विदाई की शहनाई की गूंज अभी कानों में ताज़ा ही थी कि मायके की दहलीज छूट गई और ससुराल का भव्य दरवाजा सामने आ खड़ा हुआ। नैना, जिसने अभी-अभी नई-नवेली दुल्हन के रूप में इस ‘चौधरी विला’ में कदम रखा था, का दिल किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था।
गाड़ी से उतरते ही पड़ोस की काकी और दूर की कुछ रिश्तेदार औरतें, जो रस्मों के नाम पर उसे घेर कर खड़ी थीं, फुसफुसाने लगीं। उनमें से एक, जिनकी आवाज़ में शहद कम और मिर्च ज़्यादा थी, नैना के कान के पास आकर बोली, “बेटी, भगवान ही मालिक है तेरा। तेरी सास, सुभद्रा देवी… उफ़! पूरा शहर थर्राता है उनके नाम से। अनुशासन की ऐसी पक्की हैं कि उनके घर में घड़ियाँ भी उनसे पूछकर चलती हैं। ज़रा सी गलती हुई नहीं कि समझो महाभारत शुरू। बहुत संभलकर रहना, यहाँ बहुओं को सांस लेने की भी इज़ाज़त लेनी पड़ती है।”
नैना ने घूंघट की आड़ से अपनी सास की ओर देखा। सुभद्रा देवी—चेहरे पर एक सख्त गंभीरता, आँखों में एक तीखापन और चाल में एक ऐसा रौब जो किसी सेनापति को भी मात दे दे। उन्होंने नैना को देखा, न मुस्कुराईं, न गले लगाया, बस कड़क आवाज़ में कहा, “अंदर चलो, मुहूर्त निकल रहा है।”
उस रात नैना को नींद नहीं आई। उसके कानों में बुआ सास और काकी की बातें गूंज रही थीं। नैना एक चित्रकार थी। रंगों से खेलना, कैनवस पर अपनी भावनाओं को उकेरना उसकी ज़िंदगी थी। लेकिन शादी तय होते ही उसके पिताजी ने कहा था, “बेटा, वो बहुत बड़ा और रसूखदार खानदान है। वहाँ ये पेंटिंग-वेंटिंग नहीं चलेगा। ससुराल में गृहस्थी संभालना ही धर्म है। अपने रंग और ब्रश यहीं छोड़ जा।”
नैना ने भारी मन से अपने सारे कैनवस, अपने ईज़ल और वो सारे रंग मायके के स्टोर रूम में बंद कर दिए थे। वह ससुराल तो आ गई थी, लेकिन अपनी आत्मा को पीछे छोड़ आई थी। उसे लगा कि अब उसकी ज़िंदगी सिर्फ़ रसोई के मसाले और सुभद्रा देवी के कड़े नियमों के बीच ही सिमट कर रह जाएगी।
अगली सुबह, नैना ब्रह्म मुहूर्त में ही उठ गई। उसे डर था कि कहीं देर न हो जाए। उसने जल्दी-जल्दी स्नान किया और रसोई में जा पहुँची। अभी सुबह के पांच भी नहीं बजे थे। वह चाय बनाने की तैयारी कर ही रही थी कि पीछे से भारी कदमों की आहट सुनाई दी।
नैना का दिल धक से रह गया। सुभद्रा देवी वहां खड़ी थीं। उन्होंने नैना को ऊपर से नीचे तक देखा।
“इतनी सुबह क्यों उठी हो?” सुभद्रा देवी की आवाज़ में वही कड़कपन था।
“वो… माँजी… चाय बनाने…” नैना हकलाते हुए बोली।
“रसोइया है घर में, वो बना लेगा। अभी जाओ, तैयार हो जाओ। साड़ी पल्लू ठीक से लेना। आज मुँह दिखाई की रस्म है। और हाँ, ज़्यादा बोलना नहीं है। जो पूछा जाए, सिर्फ़ उसका जवाब देना।” इतना कहकर सुभद्रा देवी वहां से चली गईं।
नैना की आँखों में आँसू आ गए। उसे लगा कि लोगों ने सही कहा था। यहाँ तो अपनी मर्जी से चाय बनाने का भी हक़ नहीं है। दिन भर रस्में चलीं। नैना एक गुड़िया की तरह सजी-धजी बैठी रही। औरतें आतीं, उसका चेहरा देखतीं, और फिर सुभद्रा देवी की तरफ देखकर धीमी आवाज़ में बातें करतीं। नैना को हर पल ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी पिंजरे में बंद है।
तीसरे दिन की बात है। दोपहर का समय था। घर के पुरुष काम पर जा चुके थे। नैना अपने कमरे में बैठी थी। उसका हाथ अनायास ही मेज पर रखे पानी के गिलास के पास पड़े एक पेन की ओर बढ़ा। पास ही एक टिश्यू पेपर रखा था। उसने पेन उठाया और अनजाने में ही उस टिश्यू पेपर पर एक स्केच बनाने लगी। उसका हाथ सधे हुए कलाकार की तरह चल रहा था। कुछ ही पलों में उस पेपर पर एक उदास लड़की का चेहरा उभर आया जो खिड़की से बाहर देख रही थी।
तभी दरवाजे पर आहट हुई। नैना हड़बड़ा गई। उसने तुरंत वह टिश्यू पेपर मोड़कर अपनी मुट्ठी में छिपा लिया। सामने सुभद्रा देवी खड़ी थीं।
“क्या छिपाया तुमने?” सुभद्रा देवी की नज़र बाज़ जैसी थी।
“कु… कुछ नहीं माँजी,” नैना पसीने से तर-बतर हो गई।
“खोलो हाथ,” आदेश हुआ।
नैना ने कांपते हाथों से मुट्ठी खोली। सुभद्रा देवी ने वह मुड़ा-तुड़ा टिश्यू पेपर उठाया और उसे सीधा किया। नैना ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे लगा अब प्रलय आएगी। अब ताने मिलेंगे कि काम-धाम छोड़कर ये क्या लकीरें खींच रही हो।
सुभद्रा देवी ने उस स्केच को गौर से देखा। एक पल के लिए उनके चेहरे के भाव को पढ़ना मुश्किल था। फिर उन्होंने नैना की ओर देखा और बिना कुछ बोले कमरे से चली गईं। नैना धम्म से बिस्तर पर बैठ गई। वह जानती थी कि यह खामोशी तूफ़ान से पहले की है। रात को ज़रूर सबके सामने उसकी क्लास लगेगी।
शाम को सुभद्रा देवी ने नैना को आवाज़ दी। “नैना, तैयार हो जाओ।”
नैना का दिल बैठ गया। “जी माँजी… कहाँ जाना है?” उसने डरते-डरते पूछा। शायद मायके भेजने की तैयारी हो रही हो? या किसी मंदिर में कसम खिलाने ले जा रही हों?
“सवाल मत करो। जो कहा है, वो करो। और साड़ी नहीं, कोई ढंग का सूट पहन लो। चलने में आसानी होगी।”
नैना ने चुपचाप आज्ञा का पालन किया। वह कार में पिछली सीट पर सुभद्रा देवी के साथ बैठी। पूरा रास्ता खामोशी में बीता। नैना की हथेलियाँ पसीने से गीली हो रही थीं। कार शहर के भीड़भाड़ वाले इलाक़े से निकलकर एक शांत, पॉश कॉलोनी की तरफ मुड़ गई।
गाड़ी एक बड़ी सी इमारत के सामने रुकी जिस पर लिखा था – “आकृति आर्ट गैलरी”।
नैना को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वह हतप्रभ होकर सुभद्रा देवी को देखने लगी। सुभद्रा देवी ने ड्राइवर को इशारा किया और कार से उतर गईं।
“उतरो,” उन्होंने नैना से कहा।
नैना किसी सम्मोहित व्यक्ति की तरह उनके पीछे-पीछे चली। गैलरी के अंदर दीवारों पर शानदार पेंटिंग्स लगी थीं। रंगों की खुशबू ने नैना के अंदर सोए हुए कलाकार को झकझोर कर जगा दिया।
सुभद्रा देवी सीधे गैलरी के मैनेजर के पास गईं। मैनेजर उन्हें देखते ही खड़ा हो गया। “नमस्कार मिसेज चौधरी! कैसे आना हुआ?”
सुभद्रा देवी ने अपने पर्स से वही मुड़ा-तुड़ा टिश्यू पेपर निकाला और मैनेजर के सामने रख दिया।
“यह स्केच मेरी बहू ने बनाया है, महज़ दो मिनट में, वो भी एक टिश्यू पेपर पर,” सुभद्रा देवी की आवाज़ में एक अजीब सा गर्व था। “मुझे बताओ, क्या तुम्हारे पास कोई ऐसा कैनवस है जो इसके हुनर को संभाल सके?”
नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह अवाक खड़ी अपनी सास को देख रही थी।
सुभद्रा देवी ने पीछे मुड़कर नैना को देखा। उनके चेहरे की सख्ती थोड़ी पिघल गई थी।
“क्या देख रही हो? मैनेजर साहब पूछ रहे हैं कि तुम्हें ऑइल पेंट्स चाहिए या एक्रेलिक? मुझे इन सब का पता नहीं है, तुम खुद बताओ।”
“मा… माँजी… ये…” नैना के गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। “आपने तो…”
सुभद्रा देवी नैना के करीब आईं। उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा—पहली बार। वह स्पर्श सख्त नहीं, बल्कि बेहद मज़बूत और भरोसा देने वाला था।
“नैना,” सुभद्रा देवी ने धीमे स्वर में कहा, “जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, तो मुझे लिखने का बहुत शौक था। कविताएं लिखती थी। लेकिन उस ज़माने में बहुओं का पढ़ना-लिखना अच्छा नहीं माना जाता था। मेरी सास ने मेरी डायरी चूल्हे में झोंक दी थी। उस दिन मैंने कसम खाई थी कि अगर कभी मैं सास बनी, तो अपनी बहू के सपनों को चूल्हे की आग में नहीं जलने दूँगी।”
नैना की आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे।
सुभद्रा देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से उसके आंसू पोंछे। “रो मत पगली। लोग कहते हैं मैं सख्त हूँ, कड़क हूँ। हूँ मैं सख्त। क्योंकि अगर मैं सख्त न होती, तो इस ज़माने के दकियानूसी रिवाज़ मेरे घर की औरतों को कब का निगल गए होते। मैंने अनुशासन इसलिए बनाया ताकि मेरा घर सुरक्षित रहे, इसलिए नहीं कि किसी का दम घुट जाए।”
उन्होंने गैलरी में रखे कैनवस और रंगों के सेट की ओर इशारा किया।
“तुम्हारे पिताजी ने शादी के वक़्त कहा था कि तुम बहुत अच्छा चित्र बनाती हो, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अब तुम्हें गृहस्थी संभालनी है। मैंने उसी वक़्त सोच लिया था कि गृहस्थी संभालने के लिए हाथ चाहिए होते हैं, और सपने पूरे करने के लिए पंख। मेरे घर की बहू के पास दोनों होंगे।”
नैना ने सुभद्रा देवी के पैर छू लिए। सुभद्रा देवी ने उसे गले लगा लिया।
“अब खड़ी-खड़ी मेरा मुँह क्या देख रही हो?” सुभद्रा देवी ने अपनी पुरानी कड़क आवाज़ में वापस लौटते हुए कहा। “जाओ, अपने पसंद के रंग और ब्रश चुनो। मैंने घर की तीसरी मंज़िल वाला कमरा खाली करवा दिया है। वहां रोशनी बहुत अच्छी आती है। कल से तुम्हारी सुबह चाय बनाने से नहीं, रंगों को मिलाने से शुरू होगी। समझीं?”
नैना ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। “जी माँजी।”
दुकानदार जब नैना को सामान पैक करके दे रहा था, तो नैना को याद आया कि पड़ोस की काकी ने क्या कहा था—“सास के तेवर से बचकर रहना।” नैना मन ही मन हंसी। हाँ, सास के तेवर तेज़ ज़रूर थे, लेकिन वे तेवर उसे डराने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया से लड़कर उसे उसके सपने वापस दिलाने के लिए थे।
उस दिन नैना समझ गई कि नारियल बाहर से चाहे जितना कठोर हो, अंदर से उतना ही मीठा और शीतल होता है। सुभद्रा देवी ने नैना को सिर्फ़ एक बहू का दर्जा नहीं दिया था, बल्कि उसे उसका खोया हुआ अस्तित्व लौटा दिया था। घर लौटते वक़्त नैना की गोद में रंगों का डिब्बा था और दिल में अपनी “खतरनाक” सास के लिए बेइंतिहा इज़्ज़त।
लेखिका : गरिमा चौधरी