सबक – करुणा मलिक

अरे! लडके की माँ क्यूँ नहीं आई, आना चाहिए था। 

उनका तो कल शाम तक पक्का प्रोग्राम था पर आधी रात में सर्दी के साथ ऐसा बुखार चढ़ा कि आँख खोलने की भी हिम्मत नहीं थी सुबह…. वो तो उनकी बहन वही ं है, उसके भरोसे छोड़ कर आए नहीं तो, आज का आना तो शायद कैंसिल करना पड़ता। कोई बात नहीं, आज तो मिलने- मिलाने की औपचारिकता है, सगाई की रस्म पर आपको यहीं मिलेगी और हमारी माता जी से मिलिए। 

इतना कहकर निरंजन सिंह ने हँसते हुए अपनी माँ का परिचय करवाया । वे अपने बेटे आलोक के विवाह के लिए उसी के साथ काम करने वाली नंदा के माता पिता से मिलने आए थे । 

दोनों परिवारों ने खूब गपशप की, खाया- पिया और बच्चों के फैसले पर अनौपचारिक मोहर लगा दी तथा औपचारिक मोहर के लिए एक महीने बाद की सगाई की तारीख निश्चित करके विदाई ली। 

मेहमानों के जाने के जाने के बाद नंदा अपनी माँ से बोली-

मम्मा, जब मैं और आलोक ऊपर छत पर गए थे ना तो आलोक बहुत उदास था, मैंने बार- बार पूछा तो वह अपनी माँ को लेकर बहुत परेशान था । उसकी बातों से ऐसा लगता है कि शायद अंकल और आंटी में कोई खास बोंड नहीं है। 

हाँ, आलोक के पापा किसी को बोलने ही नहीं देते, हर बात का जवाब खुद देते हैं। मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा, अपनी माता जी को भी कहाँ बोलने दे रहे थे? अच्छा नंदा, तेरे पास आलोक की माँ या बहन का नंबर है क्या? आलोक तो शाम को ही बात करवा सकता है पर मैं थोड़ी फुरसत के समय बात करना चाहती हूँ। 

हाँ मम्मा, मैने आज ही अनामिका का नंबर लिया है। 

ठीक है, कल जरा याद दिलाना बेटा…. फोन करके उसकी माँ का हाल पूछूँगी। 

अगले दिन ग्यारह बजे के करीब नंदा की माँ ने फोन किया-

हाँ बेटा… अनामिका, मैं नंदा की माँ… नंदा ने बताया कि आजकल तुम घर पर रहकर ही पढ़ाई कर रही हो। तुम्हारी मम्मी की तबियत कैसी है, बात तो करवाओ जरा। 

जी आँटी, लीजिए बात कीजिये मम्मी से। 

औपचारिक बातचीत के बाद जैसे ही आलोक की माँ ने कहा– आने का तो बड़ा मन था पर पैर में हल्की सी मोच आ गई थी। 

उनके इतना कहते ही नंदा की माँ के कान खड़े हो गए पर उन्होंने सामान्य रूप से बातचीत पूरी की। उन्हें आलोक की माँ बहुत ही सभ्य और सुलझी हुई लगी पर उनके दिमाग में एक ही बात बार- बार घूम रही थी कि आलोक के पिता बुखार कहा और माँ ने मोच बताई, आखिर इस साधारण सी बात में झूठ बोलने की क्या जरूरत थी? 

धीरे धीरे सगाई की तारीख नजदीक आने लगी। एक दिन फिर नंदा की माँ ने आलोक की माँ को साथ ही खरीददारी करने का न्यौता दिया क्योंकि अगर दोनों बच्चों के साथ परिवार के बड़े भी रहे तो खरीददारी में आसानी रहेगी। आलोक की माँ उनके इस फैसले से एकदम सहमत और खुश थी पर जिस दिन और जिस स्थान पर मिलने की बात तय हुई थी, वहाँ निरंजन सिंह और अनामिका को देखकर, नंदा फिर उदास हो गई। इस बार निरंजन सिंह ने कहा कि उनकी माता जी की तबियत ठीक नहीं थी इसलिए आलोक की माँ ने कहा कि बच्चों की पसंद के अनुसार ही तो खरीददारी करनी है फिर उनके ना  जाने से ज्यादा फर्क नहीं पडे़गा। 

नंदा की माँ थोड़ी असहज सी हो गई पर उन्होंने जल्दी ही खुद को संभाला और बच्चों की खरीददारी में सहायता करने लगी। 

घर आकर नंदा के माता पिता ने तय किया कि सगाई से पहले वे आलोक की माँ से किसी न किसी तरह अवश्य मिलेंगे, बस तीसरे ही दिन दोनों पति पत्नी बारह बजे के करीब आलोक के घर जा पहुँचे। दरवाजा खुलने पर उन्होंने देखा कि एक बेहद दुबली पतली एकदम काले रंग की औरत खडी़ थी, जिसने दुपट्टे से अपना सिर ढका हुआ था। उसे देखकर नंदा के माता पिता को लगा कि शायद घर का काम करने वाली होगी। उन्होंने कहा– निरजंन सिहं तो इस समय घर पर नहीं होंगे, उनकी माता जी या पत्नी को बुला दीजिये। 

उस स्त्री ने बड़े ही आदर के साथ उन्हें ड्राइंगरुम में बैठाया

और बोली–

अम्मा, जरा बाहर तो आइए, मेहमान आएँ है ं आपसे मिलने। 

पर जैसे ही आलोक की दादी ने कमरे में पैर रखा उनका चेहरा सफेद पड़ गया जिसे नंदा के माता पिता ने पढ़ लिया। दादी के पास उस डरावनी स्त्री को बैठते देख नंदा की माँ ने पूछा–

माता जी, इनका परिचय….. 

ये मेरी बहू अन्नपूर्णा है। आलोक और अनामिका की माँ। और बहू… ये तेरे होने वाले समधी समधन है। 

इतना सुनते ही आलोक की माँ का चेहरा पीला पड़ गया, वे तुरंत खडी़ हो गई। 

बैठिए बहनजी, आप खडी़ क्यों हो गई? आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी इसलिए आज अचानक आकर अपनी यह इच्छा पूरी करनी पड़ी। 

तभी अन्नपूर्णा जी चाय नाश्ता ले आई पर उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। यहाँ तक कि चाय देते समय उनके हाथ काँप रहे थे। तभी दादी ने उनका हाथ पकड़कर बैठाया और बोली–

डरने की बिलकुल जरूरत नहीं… जो होगा देखा जाएगा। उसके बाद उन्होंने नंदा के माता पिता की तरफ देखकर कहा-

बेटा, शायद तुम्हारे मन में हजारों सवाल उठ रहे होंगे। ईश्वर की बड़ी कृपा है कि आज आपको सच्चाई बताने का मौका मिल गया। निरंजन ने कभी अपनी पत्नी को ना तो सम्मान दिया और ना ही पत्नी का अधिकार…. उसके लिए ये केवल साधन मात्र है दो घड़ी के सुख का। दरअसल हर कोई बाहरी सुंदरता को देखता है जबकि #असली खूबसूरती मन की होती है। मेरी बहू ऐसा कोहिनूर है जो किस्मत से मिलता है। 

इतना कहकर दादी की आँखों से आँसू बह निकले। सास की बातों से अन्नपूर्णा जी में न जाने कहाँ से इतनी हिम्मत आ गई कि उसके बाद की अपनी पूरी कहानी उन्होंने खुद बताते हुए कहा-

जब विवाह के बाद मेरे पति ने मेरे रंग रुप के कारण मुझे ह्रदय से स्वीकार नहीं किया तो मेरे सास ससुर ने पहले मेरी शिक्षा पूरी करवाई, भाग्य से मुझे प्राइमरी सरकारी स्कूल में नौकरी भी मिल गई। इसी बीच आलोक और अनामिका का भी जन्म हुआ पर अम्मा ने मेरी शिक्षा में बाधा नहीं आने दी। मेरे सास ससुर ने माता पिता बनकर मुझे मेरे पैरों पर खड़ा किया। मुझे माफ करना, आपसे न मिलने का कारण यह था कि मेरे पति को मुझसे शर्म आती है, मैं घर में किसी भी तरह की कलह नहीं चाहती थी इसलिए मैनें अम्मा,आलोक और अनामिका को चुप रहने को कहा। लेकिन आप मेरा यकीन कीजिये, मेरे आलोक में अपने पिता का एक भी गुण नहीं है, उसमें अम्मा और बाबा के संस्कार है। वह नंदा को भरपूर मान और प्यार देगा। 

नंदा के माता पिता ने जब घर लौट कर नंदा को सारी बातें बताई तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि आलोक ने उससे इतनी बड़ी बात कैसे छिपाई। इधर जब दादी ने अपने बेटे और पोते को नंदा के माता पिता के आने की खबर दी तो आलोक यह सोचकर शर्म से गड़ गया कि कैसे नंदा का सामना करेगा? निरंजन सिंह ने तो वही हाय तौबा मचाई जिसकी उनसे उम्मीद थी। 

आलोक ने नंदा को कई फोन किए पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। अगले दिन आफिस में पहुँचने पर आलोक ने नंदा से माफी माँगते हुए कहा कि माँ के कहने पर पापा की हाँ में हाँ मिलानी पड़ी वरना वह पहले ही दिन सब कुछ बता देता। 

नंदा ने  कहा-

देखो आलोक, अभी  सगाई नहीं हुई है और मुझे यह बात बिलकुल भी पसंद नहीं कि आपस में कोई बात एक दूसरे के साथ साझा ना की जाए क्योंकि मेरे परिवार में ऐसा नहीं होता। मैं तो सोच भी नहीं सकती कि तुम अपनी माँ को माँ कहने में शरमा सकते हो? तुम इतने बड़े होकर अपनी माँ को उनका अधिकार नहीं दिलवा सकते…. 

नहीं नंदा, ये माँ का आदेश था वरना मैं कभी चुप न रहता। 

आज नंदा ने आलोक को अंदर तक झकझोर दिया था। शाम को घर जाते ही उसने  पिता से कह दिया कि अगर उन्हें उसकी माँ से शर्म आती है तो वे परिवार को छोड़कर जा सकते हैं क्योंकि अब वे दोनों भाई- बहन अपनी माँ के बिना किसी भी सामाजिक कार्य में हरगिज़ नहीं जाएँगे। 

आलोक की दृढ़ता देखकर दादी का बूढा ़ चेहरा जय जयकार कर रहा था और निरंजन सिंह की मानो पल भर में ही कमर टूट गई थी। 

जिस समय सगाई के अवसर पर दादी ने कहा- 

अन्नपूर्णा, आगे आओ बेटा, अपनी बहू को चुनरी चढ़ाओ, तो नंदा की आँखें खिल उठी। और सबसे ज्यादा खुशी तो तब हुई जब पूरे परिवार का फोटो खिंचता देख निरंजन सिंह अन्नपूर्णा की बराबर में आ खड़े हुए। 

करुणा मलिक 

# असली खूबसूरती मन की होती है।

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