समझौता अब नहीं – करुणा मलिक 

रसोई की खिड़की से आती धूप की तीखी किरणें सुधा के चेहरे पर पसीने की बूंदों को चमका रही थीं। गैस पर चढ़ा बड़ा सा पतीला खदबदा रहा था, जिसमें पचास लोगों के लिए कढ़ी पक रही थी। सुधा ने पल्लू से माथा पोंछा और एक गहरी साँस ली। पिछले पाँच सालों से यही उसकी दिनचर्या थी। सुबह चार बजे उठना, मसाले कूटना, सब्जियाँ काटना और फिर शहर के अलग-अलग दफ्तरों में जाने वाले टिफिन तैयार करना।

‘सुधा टिफिन सर्विस’ अब शहर में एक जाना-माना नाम था, लेकिन इस नाम के पीछे की कमरतोड़ मेहनत सिर्फ सुधा जानती थी।

तभी ड्राइंग रूम से उसके पति, मयंक की आवाज़ आई, “सुधा! अरे सुनती हो? आज वो मेहता जी का पेमेंट आया क्या?”

सुधा ने हाथ पोंछते हुए बाहर झाँका। मयंक सोफे पर पसरा हुआ मोबाइल में कुछ देख रहा था। उसके सामने चाय का खाली कप रखा था।

“हाँ, अभी दोपहर में ऑनलाइन आया है। मैंने डायरी में नोट कर लिया है,” सुधा ने जवाब दिया और वापस रसोई की ओर मुड़ी।

मयंक उठकर रसोई के दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ। “देखो सुधा, मैं सोच रहा था कि अब हमें अपने बिज़नेस को थोड़ा बढ़ाना चाहिए। कब तक तुम इस छोटे से किचन में खटती रहोगी? शहर के पॉश इलाके में एक रेस्टोरेंट खोलने का प्लान है मेरा। बस थोड़ा निवेश चाहिए।”

सुधा के हाथ रुक गए। मयंक पिछले दो साल से इसी ‘प्लान’ की बात कर रहा था। जब मयंक की नौकरी छूटी थी, तब सुधा ने ही यह टिफिन का काम शुरू किया था। मयंक ने कहा था कि वह मार्केटिंग और हिसाब-किताब देखेगा, लेकिन असलियत यह थी कि वह सिर्फ पैसों का मालिक बनकर बैठ गया था।

“मयंक, अभी हमारे पास इतना पैसा नहीं है। और फिर रेस्टोरेंट चलाने के लिए मुझे वहाँ खड़ा रहना पड़ेगा। टिफिन का काम घर से हो जाता है,” सुधा ने अपनी व्यावहारिक चिंता जताई।

मयंक चिढ़ गया। “तुम तो हमेशा रोती ही रहती हो। अरे, मैं हूँ न! और फिर तुम्हारी मदद के लिए मैंने नीलिमा से बात की है। वह आज से तुम्हारे साथ हाथ बंटाने आएगी। बेचारी को काम की ज़रूरत है और तुम्हें आराम की।”

नीलिमा… यह नाम सुनते ही सुधा के मन में एक अजीब सी खटास घुल गई। नीलिमा, सुधा की दूर की मौसी की बेटी थी। देखने में सुंदर, चंचल और बातों की धनी। पिछले कुछ महीनों से मयंक और नीलिमा की नज़दीकियाँ सुधा को खटक रही थीं, लेकिन वह हर बार इसे अपना वहम मानकर झटक देती थी। उसे लगता था कि मयंक भले ही निकम्मा हो, पर धोखेबाज़ नहीं हो सकता।

शाम को नीलिमा आ गई। “दीदी, नमस्ते!” उसकी आवाज़ में एक बनावटी मिठास थी। उसने आते ही मयंक के पैर छुए और फिर सुधा के गले लगी।

“दीदी, जीजाजी बता रहे थे कि आप कितना थक जाती हैं। अब मैं आ गई हूँ न, सब संभाल लूँगी। आप बस मुझे अपनी वो खास मसालों वाली रेसिपी सिखा दीजिए,” नीलिमा ने चहकते हुए कहा।

मयंक ने भी सुर में सुर मिलाया, “हाँ सुधा, इसे सब सिखा दो। यह होशियार लड़की है, जल्दी सीख जाएगी। फिर तुम आराम करना, हम दोनों मिलकर बिज़नेस संभालेंगे।”

सुधा को यह बात अजीब लगी। ‘हम दोनों’ में सुधा कहाँ थी? लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार उसने चुप रहना ही बेहतर समझा। अगले एक महीने तक नीलिमा रोज़ आती रही। सुधा ने बड़े प्यार से उसे कढ़ी का तड़का, राजमा का मसाला और अपनी खास चटनी की विधियाँ सिखाईं। नीलिमा काम कम करती थी और मयंक के साथ बैठकर ‘बिज़नेस स्ट्रेटेजी’ के नाम पर घंटों बातें ज़्यादा करती थी।

सुधा रसोई में पसीने से तरबतर रहती और ड्राइंग रूम से उन दोनों की हँसी की आवाज़ें आतीं। कभी-कभी सुधा को लगता कि वह अपने ही घर में नौकरानी बनकर रह गई है।

एक दिन सुधा की तबीयत बहुत खराब थी। उसे तेज़ बुखार था। मयंक ने कहा, “तुम आज आराम करो। टिफिन की डिलीवरी मैं और नीलिमा देख लेंगे। आज क्लाइंट्स से मिलने भी जाना है, नए कॉन्ट्रैक्ट के लिए।”

सुधा ने रज़ामंदी दे दी। वह बिस्तर पर पड़ी रही। दोपहर को उसे प्यास लगी तो वह पानी लेने के लिए उठी। घर में सन्नाटा था। उसे लगा मयंक और नीलिमा चले गए हैं। लेकिन तभी उसे मयंक के कमरे (जो उसने अपना ऑफिस बना रखा था) से फुसफुसाने की आवाज़ आई। दरवाज़ा थोड़ा खुला था।

सुधा के कदम ठिठक गए। अंदर मयंक और नीलिमा थे।

“मयंक, दीदी को कब तक अंधेरे में रखोगे? जिस दिन उन्हें पता चला कि वो नई जगह लीज पर तुमने मेरे नाम से ली है, वो हंगामा कर देंगी,” नीलिमा की आवाज़ थी।

मयंक हँसा, एक ऐसी हँसी जो सुधा ने पहले कभी नहीं सुनी थी—क्रूर और स्वार्थी। “अरे, उसे पता चलने तक तो ‘सुधा टिफिन’ का नाम बदल चुका होगा। देखो नीलिमा, सुधा सिर्फ एक रसोइया है। उसके पास न तो अक्ल है और न ही मॉडर्न दुनिया की समझ। वो सिर्फ मसाले कूट सकती है। असली दिमाग तो मेरा है, और चेहरा तुम्हारा होगा। ‘नीलिमाज़ किचन’ के नाम से हम रेस्टोरेंट खोलेंगे।”

सुधा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसे अपनी कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

नीलिमा बोली, “लेकिन पैसे? रेस्टोरेंट का डिपॉजिट तो दीदी की सेविंग्स से ही गया है न?”

“हाँ, तो क्या हुआ? पति हूँ उसका, हक है मेरा। मैंने उसे कहा था कि यह पैसा हम ज्वाइंट अकाउंट में डाल रहे हैं भविष्य के लिए। बेचारी ने साइन कर दिए। अब वो पैसा तुम्हारे नाम के एग्रीमेंट में लग चुका है। एक बार रेस्टोरेंट शुरू हो जाए, फिर उसे कह देंगे कि टिफिन का काम बंद कर दे। घर पर बैठकर रोटियाँ सेंके। वैसे भी अब मुझे तुम्हारे साथ की आदत हो गई है, उस तेल-मसाले की महक वाली औरत के साथ अब और नहीं रहा जाता।”

सुधा को लगा जैसे किसी ने उसके अस्तित्व पर हथौड़ा मार दिया हो। उसके पैर कांपने लगे। वह वहीं दीवार के सहारे बैठ गई। जिसे वह अपना जीवनसाथी मानती थी, वह उसे सिर्फ एक ‘तेल-मसाले वाली औरत’ समझता था? और नीलिमा, जिसे उसने बहन की तरह हुनर सिखाया, वह उसकी जगह लेने को तैयार बैठी थी?

अंदर बातें अभी भी चल रही थीं।

नीलिमा ने इठलाते हुए कहा, “लेकिन मयंक, अगर दीदी ने अपनी रेसिपीज़ देने से मना कर दिया तो? स्वाद तो उनके हाथ का है।”

मयंक ने बेपरवाही से कहा, “अरे, तुम सब सीख तो चुकी हो। मैंने इसीलिए तो तुम्हें यहाँ लगाया था। पिछले एक महीने में तुमने उसकी सारी डायरी की फोटो ले ली है, सारे मसाले समझ लिए हैं। अब उसकी ज़रूरत क्या है? एक बार रेस्टोरेंट चल निकले, फिर मैं उसे तलाक के पेपर थमा दूँगा। कुछ पैसे दे देंगे गुजारे के लिए, पड़ी रहेगी कहीं।”

सुधा की आँखों से आंसू बहना बंद हो गए। एक अजीब सी शून्यता छा गई। वह उठी और दबे पांव अपने कमरे में वापस आ गई।

उसने आइने में अपना चेहरा देखा। आँखों के नीचे काले घेरे, बालों में सफेदी की झलक, चेहरे पर थकान की लकीरें—यह सब उसने मयंक और इस घर को संवारने में गंवा दिया था। और बदले में उसे क्या मिला? धोखा, अपमान और एक षड्यंत्र।

सुधा को गुस्सा नहीं आया, बल्कि उसे खुद पर तरस आया। उसने सोचा कि क्या वह इतनी बेचारी है कि रोकर मयंक से भीख मांगेगी? क्या वह लड़ेगी कि ‘मुझे मत छोड़ो’?

नहीं।

सुधा ने अपनी अलमारी खोली। उसने अपने वो गहने निकाले जो उसकी माँ ने उसे दिए थे। शुक्र है कि मयंक की नज़र अभी इन पर नहीं पड़ी थी। उसने अपनी पासबुक चेक की, जिसमें सिर्फ कुछ हज़ार रुपये बचे थे जो उसने मयंक से छिपाकर, इमरजेंसी के लिए रखे थे।

उसने एक छोटा बैग लिया। उसमें अपने दो जोड़ी कपड़े डाले। फिर वह रसोई में गई। वहाँ उसकी मसालों की वह पुरानी डायरी रखी थी, जो उसकी माँ की थी। नीलिमा ने उसकी फोटो भले ही ले ली हो, लेकिन सुधा जानती थी कि स्वाद डायरी के पन्नों में नहीं, बनाने वाले के हाथों और नीयत में होता है। उसने वह डायरी अपने बैग में डाल ली।

तभी मयंक और नीलिमा कमरे से बाहर निकले। सुधा को हॉल में खड़ा देख दोनों एक पल के लिए सकपका गए।

मयंक ने संभलते हुए कहा, “अरे सुधा, तुम उठी क्यों? बुखार उतरा?”

सुधा ने मयंक की आँखों में देखा। आज उन आँखों में उसे अपना पति नहीं, बल्कि एक सौदागर दिखाई दे रहा था।

“बुखार उतर गया मयंक। हमेशा के लिए उतर गया,” सुधा की आवाज़ में एक ऐसी ठंडी खामोशी थी जिसने मयंक को चौंका दिया।

“क्या मतलब?” मयंक ने पूछा। नीलिमा भी सहम गई।

सुधा ने अपना बैग कंधे पर टांगा। “मतलब यह कि अब मुझे आराम की ज़रूरत नहीं है। और न ही तुम्हें मेरी ज़रूरत है। तुम्हारी ‘नीलिमाज़ किचन’ के लिए मेरी शुभकामनाएं।”

मयंक के चेहरे का रंग उड़ गया। “तुम… तुमने हमारी बातें सुन लीं?”

सुधा ने नीलिमा की तरफ देखा, जो नज़रें चुरा रही थी। “नीलिमा, रेसिपी चोरी की जा सकती है, हुनर नहीं। और मयंक, पैसा चोरी किया जा सकता है, किस्मत नहीं। तुम दोनों को लगता है कि तुमने मुझे लूट लिया? नहीं, तुमने मुझे आज़ाद कर दिया।”

“सुधा, तुम गलत समझ रही हो, वो तो बस बिज़नेस…” मयंक ने पास आने की कोशिश की।

सुधा ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। “बस! अब और झूठ नहीं। मैं वो नींव थी जिस पर तुम महल बनाना चाहते थे, लेकिन नींव को ही दफन करके। अब नींव खिसक चुकी है मयंक। देखो, तुम्हारा महल कितनी देर टिकता है।”

“तुम जाओगी कहाँ? तुम्हारे पास है क्या? यह घर मेरा है, पैसे मैंने निवेश कर दिए हैं,” मयंक अब अपनी असलियत पर उतर आया था। “सड़क पर आ जाओगी।”

सुधा मुस्कुराई, एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द नहीं, चुनौती थी। “सड़क पर तो मैं पांच साल पहले भी थी जब तुम्हारी नौकरी गई थी। तब मैंने तुम्हें उठाया था। अब मैं खुद उठूँगी। मेरे पास मेरे हाथ हैं, मेरा हुनर है। मुझे किसी मयंक या किसी छत की मोहताज नहीं हूँ।”

सुधा मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ी।

“सुधा, रुक जाओ! लोग क्या कहेंगे? तमाशा मत बनाओ,” मयंक ने पीछे से चिल्लाया। उसे सुधा के जाने से ज़्यादा अपनी बदनामी का डर था।

सुधा रुकी नहीं। उसने दरवाज़ा खोला। बाहर शाम घिर रही थी, लेकिन सुधा के लिए यह एक नई सुबह की आहट थी। उसे पता था कि रास्ता कठिन होगा। उसे फिर से शून्य से शुरुआत करनी होगी। शायद फिर से किसी छोटे कमरे में रहकर टिफिन बनाने होंगे। लेकिन इस बार वह जो कमाएगी, वह उसका अपना होगा। इस बार उसके खाने में किसी के धोखे की कड़वाहट नहीं होगी।

उसने एक बार भी पीछे मुड़कर उस घर को नहीं देखा जिसे उसने अपने खून-पसीने से सींचा था। वह घर अब एक व्यापारिक प्रतिष्ठान था जहाँ रिश्तों की बोली लगती थी।

सुधा सड़क पर आ गई। ठंडी हवा ने उसके चेहरे को छुआ। उसने एक रिक्शा रोका।

“कहाँ जाना है बहनजी?” रिक्शेवाले ने पूछा।

सुधा ने एक पल सोचा। उसके पास कोई पक्का ठिकाना नहीं था, लेकिन दुनिया बहुत बड़ी थी।

“स्टेशन चलो भैया,” सुधा ने दृढ़ता से कहा।

रिक्शा चल पड़ा। सुधा ने अपनी मुट्ठी में भींची हुई माँ की डायरी को कसकर पकड़ लिया। मयंक ने सोचा था कि उसने सुधा को तोड़ दिया है, लेकिन उसे नहीं पता था कि उसने एक बीज को मिट्टी में दबाया था। और बीज दबकर मरता नहीं, बल्कि एक नए पेड़ के रूप में उगने के लिए तैयार होता है।

सुधा अब किसी के लिए नहीं, अपने लिए जीने जा रही थी। समझौता अब नहीं।

मूल लेखिका : करुणा मलिक 

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