सबसे बड़ा धन परिवार – उमा वर्मा

जनवरी की कपकंपाती सर्द सुबह ।नन्दिनी बालकनी में चटाई बिछाकर धूप का आनंद ले रही थी।बेटा बहू आफिस के लिए निकल गये थे ।

काम वाली सुबह आठ बजे आकर घर की सफाई और बर्तन कर के चली गई थी ।अब अकेली घर में यादों की पोटली खुल गई थी ।यही समय होता है जब यादों का पिटारा खोलती है वह।खोलती क्या है।खुद ही खुल जाती है ।समय भी कितना आगे भाग जाता है ।

दो बच्चों की माँ रही थी वह ।यश और अंशिका ।बहुत खुश थी वह अपने घर में परिवार के साथ ।सुखी गृहस्थी अचछे पति ।स्नेह बरसाती सासूमा और पिता सरीखे ससुर जी ।सबकुछ अपनी गति से चल रहा था ।बच्चे पढ़ाई पूरी करके अच्छी नौकरी पा गये थे ।बेटी की शादी अच्छे परिवार में हो गई ।पति नौकरी से रिटायर हो गये थे तो बेटे ने सलाह दी की हमे रहने के लिए कुछ उपाय करने चाहिए पापा ।

और सबके सूझ बूझ से जमीन का टुकड़ा खरीद लिया गया ।छोटा सा मकान भी बन गया ।आधा अधूरा ही सही, पर अपना तो था।क्योकि बेटी की शादी में कुछ कर्ज हो गया तो उसे चुकाना जरूरी था।

मकान का क्या वह तो पूरा होता रहेगा ।नन्दिनी की सोच सही थी।दोनों बच्चे बहुत शालीन और आज्ञाकारी थे।किसी बात की चिंता परेशानी नहीं थी ।जीवन है तो ऊंच नीच तो चलता ही रहता है ।

नन्दिनी बेटे की शादी की कल्पना मे डूबी रहती ।खूब सुन्दर बहू लायेगें ।खूब आज्ञाकारी होगी वह।खूब पढ़ीलिखी भी होने चाहिए ।पर जिंदगी की चाल कोई कहाँ समझ पाया है ।बेटे ने अचानक एकदिन सूचना दी “मम्मी मै यशी को पसंद करता हूँ ।मेरे ही साथ काम करती है “टूट गई थी नन्दिनी तब।

कहाँ तो खुद बहू खोजने की सोच रही थी ।लो अब आज्ञाकारी बेटे ने खुद पसंद कर लिया ।मन को धक्का लगा था बहुत ।पर अपने को संभाल लिया ।चलो बेटा है तो उसकी पसंद अपनी पसंद ।धूमधाम से शादी हो गई थी ।बहुत सुन्दर थी यशी।लेकिन नन्दिनी का मन पूरी तरह से स्विकार नहीं कर पाया था उसे ।कारण था उसका विजातीय होना।कहाँ यश कायस्थ और यशी बनिया ।भला कैसे साथ रह पायेगी ।

हालांकि यशी जबसे शादी होकर घर आई तब से नौकरी के साथ पूरे घर और परिवार को अच्छी तरह से संभाल रही थी ।सुबह उठकर दादी दादा के लिए गरम पानी ।फिर चाय नाश्ता ।और उनके नहाने के लिए गर्म पानी फिर पूजा की तैयारी कर देती ।

साथ साथ यश और अपना टिफ़िन भी भर लेती ।भागा भागी का समय होता तब।दादी दादा खुश थे।पति भी खुश थे।लेकिन नन्दिनी का मन कभी उसे अपना नहीं बना पाया ।हमेशा उसके किसी न किसी काम में नुकस निकाल देती।”भला इतनी तीखी सब्जी कैसे कोई खायेगा? “नयी बहू है, जरा भी तमीज नहीं पैंट-शर्ट पहन कर निकल गई ।लोग क्या कहेंगे “पति समझाते “नन्दिनी,समय बदल गया है ।

अपनी सोच बदलो”समय के साथ चलोगी तो सुखी रहोगी ।कितने जतन से सबकी सेवा करती है ।सबके खाने पीने का ध्यान रखती है ।आफिस से आते ही रसोई में लग जाती है ।और क्या चाहिए तुम्हे? “पर नन्दिनी न जाने किस मिट्टी की बनी थी ।टस से मस नहीं हुई ।फिर समय का पहिया अचानक घूम गया ।पति को रात में सीने में दर्द उठा ।

जबतक अस्पताल जाने की हुई तो उनकी सांसे बंद हो गई ।फिर भी अस्पताल ले जाया गया तो डाक्टर ने जबाब दे दिया ।हार कर घर लौट गये सब।नन्दिनी और माता पिता का रो रो कर बुरा हाल था ।अकेली यशी सबको संभाल रही थी ।बेटे ने सबकुछ निबटाया ।परिवार के बहुत से लोग जुट गये ।तेरहवीं समाप्त हो गई ।सबलोग अपने घर लौट गये ।अब बेटा बहू काम पर जाते ।

घर में सन्नाटा छा जाता ।किसी को किसी से बात करने का मन नहीं करता था ।नन्दिनी की तो दुनिया उजाड़ हो गई थी ।लेकिन माता पिता भी बेसहारा महसूस कर रहे थे ।किसी तरह छःमहीने बीत गए ।एक दिन सासूमा बाथरूम में गिर गई और खत्म हो गई ।काम क्रिया चल ही रहा था कि आठवें दिन ससुर जी का देहांत हो गया ।शायद इकलौता बेटा चला गया तो इस दुख को सह नहीं पाये वे।अब नन्दिनी का मन नहीं लगता घर में ।पर जाए तो कहाँ?

अकेली घर में यादों की पोटली लिए खोलती रहती ।बेटी जब तब माँ से मिलने आ जाती तो थोड़ा अच्छा लगता उसे ।लेकिन आदत नहीं बदल पायी नन्दिनी ।बेटी से अपनी बहु की शिकायत लेकर बैठ जाती ।बहुत बार समझाया करती अंशिका “माँ मै आती हूँ आपसे मिलने,आपकी खुशी के लिए, पर आप भाभी की शिकायत लेकर बैठ जाती हैं।भाभी आज के जमाने के हिसाब से बहुत अच्छी है माँ ।आप उनकी शिकायत मत करो ।नन्दिनी को लगता बेटी भी मुझे नहीं समझ पायी है ।

फिर अंशिका भी कितना दिन रहती ।अपनी घर गृहस्थी भी तो देखनी थी ।माँ बेटी मे फोन से बातें होती रहती ।उस दिन भी तो दो बजे दिन तक बेटी से बात हुआ था फिर अचानक खबर मिली कि अंशिका नहीं रही।टूट गई थी नन्दिनी ।अब कौन था उसका जो उसके मन का दुख बांटता? बेटा बहू बहुत अच्छे थे।

लेकिन उनकी अपनी भी दुनिया थी।अपनी समस्या थी।फिर भी माँ का पूरा खयाल रखते ।बेटे बहू के साथ नन्दिनी उसके घर गयी।बेटी जमीन पर पड़ी हुई थी ।लोग गमगीन बैठे हुए थे।पर एक माँ का दुख बहुत बड़ा था।जिसके सामने संतान चला गया हो

उस माँ को कैसे संतोष मिले।रो रो कर बुरा हाल था नन्दिनी का ।वह घर लौट आई ।अर्थी पर जाती हुई बेटी को देखना सबसे बड़ा दुख था।लगता था कि अभी माँ कहकर पुकार लेगी।पर ऐसा कहाँ संभव होता है ।रोते रोते नन्दिनी का गला बैठ गया ।आवाज़ ही बंद हो गई ।

और आठवें दिन वह अचानक बेहोश हो गई थी ।बेटा अस्पताल दौड़ा ।डाक्टर ने साफ कह दिया कि बचने की उम्मीद कम ही है।ब्रेन हेमरेज हो गया है ।लेकिन बेटे बहू की सेवा और डाक्टर के प्रयास से वह पन्द्रह दिन के बाद अस्पताल से लौट आई।बहू ने बताया था कि सारे शरीर पर मशीन लगा था नाक में, मुँह मे ।सबजगह ।घर लौटी नन्दिनी तो बहू ने अपने

आफिस से पन्द्रह दिन की छुट्टी ले ली ।दिन रात सेवा में लगी रहती ।समय पर खाना ।फल।दूध सबकुछ और साथ मे दवा भी खिलाती ।रात में तेल मालिश कर देती ।दिन में नहला भी देती ।एक महीने के बाद नन्दिनी मे सुधार हो गया ।शरीर के भी और मन के भी।सोचती नन्दिनी मैंने यशी के हर क्रिया कलाप में नुकस निकाला।

हमेशा अपनी नजर से गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।पर यह सबकुछ शान्तभाव से सहती रही ।कभी शिकवा शिकायत नहीं किया ।मै धन्य हो गई इतनी अच्छी बहू के साथ ।मै बहुत बुरी हूँ ।एकदिन मौका मिला तो नन्दिनी यशी के कमरे में गयी और उसे हृदय से लगा लिया ।”बेटा मै बहुत खराब सास थी”तुम को न जाने कितना भला बुरा कहा ।पर तुमने कभी शिकायत नहीं किया ।

मुझे माफ कर देना बेटा “नहीं माँ, आप बहुत अच्छी हो आपने मुझे रास्ता दिखाया ।अपना बनाया ।तभी तो मै और भी निखरी हूँ ।नन्दिनी ने कदमों के झुकी यशी को गले लगा लिया ।यश दरवाजे पर खड़ा एक माँ बेटी का मिलन देख कर मुस्कुरा रहा था ।”अरे भाई,मुझे चाय वाय मिलेगी आज या नहीं?

सिर्फ माँ बेटी ही खिचड़ी पकाती रहोगी? “परिवार सबसे बड़ा धन होता है “आज नन्दिनी को समझ में आ गया था ।बहुत सेवा की मेरी इस बेटी ने।अब जब बहू काम पर से लौटती है तो नन्दिनी उसके लिए गरमागरम भोजन बनाकर रखती है ।थक कर आती हो

तो चेहरा कैसे मलिन हो जाता है ।अब तो यही मेरी जमा पूंजी है मेरे लिए मेरी बेटी यशी।।धूप खत्म होने लगी है।यादों के भंवर ने आखिर कितना रहे वह।चलूँ रात के खाने की तैयारी कर लेते हैं ।लेकिन पहले चाय पी लेने का मन हो रहा है ।नन्दिनी उठ कर गैस पर चाय बनाने लगी ।—

उमा वर्मा ।नोयेडा ।स्वरचित ।

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