कभी-कभी मनुष्य भावनाओं में इतना बह जाता है कि अपना करीबी रिश्तेदार ही उसके खिलाफ साजिश रचता है और वह उसी को अपना हितैषी समझ बैठता है, परन्तु जब वही व्यक्ति अपनी साजिश से उसे सदा के लिए किसी मरूस्थल के सूखे और प्यासे पेड़ की तरह ठूॅंठ बनाकर चला जाता
है,तब उसकी ऑंखें खुलती हैं।सब कुछ लुट जाने पर होश में आने पर उसके लिए ‘ का वर्षा जब कृषि सुखाने ‘ वाला मुहावरा ही चरितार्थ होकर रह जाता है। हमारे पड़ोसी शर्मा दम्पत्ति इसी तरह की साज़िश के शिकार हो गए।
हमारे पड़ोस में यश शर्मा और नलिनी शर्मा दम्पत्ति रहते थे। शर्मा जी सरकारी नौकरी में थे और नलिनी जी गृहिणी। दोनों ही पति-पत्नी काफी हॅंसमुख और मिलनसार थे। उनके पास बड़ा घर, बड़ी गाड़ी सब कुछ था।उनके जीवन में बस एक औलाद की ही कमी थी।समय के साथ उन्होंने इसे ईश्वर की इच्छा समझकर अपने दिल को समझा लिया था।वे अपनी जिंदगी अपने ढ़ंग से खुशी-खुशी जीते थे।
अचानक से उनकी शांत जिन्दगी में हलचल हो उठी। कुछ दिनों पहले नलिनी जी की बहन अमिता उनके ही घर की ऊपरी मंजिल पर अपने पति और बच्चों के साथ रहने आ गई थी। बातों -बातों में पता चला कि अमिता के पति को व्यापार में काफी नुकसान हो गया था। बड़ी बहन का फर्ज निभाते हुए नलिनी जी ने उन्हें अपने घर में रहने को बुला लिया।
कभी-कभार नलिनी आंटी से मेरी मुलाकात हो जाया करती थी।मेरे बच्चे छोटे थे,इस कारण मैं भी व्यस्त रहती थी।एक दिन पार्क में नलिनी आंटी से मुलाकात हो गई।आंटी काफी खुश दिख रहीं थीं।उनके खिले-खिले चेहरे को देखकर मैंने पूछ ही लिया -“आंटी!क्या बात है?आज आप बड़ी खुश लग रही हो?”
आंटी ने उत्साहित होते हुए कहा -“हाॅं!मेरी छोटी बहन परिवार समेत मेरे पास रहने आ गई है!उसके दो बच्चे,एक बेटा और एक बेटी है।उन लोगों के आ जाने से मेरा खामोश घर गुलजार रहने लगा है।अमिता के पति अभी आर्थिक परेशानी में हैं,इस कारण दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च हमलोग ही उठाते हैं!”
मैंने अपनी समझानुसार कहा -“आंटी!इससे तो अच्छा था कि आप एक बच्चे को गोद ही ले लेती न!”
आंटी ने जबाव देते हुए कहा -“अरे!गोद क्यों लेना?ये तो अपने ही खून हैं।तुमने सुना नहीं कि खून पानी से ज्यादा गाढ़ा होता है!”
मैंने मन-ही-मन सोचा कि कभी-कभी खून के रिश्ते ही ऐसी साजिश रचते हैं कि उन पर सहसा विश्वास करना भी मुश्किल हो जाता है, परन्तु उसके बाद मैंने इस विषय पर आंटी से बात ही करना छोड़ दिया।जब कभी आंटी से मुलाकात हो जाती,तब आंटी ही खुश होकर दोनों बच्चों के बारे में बतातीं।सदैव दोनों बच्चों की प्रशंसा करती हुई कहती -” दोनों बच्चे अपने माता-पिता से ज्यादा हम पर जान लुटाते हैं। दोनों पढ़ाई में काफी होनहार हैं!”
आंटी को खुश देखकर मुझे खुशी होती।मुझे ऐसा महसूस होता मानो उनकी ठहरी हुई ज़िन्दगी में अचानक से रवानी आ गई हो। उनके अकेलेपन और उदासी की पीड़ा छॅंटने लगी थी। दोनों बच्चे उनकी रेगिस्तान -सी सूखी जिंदगी में बरबस जीवनदायनी फुहार बनकर आ गए थे। बच्चों के आ जाने से शर्मा दम्पत्ति को जीने का मकसद मिल चुका था।समय में दिन-पर-दिन जुड़ते चले गए और समय पंख लगाकर उड़ता रहा।
काफी समय से व्यस्तता के कारण नलिनी आंटी से भेंट नहीं हो पाई थी।एक दिन अचानक से नलिनी आंटी हॅंसती-खिलखिलाती हुई एक बड़ा -सा मिठाई का डिब्बा लेकर मेरे यहाॅं आ गईं। मैंने पूछा -“आंटी!किस खुशी की मिठाई है?”
आंटी ने भावविभोर होते हुए कहा -“सचमुच बहुत बड़ी खुशखबरी है।मेरी बेटी मेधा का चयन बैंक ऑफिसर में हो गया है।”
यह सुनकर मैंने भी उनको बधाई दे दी।जितनी देर तक नलिनी आंटी मेरे यहाॅं बैठी रहीं,उतनी देर तक मेधा और उसके भाई अनूप की तारीफों के पुल बाॅंधती रहीं। उन्हें देखकर ऐसा महसूस हो रहा था,मानो दोनों बच्चों के रूप में सारे जहां की खुशियाॅं उनके पहलू में आकर बैठ गईं हों।
कुछ समय बाद अचानक से शर्मा अंकल का फोन आया।वे मुझे अपनी बेटी समान मानते थे। मैं भी उन लोगों की बहुत इज्जत करती थी।फोन पर उन्होंने मुझे कहा -“निम्मी!तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं,जब फुर्सत मिले तो आ जाना।”
मेरे मन भी भी उत्कंठा जग चुकी थी कि आखिर ऐसी क्या बात है ,जिसे अंकल मुझसे करना चाहते हैं?अगले दिन समय निकालकर शाम में उनसे मिलने गई।मेरे वहाॅं पहुॅंचने पर शर्मा अंकल ने कहा -“मेधा की शादी भी बैंक ऑफिसर से तय हो गई है!”
मैंने उन्हें बधाई देते हुए कहा -“अंकल!यह तो बहुत ख़ुशी की बात है!”
शर्मा अंकल ने कहा -“बात तो सचमुच खुशी की है, परन्तु तुम आंटी को थोड़ा समझाओ,ये ममता में पागल होकर अपने सारे जेवर मेधा को दे रहीं हैं और मुझे भी ढ़ेर सारे पैसे खर्च करने को कह रहीं हैं,जबकि अब मेधा के पिता का बिजनेस भी अच्छा चल रहा है!”
पति की बात सुनते ही आंटी ने मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया और अपने पति से उलझ पड़ीं। उन्होंने अपने पति से कहा -“मेधा को हमेशा मैंने अपनी सगी बेटी से बढ़कर माना है।अब उसकी शादी है तो मैं कैसे अपने हाथ खींच लूॅं? बुढ़ापे में मैं कौन -सा जेवर पहनने बैठूॅंगी?जिस काम में हमारा दिल खुश हो रहा है,तो उसमें बचत का पैबंद लगाना कहाॅं तक उचित है?अगर हमारी सगी बेटी होती,तो हम खर्च करते या नहीं?”
मैंने पति-पत्नी के बीच में नहीं पड़ने में ही अपनी भलाई समझी और चुपचाप वहाॅं से खिसक गई।
कुछ दिनों बाद मेधा की शादी काफी धूम-धाम से हो गई। अमिता माॅं -बेटी ने नलिनी जी को इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए काफी पैसे खर्च करवा दिए, परन्तु मेधा आंटी खर्चों की परवाह न करते हुए खुद को एक माॅं की तरह गौरवान्वित महसूस कर रही थीं।
शादी के बाद काफी दिनों नलिनी आंटी से मुलाकात नहीं हो पाई थी।एक दिन अचानक बाजार में उनसे भेंट हो गई।आंटी अपनी बहन के साथ खरीददारी कर रहीं थीं।मिलने पर रास्ता रोककर आंटी ने बड़े उत्साह से मुझे बताया -“मेधा को बेटी हुई है।छठी में हमें भी बेंगलुरु जाना है,उसी के लिए खरीददारी करने आई हूॅं।हाॅं!एक और खुशखबरी है कि अनूप का भी इंजीनियरिंग में दाखिला हो गया है!”
मैंने दोहरी खुशी की उन्हें बधाई दे दी, फिर खरीददारी करने आगे निकल गई।बाद में लोगों द्वारा पता चला कि मेधा के ससुरालवालों ने बाॅंझ होने के कारण उन्हें बुलाया ही नहीं था।झूठ बोलकर साजिश के तहत उनकी छोटी बहन ने उनसे सारे सामान खरीदना लिए।यह सुनकर मुझे काफी दुखी हुआ कि जिसने ज़िन्दगी भर उस मेधा पर अपनी ममता लुटाई और पढ़ी-लिखी होने के बावजूद उस मेधा ने इस अंधविश्वास का विरोध क्यों नहीं किया?
कुछ दिनों बाद मैं आंटी से मिलने उनके घर गई।मेरे कुछ पूछने से पहले ही सफाई देती हुई आंटी ने कहा -“अरे निम्मी!अब तो उम्र हो गई है,शरीर भी साथ नहीं देता है।मेधा और उसके ससुराल वाले छठी में आने की बहुत जिद्द कर रहें थे, परन्तु बेटियाॅं तो पराया धन होती न हैं!बेटियों के घर का तो हम पानी भी नहीं पीते हैं।वैसे मेरी तबीयत भी खराब थी।”
बगल में बैठे अंकल खामोश से थे।आंटी के झूठ को उनके चेहरे की रेखांकित रेखाऍं चुगली कर रहीं थीं।आंटी के अंतर्मन को सचमुच गहरी ठेस लगी थी, परन्तु ऊपर से खुश होने का दिखावा कर रहीं थीं।नारी का ममत्व ऐसा ही होता है,जो ममतावश बच्चों की गलतियों पर झूठ का पर्दा डालने से भी
नहीं हिचकता है। आंटी की बातों से मैं समझ चुकी थी कि वो कितनी मुश्किल से झूठ बोलकर अपने आहत अंतर्मन पर मरहम लगा रहीं हैं। मैंने भी उनके जज़्बातों को कुरेदना सही नहीं समझा और अपने घर आ गई।
कुदरत का नियम है कि व्यक्ति एक सहारा छूटने पर अमरबेलि की भाॅंति लिपटने के लिए दूसरा सहारा खोजने लगता है। शर्मा दम्पत्ति का भी वही हाल था।अब उनकी सारी उम्मीदें अनूप पर टिकी हुई न थीं। उन्हें विश्वास था कि अनूप उन्हें अपने माता-पिता से ज्यादा प्यार करता है। शर्मा दम्पत्ति को
उन लोगों की सोची-समझी साजिश का भान तक नहीं था। अनूप की इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी।वह आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना चाहता था।नलिनी जी की बहन ने मगरमच्छी ऑंसू बहाते हुए कहा -“दीदी!तुम ही अनूप को समझाओ,उसे विदेश में पढ़ाना हमारी औकात से बाहर की बात है। हमारी बात समझता ही नहीं है!”
नलिनी जी बहन की बातों में आकर भावनाओं में बहते हुए कहा -“बहन! तुम चिन्ता मत करो। मैं देखती हूॅं कि क्या हो सकता है?”
एक बार फिर अनूप की पढ़ाई के खर्चें को लेकर नलिनी जी की पति से काफी लड़ाई हो गई। फिर उनके पति अपनी पत्नी के इमोशनल अत्याचार के शिकार होकर अनूप की पढ़ाई के लिए बैंक से बहुत सारा कर्ज ले लिया तथा अपने पी पी एफ से भी काफी पैसा निकाल लिया।यश जी का पाई-पाई जोड़े हुए पैसों पर अमिता का परिवार ऐश कर रहा था, परन्तु नलिनी के मन में अनूप को लेकर बहुत सारी उम्मीदें थीं।अनूप उन्हें अभी भी बुढ़ापे का सहारा नजर आ रहा था।
काफी दिनों के लिए मैं शहर से बाहर गई थी,इस कारण उन लोगों से न तो मेरा मिलना हो पाया,न ही उनका कोई समाचार प्राप्त हुआ था। शर्मा दम्पत्ति से मेरा कुछ विशेष लगाव था,इस कारण अपने शहर वापस लौटने पर उनसे मिलने चली गई। दिसम्बर की दोपहर थी।कई दिनों के कुहाॅंसे में छिपे
रहने के बाद भास्कर देवता आसमान में अवतरित हुए थे।इसी खुशी में सभी रजाइयों की पनाह छोड़कर सूर्यदेव की सत्कार में खुले में बैठकर धूप का आनन्द उठा रहें थे। शर्मा दम्पत्ति भी लाॅन में गुमसुम बैठे धूप सेंक रहें थे।मेरे जाने पर अचानक से उनके चेहरे पर चमक आ गई।खुशी का
दिखावा करते समय भी उनके अंतर्मन में आऍं भीषण झंझावातों का प्रतिबिम्ब उनके चेहरे पर स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था।उनका चेहरा निस्तेज पड़ा हुआ था। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो दोनों की आयु अचानक से दस वर्ष बढ़ गई हो। दोनों अचानक से बूढ़े लगने लगें।
नलिनी आंटी तो कुछ कहने से ऑंखें चुरा रहीं थीं।यश अंकल भी गहरी सोच मुद्रा में थे,मुझे देखकर गहरी साॅंसे भरकर आहिस्ता से कहना शुरू किया -” निम्मी! मैंने नलिनी को बहुत समझाने की कोशिश की कि दो-चार रातों की चाॅंदनी। की शीतलता ही किसी रेगिस्तान की यथार्थ नहीं होती,
बल्कि हमारी जिंदगी रूपी रेगिस्तान की नियति ही है प्रचंड ज्वाला में झुलसने की। परन्तु इसने उन लोगों की साज़िश की ओर न ध्यान देकर उन्हें ही अपना सर्वस्व समझ लिया,जिसका नतीजा आज
सामने है।अब सारे मकसद पूरे हो जाने के बाद अमिता का परिवार हमारी जिंदगी से ऐसा गायब हो गया,जैसे गदहे के सिर से सिंग। कहा भी गया है कि जब साॅंप भाग जाऍं,तो लाठी पीटने से क्या फायदा? अब आंटी को उस साजिश से उबरने में मदद करो”
शर्मा अंकल की बातों में ऐसी उदासी मैंने कभी नहीं देखी थी। वे अपने ही रिश्तेदारों की साज़िश का शिकार हो चुके थे।उनके दुख को महसूस कर मेरा मन काफी व्यथित हो चुका था। नलिनी आंटी के दिल में वर्षों पूर्व निसंतान होने की जो सिसकारी उठी थी,एक बार फिर से विश्वासघात बनकर उनकी
ऑंखों से फूट पड़ी।उनके होंठों से दर्द की एक टीस फूटी।मुझे पकड़कर फूट-फूटकर रो पड़ीं। मैंने उन्हें सांत्वना देकर चुप कराया।चुप होने पर अपने दर्द को जुबां पर लाने से वे खुद को रोक नहीं पाईं। उन्होंने कहना शुरू किया -“निम्मी! अपनों से ऐसी साजिश की तो मैंने सपने में भी कल्पना नहीं की
थी। अनूप की पढ़ाई पूरी होते ही उसके माता-पिता निर्दयी की तरह हमसे नाता तोड़कर यहाॅं से चले गए।अनूप ने अपने दीक्षांत समारोह में माता-पिता और बहन-बहनोई को विदेश बुलाया। हमें एक फोन तक नहीं किया। दोनों भाई-बहन एक फोन तक नहीं करते हैं।हमारे स्नेह की पैनी कुल्हाड़ी से
भी उन लोगों का मन भींगा तक नहीं था,बस मैं ही मूर्ख थी। अनूप का शिक्षा लोन भी इनके ही नाम पर है। इन्हें ही जैसे-तैसे चुकाना होगा।हमने तो प्रेम के वशीभूत होकर उनकी मदद की थी, परन्तु उन लोगों ने साजिश के तहत हमें शिकार बनाया।इनके मना करने पर भी मेरी ऑंखें नहीं खुलती थीं।जीवन की सांध्य वेला में इतने घातक विश्वासघात को कैसे बर्दाश्त करूॅं?”
अपनों के विश्वासघात से उनका मन घायल हो चुका था। मैंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा -“ऑंटी!रिश्ते खड़े तो प्यार के पैर पर ही होते हैं, परन्तु जिन रिश्तों में प्यार का कतरा भर भी न होकर केवल स्वार्थ भरा हो,तो उन रिश्तों को टूटना ही अच्छा होता है। आजकल तो अपने बच्चे भी माता-पिता के स्नेह की
छाॅंव छोड़कर अपनी राह चले जाते हैं।वे तो कभी आपके थे ही नहीं,बस अपने स्वार्थपूर्ति हेतु आप लोगों साथ साजिश रच रहे थे।”
इतना कहकर मैं मन-ही-मन सोचते ही निकल पड़ी कि जिस अंकल -ऑंटी के हृदय से जुड़ा वात्सल्य की कोमल भावनाओं के मृदुल एहसास से भींगा वो नैसर्गिक रिश्ता उनके मन-प्राण में ऊष्मा का संचार कर रहा था,वह सहसा सामने से विलुप्त होकर हृदयविदारक हो उठा है।उनके उम्मीदों के
महल ढ़ह चुके थे। दोनों का मन भावनात्मक खालीपन से जूझ रहा था। अंकल -आंटी उदास ऑंखों में तैरती नमी के बीच पलटकर मेरी तरफ आशा भरी नजरों से देख रहें थे।काश! अपनों की साज़िश का उन्हें पहले पता चल गया होता तो ये दिन देखने नहीं पड़ते।
समाप्त।
लेखिका -डाॅ संजु झा।