साजिश परिवार में होता है क्या – रोनिता कुंडु : Moral Stories in Hindi

मम्मी जी! वह आप लोगों से पापा की बात हुई थी ना मेरी पढ़ाई को लेकर? मेरा काफी क्लास छूट गया है, शादी की वजह से, सोच रही हूं कल से ही कॉलेज जाना शुरू कर दूं, परीक्षा भी जल्द ही होनी है, नव्या ने अपनी सास प्रभा जी से कहा 

प्रभा जी:  हां बात तो हुई थी तुम्हारी पढ़ाई की, पर इस बात पर सोचने के लिए हमें भी थोड़ा समय चाहिए और सवा महीने तक तो तुम कहीं जा भी नहीं सकती, यह हमारे यहां की रीत है, ऐसे में कल से कॉलेज जाने का तो सवाल ही नहीं उठता, सवा महीने बीत जाए फिर सोचते हैं। 

नव्या: अब आगे क्या ही बोलती? नई नवेली दुल्हन को तो हर रीत निभानी ही पड़ती है, तो उसने अपने सहेलियों से पढ़ाई का सारा कुछ पूछ पूछ कर घर से ही अपनी पढ़ाई को जारी रखा, इसी तरह सवा महीने गुज़र जाते हैं, फिर नव्या बड़े आस के साथ प्रभा जी से कॉलेज जाने की बात करती है।

प्रभा जी:   बहु, मैं देख रही हूं तुम्हारी घर गृहस्ती से ज्यादा कॉलेज पर ध्यान है! अरे नई-नई शादी हुई है, कहां घर के कामकाज हमारे रीति रिवाज़ को सिखने में मन लगाना चाहिए तो कहां तुम बस कॉलेज में फंसी पड़ी हो? अच्छा यह बताओ शादी तो हो गई ना? अब पढ़कर कौन सा कलेक्टर ही बन जाओगी और ऐसा भी नहीं है हमारे यहां किसी चीज़ की कमी है, जो तुम्हारे कमाने से पूरी हो जाएगी, अच्छा खासा कमाता है मेरा गौरव, तो उसे और घर को संभालो और ऐश करो। 

नव्या:  मम्मी जी! आपसे किसने कहा कि मैं इस घर की तंगी मिटाने के लिए पढ़ना चाहती हूं, मेरा बचपन से ही सपना रहा है कि मैं पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं और तभी इस शादी के लिए भी हां कहा था मैंने, क्योंकि इसी शहर में रहने से मेरी पढ़ाई भी जारी रहेगी और मेरे पापा ने शादी से पहले ही आपको सब कुछ बताया भी था, उस वक्त तो आपने भी हां कहा था, फिर कहां के सवा महीने के बाद कॉलेज जाना, पर अब जब सवा महीने बीत गए, आप कुछ और ही कह रही हो! 

प्रभा जी:   तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे की शादी करके एहसान ही कर दिया हो! अच्छा अब तुम्हें मेरी बात बुरी लग रही है? जाकर देखो कौन सी बहू अपने घर परिवार को छोड़कर पढ़ाई में अपना समय देने की सोच रही है और मैंनें गौरव की शादी भी इसलिए कराई कि उसकी पत्नी आकर इस घर को संभाले, पर यहां तो सब उल्टा ही हो रहा है, यह तो आते ही बस कॉलेज की रट लगाए जा रही है, देखो मैंने जो कहना था कह दिया, अब तुम्हें जो ठीक लगे वह करो, गौरव से भी पूछ लो ज़रा।

नव्या इसके बाद रात को गौरव को सारी बात बताती है, जिस पर गौरव कहता है, देखो नव्या! मम्मी ज़रा पुराने ख्याल की है, तुम अभी-अभी इस घर में आई हो, यही समय है तुम दोनों में अच्छे रिश्ते बनाने का, ऐसे में तुम अपना पूरा समय पढ़ाई कॉलेज में लगाओगी तो उनसे कभी जुड़ ही नहीं पाओगी, तो क्यों न बीच का हल निकाल लिया जाए? 

नव्या:   क्या मतलब? 

गौरव:  तुम कॉलेज जाकर बात करो कि तुम पढ़ाई घर से कर लोगी और केवल परीक्षा देने कॉलेज आ पाओगी, ऐसे में तुम्हारी पढ़ाई भी नहीं रुकेगी और मम्मी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी, 

नव्या गौरव की इस बात से पूरी तरह सहमत तो नहीं थी, पर इसके अलावा और कोई रास्ता भी उसे सूझ नहीं रहा था, फिर वह गौरव से कहती है, मेरे जो कोई सवाल होंगे उसका हल फिर कैसे मिलेगा? मुझे तो यह समझ नहीं आ रहा है कि घर का सारा काम निपटा कर जाऊंगी और आकर बाकी का निपटा लूंगी, फिर तो सारा समय घर पर ही रहूंगी मम्मी जी के साथ, फिर ना जाने मम्मी जी क्यों मना कर रही है?

नव्या यह सब गौरव से कह ही रही थी कि, तभी प्रभा जी उनके कमरे में बाहर से गुज़र रही थी, वह अंदर जाकर कहती है, बहू मुझे गलत मत समझना, मैं तुम्हारी पढ़ाई के खिलाफ नहीं हूं, मैं तो बस इतना चाहती हूं कि मेरे सामने तुम सब कुछ सीख लो और एक कुशल गृहणी बन जाओ, हर चीज़ की एक उम्र होती है, जितना पढ़ना था पढ़ लिया, अब समय है घर परिवार को संभालने का, अब मेरी तबीयत भी सही नहीं रहती, जाने कब बुलावा आ जाए? अगर फिर भी तुम्हें पढ़ना है तो 6 महीने इस घर को दे दो, फिर शुरू कर देना पढ़ाई। 

नव्या:   मम्मी जी! पढ़ाई के बीच में 6 महीने रुक जाऊं तो वहीं पढ़ाई का इच्छा नहीं रहती है और एक बार यह समय निकल गया तो मुझे दोबारा से शुरू करनी पड़ेगी, मेरा सारा किया कराया बेकार हो जाएगा, खैर जाने दीजिए इन सारी बातों को, मैं आप दोनों को एक अच्छी गृहणी बन कर दिखाऊंगी, इस बात को गुज़रे अभी एक दिन ही बीता था, तभी एक दिन नव्या रसोई में काम करते हुए, बीच में ही प्रभा जी से यह पूछने जाती है कि कौन सी दाल बनाऊं? पर जैसे ही वह प्रभा जी के कमरे तक पहुंचती है, उसके पैर ठिठक जाते हैं और वह वही दरवाजे पर ही खड़ी होकर प्रभा जी की फोन पर चल रही बातें, अपनी बेटी अंकित के साथ सुनने लगती है, उन बातों को सुनकर तो उसके अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था। 

फोन पर प्रभा जी:  अंकिता! तूने क्या अपनी मम्मी को कोई कच्ची खिलाड़ी समझा है? सब समझती हूं यह आजकल की लड़कियों के चोंचले, पहले पढ़ाई पढ़ाई की रट्टा लगाएगी, फिर नौकरी की और अंत में घर की सारी जिम्मेदारी सांस पर लाद कर खुद मस्ती करेगी, मैंनें ऐसी साजिश की है कि उसकी कभी नौबत ही नहीं आएगी, पहले सवा महीने रोका, अब 6 महीने और 6 महीनो में पढ़ाई का भूत उसके सर से खुद ही उतर जाएगा और तेरी भी तो इच्छा थी कि जब तू मायके आए छुट्टियां मनाने, तेरी सेवा के लिए तेरी भाभी हो, अब तू भी यहां आराम करने जब तब आ सकेगी, पर यह काम इतना आसान नहीं था, उसे डांट डपट कर, यह सब तो नहीं करवा पाती, इसलिए घर परिवार, रीति रिवाज़ का बहाना बनाना पड़ा। 

नव्या पहले तो बड़ी दुखी हुई, पर फिर उसने सोचा के अब दुखी होने का वक्त नहीं है, इनकी साजिश को नाकाम करने का वक्त है, उसने पहले तो अपनी पढ़ाई 6 महीना के लिए स्थगित करने की सोची थी, पर अब उसने तय किया कि वह पढ़ेगी भी और अपने पैरों पर खड़ी भी होगी और यह सब उसे चुपचाप करना होगा, उसने ऑनलाइन क्लासेस में एडमिशन कराया और अपने खाली समय में पढ़ाई करती रही, उसने अपना पीजी खत्म किया और साथ-साथ तरह-तरह की नौकरियों की परीक्षाएं भी देने लगी, इसी बीच प्रभा जी ने उसे पोते का मुंह दिखाने को भी कहने लगी, नव्या जान चुकी थी यह भी उसकी सास की, की गई एक साजिश का ही हिस्सा है, क्योंकि बच्चा होने के बाद नव्या और भी बंध जाती, इसलिए नव्या ने अपनी तैयारी खामोशी के साथ जारी रखी और प्रभा जी के बातों को एक कान से डालकर दूसरे से निकाल दिया और ऐसे ही पूरे 1 साल बीत गए और इन 1 सालों में नव्या ने एक सुशील बहू का पूरा-पूरा कर्तव्य निभाया और अपने सपनों को भी चुपचाप पंख देती रही, फिर एक दिन सुबह नव्या जाकर प्रभा जी के पैर छूकर आशीर्वाद लेती है, तो प्रभा जी खुश होकर कहती है, क्या बात है बहू? जिस खबर को मैं कब से सुनने को तरस रही थी वही खबर देने आई हो क्या? 

नव्या:  हां हां मम्मी जी! ऐसी ही कोई खबर समझ लिजिए 

प्रभा जी:  मतलब मैं दादी बनने वाली हूं? हे भगवान आपने मेरी सुन ली! अब मैं आपके दर्शन करने आऊंगी नंगे पैर! 

तब तक गौरव भी वहां आ जाता है उसे देखते ही प्रभा जी उससे कहती है, गौरव कल ही हम कुलदेवी के मंदिर चलेंगे, तू पूरे 5 किलो लड्डू ले लेना। 

गौरव हैरान होकर:  ऐसा भी क्या हो गया मम्मी? 

प्रभा जी:  हे मेरा पगला बेटा, बाप बनने चला है और अभी भी बच्चों वाली बातें ही करता है। 

गौरव:  क्या? यह कब हुआ नव्या तुमने मुझे कुछ बताया क्यों नहीं? 

नव्या:  मैंने बताया तो मम्मी जी को भी यह नहीं, बस पैर छूकर आशीर्वाद लिया, मम्मी जी ने खुद ही सब कुछ सोच लिया! 

प्रभा जी:   हां तो यह बाल धूप में सफेद नहीं हुए हैं, चेहरा देखकर इंसान की तबीयत बता सकती हूं, गौरव! अबसे बहू का पूरा ध्यान रखना है समझा? 

नव्या:   मम्मी जी! थोड़ा ठहर जाइए, मेरी पूरी बात तो सुन लीजिए, मैंने आपके पैर इसलिए नहीं छुए कि मैं मां बनने वाली हूं, बल्कि इसलिए छुए कि मेरी नौकरी लग गई है और आपकी साजिश नाकाम हो गई है। 

गौरव:   यह क्या बोले जा रही हो तुम नव्या? मम्मी है वह मेरी और कौन सी साजिश की बात कर रही हो तुम? 

नव्या:  यह आप मम्मी जी से ही पूछ लीजिए, कि अंकिता दीदी के साथ मिलकर कौन सी साजिश रची थी इन्होंने? 

मम्मी जी! अगर आपने सच में ईमानदारी से जो बात मेरे सामने की थी, वही सोचती, तो शायद सच में, मैं अपने सपनों को कुर्बान भी कर देती, मैं ही क्यों हम जैसी कितनी लड़कियां ऐसे ही तो अपने सपनों को अपने ही पैरों से कुचलती है, पर जब उसी कुर्बानी को साजिश के साथ करवाया जाए, फिर तो सच में बदले की भावना जाग जाती है और मेरे साथ वही किया आपने, आप चाहती थी ना मैं पढ़ाई करके नौकरी ना करूं, ताकि आप और दीदी मजे से आराम कर सके, तो करना अब आराम, बस मैं नहीं होगी घर पर, 

गौरव:   मम्मी! यह सब क्या कह रही है नव्या? साजिश परिवार में होता है क्या? और मैं इसे ही समझाता रहा की मम्मी से जुड़ने की कोशिश करो, पर यहां दूरियों का बीजारोपण तो आपने पहले ही कर दिया, लो मम्मी अब यह जिंदगी भर की दूरियां मुबारक हो। 

प्रभा जी सर झुकाए चुपचाप खड़ी थी, वह कहती भी क्या? तभी नव्या कहती है, मम्मी जी! भले ही आपने मेरे लिए कुछ और सोचा था, पर मैंने आपके लिए भी कुछ सोचा है, एक साजिश आपने मुझे घर में बांधने की, की थी और अब एक पहल मैंने आपकी सोच बदलने की की है, मम्मी जी! जरूरी नहीं की बहू अगर पढ़ लिखकर कुछ करना चाह रही है, तो अपनी गृहस्ती को अनदेखा कर देगी, बल्कि अगर उसे अपने परिवार का साथ मिले तो वह दोनों को संभाल कर मुसीबत में परिवार का ही ढाल बनकर खड़ी होगी, औरत अगर घर संभाले या नौकरी करते हुए घर संभाले, वह हर हाल में अपना 100% देगी, पर यह सारी साजिशे, उसे बगावत करने पर मजबूर कर देती है और फिर इसी तरह वह बदनाम भी हो जाती है, पर आप निश्चिंत रहिए मैं कभी भी आपको बदनाम नहीं करूंगी और एक सुशील बहू के पूरे कर्तव्य भी निभाऊंगी, 

प्रभा जी निशब्द खड़ी सोच रही थी कि उन्होंने क्या सोचा और अंत में क्या हुआ? प्रभा जी आज अगर यहां कुछ अलग सोचकर अपनी बहू का साथ देती, तो शायद आज का मंजर कुछ और ही होता, पता नहीं जब तक एक औरत घर संभालती है, तब तक उसको कोई दिक्कत नहीं होती, पर जैसे ही उसकी बहू उस घर में आ जाती है, उसे हर काम करने में तकलीफ होने लगती है। वह चाहे तो एक मां का किरदार निभा सकती है, पर नहीं, उन्हें सास ही बनकर रहना है।   

दोस्तों, शादी के पहले अगर लड़कियों की अच्छी पढ़ाई ना हो, तो माता-पिता कहते हैं तेरी शादी करवा देंगे, पढ़ना लिखना तो तेरे बस का नहीं, जो पढ़ना चाहे तो ससुराल वाले की रजामंदी लेनी पड़ती है, क्यों हमेशा लड़कियों को अपनी इच्छाओं को शर्तों पर रखना पड़ता है? क्या जवाब है इसका किसी के पास?

धन्यवाद 

रोनिता कुंडु 

#साजिश

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