साजिश – नीरज श्रीवास्तव : Moral Stories in Hindi

  रश्मि की हालत नाजुक थी। बुखार से शरीर तप रहा था और सिर दर्द से फटा जा रहा था। वह घर के एक कोने में बैठी एक टक घड़ी की ओर निहार रही थी।  रात के नौ बज चुके थे। पर रमेश अभी  भी घर न आया था।

                 रश्मि की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी क्योंकि कम्बख्त फोन भी आज स्विच्ड ऑफ हो चुका था और ऊपर से लाइट भी न थी। बैठे-बैठे रश्मि अचानक अपनी ही स्मृतियों में खो गयी।

   कितना सुंदर दृश्य था। जब पहली बार किशोर और रश्मि अपने शहर के साइबर कैफे में मिले थे। रश्मि कैफे रुम का दरवाजा खोल अभी बाहर ही निकली थी कि वह एक युवक से जा टकराई। वह युवक कोई और नहीं बल्कि किशोर ही था।

रश्मि : बड़े बत्तमीज किस्म के आदमी हो? दिन में ही अँधेरा छा गया क्या? अंधे हो?? इतनी बड़ी इंसान तुम्हें नज़र नहीं आती।

किशोर : देखिए गलती आपकी है। आपने ही तेजी के साथ दरवाजा खोला था और अब सारा का सारा इल्जाम मुझ पर थोप रही हैं।

रश्मि : ओहो, तो आप यह कहना चाहते हैं कि सारी गलती मेरी है। वाह जी वाह। एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी। माफ़ी मांगने के बजाये तुम मुझमें ही गलतियाँ निकाल रहे हो। मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं।

किशोर : जी देखिए माफ़ी आपको मांगनी चाहिए मुझे नहीं और वैसे भी गलती आपकी है मेरी नहीं।

       दोनों आपस में जोर-जोर से चिल्लाते हुए लड़ने लगे। शोर-शराबा इतना बढ़ गया कि कैफे के मालिक को बीच में आना पड़ा। तब जाकर मामला रफा-दफा हुआ।

             कैफे में रश्मि और किशोर दोनों का आना जाना तो लगा ही रहता था। एक दिन रश्मि कैफे से घर जा रही थी। तभी पीछे से किशोर आया और बोला – जी सुनिए।

       रश्मि ने पीछे मुड़कर देखा तो किशोर खड़ा था। उसे देख तो जैसे रश्मि का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। रश्मि ने चिल्लाते हुए बोला – बीच सड़क पर लड़की छेड़ते तुम्हें शर्म नहीं आती।

किशोर ने सहमे आवाज़ में बोला: जी देखिए आप मुझे फिर गलत समझ रही हैं।

रश्मि : अगर मैं गलत समझ रही हूँ तो फिर आप मेरे सामने क्या कर रहे हैं?

किशोर ने रश्मि की ओर हाथ बढ़ाते हुए बोला – जी ये आपका पर्स है। जो गिर गया था। वही लौटाने आया था आपको। अब ये मत कहना कि आपका पर्स मैंने चोरी कर लिया था।

रश्मि ने पर्स को अपने हाथ में लेते हुए बोला – ठीक है, ठीक है।

रश्मि ने अपना पर्स लिया और चलते बनी। रश्मि घर तो चली आई थी। पर उसे लगा शायद उसे किशोर से इतनी बत्तमीजी से बात नहीं करना चाहिए था। आखिर किशोर उसका पर्स ही तो लौटाने आया था। उसका इरादा कुछ गलत नहीं था।

     रश्मि अगले दिन जब किशोर से मिली तो उसके तेवर कुछ बदले-बदले थे। रश्मि ने किशोर से माफ़ी मांगते हुए उसका शुक्रिया अदा किया। उसके बाद तो दोनों के बीच सम्बन्ध काफ़ी अच्छे बन गये थे। अब दोनों आपस में लड़ते न थें बल्कि एक दूसरे की हर प्रकार से मदद किया करते थे।

      समय बीतता गया। दोनों की दोस्ती कब प्यार में बदल गई उन्हें पता भी न चला और नौबत यहाँ तक आ गई की उन्होंने शादी करने का फैसला भी ले लिया।

        पर रश्मि के घरवालोंं को यह रिश्ता मंजूर न था। रश्मि अपने घरवालोंं के खिलाफ न जा सकती थी। इसलिए उसने बाद में शादी से इंकार कर दिया। पर किशोर के बार-बार उकसाने पर वह उनके खिलाफ शादी करने के लिए मान गई।

रश्मि ने किशोर से पूछा कि शादी के बाद हम कहाँ जायेंगे?

किशोर : हम लखनऊ जायेंगे। वहाँ मेरा भाई रहता है। वह वहाँ हमारे रहने की सारी वयवस्था कर देगा। तुम्हें टेन्शन लेने की कोई जरुरत नहीं है।

रश्मि : पर खर्चे के लिए पैसे भी तो चाहिए होंगे। वह हम कहाँ से लायेंगे।

किशोर : ओह, हो, कर दी न तुमने बेवकूफों वाली बात। अरे, मेरा भाई बहुत बड़ी कंपनी में काम करता है। उसने मेरे लिए बात कर रखा है। जाते-जाते मुझे काम मिल जायेगा। तुम खामो खा टेन्शन ले रही हो और हाँ कल ही हम लखनऊ के लिए रवाना हो रहे हैं।

रश्मि : पर इतनी जल्दी??

किशोर : इतनी जल्दी! अरे, तुम्हारे घरवालोंं को भनक भी लग गई ना? तो सारी प्लानिंग चौपाट हो जायेगी।

रश्मि : ठीक है।

रश्मि और किशोर अगली सुबह ही घर से भाग निकले और ट्रेन से लखनऊ के लिए रवाना हो गये। शाम तक दोनों लखनऊ पहुँच चुके थे। किशोर के भाई विक्की ने दोनों के लिए एक कमरे का अरेंजमेंट पहले ही कर दिया था।

        किशोर ने अगली सुबह रश्मि से बोला कि वह नहा-धोकर तैयार हो जाये ताकि कोर्ट के लिए वह दोनों जल्द से जल्द निकल पड़े और उनकी शादी हो सके। रश्मि के ख़ुशी का ठिकाना न था। किशोर ने जैसा कहा रश्मि ने वैसा ही किया।

        रश्मि तैयार थी। किशोर ने रश्मि से कहा कि कुछ अरेंजमेंट बाकी रह गये हैं। उसमें कुछ वक्त लगेगा। इसलिए मुझे थोड़े देर के लिए बाहर जाना होगा।

रश्मि : क्या काम है? मैं भी चलती हूँ ना।

किशोर : अरे यार, समझती क्यों नहीं। यह  एक सरप्राइज है। जो मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। बस आधे घंटे की बात है।

रश्मि : ठीक है लेकिन जल्दी आना।

किशोर : ठीक है जल्दी आ जाऊँगा अब जाऊँ।

रश्मि : हाँ, जाओ।

आधे घंटे से ज्यादा हो चुके थे। पर किशोर वापस न आया। रश्मि की चिंता बढ़ने लगी तो उसने किशोर को फोन किया। पर किशोर का फोन स्विच्ड ऑफ जा रहा था। रश्मि के समझ न आ रहा था कि वह क्या करें?

        तभी कमरे के बाहर एक दस्तक हुई। किसी ने दरवाजे को जोर से खटखटाया। रश्मि ने बिना वक़्त गवाये दरवाजे को खोल दिया। पर वह सामने देख हक्की-बक्की रह गई। सामने किशोर की जगह कोई और था।

रश्मि ने पूछा आप कौन है और आपको किससे मिलना है?

उस व्यक्ति ने कहा – मुझे किशोर से मिलना है। मैं उसका वकील हूँ। उसने अपने शादी के सिलसिले में मुझसे बात की थी। कुछ डॉक्यूमेंट्स चेक करने है।

रश्मि : ठीक है। फिर आप बाहर ही इंतजार किजिये क्योंकि किशोर घर पर नहीं हैं।

रश्मि ने अभी यह कहा ही था कि वकील तेज कदमों के साथ घर के अंदर घुस गया और अंदर से दरवाजे की कुण्डी को लगा दिया।

रश्मि ने गुस्से के साथ बोला – यह क्या बत्तमीजी है???

वकील – मैं कोई बत्तमीजी नहीं कर रहा। अब तुम मेरी हो। मैं जो चाहे वो करुँ। तुम मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकती।

वकील रश्मि को पकड़कर अपनी ओर खींचने लगा। रश्मि उसके इरादे समझ चुकी थी। इसलिए रश्मि जोर-जोर से चिल्लाने लगी –  बचाओ, बचाओ, किशोर कहाँ हो मुझे इस दरिंदे से जल्दी बचाओ।

तभी वकील ने हँसते हुए बोला – जितना चिल्लाना है चिल्ला ले क्योंकि कोई किशोर तुझे बचाने नहीं आयेगा। जिसे तू किशोर समझ रही है। वह किशोर नहीं, वह जुनैद है ,जुनैद। उसने तुझे मुझसे बेच दिया है और वो भी पूरे पच्चास हज़ार में। जुनैद वैसे भी बड़ा शातिर खिलाडी़ निकला। तुम्हें मुझसे बेच गया और तुम्हें पता भी न चला।

                रश्मि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। पहले उसे उस वकील की बात पर विश्वास ही न हुआ। पर जब किशोर काफ़ी समय तक न आया तो रश्मि का शक यकीन में बदल गया। रश्मि जान चुकी थी कि यह व्यक्ति भी कोई वकील न था। रश्मि एक साजिश का शिकार हो चुकी थी। जिसे आज तक वह अपना प्रेमी और हमदर्द समझ रही थी। वही सबसे बड़ा दगाबाज निकला।

          उस व्यक्ति ने रश्मि के कपड़े फाड़ दिये और उसके साथ जबरदस्ती करने लगा। रश्मि भी अब हिम्मत हार चुकी थी। इसलिए उसने भी उस व्यक्ति का विरोध करना छोड़ दिया।

  तभी कुछ देर बाद वह आदमी जोर से चिल्लाते हुए रश्मि से दूर हटा और उसे लात मारने लगा। रश्मि ने अपने दांतों से उस आदमी के एक कान को ऐसे काटा था कि वह लगभग उसके शरीर से अलग ही हो गया था। रश्मि का मुँह खून से लाल हो चुका था। ऐसे लग रहा था जैसे अभी-अभी किसी शेरनी ने किसी जंगली जानवर का शिकार किया हो।

           रश्मि ने मौके का फायदा उठाते हुए कमरे में पड़े स्टूल को उठा लिया और उस व्यक्ति की सिर पर दे मारा। वह व्यक्ति खून से लहू लुहान हो चुका था। वह अभी संभल पाता उससे पहले ही रश्मि दरवाजा खोल वहाँ से भाग निकली।

       अभी वह कुछ दूर भागी ही थी कि वह एक कार से जा टकराई और बेहोश हो गई। यह कार किसी और कि नहीं बल्कि रमेश की थी। रमेश ने जब रश्मि की ऐसी हालत देखी तो वह उसे अपने घर ले आया। रमेश पेशे से एक डॉक्टर था। इसलिए उसने उसका इलाज घर पर ही किया। वह चाहता था कि इसकी सूचना वह पुलिस को दे दे लेकिन उससे कही रश्मि की बदनामी ना हो जाये। इसलिए उसने ऐसा नहीं किया।

           रश्मि जब होश में आई तो उसने रमेश को सब सच-सच बता दिया। रश्मि अपने घर न जाना चाहती थी। आखिर वह अपने घरवालोंं को क्या मुँह दिखाती? लेकिन रमेश के घर पर वह कितने दिन रहती।

          एक दिन रमेश ने रश्मि से कहा कि वह उससे शादी करना चाहता है। पर रश्मि एक बार धोखा खा चुकी थी और एक साजिश का शिकार बन चुकी थी। इसलिए वह दुबारा किसी साजिश का शिकार न होना चाहती थी। अंततः रश्मि ने रमेश को शादी के लिया मना ही कर दिया। तब रमेश ने कहा कि अगर तुम्हारे मम्मी पापा चाहे तो क्या तब तुम मुझसे शादी करना चाहोगी?? रश्मि ने बोला वह मुझे कभी नहीं अपनाएंगे।

       तभी रश्मि के पीछे से आवाज आई। क्यों नहीं अपनाएंगे?? यह आवाज रश्मि के माँ बाप की थी। डॉक्टर रमेश ने पहले ही उन्हें सूचना दे दी थी और उन्हें बुलवा लिया था। अपने माँ बाप को देख रश्मि फुट-फुटकर रोने लगी। उसने उनसे अपने किये की माफ़ी मांगी और उन्हीं के कहने पर रमेश से शादी भी कर ली। आज दोनों बड़े ही खुश थें।

            रश्मि अपने बीते कल की स्मृतियों में गोते ही लगा रही थी कि तभी डोरबेल की आवाज सुन वह स्मृति से बाहर आई। शायद रमेश आ चुका था। रश्मि ने घड़ी की ओर देखा तो रात के दस बज रहे थे और अब घर में लाइट भी आ चुकी थी। बाहर दरवाजा खोला तो दरवाजे पर रमेश खड़ा था। रश्मि ने कहा – अब तुम आ गये ना। अब मेरा बुखार और सिर दर्द दोनों छू मंतर हो जायेगा।

(पूर्णतः सुरक्षित, स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना)

लेखक : नीरज श्रीवास्तव
        मोतिहारी, बिहार

सीख : इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि :
1. हमें कोई भी कदम उठाने से पहले उसके परिणाम के बारे में पहले सोच लेना चाहिए।

2. किसी पर विश्वास करने से पहले उसे अच्छे से परख लेना चाहिए।

3. अपने माँ बाप के निर्णय पर कभी भी संदेह नहीं करना चाहिए।

नोट : कहानी कैसी लगी। प्रतिक्रिया अवश्य दीजियेगा। धन्यवाद।

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