समय दो… – रश्मि झा मिश्रा

“मां जी… आप लोग इतने दिन तो यहीं रहते थे… अब क्यों जा रहे हैं… मुझे आए तो अभी ठीक से चार महीने भी नहीं हुए… क्या मुझसे कोई परेशानी है…!”

” अरे… नहीं नहीं बेटा… तुम तो बहुत प्यारी हो… इतने दिनों तक तो सारे घर की जिम्मेदारी हमने ही संभाल रखी थी… राकेश को कभी किसी चीज की चिंता नहीं रही… घर मैं संभालती थी, और बाहर का सब कुछ पापा देख लेते थे… लेकिन अपनी शादी हो जाने के बाद भी उसका यही ढंग है… उसे अपनी जिम्मेदारी का जरा भी एहसास नहीं…

दिन रात बस काम काम… नई बहू है… उसे भी समय चाहिए… मां पिता बूढ़े हुए, उन्हें भी पैसों से ज्यादा थोड़ा समय और सम्मान ही चाहिए…

पर यह बात समझने का भी समय नहीं, मेरे बेटे के पास… इसलिए बहुत सोच समझ कर हमने यह फैसला किया है, कि अब हम कुछ दिन गांव में ही रहेंगे… तुम भी घर संभालना सीख लोगी, और वह भी तुम्हारी जिम्मेदारी उठाना, घर संभालना सीखेगा.… सिर्फ धन कमाने से ही कुछ नहीं होता… उसका प्रबंधन भी आना चाहिए…!”

 उपासना अकेली रह गई… उसके सास ससुर उसके हाथों में गृहस्थी की बागडोर सौंप कर चले गए… वह थोड़ी परेशान तो थी… लेकिन उसके साथ-साथ रोमांचित भी थी, कि अब सब उसे अपने पति के साथ मिलकर करना है…

 लेकिन दो-तीन दिनों में ही उसका रोमांच ठंडा पड़ गया… सचमुच राकेश को अपने ऑफिस के बंधे बंधाए काम के सिवा कुछ नहीं आता था, और ना ही वह सीखना चाहता था…

 ड्यूटी खत्म होने के बाद भी, हमेशा ओवर टाइम के चक्कर में रहता था… सारे स्टाफ जानते थे, राकेश कभी ओवर टाइम का मौका नहीं छोड़ सकता…

 हफ्ते भर में ही उपासना बुरी तरह परेशान हो गई… राकेश के पास दिन रात कभी दो घड़ी का समय नहीं था… बैठकर दो बातें करना… उसे समय बर्बाद करना लगता था…

 आखिर एक दिन उपासना ने भी अपना सामान बांध लिया… “राकेश कल मुझे मम्मी पापा के पास छोड़ देना…!”

राकेश झल्ला उठा…” अभी तुम्हें कहां जाना है… मैं क्या अकेला रहूंगा… मां पापा भी चले गए… तुम भी बोल रही हो जाना है…!”

” तुम्हें तो बिल्कुल समय ही नहीं है… तुम्हारे मां पिताजी थे तो मेरा भी मन लगा रहता था… अब मैं बहुत बोर हो रही हूं… तुम्हारा काम जब थोड़ा कम हो जाए, तो मुझे ले आना…!”

 राकेश थोड़ा रुका… उपासना ने सोचा वह उसे रुकने को बोलेगा… लेकिन उसके पास समझदारी की भारी कमी थी… उसने उपासना को रास्ता दिखा दिया… “ठीक है… तुम्हें जाना है तो चली जाओ… पर मेरे पास समय नहीं है, तुम्हें छोड़ने का…!”

 उपासना ठगी सी खड़ी रही… फिर अपने मायके चली गई…

अब राकेश अचानक अकेला पड़ गया… हमेशा घर और उसे संभालने वाली मां के जाने के बाद… उपासना का भी यूं चले जाना… उसे तब अखड़ा जब उसने अपने आप को बीमार कर लिया…मां जब भी कहीं जाती थी… उसकी सब व्यवस्था करके जाती थी…पर इस बार सब उसे खुद से करना था…

 बाहर का खाना… कभी देर से आए तो कुछ भी नहीं खाना… घर… कपड़े… सब बेतरतीब… कुछ दिन तक तो किसी तरह चलता रहा… फिर उसने भी जिद ठान ली…

” सब छोड़ कर गए हैं ना… मैं भी अकेले रहकर बता देता हूं…!”

 उसने काम वाली तो थी ही… खाना बनाने… कपड़े धोने… सबके लिए नौकर रख लिए…लेकिन नौकर को चलाने के लिए भी समय देना पड़ता है… उन्हें बताना पड़ता है… क्या करना है… कैसे करना है…जो कि उसे खुद नहीं पता था…

किसी तरह एक महीना निकला… लेकिन खर्च इतना बढ़ गया, कि एक ही महीने में उसकी अक्ल ठिकाने आ गई…

” मां रोज-रोज फोन कर उसे समझाती थी, की उपासना को वापस ले आ, और अपनी पुरानी आदतें बदलने की कोशिश कर…

 बेटा उसे वापस ले आ… घर संभालने में उसका सहयोग कर… जैसे पापा मेरा करते हैं…!”

” लेकिन मैं क्या सहयोग करूं मां… मैं पैसे तो दे ही रहा हूं…!”

” सिर्फ पैसे से कुछ नहीं होता बेटा… समय भी दो… तुम समय दो ना… बाकी वह खुद संभाल लेगी…!”

आखिर अब उसे पछतावा होने लगा…

 काम वाले चाहे हजार रख लो… लेकिन परिवार नहीं बन सकता… परिवार के लिए घर में अपनों का होना जरूरी होता है, और अपने तभी साथ रहते हैं… जब सबका सम्मान और सहयोग मिलता है…

 राकेश ने अपनी शादी के बाद आज पहली छुट्टी के लिए अप्लाई किया, तो ऑफिस में भी चर्चा शुरू हो गई… “क्या बात है यार राकेश… तुम और छुट्टी… सब सही तो है.…?”

 बॉस ने पूछते हुए कंधे पर हाथ रखा तो, राकेश हंस पड़ा…” हां सर… अब मुझे भी छुट्टी लेना पड़ेगा… शादी जो हो गई… घर की जिम्मेदारी उठानी है…परिवार को समय देना है…!”

 बॉस ने मुस्कुराते हुए कहा…” हां यार… सबसे बड़ा धन परिवार होता है… उसे कभी टूटने मत दो… जाओ…!”

 राकेश सही मायने में आज, अपनी शादी के बाद पत्नी की विदाई करवाने जा रहा था…. उसके लिए समय लेकर…फिर मां पापा को भी तो लाना था…जिम्मेदार बनकर……

रश्मि झा मिश्रा 

#सबसे बड़ा धन- परिवार

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