“जब एक अमीर समधी ने गरीब पिता के सामने हाथ फैलाकर कहा—’मुझे आपकी दौलत नहीं, आपकी वो धरोहर चाहिए जिसे आपने अपनी गरीबी की भट्टी में तपाकर कुंदन बनाया है… मुझे दहेज में आपकी बेटी के संस्कार और आपकी जेब का वो एक सिक्का चाहिए।'”
शहर के सबसे पॉश इलाके में बने ‘सिंघानिया विला’ के सामने से गुजरते वक्त लोग अक्सर अपनी गाड़ियाँ धीमी कर लेते थे। उसकी भव्यता और शान-ओ-शौकत किसी राजमहल से कम नहीं थी। लेकिन आज शहर के दूसरे छोर पर, एक तंग गली के पुराने मकान में दीनानाथ जी के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। उनके हाथ में पानी का गिलास कांप रहा था।
वजह थी—हर्षवर्धन सिंघानिया का आगमन।
वही हर्षवर्धन सिंघानिया, जिनका टेक्सटाइल का कारोबार देश-विदेश में फैला हुआ था। और दीनानाथ? एक समय था जब उनका भी नाम था, लेकिन वक्त की मार और व्यापार में घाटे ने उन्हें अर्श से फर्श पर ला दिया था। अपनी ईमानदारी बचाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ बेचकर कर्ज चुकाया था और अब एक छोटी सी किराने की दुकान चलाकर गुजारा करते थे।
बिचौलिये ने जब रिश्ता बताया था, तो दीनानाथ जी ने साफ मना कर दिया था। “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली। हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते,” उन्होंने हाथ जोड़ लिए थे। लेकिन हर्षवर्धन जी ने खुद मिलने की जिद्द की थी।
बाहर एक लंबी काली मर्सिडीज आकर रुकी। गली के बच्चे और पड़ोसी छतों से झांकने लगे। दीनानाथ जी ने अपनी फटी हुई बनियान के ऊपर जल्दी से एक पुराना लेकिन धुला हुआ कुर्ता पहना और बाहर आए।
हर्षवर्धन सिंघानिया कार से उतरे। उनके साथ उनका बेटा, आर्यन भी था। आर्यन बिल्कुल वैसा ही था जैसा सुना था—सौम्य और गंभीर।
दीनानाथ जी ने सकुचाते हुए स्वागत किया। “आइए… आइए सेठ जी। घर छोटा है, पर दिल में जगह की कमी नहीं है।”
हर्षवर्धन जी ने मुस्कुराते हुए जूते बाहर उतारे और अंदर आए। दीनानाथ जी की पत्नी, सावित्री, घबराहट में पल्लू ठीक करती हुई पानी लेकर आईं। घर के कोने-कोने से गरीबी झांक रही थी, लेकिन सफाई ऐसी थी कि फर्श आईने की तरह चमक रहा था।
थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के बाद, हर्षवर्धन जी ने सीधे मुद्दे की बात की। “दीनानाथ जी, मैंने आपके बारे में बहुत सुना है। दस साल पहले जब आपका दिवाला निकला था, तो आप चाहते तो खुद को बैंकप्ट (दिवालिया) घोषित करके बच सकते थे। लेकिन आपने अपना पुश्तैनी मकान, खेत, गहने—सब बेचकर एक-एक लेनदार का पैसा चुकाया। आप सड़क पर आ गए, लेकिन अपनी साख पर दाग नहीं लगने दिया।”
दीनानाथ जी की आँखें भर आईं। वह पुराना दर्द आज भी रिसता था। “सेठ जी, पैसा तो हाथ का मैल है, पर इज्जत चली जाए तो वापस नहीं आती। मैंने अपनी बेटी सुमन को भी यही सिखाया है।”
तभी सुमन चाय लेकर आई। सादगी की मूरत। न कोई महंगा मेकअप, न भारी गहने। बस आँखों में एक आत्मविश्वास और चेहरे पर विनम्रता। उसने आर्यन और हर्षवर्धन जी को चाय दी और बड़ों के पैर छूकर भीतर चली गई।
आर्यन ने चाय का घूंट भरा और अपने पिता की ओर देख कर हल्का सा सिर हिला दिया। वह रजामंदी थी।
हर्षवर्धन जी ने मेज पर हाथ रखा। “दीनानाथ जी, मुझे अपने बेटे के लिए कोई मॉडल या बिजनेस टाइकून की बेटी नहीं चाहिए। मुझे वो लड़की चाहिए जिसने अभाव में भी खुश रहना सीखा हो। जिसने देखा हो कि ईमानदारी की कीमत क्या होती है। आर्यन को भी मैंने यही संस्कार देने की कोशिश की है, लेकिन अमीरी की चकाचौंध में डर लगता है कि कहीं जड़ें न हिल जाएं। सुमन जैसी लड़की ही मेरे घर को, मेरे परिवार को बांध कर रख सकती है।”
दीनानाथ जी का गला रुंध गया। “सेठ जी, आपकी महानता है जो आप हमारी झोपड़ी में आए। पर… पर एक सच यह भी है कि मैं… मैं शादी में कुछ नहीं दे पाऊँगा। सुमन के लिए दो तोले सोने के गहने भी बनवाना मेरे लिए मुश्किल है। बरात का स्वागत, दावत… मैं आपकी हैसियत के हिसाब से कुछ नहीं कर सकूंगा। लोग हंसेंगे कि सिंघानिया साहब ने समधी भी चुना तो कैसा कंगाल।”
हर्षवर्धन जी ने गंभीरता से कहा, “शादी का सारा खर्चा मेरा होगा। आर्यन इकलौता बेटा है, मेरे अरमान हैं। आप बस कन्यादान कीजिएगा। मुझे दहेज में एक तिनका भी नहीं चाहिए। बस सुमन चाहिए।”
रिश्ता तय हो गया।
शादी का दिन आया। शहर के सबसे बड़े फाइव स्टार होटल में इंतज़ाम था। सजावट ऐसी कि आँखें चुंधिया जाएं। दीनानाथ जी ने अपनी जिंदगी की बची-खुची जमा पूंजी निकालकर सुमन के लिए एक साधारण सी लाल साड़ी और कुछ आर्टिफिशियल गहने खरीदे थे। उन्हें डर था कि वहां मौजूद हीरों के हारों के बीच उनकी बेटी की चमक फीकी न पड़ जाए।
होटल के गेट पर जब दीनानाथ जी और उनका छोटा सा परिवार पहुंचा, तो हर्षवर्धन जी ने आगे बढ़कर उन्हें गले लगाया। वहां मौजूद शहर के बड़े-बड़े रईस, नेता और व्यापारी कानाफूसी करने लगे।
“सुना है लड़की वाले एकदम फकीर हैं। सिंघानिया जी को क्या सूझी?”
“अरे, जरूर लड़की ने बेटे को फंसाया होगा।”
“देखो तो, समधी जी के कपड़े देखो, साफ़ पता चल रहा है कि रंगे हुए हैं।”
ये बातें दीनानाथ जी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं। वे सिकुड़ते जा रहे थे। मंडप सजा हुआ था। सुमन जब आई, तो आर्यन उसे देखता रह गया। उस साधारण लाल साड़ी में वह किसी देवी जैसी लग रही थी।
रस्में शुरू हुईं। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। अब समय आया ‘कन्यादान’ का।
यह वह पल होता है जब पिता अपनी बेटी का हाथ वर के हाथ में सौंपता है। परंपरा के अनुसार, इस रस्म में पिता को वर को कुछ न कुछ दान—सोना, चांदी या नकद—देना होता है।
पंडित जी ने कहा, “कन्यादान के लिए वर के हाथ पर कुछ द्रव्य (धन/सोना) रखिए।”
दीनानाथ जी का हाथ अपनी जेब की तरफ गया। उनकी जेब में एक छोटा सा, मखमली थैला था। उसमें उनकी माँ की दी हुई एक पुरानी, घिसी हुई चांदी की अंगूठी थी। यही उनकी आखिरी संपत्ति थी। उनकी आँखों से आंसू बहने लगे। उन्हें लगा कि अरबपति दामाद के हाथ पर यह काली पड़ी हुई चांदी की अंगूठी रखना उनका अपमान करने जैसा होगा। उनका हाथ कांप रहा था। वे जेब से हाथ निकाल ही नहीं पा रहे थे।
पूरा मंडप शांत था। सबकी नज़रें दीनानाथ जी के कांपते हाथों पर थीं। सावित्री जी ने नीचे गर्दन झुका ली थी।
तभी हर्षवर्धन जी ने आर्यन के कान में कुछ कहा। आर्यन ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
हर्षवर्धन जी माइक लेकर खड़े हो गए।
“पंडित जी, एक मिनट रुकिए,” हर्षवर्धन जी की भारी आवाज़ गूंजी। “आज कन्यादान के नियम थोड़े बदलेंगे।”
सब हैरान रह गए। दीनानाथ जी का दिल धक से रह गया। क्या रिश्ता टूट जाएगा?
हर्षवर्धन जी दीनानाथ जी के पास आए और उनके कंधे पर हाथ रखा। “समधी जी, आप जेब में क्या टटोल रहे हैं? वो चांदी की अंगूठी? या वो शगुन के ग्यारह सौ रुपये जो आपने बड़ी मुश्किल से जोड़े हैं?”
दीनानाथ जी पानी-पानी हो गए। उनका सर शर्म से झुक गया।
हर्षवर्धन जी ने माइक पर बोलना जारी रखा, “यहाँ मौजूद सभी लोग सुन लें। आज मेरे समधी, श्री दीनानाथ जी, इस शहर के सबसे अमीर आदमी हैं। आप लोग सोच रहे होंगे कैसे? क्योंकि इन्होंने अपनी ईमानदारी के लिए अपनी दौलत कुर्बान कर दी। आज की दुनिया में लोग दौलत के लिए ईमानदारी बेच देते हैं।”
फिर हर्षवर्धन जी ने दीनानाथ जी के कुर्ते की ऊपर वाली जेब की तरफ इशारा किया।
“दीनानाथ जी, मैंने देखा है कि आप अपनी ऊपर वाली जेब में हमेशा एक रुपये का सिक्का रखते हैं। वो सिक्का, जो आपने अपनी पहली मेहनत की कमाई से बचाया था, जब आप सिर्फ 15 साल के थे। आपने मुझे बताया था कि वो सिक्का आपका ‘लकी चार्म’ है, आपके स्वाभिमान का प्रतीक है।”
दीनानाथ जी ने चौंक कर हर्षवर्धन जी को देखा। उन्हें याद आया कि पहली मुलाकात में बातों-बातों में उन्होंने यह जिक्र किया था।
हर्षवर्धन जी ने अपना हाथ फैला दिया। “आज कन्यादान में मुझे न सोना चाहिए, न चांदी, न वो अंगूठी। मुझे वो एक रुपये का सिक्का चाहिए। क्योंकि वो सिक्का सिर्फ धातु नहीं है, वो आपके पसीने, आपके संघर्ष और आपके उस अटूट स्वाभिमान का प्रतीक है, जिसके आगे मेरी करोड़ों की दौलत भी फीकी है। मैं चाहता हूं कि मेरे घर में जो लक्ष्मी (सुमन) आ रही है, उसके साथ वो ‘स्वाभिमान’ भी आए।”
मंडप में सन्नाटा छा गया। वो कानाफूसी करने वाले रिश्तेदार, वो दहेज के लोभी समाज के लोग—सबकी बोलती बंद हो गई थी।
दीनानाथ जी के कांपते हाथों ने अपनी जेब से वो पुराना, घिसा हुआ एक रुपये का सिक्का निकाला। आर्यन ने अपने दोनों हाथ आगे कर दिए, जैसे कोई प्रसाद ले रहा हो।
दीनानाथ जी ने वो सिक्का आर्यन की हथेली पर रखा और सुमन का हाथ उसके ऊपर रख दिया।
“मैं… मैं अपनी जान, अपनी गुड़िया तुम्हें सौंप रहा हूं आर्यन बेटा। इसके पास दौलत नहीं है, पर संस्कार बहुत हैं,” दीनानाथ जी फूट-फूट कर रो पड़े।
आर्यन ने वो सिक्का अपनी शेरवानी की जेब में ऐसे रखा जैसे कोई हीरा रख रहा हो। उसने झुककर दीनानाथ जी के पैर छुए। “बाबूजी, यह सिक्का आज से मेरी तिजोरी की सबसे कीमती चीज होगी। यह मुझे हमेशा याद दिलाएगा कि मुझे सुमन का ख्याल एक पति की तरह नहीं, बल्कि आपकी तरह रखना है—पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी से।”
हर्षवर्धन जी ने सावित्री जी के हाथ जोड़कर कहा, “भाभी जी, रोइए मत। आप बेटी विदा नहीं कर रहीं, बल्कि एक बेटे को गोद ले रही हैं।”
विदाई के वक्त, जब सुमन मर्सिडीज में बैठ रही थी, तो उसने देखा कि उसके पिता का सिर अब झुका हुआ नहीं था। उनका सीना गर्व से चौड़ा था। वो एक रुपये का सिक्का, जो दुनिया की नजर में शायद कुछ नहीं था, उसने आज दो परिवारों के बीच एक ऐसा पुल बना दिया था जो सोने-चांदी से कभी नहीं बन सकता था।
सिंघानिया विला में जब सुमन का गृह-प्रवेश हुआ, तो हर्षवर्धन जी ने अपनी तिजोरी खोली। उसमें हीरे-जवाहरात के डिब्बे थे। उन्होंने सबसे ऊपर, एक मखमली गद्दी पर, उस एक रुपये के सिक्के को सजाया।
उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, “देखो, आज हमारे घर में असली ‘खालिस सोना’ आया है। दौलत तो आती-जाती रहेगी, लेकिन यह सिक्का हमारी आने वाली पीढ़ियों को बताएगा कि एक पिता का स्वाभिमान दुनिया के किसी भी दहेज से बड़ा होता है।”
सुमन ने यह देखा और मन ही मन अपने पिता को नमन किया। गरीबी ने उसके पिता से सब कुछ छीना था, लेकिन आज उसी गरीबी और ईमानदारी ने उन्हें दुनिया का सबसे अमीर पिता बना दिया था।
मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल