सब समय समय की बात है – मंजू ओमर 

समय समय की बात  है सरोज बहन , हमारे समय में तो ऐसा नहीं होता था। हमारे समय में तो बेटा बाप के सामने ऊंची आवाज में बात नहीं करता था।और पिता ने कोई बात कह दी तो उसे काट तो सकता नहीं था। इतनी हिम्मत ही नहीं होती थी बच्चों की। ऐसे संस्कार दिए जाते थे बच्चों को कि बड़ों की बात मानना,उनका आदर सत्कार, सम्मान देना सबसे पहले होता था। चाहे बेटा कितना ही बड़ा क्यों न हो गया हो। कावेरी ने अपनी पड़ोसन सरोज से कह रही थी।आज दोनों पडोसन मंदिर में टकरा गई तो अरूण के घर में हुई आज बेटे द्वारा एक घटना का जिक्र कर रही थी।

           अरूण मुहल्ले में कावेरी के सामने वाले मकान में रहते थे। पत्नी पुष्पा और तीन बच्चे थे ।दो बेटियां और एक बेटा। अरूण जी रेलवे में नौकरी करते थे। जिसमें दस से पांच वाली ड्यूटी तो नहीं थी।वो टीटी थे । उसमें जब भी ड्यूटी लग जाती थी जाना पड़ता था कभी दिन तो कभी शाम तो कभी रात , कभी कभी तो आधी रात को भी जाना पड़ता था। ड्यूटी करने के बाद आराम की जरूरत होती थी।और भरपूर नींद भी चाहिए होती थी।तो अरूण जी का ज्यादा समय सोने में ही जाता था।तो घर और बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह से पत्नी पुष्पा की ही होती थी । बच्चों की सारी जिम्मेदारी पुष्पा पर होने से पति-पत्नी में अक्सर ही तू तू मैं मैं होती रहती थी।अरूण जी कहते अब मेरी नौकरी इस तरह की है तो क्या कर सकते हैं ,कहो तो नौकरी छोड़ दें । हां नौकरी छोड़ दोगे तो घर का खर्च कैसे चलेगा।तो फिर तुम्ही बताओ कि मैं क्या करूं।जब तनख्वाह देता हूं हाथ में तो झट से रख लेती हो और लडती दिन भर हो। उनके यहां रोज का यही काम था।आए दिन झगड़े होना रोज की बात थी। कभी कभी झगड़ा इतना विकराल रूप ले लेता था कि उसकी आवाजें इस पड़ोस और सड़क तक आने लगती थी ।राह चलते लोग खड़े होकर सुनने लगते थे।

            फिलहाल उनके घर ऐसे ही चलता रहा।अरूण जी कमाकर पैसे तो लाते लेकिन घर में उनकी कोई इज्जत नहीं थी। बच्चे बड़े होते गए। बेटियां तो ठीक थी वो मन लगाकर पढ़ाई भी करती थी। लेकिन बेटे का मन पढ़ाई में न लगता था। शायद बड़े होते बच्चे के लिए एक बाप की पैनी नज़र उसके क्रियाकलापों पर होना बहुत जरूरी है और वो अरूण जी के घर में नहीं था। फिर क्या था इंटर की परीक्षा का रिजल्ट आया तो बेटा फेल हो गया। बेटे की आदतें खराब हो गई थी ,वो आवारा गर्दी में पड़ गया था। लड़कियां तो पढ़-लिख गई लेकिन बेटा न पढ़ पाया।अब बड़ी बेटी की शादी हो गई और छोटी बेटी ने मेहनत करी तो अच्छे नंबरों से पास हुई और उसने इंजिनियरिंग कालेज में दाखिला ले लिया। बेटा अभी इंटर में ही था दो बार फेल होने के बाद पढ़ाई से उसने तौबा कर ली।

                 अरूण जी के मकान के ऊपर वाले हिस्से में एक किराएदार रक्खा था।वो लोग निचली जाति के थे। उनकी एक अट्ठारह साल की बेटी थी ।मनीष उसके चक्कर में पड़ गया । पिता को घर से कोई मतलब नहीं था वो तो बस अपनी नौकरी में व्यस्त रहते थे। ड्यूटी से आए तो सोना है थकान उतारने को और अगली ड्यूटी पर जाने को भी सोना है बस उनका समय तो ऐसे ही बीतता था। पत्नी घर के कामों में , पूजा पाठ में और बाकी समय में टी वी देखने में।घर में बेटा क्या गुल खिला रहा है किसी को नहीं पता।

कुछ समय बीत गया और बेटा उस लड़की से प्यार की पेगे बढ़ाता रहा।बस, इत्तेफाक से एक दिन पुष्पा जी ने बेटे को उस लड़की से बात करते हुए देख लिया।तो उन्हें कुछ शक हुआ जब बेटे से पूछा तो वो उस समय तो साफ मुकर गया। लेकिन अब पुष्पा जी की थोड़ी पैनी नजर बेटे पर रहने लगीं।और एक दिन जब बेटा ऊपर गया तो खुद भी पीछे पीछे चली गई और दोनों को एक साथ साथ पकड़े हुए देख लिया । हां लड़की की मां कोई रोक टोक नहीं करती थी । शायद वो ऐसा चाहती थी कि लड़का उसकी लड़की से चक्कर चलाए । बेटे को लड़की का हाथ पकड़े हुए देखकर पुष्पा जी जोर से चिल्लाई उस समय वो सीढ़ियों पर खड़ी थी। उनकी आवाज सुनकर बेटे ने पीछे मुड़कर देखा तो मां खड़ी थी ।मनीष ये क्या हो रहा है चलो नीचे पुष्पा जोर से बोली।तुम जाओ नीचे मम्मी ,नहीं मैं नहीं जाऊंगी तुम चलो नीचे अभी तुम्हारी खबर लेती हूं। ऐसा कहते हुए पुष्पा जी बेटे का हाथ पकड़कर खींच रही थी , लेकिन बेटे ने हाथ छुड़ाने के चक्कर में मां को एक लात मार दी ।वो सीढ़ियों पर से गिरते गिरते बच गई और वहीं रैलिंग के सहारे बैठ गई।और रोने लगी।कि ऐ कैसा कलयुग आ गया है कि बेटा मां को लात मार रहा है ।प्यार अंधा होता है शायद ये कहावत सही है। पुष्पा जी के सीने में तेज दर्द उठा वो रोते-रोते पड़ोसन कावेरी के पास आई और सारा वृत्तांत कह सुनाया । कावेरी पुष्पा जी को डाक्टर के पास ले गई। एक्स-रे कराया तो बाल बराबर फैक्चर था ।दवा और बैंडेज बांधने को लेकर घर भेज दिया।

          इस एक्सीडेंट के कुछ दिन बाद बेटा मनीष घर में पैसे जो रखें थे वो और कुछ मां के गहने जो पड़े थे लेकर लड़की को लेकर घर से भाग गया।पढ़ें लिखे हैं नहीं ,काम धंधा कुछ करते नहीं है लड़की को लेकर पहले भाग गए ।अब उसको कहां रखेंगे , क्या खिलाएंगे पता नहीं । लड़की के परिवार की तरफ से सपोर्ट था हो सकता है वहीं लोग मदद कर रहे हो।अब कुछ दिन बाद लड़की के पिता जी पुलिस लेकर घर आ गए पुष्पा और अरूण जी से पूछताछ करते और थाने भी बुलाते रहते । हालांकि पुष्पा जी ने मकान खाली करवा लिया था। शायद कुछ और पैसा वसूलने के चक्कर में हो लड़की के मां बाप भी।

           कावेरी ने सरोज से कहा बहन कैसा जमाना आ गया है आजकल बच्चे क्या न कर जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। पहले के समय में कम से कम बच्चों को ऐसे संस्कार तो नहीं दिखाई देते थे। हां होते होंगे कुछ बच्चे ऐसे लेकिन अब तो हर जगह कुछ ऐसे न सुने हुए किससे सुनाई देते हैं। किसी घर में बच्चे मां बाप को मारते पीटते हैं , खाना नहीं देते ,घर से बेघर कर देते हैं । बेचारे वृद्धाश्रम में पड़े हैं । पहले क्या कभी सुना किसी वृद्धाश्रम के बारे में। बहुत समय खराब आ गया है आजकल बहन सब समय समय की बात है । पहले के समय में तो मां बाप से बच्चे डरते थे लेकिन आजकल तो मां बाप बच्चे से डरते हैं। आजकल मां बाप अकेले रहना पसंद करते हैं लेकिन बच्चों के पास जाकर रहने में घबराते हैं।डर सा लगने लगा है उनको बच्चों कै पास रहने में। बच्चों के पास न उनको बोलने की आजादी ,न खाने पीने की आजादी नहीं कुछ कहने की आजादी बस बंधन ही बंधन ।तो यदि मजबूरी न हो तो वो अपने घर पर ही रहना पसंद करते हैं।

           इस लिए दोस्तों समय आज का बहुत बदल गया है।और दिन पर दिन बदलता ही जा रहा है।आज बच्चों में फिर से संस्कार डालने की जरूरत आन पड़ी है। औलाद बुढ़ापे में सहारे के लिए होती हैं कि बेसहारा करने को।इस लिए जीते जी अपनी सम्पत्ति अपना पैसा मोह में पड़कर अपने बच्चों के नाम न करें । अपने पास रखें। नहीं तो हर एक चीज के लिए आपको बच्चों का मोहताज हो जाना पड़ेगा। फिर आपको अपना बुढ़ापा कहां और कैसे बीताना है ये बच्चे तय करेंगे आप नहीं।

       सब समय समय की बात है समय बहुत परिवर्तन शील है ।और आज का समय तो बहुत ही खराब चल रहा है। इसलिए अपना ध्यान रखें और बच्चों पर भरोसा न करें ।

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश 

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