिछले तीन महीने से मैं नोटिस कर रही हूँ। तुम्हारा देर से घर आना, छुप-छुप कर फोन पर बात करना, और घर के खर्चों में कटौती करके कहीं और पैसे भेजना। मुझे लगता था कि तुम काम में व्यस्त हो, लेकिन तुम तो… तुम तो मेरी पीठ में छुरा घोंप रहे थे!” काव्या फूट-फूट कर रोने लगी।

“काव्या, प्लीज़, मैं हाथ जोड़ता हूँ। यह बात इतनी सीधी नहीं है जितनी तुम्हें लग रही है। ‘आर’ कोई और नहीं…” समीर ने बोलना चाहा।

“बस! एक शब्द और नहीं!” काव्या ने चीखते हुए कहा। उसने बेडरूम में जाकर अपना और अपने छह साल के बेटे कबीर का सूटकेस निकालना शुरू कर दिया।

“क्या कर रही हो तुम?” समीर घबरा गया।

“मैं जा रही हूँ समीर। हमेशा के लिए अपने मायके। अब मैं इस घर में एक पल भी नहीं रुक सकती। तुमने मेरे भरोसे का कत्ल किया है।” काव्या ने कबीर का हाथ पकड़ा जो सहमा हुआ सब देख रहा था, और सूटकेस खींचते हुए दरवाज़े की तरफ बढ़ गई।

समीर ने दरवाज़े के पास जाकर उसे रोकने की बहुत कोशिश की। “काव्या, कबीर की तरफ तो देखो, वो डर रहा है। ऐसे गुस्से में घर छोड़कर मत जाओ। मैं कसम खाता हूँ, मैंने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया। एक बार मेरी पूरी बात सुन लो, फिर जो फैसला करना हो कर लेना।”

लेकिन काव्या ने एक नहीं सुनी। उसने समीर को धक्का दिया और रात के उस अंधेरे में कैब बुक करके अपने मायके चली गई। उस रात समीर उस खाली घर में ज़मीन पर बैठा घंटों रोता रहा। उसका बसा-बसाया, हँसता-खेलता परिवार एक झटके में उजड़ गया था।

मायके पहुँचकर काव्या ने अपनी माँ और पिताजी को रो-रोकर सारी बात बताई। उसके पिता, दीनानाथ जी, एक बहुत ही सुलझे हुए और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने काव्या को पानी पिलाया और बोले, “बेटी, मुझे समीर पर पूरा भरोसा है। वह ऐसा लड़का नहीं है। तुमने शायद कोई जल्दबाज़ी कर दी है। क्रोध में लिया गया फैसला हमेशा पछतावा देता है। क्या तुमने उससे पूछा कि वह ‘आर’ कौन है?”

काव्या ने गुस्से से कहा, “पापा, आप भी उसी का पक्ष ले रहे हैं? मैंने खुद मैसेज पढ़े हैं। कोई भी औरत ऐसे मैसेज किसे करती है? और पैसे क्यों मांग रही है? मुझे कुछ नहीं सुनना। मैं कल ही वकील से मिलकर तलाक के कागज़ तैयार करवाऊंगी।”

दीनानाथ जी ने एक ठंडी सांस ली और चुप रह गए। वे जानते थे कि अभी काव्या के दिमाग पर गुस्सा हावी है, उसे अभी कुछ भी समझाना दीवार से सिर टकराने जैसा होगा।

दिन बीतने लगे। काव्या मायके में थी, लेकिन उसका मन एक पल के लिए भी शांत नहीं था। वो रात-दिन समीर की यादों और उसके धोखे के ख्यालों के बीच झूलती रहती। कबीर बार-बार अपने पापा के बारे में पूछता, “मम्मा, पापा कब आएंगे? मुझे उनके साथ पार्क जाना है।” कबीर के इन सवालों से काव्या और भी ज़्यादा चिड़चिड़ी हो जाती।

समीर ने कई बार काव्या को फोन किया, लेकिन काव्या ने उसका नंबर ब्लॉक कर दिया था। उसने दीनानाथ जी को भी फोन किया, लेकिन काव्या ने उन्हें कसम दे रखी थी कि वे समीर से कोई बात नहीं करेंगे।

करीब पंद्रह दिन बीत चुके थे। एक शाम, काव्या अपने कमरे में बैठी कबीर को होमवर्क करवा रही थी, तभी दरवाज़े की घंटी बजी। काव्या की माँ ने दरवाज़ा खोला।

बाहर समीर खड़ा था। लेकिन वह अकेला नहीं था। उसके साथ एक औरत थी, जिसका सिर पल्लू से ढका हुआ था। उसके कपड़े मैले थे और वो बहुत कमज़ोर लग रही थी।

काव्या की माँ ने हैरान होकर पूछा, “समीर? तुम? और यह कौन है तुम्हारे साथ?”

समीर की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह कई रातों से सोया न हो। उसने हाथ जोड़कर कहा, “माँ जी, मुझे काव्या से बात करनी है। बस एक बार।”

आवाज़ सुनकर काव्या भी बाहर आ गई। समीर के साथ एक औरत को देखकर उसका पारा फिर से चढ़ गया। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इसे मेरे घर तक लाने की? क्या अब तुम यहाँ भी मेरा तमाशा बनाने आए हो?”

समीर कुछ नहीं बोला। उसने अपने साथ खड़ी उस औरत के सिर से पल्लू धीरे से पीछे किया।

काव्या, उसकी माँ और दीनानाथ जी, तीनों के मुंह से एक साथ चीख निकल गई।

वह औरत कोई और नहीं, समीर की छोटी बहन ‘रश्मि’ थी। वही ‘आर’। रश्मि के चेहरे पर कई जगह चोट के गहरे निशान थे। उसकी आँख के पास सूजन थी और होंठ कटे हुए थे। वह इतनी कमज़ोर हो गई थी कि खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।

“रश्मि? तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?” काव्या अवाक रह गई। उसका सारा गुस्सा एक पल में हवा हो गया और उसकी जगह एक गहरे सदमे ने ले ली।

समीर ने रश्मि को सोफे पर बिठाया और काव्या की तरफ देखकर बोला, “यही है वो ‘आर’, काव्या। जिसके लिए मैं बैंक से पैसे निकाल रहा था। जिससे मिलने मैं होटल के पास जाता था, क्योंकि इसका पति इसे घर से बाहर नहीं निकलने देता था और वहीं से यह छुपकर मुझसे मिलने आती थी।”

काव्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। रश्मि, जिसने चार साल पहले परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर एक लड़के से भागकर शादी की थी। उस घटना के बाद समीर के पिता को हार्ट अटैक आ गया था और समीर ने कसम खाई थी कि वह रश्मि का मुंह कभी नहीं देखेगा। काव्या को भी रश्मि के उस कदम से समाज में बहुत ताने सुनने पड़े थे।

“लेकिन… लेकिन तुमने मुझे बताया क्यों नहीं समीर?” काव्या की आवाज़ कांप रही थी। उसकी आँखों से अब पछतावे के आंसू बहने लगे थे।

समीर ने एक गहरी सांस ली और अपनी रुंधे हुए गले से कहा, “कैसे बताता काव्या? तुम्हें याद है, जब रश्मि भागी थी, तब तुमने कितना कुछ सहा था? तुमने मुझसे कहा था कि तुम उस लड़की का नाम भी इस घर में नहीं सुनना चाहती। तीन महीने पहले रश्मि ने मुझे एक अनजान नंबर से फोन किया। वो रो रही थी। उसका पति उसे जानवरों की तरह पीटता था। उसे घर में भूखा रखता था। रश्मि के पास भागने की भी जगह नहीं थी।”

समीर के आंसू छलक पड़े। “मैं एक भाई हूँ काव्या। अपनी बहन को मौत के मुंह में कैसे छोड़ देता? मैंने उसे छुपकर पैसे देने शुरू किए ताकि वह भागकर कहीं और रह सके। मैंने एक वकील से बात की और उसके लिए एक सेफ हाउस (होटल) का इंतज़ाम किया। मैं तुम्हें बताना चाहता था, लेकिन मुझे डर था कि तुम रश्मि की पुरानी गलतियों की वजह से उसे कभी माफ़ नहीं करोगी। मैं घर में कोई नया क्लेश नहीं चाहता था। इसलिए मैंने सोचा कि जब रश्मि का तलाक हो जाएगा और वो सुरक्षित हो जाएगी, तब मैं तुम्हें सब सच बता दूंगा। लेकिन तुमने… तुमने मुझे मौका ही नहीं दिया काव्या। तुमने मेरे चरित्र पर ही उंगली उठा दी।”

काव्या वहीं ज़मीन पर धम्म से बैठ गई। उसे अपनी बेवकूफी, अपने क्रोध और अपने शक पर इतनी घिन आ रही थी कि वह बता नहीं सकती थी। जिस पति ने अपनी बहन की जान बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिया, उसने उस पति को एक ‘धोखेबाज़’ समझ लिया। उसने एक बार भी अपने पति की आँखों में सच्चाई देखने की कोशिश नहीं की। क्रोध ने वाकई उसकी बुद्धि हर ली थी।

काव्या रेंगते हुए रश्मि के पास गई और उसके पैरों पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दे रश्मि। मुझे माफ़ कर दे। मुझे नहीं पता था कि तू इस नरक से गुज़र रही है। मैं कितनी बुरी हूँ। मैंने अपने ही पति पर इतना गंदा शक किया।”

रश्मि ने कांपते हाथों से काव्या को उठाया और गले लगा लिया। “भाभी, आपकी कोई गलती नहीं है। मैं ही गुनहगार हूँ। मेरी वजह से आपका घर टूटने वाला था। भैया ने मुझे आज सब बता दिया, इसलिए मैं खुद यहाँ आई हूँ। आप भैया को गलत मत समझिए, वो दुनिया के सबसे अच्छे पति और भाई हैं।”

दीनानाथ जी ने आगे बढ़कर समीर के कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, तुमने जो किया, वो एक सच्चे इंसान की निशानी है। हमें तुम पर गर्व है।”

काव्या उठी और समीर के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। “समीर… मुझे कोई हक़ नहीं है तुमसे माफ़ी मांगने का। मैंने हमारे सात साल के रिश्ते को एक झटके में खत्म करने की कोशिश की। मैंने तुम्हारा विश्वास तोड़ा है। क्या तुम मुझे कभी माफ़ कर पाओगे?”

समीर ने काव्या के हाथ पकड़ लिए और उसे अपने सीने से लगा लिया। “मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ काव्या। बस थोड़ा आहत था। मैं जानता हूँ कि परिस्थितियां ही ऐसी बन गई थीं कि कोई भी पत्नी शक करती। मेरी भी गलती थी कि मैंने तुमसे इतना बड़ा सच छुपाया। पति-पत्नी के बीच कोई राज़ नहीं होना चाहिए। आओ, अब घर चलें। कबीर भी हमारा इंतज़ार कर रहा होगा।”

उस दिन काव्या को जीवन का सबसे बड़ा सबक मिल गया था। उसने समझ लिया था कि शक वो दीमक है जो किसी भी मजबूत से मजबूत रिश्ते को अंदर से खोखला कर देता है, और क्रोध वो आग है जो उस खोखले रिश्ते को जलाकर राख कर देती है।

घर लौटकर काव्या ने रश्मि का पूरा इलाज करवाया। उसे अपने घर में पनाह दी और उसके तलाक का केस खुद लड़ा। काव्या और समीर का रिश्ता अब पहले से भी ज़्यादा गहरा और मजबूत हो गया था, क्योंकि अब उस रिश्ते की नींव में कोई राज़ या शक नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति असीम सम्मान और अटूट विश्वास था।

जीवन में कभी-कभी सामने दिखने वाला सच आधा ही होता है। पूरी सच्चाई जानने के लिए क्रोध को शांत करके, संयम और विश्वास की आँखों से देखना पड़ता है। रिश्ते कांच के बने होते हैं, उन्हें अगर संभाल कर न रखा जाए, तो वो टूटकर अपनों को ही लहूलुहान कर देते हैं।


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