रोशनी का कर्ज

“रिश्तेदारों ने ताना मारा कि ‘निकम्मा बेटा बुढ़ापे में क्या सहारा बनेगा, इसे तो खुद पालना पड़ रहा है’। लेकिन जब पिता की आँखों की रोशनी छिनने लगी और अपनों ने ही घर गिरवी रखने की शर्त रख दी, तब उस ‘निकम्मे’ बेटे ने जो किया, उसे देखकर पूरे खानदान की आँखें फटी रह गईं… पढ़िए एक बेटे के अनकहे संघर्ष और एक पिता के स्वाभिमान की यह रुला देने वाली कहानी।”

आठ लाख रुपये! दीनानाथ जी के लिए यह रकम किसी पहाड़ से कम नहीं थी। जीवन भर की कमाई तो प्रथम की पढ़ाई और घर के राशन में ही खर्च हो गई थी। बैंक खाते में मुश्किल से बीस हज़ार रुपये पड़े थे। सुशीला अस्पताल के गलियारे में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर कहा, “रो मत सुशीला, शायद मेरी किस्मत में यही लिखा है। मैं बिना आँखों के जी लूँगा, पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊंगा।”

शाम ढल चुकी थी और शहर की पुरानी बस्ती में स्थित दीनानाथ जी की सिलाई की छोटी सी दुकान में अब भी पुरानी सिलाई मशीन की ‘खट-खट’ गूंज रही थी। दीनानाथ जी पिछले तीस सालों से इसी दुकान में कपड़े सिलकर अपने परिवार का पेट पाल रहे थे। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उन्हें सुई में धागा डालने में बहुत तकलीफ होने लगी थी। उनकी आँखों के सामने अक्सर धुंधलापन छा जाता था। वे चश्मे के शीशे को बार-बार अपने कुर्ते से पोंछते, लेकिन धुंधलका था कि छंटने का नाम ही नहीं लेता था।

दुकान के एक कोने में एक छोटी सी टेबल पर उनका 25 वर्षीय बेटा, प्रथम, अपने पुराने लैपटॉप पर आँखें गड़ाए बैठा था। प्रथम ने दो साल पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी, लेकिन अब तक उसके हाथ में कोई पक्की नौकरी नहीं थी। मोहल्ले वाले और रिश्तेदार दबी ज़बान में और कभी-कभी मुंह पर भी उसे ‘बेरोज़गार’ और ‘पिता पर बोझ’ कहने लगे थे। दीनानाथ जी के बड़े भाई, किशोर बाबू, जो शहर के एक बड़े व्यापारी थे, अक्सर दुकान पर आकर ताने मारते थे।

“अरे दीनानाथ, कब तक इस लड़के को अपनी छाती पर बैठाकर खिलाएगा? मेरा बेटा देख, मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है। और एक तेरा नवाब है, जो दिन भर इस डिब्बे (लैपटॉप) के सामने उंगलियां चलाता रहता है। कोई छोटी-मोटी नौकरी क्यों नहीं कर लेता?” किशोर बाबू की बातें दीनानाथ जी के सीने में तीर की तरह चुभती थीं।

लेकिन दीनानाथ जी कभी अपने बेटे से कुछ नहीं कहते। वे बस एक फीकी मुस्कान के साथ जवाब देते, “भैया, बच्चा मेहनत कर रहा है। मेरा प्रथम कोई गलत काम नहीं कर रहा। भगवान एक दिन इसकी भी सुनेगा।”

प्रथम सब कुछ सुनता था। उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर और तेज़ चलने लगती थीं, लेकिन वह पलटकर कभी किसी को जवाब नहीं देता। वह अपनी मौन दुनिया में कुछ ऐसा रच रहा था जिसे समझने की फुर्सत उन ताने मारने वालों के पास नहीं थी।

एक दिन कपड़े सिलते हुए अचानक दीनानाथ जी की आँखों के आगे पूरा अंधेरा छा गया। सिलाई मशीन की सुई उनकी उंगली के आर-पार हो गई। उनकी चीख सुनकर प्रथम दौड़कर आया। पिता की उंगली से खून बह रहा था और वे अपनी आँखों को दोनों हाथों से दबाकर दर्द से कराह रहे थे। प्रथम उन्हें तुरंत नज़दीकी अस्पताल ले गया।

अस्पताल में डॉक्टर ने लंबी जांच के बाद जो कहा, उसने प्रथम और उसकी माँ, सुशीला के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी। डॉक्टर ने गंभीर स्वर में बताया कि दीनानाथ जी की आँखों की नसें बहुत तेज़ी से सूख रही हैं। यह एक दुर्लभ बीमारी है और अगर अगले पंद्रह दिनों के भीतर एक जटिल सर्जरी नहीं हुई, तो वे जीवन भर के लिए अपनी आँखों की रोशनी खो देंगे। सर्जरी का खर्च करीब आठ लाख रुपये था।

आठ लाख रुपये! दीनानाथ जी के लिए यह रकम किसी पहाड़ से कम नहीं थी। जीवन भर की कमाई तो प्रथम की पढ़ाई और घर के राशन में ही खर्च हो गई थी। बैंक खाते में मुश्किल से बीस हज़ार रुपये पड़े थे। सुशीला अस्पताल के गलियारे में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर कहा, “रो मत सुशीला, शायद मेरी किस्मत में यही लिखा है। मैं बिना आँखों के जी लूँगा, पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊंगा।”

लेकिन प्रथम यह कैसे बर्दाश्त कर सकता था? जिस पिता ने उसके भविष्य के लिए दिन-रात अपनी आँखें फोड़ी थीं, वह उन आँखों को ऐसे ही बुझने नहीं दे सकता था।

अगले दिन सुबह-सुबह, अपनी सारी हिचकिचाहट को किनारे रखकर, दीनानाथ जी और प्रथम अपने बड़े भाई किशोर बाबू के घर पहुंचे। किशोर बाबू उस वक़्त अपने आलीशान बगीचे में चाय पी रहे थे। दीनानाथ जी ने गिड़गिड़ाते हुए उन्हें सारी स्थिति बताई और आठ लाख रुपये उधार मांगे।

किशोर बाबू ने चाय का कप मेज़ पर रखा और एक क्रूर मुस्कान के साथ प्रथम की तरफ देखा। “देखा दीनानाथ? मैंने कहा था न कि यह बेरोज़गार बेटा तुम्हारे बुढ़ापे की लाठी नहीं बन पाएगा। आज अगर यह कमा रहा होता, तो तुम्हें मेरे आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ते।”

प्रथम ने मुट्ठी भींच ली, लेकिन पिता की खातिर वह चुप रहा।

किशोर बाबू ने अंदर से एक फाइल मंगवाई और दीनानाथ जी के सामने फेंक दी। “मैं आठ लाख रुपये दे दूंगा दीनानाथ, आख़िर खून का रिश्ता है। लेकिन मेरी एक शर्त है। तुम्हारी वो सिलाई की दुकान और पुश्तैनी मकान, वो बाज़ार के बीचों-बीच है। इन कागज़ों पर दस्तखत कर दो कि अगर तुम एक साल में पैसे नहीं लौटा पाए, तो वो दुकान और मकान मेरे नाम हो जाएंगे। वैसे भी तुम्हारा यह बेटा तो कुछ करेगा नहीं, तो मुझे अपनी रकम की सुरक्षा तो करनी ही पड़ेगी।”

दीनानाथ जी के हाथ कांपने लगे। वह दुकान सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं थी, वह उनका मंदिर था। लेकिन अपनी आँखों और परिवार के भविष्य के बीच, उन्होंने आँखों का सौदा करना उचित समझा। उन्होंने कांपते हाथों से पेन उठाया।

“पापा, रुकिए!” अचानक प्रथम ने आगे बढ़कर वो पेन दीनानाथ जी के हाथ से छीन लिया।

“यह क्या बदतमीज़ी है प्रथम?” किशोर बाबू चिल्लाए। “अगर ये कागज़ साइन नहीं हुए, तो तेरा बाप अंधा हो जाएगा।”

प्रथम की आँखों में आज एक अजीब सी आग थी। उसने उन कागज़ों को फाड़कर किशोर बाबू के मुंह पर फेंक दिया। “मेरे पिता की आँखों की कीमत उनका स्वाभिमान नहीं हो सकता, ताऊ जी। और रही बात मेरी, तो आप बस सात दिन रुकिए। सात दिन के अंदर मैं वो पैसे लेकर आऊंगा, और वो भी बिना किसी की ज़मीन गिरवी रखे।”

प्रथम अपने पिता का हाथ पकड़कर वहां से निकल गया। घर लौटकर दीनानाथ जी बहुत रोए। “तूने यह क्या किया बेटा? अब मेरी आँखें कभी ठीक नहीं होंगी।”

प्रथम ने पिता के पैर पकड़ लिए और उनके घुटनों पर सिर रख दिया। “पापा, मुझ पर भरोसा रखिए। जिस बेटे पर आपने पूरी दुनिया के तानों के बावजूद भरोसा किया है, वो आपको अंधेरे में नहीं छोड़ सकता। मुझे बस कुछ दिन का वक़्त दीजिए।”

अगले दिन से प्रथम घर पर बहुत कम दिखाई देने लगा। वह सुबह निकलता और रात को देर से लौटता। कोई नहीं जानता था कि वो अपने उस पुराने लैपटॉप के साथ कहाँ जाता है। रिश्तेदार बातें बनाने लगे कि “बाप अंधा होने वाला है और बेटा अपनी ज़िम्मेदारी से भाग गया है।” सुशीला भी चिंता में घुलने लगी थी।

दरअसल, प्रथम कोई साधारण बेरोज़गार नहीं था। पिछले दो सालों से वह एक बहुत ही एडवांस्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सॉफ्टवेयर डिज़ाइन कर रहा था, जो बड़े अस्पतालों में मरीजों के डेटा और सर्जरी की सफलता दर का सटीक विश्लेषण कर सकता था। यह उसका ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ था, जिसे वह अपनी खुद की कंपनी बनाकर लॉन्च करना चाहता था। कई विदेशी कंपनियों ने उसे इस सॉफ्टवेयर के लिए करोड़ों का ऑफर दिया था, लेकिन शर्त यह थी कि उसे अपनी तकनीक के सारे अधिकार (Copyrights) उन्हें बेचने पड़ेंगे। प्रथम अपना सपना बेचना नहीं चाहता था, इसलिए वह एक ऐसे निवेशक की तलाश में था जो उसे उसकी ही कंपनी का मालिक बने रहने दे।

लेकिन आज, बात उसके सपने की नहीं, उसके पिता की रोशनी की थी।

प्रथम ने शहर की सबसे बड़ी मेडिकल टेक कंपनी के सीईओ से मुलाकात की। उसने बिना किसी मोल-भाव के अपना वो प्रोजेक्ट, जो भविष्य में करोड़ों की कंपनी बन सकता था, सिर्फ़ दस लाख रुपये नकद और उस कंपनी में एक साधारण कर्मचारी की नौकरी के बदले बेच दिया। सीईओ भी हैरान था कि यह लड़का अपने इतने बड़े अविष्कार को कौड़ियों के दाम क्यों बेच रहा है, लेकिन प्रथम के पास समझाने का वक़्त नहीं था। उसने कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किए और चेक लेकर सीधा अस्पताल पहुंचा।

सर्जरी का दिन आ गया। दीनानाथ जी को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। बाहर सुशीला और प्रथम भगवान से प्रार्थना कर रहे थे। तीन घंटे के लंबे ऑपरेशन के बाद डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “बधाई हो, सर्जरी बिल्कुल सफल रही। कल सुबह हम पट्टियां खोलेंगे।”

सुशीला ने प्रथम को गले लगा लिया। प्रथम के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था—अपने सपने को खोने का दर्द पिता को रोशनी देने की खुशी के आगे बहुत छोटा था।

अगले दिन सुबह दीनानाथ जी के कमरे में अस्पताल के स्टाफ के साथ-साथ किशोर बाबू भी आ पहुंचे। उन्हें लगा था कि प्रथम ने किसी गुंडे से पैसे लिए होंगे और वो अब तमाशा देखेंगे।

डॉक्टर ने धीरे-धीरे दीनानाथ जी की आँखों से पट्टियां खोलीं। कमरे में सन्नाटा था। दीनानाथ जी ने अपनी आँखें धीरे से झपकाईं। रोशनी पहले थोड़ी चुभी, लेकिन फिर सब कुछ साफ़ होने लगा। सबसे पहले उन्हें सामने खड़ा अपना बेटा, प्रथम दिखाई दिया। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर थकान थी, लेकिन होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान थी।

“प्रथम… बेटा!” दीनानाथ जी ने रोते हुए हाथ आगे बढ़ाए। प्रथम दौड़कर उनके गले लग गया।

तभी किशोर बाबू ने खांसते हुए कहा, “आँखें तो ठीक हो गईं दीनानाथ, पर अब यह बता कि इस निकम्मे ने पैसे कहाँ से चोरी किए? पुलिस तो नहीं आ जाएगी घर पर?”

इससे पहले कि प्रथम कुछ कहता, कमरे का दरवाज़ा खुला और एक सूट पहने हुए सज्जन अंदर आए। ये उसी टेक कंपनी के सीईओ थे, जिन्हें प्रथम ने अपना सॉफ्टवेयर बेचा था। उनके हाथ में एक बड़ा सा फूलों का गुलदस्ता और कुछ कागज़ात थे।

सीईओ ने दीनानाथ जी को प्रणाम किया और बोले, “दीनानाथ जी, आप बहुत खुशनसीब हैं जो आपको प्रथम जैसा बेटा मिला। मैं ‘नर्सेंट टेक’ कंपनी का सीईओ हूँ। आपके बेटे ने पिछले दो सालों में एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है जो मेडिकल साइंस में क्रांति ला सकता है। परसों यह मेरे पास आया और इसने अपना वो पूरा प्रोजेक्ट, जो इसे करोड़पति बना सकता था, सिर्फ़ आपकी सर्जरी की फीस के लिए हमें बेच दिया।”

यह सुनकर कमरे में मौजूद हर इंसान सन्न रह गया। किशोर बाबू का मुंह खुला का खुला रह गया।

सीईओ ने आगे कहा, “जब मुझे हमारी लीगल टीम से इसकी वजह पता चली, तो मुझे खुद पर बहुत शर्म आई कि मैं एक ऐसे बेटे की मजबूरी का फायदा उठा रहा हूँ। प्रथम ने अपने पिता के लिए अपना भविष्य दांव पर लगा दिया था। इसलिए, मैं आज यहाँ यह नया कॉन्ट्रैक्ट लेकर आया हूँ।”

सीईओ ने वो कागज़ प्रथम के हाथ में रख दिए। “प्रथम, हमने फैसला किया है कि हम तुम्हारे उस प्रोजेक्ट के अधिकार तुम्हें वापस कर रहे हैं। हम तुम्हें खरीदेंगे नहीं, बल्कि तुम्हारी कंपनी में पचास प्रतिशत के हिस्सेदार (पार्टनर) बनेंगे। और आज से तुम उस नए प्रोजेक्ट के डायरेक्टर हो, जिसका पहला चेक एक करोड़ रुपये का है।”

दीनानाथ जी के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने प्रथम का माथा चूम लिया।

“तूने मेरे लिए अपने जीवन भर की मेहनत बेच दी थी पगले? क्यों?” दीनानाथ जी ने रुंधे हुए गले से पूछा।

प्रथम ने पिता के आंसू पोंछते हुए कहा, “पापा, वो मेहनत तो मैंने इस लैपटॉप पर की थी। लेकिन आपने जो मेहनत मुझे इंसान बनाने में की है, उसका कर्ज़ मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकता। मेरे उस सॉफ्टवेयर में दुनिया की सारी जानकारी हो सकती है, लेकिन मेरी दुनिया तो आपकी आँखों में बसती है। अगर ये आँखें ही नहीं रहतीं, तो उस सफलता का मैं क्या करता?”

दीनानाथ जी ने गर्व से किशोर बाबू की तरफ देखा, जिनका सिर अब शर्म से ज़मीन में गड़ा जा रहा था। दीनानाथ जी ने हाथ जोड़कर कहा, “भैया, आप कहते थे न कि मेरा बेटा निकम्मा है। आज देखिए, इसने सिर्फ़ मेरी आँखें नहीं बचाईं, बल्कि मुझे यह दिखा दिया कि दौलत से घर तो बन सकता है, पर संस्कार नहीं। मैं बहुत अमीर हूँ भैया, क्योंकि मेरे पास मेरा प्रथम है।”

दीनानाथ जी ने प्रथम को फिर से अपने सीने से लगा लिया और उनके मुंह से बस एक ही बात निकली—”भगवान अगर औलाद दे, तो ऐसी दे।

उस दिन किशोर बाबू को समझ आ गया था कि सफलता सिर्फ़ ऊंची कुर्सियों और मोटे बैंक बैलेंस में नहीं होती। असली सफलता और इंसान की असली पहचान इस बात में है कि वह संकट के समय अपने परिवार के लिए किस हद तक जा सकता है। प्रथम ने साबित कर दिया था कि एक औलाद का सबसे बड़ा कर्तव्य अपने माता-पिता के स्वाभिमान की रक्षा करना है, चाहे उसके लिए उसे अपनी दुनिया ही क्यों न लुटानी पड़े।

आपके विचार:

क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में ऐसे बच्चे बहुत कम बचे हैं जो अपने करियर और सपनों से ऊपर अपने माता-पिता के सम्मान को रखते हैं? क्या प्रथम ने अपने सॉफ्टवेयर को पिता के लिए बेचकर सही फैसला किया था? इस विषय पर आप क्या सोचते हैं, अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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कहानी का सारांश:

दीनानाथ जी एक गरीब दर्ज़ी थे, जिनकी आँखों की रोशनी तेज़ी से जा रही थी। उनके बेरोज़गार समझे जाने वाले बेटे, प्रथम को सभी रिश्तेदार ताने मारते थे। सर्जरी के लिए आठ लाख की ज़रूरत थी। बड़े भाई ने पैसे देने के बदले उनकी पुश्तैनी दुकान गिरवी रखने की अपमानजनक शर्त रखी। प्रथम ने इसे ठुकरा दिया। उसने गुपचुप तरीके से बनाए अपने करोड़ों के ‘ड्रीम टेक प्रोजेक्ट’ को पिता की सर्जरी के लिए मामूली रकम में बेच दिया। जब सच्चाई कंपनी के सीईओ को पता चली, तो वह प्रथम के त्याग से प्रभावित होकर उसे उस प्रोजेक्ट का पार्टनर और डायरेक्टर बना देता है। पिता का स्वाभिमान बच जाता है और सब कहते हैं—औलाद हो तो ऐसी।

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