आओ जीजी आओ..! कब से तुम्हारी ही राह तक रही हूं, बेटी की शादी और उसकी इकलौती मासी सबसे आखिर में पहुंच रही है.. सरला जी ने कहा
मालती जी: हां अब मेरी ऐसी किस्मत कहां है? जब मन करे, जहां मन करे जब चाहे चली जाओ! हम औरतों का जीवन भी बड़ा विचित्र होता है, बचपन में माता-पिता के अनुसार चलो, फिर शादी के बाद पति के अनुसार और बुढ़ापे में बेटों के अनुसार, तो बेटों की इजाजत आज मिली और आ गई, यह बोलते हुए उनकी आंखें छलछला आई!
सरला जी: जीजी! तुम बड़ी भोली और सीधी हो, तभी आज तुम्हारी ऐसी दुर्दशा है, जीजा जी ने घर, उनकी दुकान और सारी संपत्ति, तुम्हारे नाम ही करके दी थी, पर तुम्हें उस वक्त अपने ममता पर ज्यादा भरोसा था,
जिसकी कीमत अभी चुका रही हो। फिर किस्मत का क्या दोष? ज़माना अब भी बड़ा खराब है, बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया यह कहावत ऐसे ही नहीं बनी। खैर यह सब छोड़ो और यह बताओ तुम्हारे दोनों साहबजादे कब आएंगे? सच कहूं जीजी? तुम्हारी वजह से मैं चुप रह जाती हूं,
वरना उन दोनों को ऐसा सुनाऊं की मासी के कहर का पता चले, मां भोली मिल गई है ना तो बड़ा बन रहे हैं, मेरे जैसी मां मिलती तो पता चलता, ऐसे बच्चों से तो अच्छा है औरत बांझ ही रहे। पर जीजी, एक बात, तुम पहले तो ऐसी ना थी, घर में यूही तुम्हें लड़ाकू विमान नहीं कहते थे, पर अचानक यह अबला नारी क्यों?
मालती जी: बुढ़ापा बहन बुढ़ापा! पर तू शांत हो जा बहन, बेटी का ब्याह है उस पर ध्यान दें, यह सारी बातों पर अपना दिल ना जला, वैसे भी बेटों का क्या दोष? यह सारी आफत तो बहुओ की ही देन है, आते ही बेटों को अपने कब्जे में ले लेती है, बूढ़े सास ससुर तो उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाते।
सरला जी: नहीं जीजी! यह मैं नहीं मानती? अगर बेटों में रीड की हड्डी होती तो ऐसे ही किसी के बहकावे में नहीं आते, यह तो सास को हर हाल मैं बहू ही गलत लगती है।
मालती जी: हां! यह बात तब पूछूंगी जब तेरी भी बहू आएगी। अब तू नहीं समझेगी। यह सब छोड़, थोड़ा चाय पिला दे। जब से आई हूं, तब से बस भाषण ही दिए जा रही है, यह नहीं की जीजी सफर से आई है थोड़ा चाय ठंडा ही पूछ ले पहले।
सरला जी: अरे माफ करना जीजी! बातों बातों में भूल ही गई। रुको अभी लाती हूं, तुम चलो रानो के कमरे में ही तुम रहना। थोड़ा सुस्ता भी लेना, मैं चाय नाश्ता वही भिजवाती हूं।
सरला जी की बेटी रानो की शादी 2 दिन बाद थी, जिसके लिए वह अपनी बड़ी बहन मालती जी को 15 दिनों पहले ही आने को कहती है, पर वह आज आ पाई, अब तक कहानी पढ़ कर आपको इतना तो पता लग ही गया होगा कि, मालती जी का देर से आने का कारण क्या है, और सरला जी भी इस बात पर ही बिगड़ भी रही थी। मालती जी के दो बेटे थे रवि और नवीन। वे शादी वाले दिन ही आने वाले थे। पिता के रहते सिर्फ रवि की ही शादी हुई थी राधिका के साथ और पिता के गुजरने के 2 साल बाद नवीन की शादी हुई रिद्धिमा के साथ। मालती जी के पति की किराने की दुकान थी, जो अब दोनों बेटे चलाते थे, दुकान अच्छी चलती थी और इलाके की सबसे बड़ी दुकान भी थी। बहरहाल उनकी माली हालत काफी अच्छी थी। मालती जी के पति को कैंसर हो गया था, इसलिए अपनी स्थिति को समझते हुए वे अपनी जायदाद मालती जी के नाम कर गए थे। पहले पहल मालती जी और रवि दुकान संभालता फिर नवीन के काबिल होते ही मालती जी ने इन सब का भार दोनों बेटों के कंधे पर छोड़, आराम करने को सोचने लगी और धीरे-धीरे वह बोझ बन गई, जैसा कि आजकल देखने को मिलता है। खैर कहानी में आगे बढ़ते हैं…
शादी वाले दिन सुबह से ही घर में रिश्तेदारो के आगमन होने लगे। मालती जी के बेटे बहू भी आ गए, उनके आते ही सरला जी ने कहा, वाह बहन की शादी और भाई भाभी मेहमानों की तरह पधार रहे हैं। भाई तुमलोग अगर काम की डर से पहले नहीं आए तो बता दूं, हर काम के लिए तुम्हारे मौसा जी ने लोग लगाए हुए हैं, तुम्हें तो बस उनके सहयोग के लिए बुला रहे थे। पर जो बेटे अपने मां के काम ना आए वह मासी के क्या ही काम आएंगे? ऐसा बोलते ही मालती जी ने अपनी आंखों से इशारा कर सरला जी को चुप कर दिया। सरला जी अब आगे बोलती है, जाओ बहू, ऊपर का कमरा तुम लोगों के लिए तैयार करवाया है, सारे सामान लेकर वही चली जाओ और रवि और नवीन तुम्हारे मौसा जी तुम्हें कैटरिंग वाली जगह पर बुला रहे हैं, सबके जाने के बाद मालती जी सरला जी से कहती है, तू क्यों मेरा तमाशा बनाना चाहती है? यह अभी यहां कुछ नहीं कहेंगे पर घर जाकर मुझ पर बरस पड़ेंगे और शादी पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है, तो बहन दिमाग ठंडा रख और चुप रह थोड़ा। थोड़ी देर बाद, सरला जी ऊपर वाले कमरे में जाती है ताकि बहू को कुछ रस्में बता सके, पर जैसे ही वह दरवाजे तक पहुंची तो मालती जी के चिल्लाने की आवाज़ आने लगी, उन्हें लगा ज़रूर बहू ने फिर कुछ किया होगा, पर अगले ही पल सरला जी कुछ ऐसा सुनती है जिससे उनका सारा भ्रम दूर हो गया। उन्होंने सुना मालती जी बहू से कह रही है, तुम लोग यह हल्की साड़ियां लाई हो शादी में पहनने के लिए? यहां मेरी नाक कटवाने का पूरा इरादा बनाकर आई हो ना? सब समझती हूं मैं!
राधिका: मम्मी जी! सारी भारी साड़ियां तो अपने अलमारी में बंद रखा है और चाबी भी हमें देकर नहीं आई, तो जो हमारे पास था वही लेकर आ गई।
मालती जी: हां तो अगर मैं सारी चीजों का हिसाब ना रखूं, तो तुम लोगों के तो पर ही लग जाएंगे। मेरे पति की मेहनत से कमाया हुआ सारा धन यूं ही उड़ा डालोगे और तुम लोगों का क्या भरोसा मेरे जाने के बाद पता नहीं कहां क्या-क्या करो? अजीब मुसीबत है तुम लोगों पर तो घर भी छोड़कर नहीं आ सकती और सुनो रीनों की विदाई के बाद शायद सरला मुझे रोके, पर तुम लोग कहना की मम्मी जी को हम लेकर ही जाएंगे, यह वह बहाना बना देना और हां रवि और नवीन से भी कह देना के वह मुझे ले जाने को कहे, तुम लोगों के लिए भारी साड़ियां और गहने मैं लेकर आई हूं, वही पहन लेना और फिर वापस मेरे पास ही दे देना।
सरला जी को तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था। आज तक जिस बहन को वह बेचारी समझ रही थी, वह तो तानाशाह निकली, बेचारी तो बहुएं है। शायद यही वजह रही होगी कि गांव की सीधी शादी लड़कियों को अपने घर की बहु बनाने की। कमाल की बात है मैं बहन होकर भी अपनी जीजी को नहीं जान पाई? जीजी ने बचपन से ही अपनी एक गुड़िया पर भी किसी को हक जताने नहीं दिया, वह आज बहू के अत्याचार सहेगी? यह सोच भी कैसे लिया मैंने? पर आज अगर इन बहूओ के लिए कुछ ना किया तो यह बात मुझे ताउम्र कचोटेगी, यही सोचते हुए सरला जी वहां से चली गई। रानो की शादी होने के बाद, विदाई की बेला चल रही थी, तभी सरला जी रानों से कहती है, बेटा सास ससुर की खूब सेवा करना, उनकी हर बात मानना, पर अपना हक कभी ना छोड़ना। जहां तुम्हें लगे कि कोई तुम्हारा इस्तेमाल कर रहा है, उसे वही समझा देना। क्योंकि त्याग का महत्व तभी होगा जब सामने वाला उसकी कद्र करेगा। ना कि वह तुम्हारे त्याग को अपना अधिकार मान लेगा। सास को मां ही मानना पर तानाशाह लगे तो तुम्हें लाचार बनकर रहने की कोई ज़रूरत नहीं।
मालती जी: तुम यह सब क्या सीखा रही हो रानो को? घर जोड़ने की जगह तोड़ने की बातें कर रही हो?
सरला जी: क्या करूं जीजी? उसे क्या पता कि तुम्हारी जैसी सास मिल जाए तो क्या करना है? इसलिए पहले से ही उसे चेता रही हूं, ताकि वह घबराने की जगह बुद्धि से काम ले।
मालती जी: मेरी जैसी से क्या मतलब है तेरा सरला?
सरला जी: अब तक बहुत भोली और बेचारी का ढोंग कर लिया, पर अब तुम्हारी सारी पोल खुल गई है मेरे सामने, पता है यह जो तुम तानाशाह बनकर अपनी हुकूमत चला रही हो ना? इसका नतीजा यह होगा कि जब बिस्तर पर सेवा का इंतजार करोगी, दुत्कार के अलावा कुछ ना मिलेगा, क्योंकि लोग गुलामी की जिंदगी तब तक ही जीते हैं जब तक तानाशाह के शरीर में जोर रहता है, जैसे ही वह जोर खत्म, तुम्हारे मरने का इंतजार किया जाता है। अरे बहुंए तो ऐसे ही बदनाम है, सास ने बुढ़ापे लिहाज कर लिया होता तो शायद आज सास बहू का रिश्ता कुछ अलग ही होता। पता नहीं जीजी ऐसे क्यों होता है? सास अच्छी हो तो बहु बुरी मिल जाती है और बहु सीधी हो तो सास चालक निकल जाती है, अब भी वक्त है सुधर जाओ! वरना तुम्हारे भी स्वर्ग सिधरने की दुआ मांगी जाएगी।
मालती जी तो खामोश नज़रें झुकाए खड़ी थी, राधिका और रिद्धिमा के आंखों में भी आंसू थे, शायद आज मासी जी ने उनके दिल का हाल बयां कर दिया था।
फिर मालती जी कहती है, आज तूने मेरी आंखें खोल दी सरला! कसम है, अब से मैं अपनी बहू को बेटी की तरह रखूंगी और तुम दोनों हो सके तो मुझे माफ कर दो, गलत सास मिल गई तुम्हें, पर और गलती नहीं होगी।
इन सब के बाद रानो कहती है, मां भाभियों को इंसाफ दिलाने के चक्कर में, मुझे तो आपने अनजाने में तलवार ही थमा दिया, जिससे मुझे एक पल के लिए लगा, मैं ससुराल नहीं जंग ए मैदान पर जा रही हूं, जहां जाते ही मुझे चढ़ाई करनी है, सभी एक साथ हंस पड़े। विदाई का भावुक माहौल हंसी की ठहाको से गूंज पड़ा।
धन्यवाद
रोनिता
#मेरी ऐसी किस्मत कहां?