तड़के ही निशा का फोन आया , कि दीदी आज मैं काम पर नहीं आ पाऊँगी , मुझे तेज़ बुखार आ रहा है… आप आज कैसे भी काम चला लो , मैं कल से अपनी बेटी को भेज दूँगी, आज उसका इम्तिहान है ,
इसलिए वो नहीं आ पायेगी । सुबह सुबह निशा के फ़ोन ने मेरा मूड ख़राब कर दिया और मैंने उसे तमाम भला बुरा कहा । तुम लोग भी ध्यान नहीं रखते और कभी भी बीमार हो जाते हो । साफ़ सफ़ाई रखते नहीं और बीमार हो जाते हैं।
दो दिन बाद ही निशा काम पर आने लगी और मैंने उसे कहा कि तुम बहुत छुट्टी लेती हो ।ध्यान रखा करो ।
उसके अगले दिन मुझे मेरी तबीयत ठीक नहीं लगी ,मैंने निशा से कहा आज मुझे मेरी तबीयत सही नहीं लग रही। निशा बोली ,अरे दीदी आप आराम कर लो ,मैं सारे काम कर लूंगी । तबियत खराब में कुछ अच्छा नहीं लगता । मैं आपको चाय बनाकर दूँ?
मैंने कहा हाँ बना दे। वो चाय बनाकर लाई और बोली आप परेशान मत हो …खाना भी मैं ही बना दूँगी.. आप तो आराम कर लो ।
चाय की प्याली हाथ में लेते वक्त मुझे दो दिन पहले हुई निशा की तबीयत ख़राब पर अपनी प्रतिक्रिया याद आ रही थी । सोच रही थी , मैंने उसे कितना भला बुरा कहा । उसी निशा ने कितने प्यार से मेरी तबीयत ख़राब में मुझे चाय बनाकर दी है ।
चाय के स्वाद में निशा की संवेदना का ताप ,मेरे शरीर के ताप से कहीं अधिक था ,जो मुझे मेरी ही सोच से शर्मसार कर रहा था । सोच रही थी स्वार्थ से परे की गई सेवा ही सच्ची सेवा है ।
मैं अपनी छोटी सोच पर टका सा मुँह लेकर रह गई ।
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स्वरचित, मौलिक
रश्मि वैभव गर्ग
कोटा
मुहावरा और कहावत लघुकथा प्रतियोगिता
मुहावरा- टका सा मुँह लेकर रह जाना