अलार्म की घंटी बजी। राजू का हाथ अलार्म की तरफ बढ़ा।अलार्म की घड़ी को हाथ में पकड़कर टेबल लैंप को ऑन किया और देखा ।सुबह के 6:00 चुके हैं। रोजाना की तरह राजू अलार्म को बंद करके एकदम से उठा।
कमरे की बड़ी लाइट ऑन करके, माता-पिता के कमरे की तरफ गया ।माता-पिता पहले ही जाग चुके थे। बस बिस्तर में लेटे-लेटे बातें कर रहे थे ।राजू ने उनकी तरफ देखा और कहा आप कब से उठे हो? मुझे भी उठा देते। माता-पिता ने कहा हमने सोचा अभी बहुत समय है। थोड़ी देर बाद जगा देंगे ।
राजू फटाफट किचन की तरह हो गया। लाइट ऑन की और रोजाना की तरह काम में जुट गया। माता-पिता के लिए खाना बनाकर रोजाना के छोटे-छोटे काम करके अपनी ड्यूटी के लिए तैयार हो गया। साथ-साथ में माता-पिता भी अपने रोजाना के छोटे-छोटे काम करने में व्यस्त हो गए।
राजू अपनी ड्यूटी को चला गया। राजू के तीन बड़े भाई और उनकी पत्नियां अपने परिवार के साथ शहर में रहते थे। राजू अपने माता-पिता के पास रहता था। अभी राजू की शादी नहीं हुई थी ।माता-पिता काफी उम्रदराज हो चुके थे। धीरे-धीरे समय बढ़ता बीतता गया और राजू माता-पिता की सेवा में जुटा रहा।
एक समय ऐसा आया जिस समय माता-पिता दोनों बीमार रहने लगे। राजू जब काम के सिलसिले में घर से बाहर रहता तो उसका ध्यान घर पर ही रहता क्योंकि उसके माता-पिता घर पर बिल्कुल अकेले थे। राजू को यही डर रहता कि कहीं उन्हें कुछ हो ना जाए। वह अपने माता-पिता से बहुत प्यार करता था।
कई बार उनकी तबीयत से अचानक दिन में खराब हो जाने के कारण वह काम छोड़कर घर पर पहुंच जाता। अब समय ऐसा आ चुका था ।जब उसका घर से बाहर काम करना बहुत मुश्किल हो रहा था परंतु वह सभी मुश्किलों को दूर करता हुआ अपना काम भी करता और माता-पिता की सेवा भी ।परंतु यह सब अधिक दिन ना चल सका ।
अब माता-पिता की तबीयत बहुत खराब रहने लगी। घर पर कोई ना कोई या किसी न किसी का रहना बहुत आवश्यक हो गया था। राजू ने धीरे-धीरे करके एक-एक करके सभी भाइयों को कहा कि वह घर पर आकर या तो स्वयं घर आ जाए या फिर अपनी पत्नियों को घर पर छोड़ दें ।
ताकि वह माता-पिता की देखभाल कर सके परंतु जब भी वह इस बात का जिक्र करता ।तो सभी भाई कोई ना कोई बहाना बनाकर उसकी बात को टाल देते। वह सब कहते कि सब ठीक हो जाएगा। राजू जानता था कि माता-पिता की सेवा करने के लिए कोई भी घर पर नहीं आएगा क्योंकि वह सब सुख के आदि हो चुके हैं
और कोई भी दुख में उसका साथ नहीं देगा। अब उसका भरोसा सिर्फ भगवान पर था और वह भगवान से यही प्रार्थना करता कि हे ईश्वर मौत तो एक ऐसा सत्य है जो सभी को एक न एक दिन अपना साक्षात्कार करवाएगी परंतु वह सिर्फ ईश्वर से यही प्रार्थना करता है कि जब भी ऐसा समय मेरे माता-पिता के लिए आए तो उसे समय वह उनके पास मौजूद हो ।
समय गुजरता गया और एक दिन वह दिन भी आ गया। राजू की माता एकाएक बहुत बीमार हो गई। राजू ने अपने भाइयों को फोन बताया कि उनकी माता की हालत बहुत खराब है और वह जल्दी से जल्दी घर पर पहुंचे। सभी ने कहा कि कुछ नहीं होता।
एक दिन राजू किसी काम के सिलसिले में शहर गया और उसका शाम तक ना लौटा। उसने सोचा कि वह अब अगले दिन ही घर पर जाएगा क्योंकि वह काफी दूर निकल चुका था ।इसी बीच रात्रि को राजू को फोन आया कि उसकी माता जी को दिल का दौरा पड़ा है ।राजू जैसे तैसे करके घर पर पहुंच गया ।उस समय उसकी माता अंतिम सांसें ले रही थी ।
राजू ने जैसे ही उनको अपनी बाहों में उठाया और वह सदा सदा के लिए इस संसार से चली गई। राजू का हृदय पूरी तरह टूट गया। वह इस जख्म को कभी नहीं भूल सकता था और इसका दोषी वह अपने भाइयों और उनके परिवार को मानने लगा। उसका मानना था कि यदि समय रहते उसके भाई या उनकी पत्नियों घर पर आ जाती
तो शायद उनकी मां की जिंदगी भी बच जाती । परंतु ऐसा हो ना सका ।राजू ने यह बात मन में ही रखी और जब भी वह अपनी माता के विषय में सोचता तो सिर्फ यही उसके मन में विचार आता कि अपने ही जिंदगी में सबसे गहरा जख्म देते हैं। जो उसके भाइयों ने उसे दिया था ।जिसे वह जिंदगी भर नहीं भूला सकेगा ।
धन्यवाद
लेखक :संजय सिंह