“रिश्तों का रफू” – डॉ पारुल अग्रवाल 

“दीवारों की सीलन छुपाने के लिए हम अक्सर उस पर नई पेंटिंग टांग देते हैं, लेकिन घर के बुजुर्ग वो कारीगर होते हैं जो पेंटिंग नहीं देखते, बल्कि दीवार की नमी को छूकर बता देते हैं कि नींव कहाँ से कमज़ोर हो रही है।”

घर के हॉल में सुबह के नौ बजते ही युद्ध का नगाड़ा बजना तय था। एक तरफ सत्तर वर्षीय दीनानाथ जी थे, जो अपनी पुरानी फिलिप्स की ट्रांजिस्टर रेडियो को ठीक करने की ज़िद्द में पूरे घर का कबाड़ फैलाए बैठे थे, और दूसरी तरफ उनकी पत्नी, सुमित्रा देवी, जिनका पारा सातवें आसमान पर था।

“मैं कह रही हूँ, फेंक दीजिये इस कबाड़ को! बीस साल से यह रेडियो सिर्फ़ खर्र-खर्र करता है, बजता कुछ नहीं। पूरा घर कबाड़खाना बना रखा है आपने। कल रद्दी वाला आया था, उसे दे देते तो घर में थोड़ी जगह बनती,” सुमित्रा देवी ने हाथ में पकड़ी झाड़ू को ज़मीन पर पटकते हुए कहा।

दीनानाथ जी ने अपने मोटे चश्मे के ऊपर से घूरते हुए जवाब दिया, “तुम्हारी समझ में नहीं आएगा सुमित्रा। यह रेडियो नहीं, यादें हैं। 1980 में जब मैं प्रोमोशन पाकर पहली बार शिमला गया था, तब लिया था। तुम तो बस हर चीज़ को फेंकने की फिराक में रहती हो। कल मेरी दवाई की शीशी भी फेंक दी, अभी उसमें दो खुराक बची थी।”

“दवाई एक्सपायर हो चुकी थी! जहर खिला दूँ क्या आपको?” सुमित्रा जी चिल्लाईं।

यह रोज़ का ड्रामा था। बेडरूम में लैपटॉप खोले बैठे उनके बेटे, कार्तिक और उसकी पत्नी, अवनि के कानों में यह शोर पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहा था। दोनों आईटी सेक्टर में थे और ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे थे। सुबह की पहली मीटिंग और बाहर माता-पिता की यह चीख-पुकार।

कार्तिक ने झुंझलाकर हेडफोन कानों पर कस लिया। “अवनि, यार प्लीज! तुम माँ से कहो न थोड़ा धीरे बोलें। मेरा क्लाइंट कॉल चल रहा है। यह रोज़-रोज़ की किच-किच अब बर्दाश्त नहीं होती।”

अवनि ने अपनी फाइल बंद की और गहरी सांस ली। “कार्तिक, मैं कितनी बार बोलूँ? वो मेरी सुनते हैं क्या? तुम खुद जाकर बोलो। और वैसे भी, गलती पापा जी की है। वो सच में बहुत ज़िद्दी हो गए हैं।”

कार्तिक कुर्सी धकेलकर उठा और बाहर हॉल में आया। “पापा! माँ! बस कीजिये। हम लोग अंदर काम कर रहे हैं, कोई सब्जी मंडी नहीं है यह। आप दोनों को अगर लड़ना ही है तो प्लीज छत पर चले जाइये या पार्क में जाकर लड़िये।”

दीनानाथ जी और सुमित्रा देवी एकदम चुप हो गए। बेटे की डांट ने उन्हें पल भर के लिए सहमा दिया। सुमित्रा जी बड़बड़ाते हुए रसोई में चली गईं और दीनानाथ जी ने खामोशी से अपना रेडियो समेट लिया।

सन्नाटा तो हो गया, लेकिन घर का माहौल भारी हो गया। कार्तिक और अवनि को भी बुरा लगा, लेकिन वे मजबूर थे।

रात को खाने की मेज पर सन्नाटा था। कार्तिक ने अवनि की तरफ इशारा किया। अवनि ने गला साफ़ करते हुए कहा, “माँ जी, पापा जी… हम सोच रहे थे कि आप दोनों बहुत दिनों से कहीं घूमने नहीं गए। घर में बोर हो जाते हैं। क्यों न आप दोनों चार-पांच दिन के लिए नैनीताल चले जाएं? वहां ‘आनंदा रिसॉर्ट’ में हमने बुकिंग देख ली है। बहुत शांत जगह है, योगा सेशन भी होते हैं। आप दोनों का मूड भी फ्रेश हो जाएगा।”

दीनानाथ जी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, “पैसे बर्बाद करने की क्या ज़रूरत है? हम ठीक हैं।”

“अरे नहीं पापा,” कार्तिक ने बात संभाली। “पैसे की बात नहीं है। आप लोग वहां जाएंगे तो हमें… मतलब आपको अच्छा लगेगा। यहाँ रोज़ वही रूटीन, वही नोक-झोंक। रिश्ते को भी थोड़ी ताज़ी हवा चाहिए होती है।”

सुमित्रा जी समझ गईं कि बच्चे उन्हें कुछ दिन के लिए घर से दूर भेजना चाहते हैं ताकि शांति से रह सकें। मन में थोड़ी टीस उठी, लेकिन उन्होंने हामी भर दी। “ठीक है, जैसा तुम लोग ठीक समझो।”

दो दिन बाद, कार्तिक और अवनि ने अपने माता-पिता को टैक्सी में बैठाकर नैनीताल के लिए रवाना कर दिया। जैसे ही टैक्सी ओझल हुई, कार्तिक ने एक लंबी राहत की सांस ली।

“फाइनली!” कार्तिक ने अवनि को गले लगाया। “शांति! अब अगले पांच दिन, सिर्फ तुम, मैं और यह शांत घर। कोई रेडियो की आवाज़ नहीं, कोई बर्तनों की खटपट नहीं।”

अवनि भी मुस्कुराई। “हाँ, चलो। आज रात हम अपना पसंदीदा इटालियन डिनर आर्डर करेंगे और नेटफ्लिक्स पर वो सीरीज देखेंगे जो कब से पेंडिंग है।”

शुरुआत के दो दिन तो बहुत अच्छे बीते। घर एकदम शांत था। दोनों ने अपने हिसाब से काम किया, देर तक सोए, मर्जी का खाया। लेकिन तीसरे दिन शाम को एक छोटी सी बात पर हवा का रुख बदल गया।

कार्तिक को ऑफिस से एक मेल आया कि उसका प्रोजेक्ट एक हफ़्ते डिले हो गया है, जिसके कारण उसका अप्रेज़ल लटक सकता है। वह तनाव में था। अवनि अपनी दोस्त से फोन पर बात कर रही थी और जोर-जोर से हंस रही थी।

“अवनि, क्या तुम थोड़ी देर चुप रह सकती हो? मुझे कंसंट्रेट करना है,” कार्तिक ने चिढ़कर कहा।

अवनि ने फोन काटा और हैरान होकर देखा। “कार्तिक, मैं तो दूसरे कमरे में थी। इतनी भी क्या डिस्टर्बेंस?”

“हाँ, है डिस्टर्बेंस! तुम नहीं समझोगी। तुम तो बस अपनी गॉसिप में लगी रहती हो। तुम्हें मेरे करियर की कोई परवाह नहीं है,” कार्तिक का फ्रस्ट्रेशन बाहर निकल आया।

“एक्सक्यूज़ मी?” अवनि का चेहरा लाल हो गया। “गॉसिप? मैं अपनी कलीग से बात कर रही थी। और करियर की चिंता सिर्फ तुम्हें है? मैं भी नौकरी करती हूँ कार्तिक, घर के काम के साथ-साथ। तुम तो बस लैपटॉप खोलकर बैठ जाते हो, बाकी घर कैसे चलता है, कभी देखा है?”

“ओह, तो अब तुम एहसान जताओगी?” कार्तिक ने लैपटॉप बंद किया।

“एहसान नहीं, हकीकत बता रही हूँ। जब देखो तब चिढ़े रहते हो। तुम्हारे पापा सही कहते हैं, तुम में सहनशक्ति बिल्कुल नहीं है,” अवनि ने पलटवार किया।

“अब तुम मेरे बाप की तरफदारी करोगी? जो आदमी दिन भर घर में शोर मचाता है?”

बहस बढ़ती गई। पुरानी बातें, दबी हुई शिकायतें, एक-दूसरे के परिवार पर ताने—सब कुछ बाहर आ गया। वो शांति, जिसके लिए उन्होंने माता-पिता को घर से भेजा था, अब उन्हें काटने को दौड़ रही थी। अगले दो दिन घर में ‘कोल्ड वॉर’ छिड़ गया। कार्तिक ड्राइंग रूम के सोफे पर सोया और अवनि बेडरूम में। बात करना तो दूर, दोनों एक-दूसरे की शक्ल देखने से भी कतरा रहे थे।

पांचवें दिन दोपहर को डोरबेल बजी। दीनानाथ जी और सुमित्रा देवी वापस आ गए थे। उनके चेहरे खिले हुए थे, हाथों में नैनीताल की मशहूर बाल-मिठाई और कुछ गिफ्ट्स थे।

“सरप्राइज़!” सुमित्रा जी ने उत्साह से कहा। “हम लोग दो घंटे जल्दी आ गए।”

कार्तिक और अवनि ने जबरदस्ती की मुस्कान चेहरे पर चिपकाई। “अरे वाह, आइये, आइये।”

लेकिन घर की हवा में घुली कड़वाहट बुजुर्गों से छिप न सकी। दीनानाथ जी ने देखा कि कार्तिक की आँखें सूजी हुई हैं और अवनि ने कार्तिक से पानी का गिलास तक नहीं पूछा। ड्राइंग रूम के सोफे पर एक चादर और तकिया पड़ा था, जो चीख-चीख कर बता रहा था कि रात को कोई यहाँ सोया था।

सुमित्रा जी ने रसोई में जाकर देखा, सिंक में दो दिन के बर्तन पड़े थे। कोई इटालियन डिनर नहीं बना था, ब्रेड के सूखे पैकेट पड़े थे।

रात के खाने पर सन्नाटा पसरा था। वही सन्नाटा जिसे कार्तिक ‘शांति’ समझ रहा था, लेकिन असल में वह ‘स्मशान की शांति’ थी।

दीनानाथ जी ने एक निवाला खाया और फिर अवनि से बोले, “बहू, नैनीताल में एक बहुत अजीब चीज़ देखी हमने।”

अवनि ने नज़रें उठाईं, “क्या पापा जी?”

“वहाँ एक जोड़ा था, नया-नया ब्याहा हुआ। वे दोनों झील के किनारे बैठे थे, लेकिन एक-दूसरे से बात नहीं कर रहे थे। दोनों अपने-अपने मोबाइल में लगे थे। मुझे और तुम्हारी माँ को देखकर उन्होंने कहा—’अंकल-आंटी, आप लोग कितने लकी हैं, इस उम्र में भी एक-दूसरे से इतना बात करते हैं, लड़ते हैं।’ तब मुझे एहसास हुआ कि खामोशी, लड़ाई से ज़्यादा खतरनाक होती है।”

कार्तिक ने सिर झुका लिया।

सुमित्रा देवी उठीं और अपने बैग से एक लिफाफा निकाला। “कार्तिक, अवनि… हम तुम्हारे लिए वहां से कुछ लाए हैं।”

“क्या है माँ?” कार्तिक ने पूछा।

“खोलो,” सुमित्रा जी ने लिफाफा मेज़ पर रख दिया।

कार्तिक ने लिफाफा खोला। अंदर दो वाउचर थे।

‘विपासना मेडिटेशन सेंटर – 10 डेज़ साइलेंस कोर्स (मौन शिविर)’

कार्तिक और अवनि ने हैरान होकर एक-दूसरे को देखा।

दीनानाथ जी गंभीर स्वर में बोले, “तुम दोनों ने हमें इसलिए भेजा था क्योंकि तुम्हें लगा कि हमारी आवाज़ें, हमारी नोक-झोंक तुम्हें परेशान कर रही है। तुम्हें लगा ‘शोर’ समस्या है। लेकिन बेटा, समस्या शोर नहीं, ‘संवाद’ का तरीका है। हम लड़ते हैं, चिल्लाते हैं, लेकिन दस मिनट बाद मैं इसे चाय बनाकर दे देता हूँ और यह मेरी रेडियो की बैटरियां ढूंढ देती है। हम बात करना बंद नहीं करते।”

सुमित्रा जी ने अवनि के हाथ पर हाथ रखा, “हमने देखा कि तुम दोनों के बीच बातचीत बंद है। सोफे पर पड़ी चादर सब बता रही है। जब बर्तन एक साथ होते हैं तो खड़कते हैं, लेकिन अगर उन्हें अलग-अलग रख दो तो वो सिर्फ़ ‘शो-पीस’ बनकर रह जाते हैं। तुम दोनों को शांति चाहिए थी न? ये लो, दस दिन के लिए मौन शिविर में जाओ। वहां एक शब्द बोलने की इजाज़त नहीं होती। तब तुम्हें समझ आएगा कि अपने जीवनसाथी की आवाज़, चाहे वो गुस्से में ही क्यों न हो, उस जानलेवा खामोशी से कितनी बेहतर होती है।”

कार्तिक की आँखों में नमी आ गई। उसने अवनि की तरफ देखा। अवनि की आँखों से आंसू बह निकले। वे समझ गए कि वे जिस ‘स्पेस’ और ‘प्राइवेसी’ के पीछे भाग रहे थे, उसने उनके बीच एक खाई बना दी थी।

“हमें माफ़ कर दीजिये पापा,” कार्तिक ने धीमे स्वर में कहा। “हम अपनी उलझनों में इतना खो गए थे कि हमें लगा आप लोग बोझ हैं। लेकिन असल में, इस घर की रौनक आप दोनों की वो प्यारी तकरार ही है। आपके जाने के बाद यह घर, घर नहीं… एक खाली डिब्बा लग रहा था।”

अवनि उठी और सुमित्रा जी के गले लग गई। “माँ जी, आप सही कह रही थीं। रेडियो का शोर बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन अपनों की चुप्पी बर्दाश्त नहीं होती।”

दीनानाथ जी ने हंसते हुए वाउचर वापस खींच लिए। “अरे, ये तो बस डराने के लिए था। कौन भेजेगा तुम्हें वहां? तुम दोनों चले गए तो मेरी एक्सपायर दवाइयां कौन चेक करेगा?”

पूरा कमरा हंसी से गूंज उठा।

अगले दिन सुबह, फिर से वही नज़ारा था। दीनानाथ जी रेडियो लेकर बैठे थे और सुमित्रा जी चिल्ला रही थीं। लेकिन आज बेडरूम में कार्तिक और अवनि हेडफोन लगाकर नहीं बैठे थे। वे दोनों मुस्कुराते हुए बाहर आए।

“पापा, लाइये मैं देखता हूँ यह रेडियो,” कार्तिक ने पेंचकस उठाते हुए कहा।

“और माँ, आज आप रहने दीजिये, नाश्ते में मैं आपके पसंद के आलू के पराठे बनाती हूँ,” अवनि ने रसोई की तरफ बढ़ते हुए कहा।

घर में फिर से शोर था, लेकिन यह शोर अब संगीत लग रहा था। उन्होंने सीख लिया था कि रिश्ते परफेक्शन से नहीं, बल्कि ‘एडजस्टमेंट’ और ‘स्वीकारोक्ति’ से चलते हैं।

बुजुर्गों ने अपने ‘नुस्खे’ से बच्चों को समझा दिया था कि भागने से हल नहीं निकलता, साथ रहकर उलझनों को सुलझाने में ही असली सुकून है। दीवारों पर लगी नई पेंटिंग कितनी भी सुंदर हो, अगर दीवार में दरार है, तो उसे ‘रफू’ करने का हुनर सिर्फ पुराने कारीगर ही जानते हैं।

मूल लेखिका : डॉ पारुल अग्रवाल 

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