“अब तो यही दिन देखना बाकी रह गया था!” — बड़ी बहू रागिनी घर में घुसते ही जोर से बोली।
रविवार की शाम थी, सभी लोग घर पर ही थे।
“अब क्या हो गया? क्यों सबकी शाम खराब कर रही हो?” — गुस्से से अंकित ने रागिनी से पूछा।
“इतने दिन तक तो मैंने मुंह पर कुछ नहीं कहा, पर अब मुझसे यह रोज-रोज का नाटक नहीं देखा जाता। मोहल्ले में भी मेरी इज्जत खराब कर रहे हैं मम्मी-बाबूजी के कारण,” — रागिनी ने कहा।
“भाभी, क्या हुआ है? यह तो बताइए, आप तो बस पहेलियां ही बुझा रही हैं,” — देवर विपिन बोला।
इतने में देवरानी शिवानी भी रसोई से बाहर आ चुकी थी।
“अभी सब्जी लेने गई थी तो देखा, बाबूजी मम्मी का हाथ पकड़कर पार्क से वापस लौट रहे हैं और आज पड़ोस वाले मुंह नीचे करके हंस रहे थे,” — शिवानी ने कहा।
विमला जी भी बोलीं, “मुझे बताओ, इस उम्र में यह सब क्या अच्छा लगता है? मैं तो इस बात पर चुप ही हो गई। जब से रिटायर हुए हैं बाबूजी, तेवर ही बदल गए हैं। और मम्मी भी नई-नवेली दुल्हन की तरह हर समय शर्माती रहती हैं। घर में बच्चे हैं, उन पर कितना बुरा असर पड़ता है,” — रागिनी ने उत्तर दिया।
आग तो लगी हुई थी, उसमें घी डालते हुए शिवानी भी बोली, “हां, यह बात तो ठीक है। अभी परसों शाम की ही तो बात है, बाबूजी रसोई से तेल गरम करके मम्मी के घुटनों की मालिश कर रहे थे। वह तो मैं जब चाय देने गई तो मम्मी झटके से बैठ गईं, परंतु बाबूजी समान व्यवहार ही कर रहे थे, मानो कुछ हुआ ही न हो।”
अभी बातें चल ही रही थीं कि पीछे से राजेश जी और निर्मला जी सैर करके वापस आ गए। शिवानी की बात उनके कानों में पड़ चुकी थी। कुछ कहे बिना, चुपचाप आकर वे भी सोफे पर बैठ गए कि अचानक बड़ा बेटा अंकित बोला—
“पापा, यह क्या नाटक चल रहा है? आजकल लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?”
इतना कहते ही राजेश जी गुस्से से बोले, “नाटक मुझे बताओ! अपनी बीवी का ध्यान रखना इसे नाटक कहते हैं? मैं इतने वर्षों तक अपने दफ्तर के काम में उलझा रहा, कभी तुम्हारी मम्मी के स्वास्थ्य की ओर ध्यान ही नहीं दिया। मुझे लगा कि वह खुश है, और जब से दो-दो बहुएं आई हैं, तो तुम्हारी मां की देखभाल कर रही होंगी। और जब भी उसको रसोई में लगा देखता, तो यही सोचता था कि शरीर चलता रहे, इसलिए कामकाज में लगी रहती हैं।
परंतु रिटायरमेंट के बाद पिछले चार महीनों में मैंने पहली बार महसूस किया कि वह बेचारी तो शरीर में जान होते हुए भी बहुओं के डर से रसोई में काम करती है, ताकि बुढ़ापे में उसे कोई दो प्यार के बोल बोल सके।
शिवानी बेटा, जो तुम तेल की बात कह रही हो—मैंने खुद निर्मला को तीन दिन पहले तुम दोनों को यह कहते हुए सुना था कि ‘एक बार तेल गरम करके मेरे घुटनों की मालिश कर दो’—परंतु तुम दोनों बहुओं ने अनसुना कर दिया। वह तुम्हारी सास है, तुमने उसकी बात अनसुनी कर दी, परंतु मेरी तो पत्नी है, जिसने पूरी उम्र अच्छे और बुरे समय में मेरा साथ दिया है। उसको मैं कैसे छोड़ देता? बल्कि मुझे तो इन चार महीनों में जिंदगी का एक ऐसा सबक मिला है कि काश मैंने शुरू से ही निर्मला की सेहत का ध्यान रखा होता, तो शायद आज इनका स्वास्थ्य और अधिक अच्छा होता।
आज तुम लोगों को मेरे मालिश करने पर यह नाटक लगता है या बेशर्मी? बताओ, क्या घर में पत्नी पति की सेवा कर सकती है, तो बीमारी में पति पत्नी की सेवा नहीं कर सकता क्या?
और रही बात हाथ पकड़कर आने की—तो अभी पार्क में चलते-चलते उसके घुटनों का दर्द बढ़ गया था, इसलिए मैंने अपनी पत्नी का हाथ थामा। पत्नी का हाथ थामने में शर्म कैसी? यदि समाज इस पर हमारी हंसी भी उड़ाता है, तो मैं शर्मसार नहीं हूं। यदि तुम लोगों को हमारे साथ में शर्म आती है, तो अपना सामान उठाकर कहीं और रहने का इंतजाम कर लो। ईश्वर की दया से मेरे बाद भी मेरी पेंशन इतनी आएगी कि तुम्हारी मां सर उठाकर जी सके।”
राजेश जी के कड़वे मगर सच्चे बोल अंदर तक सभी बच्चों को हिला गए। जानते थे कि उनके पिताजी कितने इरादों के पक्के हैं, यदि उन्होंने ठान लिया तो उनको इस घर में नहीं रहने देंगे।
अचानक ही सबके तेवर बदल गए। बहुत देर से चुप निर्मला जी बोलीं—
“अंकित और विपिन, मैं तुम्हें आज सिर्फ एक ही सबक देना चाहती हूं कि पति-पत्नी एक ही गाड़ी के दो पहिए होते हैं। परंतु अक्सर पति अपने काम में व्यस्त होने के कारण पत्नियों की ओर ध्यान नहीं दे पाते। मैं तो कहूंगी, तुम दोनों भी रागिनी और शिवानी का उसी प्रकार ध्यान रखना शुरू करो, जैसे तुम्हारे पिताजी मेरा रख रहे हैं, ताकि तुम्हारे रिश्तों की मिठास और गहरी हो, और तुम लोगों का रिश्ता न टूटे। हम स्त्रियां पूरी उम्र बस अपने पतियों के प्यार के दो मीठे बोल और साथ बिताए पलों के लिए ही तरसती हैं।”
निर्मला जी की बात सुनकर, दिल से रागिनी और शिवानी के आंसू निकल आए। जिस सास और ससुर को कोस रही थीं, वही सास अपने बेटे को अपनी बहू की सेवा और उनका ध्यान रखने को कह रही थी। झट से आकर गले लगकर बोलीं—
“मम्मी, हमें माफ कर दो। आज हमारी आंखें खुल गई हैं।”
राजेश जी ने चुटकी लेते हुए कहा, “अब तुम भी अपना नाटक बंद करो और जाओ, हम दोनों के लिए बढ़िया सी गरम-गरम अदरक वाली चाय बनाकर लाओ। मौसम भी तो देखो, बारिश होने वाली है। मैं और तुम्हारी मम्मी बाहर लगे झूले पर बैठकर चाय का लुत्फ उठाएंगे।”
राजेश जी की बात पर सभी लोग खिलखिला कर हंस पड़े। आज राजेश जी के कठोर मगर सत्य वचनों ने घर में सबकी आंखें खोल दी थीं।