संस्कार पर सवाल – रेखा जैन

“आपने अपनी बेटी को कुछ संस्कार नहीं दिए है!” आद्या के ससुर की कड़कती हुई आवाज फोन पर गूंजी।

“समधी जी ऐसी क्या बात हो गई कि सुबह सुबह आप नाराज हो रहे है?” आद्या के पापा उसके ससुर को शांत करने की गरज से बोले।

“कल हम आपकी बेटी को मिलने आए थे और उसकी सास ने उससे कहा था कि साथ में आए सब मेहमानों को चरण स्पर्श कर लो लेकिन आपकी बेटी ने किसी को चरणस्पर्श नहीं किया। हमारे सब रिश्तेदारों के सामने उसने हमारी नाक कटा दी। आपने अपनी बेटी को इतने संस्कार भी नहीं दिए है कि बड़ों के चरणस्पर्श करना चाहिए।”

“समधी जी, पहले ये बताओ कि क्या हमारी बेटी ने कभी आपको शिकायत का मौका दिया है? वो तो फोन पर भी आपको चरणस्पर्श बोलती है। लेकिन उसको अभी दस दिन पहले ही सीजेरियन से बेटा हुआ है और उसके सभी टांको में इन्फेक्शन हो गया है। उसे बहुत दर्द है, इन्फेक्शन की वजह से उसे बुखार भी आ रहा है। ऐसी हालत में वो कैसे कमर से झुक कर आपके सभी रिश्तेदारों का चरणस्पर्श करती। आप भी तो थोड़ा उसकी तबियत को समझो!” आद्या के पापा ने समझाने की कोशिश की।

लेकिन आद्या के ससुर अनाप शनाप बोलते चले गए। आद्या वहीं पास में ही बेड पर सोई हुई थी और सब सुन रही थी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

दस दिन पहले ही उसको सीजेरियन से बेटा हुआ था लेकिन उसके स्टीचेज में इन्फेक्शन हो गया था। इस कारण उसे दर्द भी बहुत था और बुखार भी था।

कल ही उसके सास ससुर करीब दस बारह रिश्तेदारों के साथ उसे मिलने आए। उसकी सास ने उसे फरमान सुना दिया कि सब रिश्तेदारों के चरणस्पर्श करो। और आद्या जो दर्द की वजह से करवट ही बड़ी मुश्किल से ले पा रही थी, उसे बेड से उठाना और कमर से झुक कर चरणस्पर्श करना बहुत मुश्किल लग रहा था। इस कारण वो सबके चरणस्पर्श नहीं कर पाई थी।

इसीलिए उसके ससुर ने सुबह सुबह फोन करके उसके पापा को खरीखोटी सुना दी थी।

ये उसके साथ पिछले तीन सालों से हो रहा था। जब से उसकी शादी हुई थी तब से ही उसके सास ससुर उसके अंदर मीनमेख निकाल कर उसके मम्मी पापा को शिकायत करते रहते थे। उसका पति अर्णव भी अपने मम्मी पापा का ही साथ देता था।  

आद्या की नजर में मम्मी पापा का साथ देना गलत नहीं है, लेकिन इंसान को सच को सच और गलत को गलत बोलना चाहिए, आद्या यही चाहती थी और इसी बात पर उसको हमेशा अर्णव से लड़ाई होती थी।

वो अभी अपनी किस्मत पर आंसू बहा रही थी कि एक बार फिर से फोन घनघनाया। इस बार फोन आद्या ने उठाया। दूसरी तरफ उसके पति अर्णव थे।

“आद्या, चाहे तुम्हारी कमर टूटे या टांके टूटे, जब मम्मी ने कहा था कि सबके पैर छूना है तो तुमको छूना ही पड़ेगा!” अर्णव फोन पर गरजा।

“लेकिन अर्णव ये तो हद हो गई। कम से कम तुम तो ऐसा मत बोलो। मेरी हालत तुमसे छिपी नहीं है। ठीक है, मैं पराई हूं लेकिन ये बच्चा तो तुम्हारा है और उसी को जन्म दिया है मैने और मेरी ऐसी हालत नहीं है कि मैं कमर से झुक सकूं।” 

“मैं कुछ नहीं जानता, जो मेरी मम्मी कहेगी वो तुमको करना ही पड़ेगा।” बोल कर अर्णव ने फोन पटक दिया।

आद्या ने अपने मम्मी पापा को देखा और रूंधे स्वर में बोली,

“पापा, आपने गलत जगह मेरी शादी कर दी है!”

उसके पापा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा,

“बेटा, तु खुश नहीं है तो हम तेरा तलाक करवा देते है। अभी मुझमें इतनी ताकत है कि मैं अपनी बेटी और नवासे को पाल सकता हूं!”

“नहीं पापा, मैं अपने बेटे को उसके मम्मी पापा दोनों की छत्रछाया में पालना चाहती हूं। तलाकशुदा माता पिता के बच्चों की हालत जानती हूं मैं इसलिए मैं तलाक नहीं लूंगी। शायद समय के साथ सब ठीक हो जाए।”

और इसी तरह समय गुजरता गया। आद्या के सास ससुर उसके और अर्णव के बीच गलतफहमियां पैदा करते रहे और अर्णव और आद्या लड़ते रहे।

 उसके सास ससुर भी उसे ताने देने से नहीं चूकते थे।

कुछ समय बाद आद्या के ससुर को कैंसर हो गया। उनकी तबियत काफी बिगड़ गई। 

वो कई बार रोते और कहते, 

“मैंने जिंदगी में बहुत गलत काम किए है जिनकी सजा मुझे मिल रही है।”

  लेकिन आद्या ने सब कुछ भुला कर अपने ससुर की सेवा की। 

कुछ समय बाद उसके ससुर गुजर गए। आद्या के साथ उसकी सास रह गई। आद्या सास के सब काम करती थी लेकिन सास से ज्यादा बात नहीं करती थी क्योंकि दिल में पुराने दिनों की कसक रह गई थी।

उसकी सास के दोनों घुटनों का ऑपरेशन करवाया था। आद्या उनको नहलाना, समय पर दवाई देना, मालिश करना, एक्सरसाइज करवाना…सब करती थी।

एक दिन उसने अपनी सास से कहा,

“मम्मी जी जरा दोनों पैर मोड़ कर दिखाओ!”

“पागल है क्या, तुझे दिखता नहीं मुझे कितना दर्द है!! ऐसी हालत में मैं अपने दोनों पैर कैसे मोड़ सकती हूं?” उसकी सास चिढ़ गई।

आद्या मुस्कराई और बोली,

“मम्मी जी आपके पैरों में दर्द है तो आप पैर मोड़ नहीं सकती है। 18 साल पहले जब मेरा सीजेरियन हुआ था तब मुझे भी बहुत दर्द था फिर भी आप बोली कि मैं कमर से झुक कर सबको चरणस्पर्श करूं। आपने एक बार भी मेरे दर्द के बारे में नहीं सोचा। पापाजी को बोल कर मेरे पापा से लड़ाई करवाई और मेरे संस्कारों पर सवाल उठा दिए। और उस पर भी आपका मन नहीं भरा तो अपने बेटे को बोल कर मुझे अनापशनाप बुलवाया। क्या मेरा दर्द आपके दर्द से कम था या आप इंसान है और मैं इंसान नहीं हूं जिसे दर्द नहीं हो सकता।”

ये सुन कर उसकी सास की आँखें झुक गई। लेकिन आद्या इस पर भी नहीं रुकी और आगे बोली,

“मम्मी जी यही तो विधि का विधान है, जो कर्म किए है वो वापस आते ही है। और मैं कहना नहीं चाहती लेकिन शायद पापाजी को भी इतना दर्द इसीलिए सहन करना पड़ा था क्योंकि उन्होंने मेरे दर्द को नहीं समझा था। यही विधि का विधान है जिसे कोई टाल नहीं सकता। लेकिन आप फिक्र मत करो, मैं उन सब बातों का बदला नहीं लूंगी क्योंकि यही मेरे माता पिता के संस्कार है कि बड़ों की सेवा करनी चाहिए, चाहे बड़ों ने हमारे साथ कैसा भी व्यवहार किया हो!” और उसके साथ आद्या उनके पैरों की मालिश करने लगी और उसकी सास की आँखें शर्म के मारे ऊपर ही नहीं उठ पा रही थी।

#विधि का विधान कोई टाल नहीं सकता

रेखा जैन

अहमदाबाद, गुजरात

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