निर्मला देवी और सुमित, शालिनी का यह रूप देखकर सन्न रह गए। निर्मला देवी ने चिल्लाते हुए कहा, “जुबान लड़ा रही है तू मुझसे? ये हैं तेरे संस्कार?”
“संस्कार!” शालिनी की आँखों से आंसू छलक पड़े, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। “संस्कारों की बात आप मत ही कीजिए माँ जी। जब मैं इस घर में आई थी, तो आपने मुझे संस्कारों, रिवाजों, और शर्म-हया की न जाने कितनी बेड़ियाँ पहना दी थीं। ‘बहू को जोर से नहीं हंसना चाहिए’, ‘बहू को मायके की ज्यादा याद नहीं करनी चाहिए’
, ‘बहू को पति की हर गलती पर पर्दा डालना चाहिए’। मैंने ये सारी बेड़ियाँ खुशी-खुशी पहन लीं, क्योंकि मुझे लगा कि यही इस घर का नियम है। लेकिन मुझे एक बात बताइए माँ जी, क्या ये नियम सिर्फ मेरे लिए थे? क्या संस्कारों की ज़रूरत सिर्फ एक बहू को होती है, बेटे को नहीं?”
बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, लेकिन घर के भीतर का माहौल किसी सुलगती हुई भट्टी से कम नहीं था। जैसे ही शालिनी ने घर की चौखट पर कदम रखा, हॉल में सोफे पर बैठी उसकी सास, निर्मला देवी की तीखी आवाज ने उसका स्वागत किया। “आ गई महारानी? जब तुम्हें पता था
कि सुमित तुम्हें लेने आने वाला है, तो तुम अपने भाई के साथ क्यों चली आईं? क्या मायके जाते ही ससुराल के सारे कायदे-कानून भूल जाती हो? या तुम्हारी माँ ने तुम्हें यही सिखाया है कि ससुराल वालों की बातों को जूती की नोक पर रखो और अपनी मनमानी करो?”
शालिनी के हाथ में पकड़ा हुआ बैग वहीं फर्श पर छूट गया। पिछले दो सालों से वह इस घर की हर छोटी-बड़ी बात बर्दाश्त करती आ रही थी। सुमित से उसकी शादी बड़े अरमानों के साथ हुई थी, लेकिन ससुराल की दहलीज पार करते ही उसे एहसास हो गया था
कि इस घर में बहू को एक इंसान नहीं, बल्कि नियमों से बंधी एक मशीन समझा जाता है। उसे कब उठना है, क्या पहनना है, मायके वालों से कितनी देर फोन पर बात करनी है, ये सब निर्मला देवी तय करती थीं। और उसका पति सुमित? वह तो बस अपनी माँ का आज्ञाकारी बेटा था, जिसे शालिनी की भावनाओं या उसकी तकलीफों से कोई खास सरोकार नहीं था।
आज शालिनी अपने पिता के रिटायरमेंट की एक छोटी सी पूजा में शामिल होने मायके गई थी। तय हुआ था कि सुमित शाम को ऑफिस के बाद उसे लेने आएगा। शालिनी और उसके पिता रात आठ बजे तक सुमित का इंतज़ार करते रहे।
जब शालिनी के पिता ने सुमित को फोन किया, तो सुमित अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा था। सुमित ने फोन पर शालिनी के पिता से बेहद बदतमीजी से बात की और कहा, “अरे अंकल! आप लोग अपनी बेटी को सिर पर चढ़ा कर रखते हैं। मेरा जब मन करेगा मैं आ जाऊंगा, मुझे कोई टाइम टेबल मत समझाइए। मैं आपका दामाद हूँ, कोई नौकर नहीं।”
अपने बूढ़े पिता का यह अपमान शालिनी से बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने तुरंत अपने छोटे भाई को स्कूटी निकालने को कहा और खुद वापस ससुराल आ गई।
और यहाँ आते ही, बजाय सुमित की गलती पर बात होने के, उल्टे शालिनी के संस्कारों पर सवाल उठाए जा रहे थे। पास ही खड़ा सुमित भी अपनी माँ की बातों में सुर मिलाते हुए कह रहा था, “सही तो कह रही हैं माँ। जब मैंने कहा था कि मैं आऊंगा, तो तुम्हें इतनी आग क्यों लगी थी आने की? तुम्हारी वजह से आज मुझे अपने दोस्तों के बीच से उठकर आना पड़ा, और ऊपर से तुम्हारी ये मायके वाली अकड़!”
सुमित के ये शब्द सुनते ही शालिनी के अंदर सालों से दबा हुआ ज्वालामुखी फट पड़ा। जो शालिनी हमेशा सिर झुकाकर हर ताना सुन लेती थी, आज उसने अपनी नजरें उठाईं और सीधे निर्मला देवी की आँखों में देखते हुए बोली, “माँ जी, मेरी माँ ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। उन्होंने मुझे सिखाया था कि ससुराल को अपना घर मानना, बड़ों की इज्जत करना और रिश्तों को जोड़ कर रखना। और यही वजह है कि पिछले दो सालों से मैं आपके हर ताने, हर बंदिश को चुपचाप सहती आ रही हूँ। लेकिन आज मुझे लगता है कि मेरी माँ की दी हुई शिक्षा अधूरी रह गई, क्योंकि उन्होंने मुझे अन्याय सहना नहीं सिखाया था।”
निर्मला देवी और सुमित, शालिनी का यह रूप देखकर सन्न रह गए। निर्मला देवी ने चिल्लाते हुए कहा, “जुबान लड़ा रही है तू मुझसे? ये हैं तेरे संस्कार?”
“संस्कार!” शालिनी की आँखों से आंसू छलक पड़े, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। “संस्कारों की बात आप मत ही कीजिए माँ जी। जब मैं इस घर में आई थी, तो आपने मुझे संस्कारों, रिवाजों, और शर्म-हया की न जाने कितनी बेड़ियाँ पहना दी थीं। ‘बहू को जोर से नहीं हंसना चाहिए’, ‘बहू को मायके की ज्यादा याद नहीं करनी चाहिए’, ‘बहू को पति की हर गलती पर पर्दा डालना चाहिए’। मैंने ये सारी बेड़ियाँ खुशी-खुशी पहन लीं, क्योंकि मुझे लगा कि यही इस घर का नियम है। लेकिन मुझे एक बात बताइए माँ जी, क्या ये नियम सिर्फ मेरे लिए थे? क्या संस्कारों की ज़रूरत सिर्फ एक बहू को होती है, बेटे को नहीं?”
सुमित ने गुस्से से आगे बढ़ते हुए कहा, “शालिनी, अपनी हद में रहो! तुम मेरी माँ से इस तरह बात नहीं कर सकती।”
“तुम भी चुप रहो सुमित!” शालिनी ने हाथ उठाते हुए सुमित को रोक दिया। “आज मुझे बोलने दो। आज तुम्हारी माँ पूछ रही हैं न कि मैं अपने भाई के साथ क्यों आई? तो सुनिए माँ जी! आपका ये संस्कारी बेटा आज शाम को दोस्तों के साथ बैठकर शराब पी रहा था। जब मेरे बूढ़े पिता ने इसे प्यार से फोन करके पूछा कि बेटा तुम कब तक आओगे, तो आपके इस बेटे ने उन्हें जलील किया। उन्हें याद दिलाया कि ये उनका दामाद है। क्या यही संस्कार दिए हैं आपने अपने बेटे को? कि दामाद बन जाने के बाद एक लड़के को अपने से बड़े बुजुर्गों का अपमान करने का लाइसेंस मिल जाता है?”
निर्मला देवी का चेहरा पीला पड़ गया। सुमित की आँखें भी शर्म से झुकने लगीं, लेकिन शालिनी रुकने वाली नहीं थी।
“हमारे समाज की यही सबसे बड़ी विडंबना है माँ जी,” शालिनी का गला रुंध गया था पर उसके शब्दों में आग थी। “जब एक लड़की की शादी होती है, तो उसे हजार नसीहतें दी जाती हैं। उसे बताया जाता है कि अब उसे कैसे एक आदर्श पत्नी और संस्कारी बहू बनना है। लेकिन जब एक लड़का शादी करता है, तो क्या उसे कोई बताता है कि एक अच्छा पति कैसे बना जाता है? किसी का दामाद बनने के बाद उसकी क्या जिम्मेदारियां होती हैं? नहीं! क्योंकि हमारे दकियानूसी समाज ने लड़कों को हमेशा एक ऊंचे पायदान पर खड़ा कर दिया है। लड़का चाहे कितना भी बदतमीज क्यों न हो, दामाद बनते ही वो भगवान बन जाता है। उसके लिए कोई नियम नहीं, कोई मर्यादा नहीं। वो अपनी पत्नी के माता-पिता का चाहे जितना अपमान करे, उसकी गलती को ‘दामाद का गुस्सा’ कह कर टाल दिया जाता है। लेकिन अगर एक बहू अपने आत्मसम्मान के लिए एक शब्द भी बोल दे, तो उसके पूरे मायके के संस्कारों को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।”
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया था। शालिनी के एक-एक शब्द किसी हथौड़े की तरह निर्मला देवी और सुमित के अहंकार पर चोट कर रहे थे।
“माँ जी,” शालिनी ने एक गहरी सांस ली और अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, “मैं आज भी आपका और सुमित का पूरा सम्मान करती हूँ। लेकिन सम्मान का मतलब गुलामी नहीं होता। अगर आप मुझसे उम्मीद करती हैं कि मैं आपके परिवार की इज्जत करूँ, तो आपको और आपके बेटे को भी मेरे माता-पिता की इज्जत करनी होगी। ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। मैंने इस घर को अपना माना था, लेकिन आपने मुझे हमेशा एक बाहरी ही समझा, जिसे बस दबा कर रखा जा सके। पर अब और नहीं।”
शालिनी ने अपना बैग ज़मीन से उठाया और सीधे निर्मला देवी के पास जाकर खड़ी हो गई। “अब मैं इन खोखली बेड़ियों में नहीं बंधूंगी। मैं कोई बेचारी नहीं हूँ और न ही मैं खुद को किसी की नजरों में गिराना चाहती हूँ। मेरी अपनी इच्छाएं हैं, मेरा अपना स्वाभिमान है। मैं एक आजाद इंसान की तरह इस घर में रहना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि इस घर के दकियानूसी रिवाजों की दीवारें टूटें, ताकि मुझे और भविष्य में इस घर से जुड़ने वाली किसी भी औरत को इस तरह घुट-घुट कर न जीना पड़े। अगर मेरा पति मुझसे उम्मीद करता है कि मैं एक अच्छी बहू बनूं, तो उसे भी एक अच्छा दामाद और एक सच्चा जीवनसाथी बनना सीखना होगा। क्योंकि एकतरफा रिश्ते कभी किसी मुकाम तक नहीं पहुँचते।”
शालिनी की बातें सुनकर निर्मला देवी और सुमित अवाक रह गए। उनके पास शालिनी के इन कड़वे लेकिन सौ टका सच सवालों का कोई जवाब नहीं था। जिस बहू को वे हमेशा कमजोर और दब्बू समझते थे, आज उसके इस निडर और तार्किक रूप ने उनकी बोलती बंद कर दी थी। सुमित को अपने किए पर घोर पश्चाताप हो रहा था। उसे समझ आ गया था कि उसके झूठे पुरुषार्थ और ‘दामाद’ होने के अहंकार ने आज उसका घर टूटने की कगार पर ला खड़ा किया है।
निर्मला देवी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उन्हें भी पहली बार यह एहसास हुआ कि एक माँ होने के नाते उन्होंने अपनी बहू पर तो दुनिया भर के नियम थोप दिए, लेकिन अपने बेटे को कभी यह नहीं सिखाया कि दूसरों की बेटियों और उनके माता-पिता का सम्मान कैसे किया जाता है। घर के उस सन्नाटे में आज एक बहुत बड़ी क्रांति ने जन्म लिया था—एक ऐसी क्रांति जिसने न सिर्फ शालिनी को उसके खोए हुए आत्मसम्मान से मिलवाया, बल्कि उस घर की नींव में दबे उस सड़े-गले अहंकार को भी जड़ से उखाड़ फेंका।
शायद सुमित और निर्मला देवी ऐसी गलती फिर कभी नहीं करेंगे। शालिनी ने आज सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन हजारों औरतों की तरफ से आवाज़ उठाई थी, जो रोज ऐसे ही दोहरे मापदंडों की चक्की में पिसती हैं।
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लेखिका : शारदा सक्सेना