Moral stories in hindi :सावन का महीना, आसमान से बरसती रिमझिम फुहारें…
मिट्टी की सोंधी सी खुशबु, खिली-खिली हरियाली और इसी महीने आने वाला त्योहार हरियाली तीज जो स्त्रियों के लिए नयी उमंग, जीवन में प्रेम के राग और रंग लेकर आता है।
कोई झूले पर झूलकर अपने प्रियतम संग इठलाती है, तो कोई अपने प्रिय से दूर उसकी यादों से ही स्वयं का श्रृंगार करती हुई नज़र आती है।
कहीं सहेलियों की अठखेलियां रंग बिखेरती हैं तो कहीं घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं नयी पीढ़ी को त्योहार की महत्ता और उसकी सुंदरता से अवगत कराती नज़र आती हैं।
इस बरस भी सावन आया है, तीज आयी है और इस बार तो ये बहुत ही विशेष है क्योंकि विवाह के पश्चात अरुंधति की ये पहली तीज है।
छत पर बैठी अरुंधति आसमान में सप्तर्षि तारों के बीच आदरणीय वशिष्ठ मुनि और उनकी जीवनसंगिनी आदरणीया अरुंधति माता के नाम पर रखे गये नामों वाले दोनों तारों को देखती हुई मन ही मन प्रार्थना कर रही थी “हे ईश्वर, मेरा और मेरे वशिष्ठ का साथ भी इसी तरह हमेशा बना रहे।”
“धिति बेटा कहाँ हो?” सहसा अपनी सासु माँ नीता जी की आवाज़ से अरुंधति की तंद्रा भंग हुई।
“यहाँ हूँ माँ, अपनी कुर्सी पर।” अरुंधति ने जवाब दिया।
“अरे तुम यहाँ क्यों बैठी हो? मेहंदी कब लगाओगी?”
“माँ सात बज गये हैं। अभी मेहंदी लगाने बैठूंगी तो नौ बज जायेंगे। फिर रोटियां बनानी हैं। और आप तो जानती हैं कि…।”
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“कि तुम्हें साढ़े नौ तक खाना खाने की आदत है, कि इस घर में सबको गर्म रोटियां चाहिए होती हैं, कि फिर तुम्हें नींद आने लगती है। और दिन तो तुम्हारा दफ्तर में ही गुजर जाता है। यही ना।” अरुंधति की बात पूरी करती हुई नीता जी बोली।
“हाँ माँ। इसलिए बस शगुन के लिए सामान्य सी बिंदी वाली मेहंदी लगा लूँगी।”
“बिल्कुल नहीं। मेरी बहू की पहली तीज पर फीकी मेहंदी बिल्कुल नहीं लगेगी। तुम नीचे चलो।
मेहंदी वाली को बुला लिया है मैंने।”
“पर काम? वो कैसे होगा? आपके हाथों का दर्द भी तो ठीक नहीं है।” अरुंधति के स्वर में संशय था।
“एक बात बताओ ये घर क्या अकेले हम दोनों का है? नहीं ना। तो जो हमारे आधे हिस्सेदार हैं उन्हें भी तो वक्त आने पर अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए आगे आने का अवसर हमें देना होगा ना।”
“मतलब? मैं कुछ समझी नहीं।” अरुंधति हैरानी से नीता जी को देख रही थी।
“अरे मेरी भोली बहू, ऐसे ही दिनों के लिए तो मैंने तुम्हारे ससुर जी और तुम्हारे पति दोनों को रसोई के कामों में दक्ष बनाया है।
गर्म रोटियां खाने की आदत है तो गर्म रोटियां बनानी भी चाहिए ना कभी-कभी।”
“सच में? वो बना लेंगे?”
“और क्या। किस किताब में लिखा है कि हम स्त्रियों को ही हमेशा घर-परिवार की जिम्मेदारियों में पीसकर अपनी इच्छाओं को, अपनी खुशियों और आराम को त्यागना जरूरी है?
अब चलो मेरे साथ।”
अरुंधति नीचे पहुँची तो उसके ससुर मदन जी और पति दिव्यांश भी हॉल में मौजूद थे।
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“अरे इतना वक्त कहाँ लगा दिया था?” मदन जी के पूछने पर नीता जी ने हँसते हुए कहा “आपकी बहू गर्म रोटियों की चिंता में उदास बैठी थी।”
“अरे बहू तुम इन बातों की फिक्र मत करो।
असल में अभी एक ही महीना तो हुआ है तुम्हें इस परिवार का हिस्सा बने हुए।
धीरे-धीरे तुम सारे छुपे हुए रहस्यों को जान जाओगी।” मदन जी भी हँसकर बोले।
“बिल्कुल सही बोल रहे हैं आप पापा।” दिव्यांश ने भी कहा तो नीता जी उसे टोकती हुई बोली “तुम तो कुछ बोलो ही मत नालायक। बस दफ्तर के काम में लगे रहो।
अरे तुम्हें चाहिए कि बहू के साथ थोड़ा वक्त गुजारो, उसे अपने विषय में, इस परिवार के विषय में बताओ ताकि वो बेवजह की चिंता ना करें।
इस ज़माने में तो शादी से पहले लड़का-लडक़ी दोनों एक-दूसरे से लेकर परिवार वालों के विषय में भी सब कुछ जान लेते हैं। ना जाने तुम दोनों किस दुनिया से आये हो।”
“माँ इसमें अकेले आपके बेटे की नहीं थोड़ी मेरी भी गलती है।
मैं भी तो अपने दफ्तर में ही उलझी रही ये सोचकर कि एक बार पदोन्नति ले लूँ फिर एक-दूसरे के लिए और परिवार के लिए तो सारा जीवन है ही।” अरुंधति धीमे स्वर में बोली।
“तो अब तुम दोनों अपनी-अपनी गलती सुधारो।
सिर्फ दफ़्तर, पदोन्नति, चकाचौंध से भरी लाइफस्टाइल ही जीवन नहीं होता है मेरे बच्चों।
एक बार ये वक्त गुज़र जायेगा फिर लौटकर नहीं आयेगा।” मदन जी ने उन्हें समझाते हुए कहा तो अरुंधति और दिव्यांश ने सहमति में सिर हिलाया।
तभी दरवाजे पर हुई दस्तक ने उन सबका ध्यान खींचा।
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सामने रेखा खड़ी थी जो इसी मोहल्ले में रहती थी और मेहंदी लगाने के लिए प्रसिद्ध थी।
उसे देखकर नीता जी बोलीं “आओ रेखा आओ। मेरे हाथ में तो मेहंदी लगा चुकी हो। अब जरा मेरी बहू के हाथ में भी अच्छी सी मेहंदी रचा दो।”
“बिल्कुल चाचीजी। ऐसी मेहंदी लगाऊँगी की दिव्यांश भैया देखते रह जायेंगे।” रेखा मुस्कुराते हुए बोली।
रेखा अरुंधति को मेहंदी लगाने में व्यस्त हो गयी और दिव्यांश सबके लिए चाय बनाकर ले आया।
खाने का वक्त होने पर मदन जी भी दिव्यांश के साथ रसोई में पहुँच गये।
कुछ ही देर में गरमा-गरम सब्जी और रोटियां डाइनिंग टेबल की शोभा बढ़ा रही थी।
अरुंधति को आवाज़ देती हुई नीता जी बोलीं “आ जाओ धिति, खाना लग गया है।”
“पर माँ मेहंदी तो सूखी ही नहीं। मैं कैसे खाऊँगी।” अरुंधति ने कहा।
“तुम्हें भूख लगी है या नहीं ये बोलो?” नीता जी ने पूछा।
“लगी तो है।”
“तो बस बैठ जाओ।” नीता जी ने आदेश देते हुए कहा।
अरुंधति जब अपनी कुर्सी पर बैठ गयी तब नीता जी ने थाली में अरुंधति के लिए खाना निकाला और एक निवाला तोड़ते हुए उसकी तरफ बढ़ाया।
“माँ आप ख़िलायेंगी मुझे?” अरुंधति भौंचक्की सी नीता जी को देख रही थी।
“क्यों? क्या तुम्हारी माँ ने कभी तुझे नहीं खिलाया?” नीता जी ने पूछा।
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“हाँ खिलाया है। जब मायके में मेहंदी लगाती थी तब वही मुझे खिलाती थी।”
“तो बस प्रश्न बन्द करके खाना शुरू करें?”
अरुंधति ने हाँ में सिर हिला दिया।
“वाह माँ मुझे तो आपने इतने प्यार से कभी नहीं खिलाया।” दिव्यांश मुँह बनाता हुआ बोला।
“क्योंकि तुम हमेशा से पापा के ज्यादा दुलारे जो रहे हो। लो खाओ।” मदन जी एक निवाला तोड़कर दिव्यांश की तरफ बढ़ाते हुए बोले।
“ऐसे ही मिल-बाँटकर तो घर-गृहस्थी चलती है।
मैं घर के कामों में व्यस्त रहती थी तो ये बेटे को संभाल लेते थे। उसे नहलाना, तैयार करना, खिलाना-पिलाना, उसके कपड़े धो देना।
कभी मुझे ये सुनने के लिए नहीं मिला कि ये मेरा काम नहीं है।” नीता जी पुराने दिनों को याद करते हुए बोलीं।
“ये सुखी जीवन के सारे मंत्र अब मुझे आप दोनों से सीखने हैं।” अरुंधति ने कहा।
“हाँ मुझे भी।” दिव्यांश भी बोला।
“हाँ भाई तुम दोनों मिलकर सीखोगे तब तो हमारी विरासत आगे ले जाओगे।” मदन जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“एक मिनट रुकिये जरा। मैं अभी आया।” सहसा दिव्यांश उठता हुआ बोला।
वो लौटकर आया तो उसके हाथ में उसका फोन था।
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“मैंने मना किया था ना कि खाने के वक्त कोई फोन नहीं छुयेगा।” नीता जी ने कहा तो दिव्यांश बोला “अरे माँ बस दो मिनट। आपकी धिति को खाना खिलाते हुए आपकी एक तस्वीर लेनी है।”
“क्यों? इस दिखावे की क्या जरूरत है?” मदन जी के पूछने पर दिव्यांश ने जवाब दिया “अरे पापा, ताकि लोगों को पता चले कि कहानियों से इतर भी ऐसी सास, ऐसा परिवार होता है और होना चाहिए, ताकि बहू के चेहरे पर ससुराल का खौफ़ नहीं, प्यारी सी मुस्कान हो।”
“हम्म बात तो सही है। तुम धिति को खिलाती रहो नीता। ये तस्वीर ले लेगा।” मदन जी बोले।
“ताकि सबको ये लगे कि अचानक ली गयी तस्वीर है।” अरुंधति ने हँसते हुए कहा।
“ये सही है। चलो भाई खींचो तस्वीर ताकि भविष्य में अपनी बहू के साथ रिश्ता निभाते हुए मेरी बहू भी इस तस्वीर को अपने ज़हन में रखे।” नीता जी बोलीं।
तस्वीर लेने और सबका खाना खत्म होने के बाद अरुंधति ने दिव्यांश से कहा “सुनो, जब इस तस्वीर को पोस्ट करना तो मेरी माँ को विशेषकर टैग कर देना, ताकि वो भी मेरी आने वाली भाभी का इतने ही प्यार से ख्याल रखे।”
“हाँ-हाँ बिल्कुल। लो अभी करता हूँ।” दिव्यांश सोशल मीडिया पर तस्वीर डालते हुए बोला।
तस्वीर के साथ लिखा कैप्शन ‘बहू को अपने हाथ से खाना खिलाती सास दुनिया की सबसे सुंदर सास और सबसे सुंदर स्त्री होती है’ एक खुशहाल परिवार की मजबूत नींव को बयां कर रहा था।
अपने परिवार के साथ मुस्कुराती हुई अरुंधति सोच रही थी अगर घर के बड़े ऐसे हों तो इस कलयुग में भी सतयुग के वशिष्ठ और अरुंधति जैसी जोड़ी बन सकती है।
©शिखा श्रीवास्तव