संतुलन – एम. पी. सिंह 

अशोक और आशा कि शादी को ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे कि ननद भाभी मैं शीत युद्ध शुरू हो गया. ननद कोमल वैसे तो भाभी कि हमउम्र और पड़ी लिखी थी, पर माँ और भाई का आशा कि प्रति प्यार सहन नहीं हो रहा था. कोमल रोज़ शाम को भाई से भाभी कि शिकायत करती और आशा रात को कोमल कि शिकायत करती. अशोक काफ़ी परिपक और सुलझा हुआ

इंसान था, समझ गया कि दोनों कि आपस मैं पटरी नहीं बैठ रही, इसलिए जल्दी ही कोमल के लिए कोई अच्छा लड़का ढूंढकर शादी करनी होंगी. आशा और कोमल दोनों दिखावे के लिए मिल जुल कर रहती और एक दूसरे को कभी किसी बात पर नहीं टोकती. अशोक ने ठान लिया कि जब तक कोमल की शादी होती,

तब तक दोनों के दिलो मैं एक दूसरे के लिए प्यार और सम्मान पैदा करके रहेगा. शाम को ऑफिस से आते हुए अशोक कोमल कि पसंद कि कोई मिठाई ले आता और कोमल को खुश देखकर बोलता, तेरी भाभी ने कहा था कि कोमल को पसंद है, येही मिठाई लेकर आना.

अगले दिन समोसा लेकर आता तो आशा से कहता कि कोमल बोली थी कि भाभी को समोसे पसंद है, ले आना, सो ले आया. फिर अशोक कहता, वैसे समोसे लाने के लिए तुम भी कह सकती थी. अशोक और आशा जब बाजार जाते तो कोमल के लिए कुछ न कुछ जरूर लाते.

कई बार तो आशा को भी पता नहीं होता और अशोक गिफ्ट ले आता कोमल के लिए. जब कोमल पूछती, कि इसमें क्या है, तो अशोक बोलता, पता नहीं, तेरी भाभी लाई थी तेरे लिए. चलो खोलो, में भी देखूंगा क्या है. ऐसे ही कुछ गिफ्ट बो आशा हो भी देता, कोमल के नाम से.

एक दिन अशोक ऑफिस में अपने एक साथी से बातें करते हुए बोल बैठा की कोई अच्छा लड़का को तो बताये उसकी बहन के लिए. ये सुनकर उसका दोस्त बोला, डिटेल्स और चॉइस बता दो, कुछ करता हूँ. कोमल की सारी डिटेल्स लेकर उसका दोस्त कुछ दिन बाद अशोक को मिला और एक फोटो दी और बोला, डिटेल्स पीछे लिखी है,

पसंद हो तो बताना, आगे बात बढ़ा दूंगा. अशोक ने कोमल और बाकी लोगों से बात करके लड़के वाली से मिलने का फैसला किया. अशोक ने लड़के वालों से मिलने की इच्छा जताई तो उसका दोस्त बोला, ये मेरा ही छोटा भाई कुणाल है, जब और जहाँ कहो मिलवा दुगा.

अशोक ने लड़के वाले को घर पर बुलाया और बात आगे बढ़ाई.

 बातो बातो मे पता चला कि कुणाल आशा के कॉलेज मे ही पढ़ता था और उसका सीनियर था. बात पक्की हो गई और दोनों की धूमधाम से शादी हो गई . इस शादी से कोमल बहुत ख़ुश थी, फोन पर बस पति और ससुराल के ही गुण गाती रहती. कोमल शादी के बाद पहली बार मायके आई तो उसे ख़ुश देखकर अशोक भी बहुत खुश था. कोमल जब कुणाल की तारीफों के पुल बांध रही थी, तो अशोक बोला

तुझे एक बात बताऊ, तेरी इस खुशी का सारा श्रेय तेरी भाभी को जाता है, क्योंकि ये रिश्ता तेरी भाभी ने बताया था. इतना सुनकर कोमल भाग कर भाभी के पास गई और गले मिलकर रोने लगी और बोली, भाभी, आप बहुत अच्छी हो, मुझे माफ कर दो, में आपको बहुत गलत समझ रही थी. आशा बोली,

पगली, ये तेरे रोने का नहीं बल्कि खुश होने का समय है. कोमल के दिल मे भाभी के लिए आदर सम्मान भर गया और सारा गुस्सा पिगल गया. अशोक दूर खड़ा दोनों को देखकर मुस्कुरा रहा था. 

उस दिन के बाद से ननंद भाभी का रिस्ता 2 बहनो के रिश्ते मे बदल गया, जिसका पूरा श्रय अशोक को जाता है.

साथिओं, कभी कभी ननंद भाभी के रिश्ते अहम और वहम के कारण धुंधले हो जाते है, इस रिस्ते तो जोड़ने वाले पुल के एक किनारे पर पत्नी और दूसरे पर बहन खडी होती है. वो दोनों को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता. इसलिए समझदारी के साथ दोनों में संतुलन बनाकर एक दूसरे की गलतफहमी को दूर करके सबका जीवन खुशहाल बनाने में ही समझदारी है..

क्या अशोक ने पति और भाई दोनों का फर्ज निभाना, अपनी राय जरूर दें.

लेखक

एम. पी. सिंह 

(Mohindra Singh )

स्वरचित, अप्रकाशित 

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