“एक सास को गुमान था कि उसका घर भरा-पूरा है और बहू ‘अकेलेपन’ से आई है, इसलिए उसे रिश्तों की कद्र नहीं। लेकिन जब घर में विपत्ति की आंधी चली, तो उस ‘भरे-पूरे’ परिवार की भीड़ तमाशबीन बन गई और वो ‘अकेली’ बहू ढाल बन गई। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि रिश्ता खून का होता है या एहसास का…”
“मांझी, परिवार छोटा हो या बड़ा, यह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि मुसीबत में कौन किसके साथ खड़ा है। मेरे माता-पिता ने मुझे सिखाया था कि भीड़ इकट्ठी करना आसान है, लेकिन किसी एक इंसान का होकर रहना मुश्किल। मैंने बस अपना फ़र्ज़ निभाया।
रसोई में बर्तनों के टकराने की आवाज़, ड्राइंग रूम में ठहाकों का शोर और आंगन में बच्चों की धमाचौकड़ी। यह ‘रघुवंशी सदन’ का रोज़ का नज़ारा था। शहर के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित परिवारों में से एक, जहाँ आज भी तीन पीढ़ियां एक साथ रहती थीं।
सावित्री देवी इस घर की मुखिया थीं। 65 साल की उम्र में भी उनकी कमर सीधी थी और आवाज़ में वही कड़कपन, जिससे पूरा घर थर्राता था। उन्हें अपने “भरे-पूरे परिवार” पर बहुत घमंड था। उनका मानना था कि जिस घर में शोर न हो, वो घर नहीं, श्मशान होता है।
दूसरी तरफ थी उनकी छोटी बहू—आव्या।
आव्या एक बेहद शांत और सुलझी हुई लड़की थी। वह एक न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) से आई थी, जहाँ सिर्फ वो और उसके माता-पिता थे। शांति, अनुशासन और हर चीज़ का सलीका—यही उसकी परवरिश थी। जब उसकी शादी रघुवंशी सदन के छोटे बेटे, मयंक से हुई, तो शुरू में उसे इस भीड़-भाड़ में एडजस्ट करने में बहुत दिक्कत हुई। लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की।
समस्या यह थी कि सावित्री देवी को आव्या का यह शांत स्वभाव “घमंड” और “रूखापन” लगता था।
दिवाली आने वाली थी। घर में मेहमानों का तांता लगा हुआ था। सावित्री देवी की ननदें, देवरानियां, और दूर के रिश्तेदार—सब जमा हो रहे थे। घर में लगभग 40 लोगों का खाना हर वक़्त बनता था।
एक सुबह, आव्या रसोई में अकेली 40 लोगों के लिए चाय और नाश्ता बना रही थी। बड़ी बहू (जेठानी) विमला, जो मीठी बातें बनाने में माहिर थी, मेहमानों के बीच बैठकर गप्पें लड़ा रही थी।
आव्या ने पसीने से तर-बतर होकर सास से कहा, “मांझी, अगर विमला दीदी थोड़ी मदद कर देतीं तो जल्दी हो जाता। मेहमान इंतज़ार कर रहे हैं, और मेरी तबीयत भी थोड़ी ठीक नहीं लग रही।”
सावित्री देवी ने अपनी ननद (सुमित्रा बुआ) के सामने आव्या को घूर कर देखा। सुमित्रा बुआ ने तंज कसा, “अरे भाभी, आजकल की लड़कियों से इतना सा काम नहीं होता। हमारे ज़माने में तो हम कुएं से पानी भरकर पूरी बारात का खाना अकेले बनाते थे।”
सावित्री देवी का पारा चढ़ गया। उन्होंने आव्या को डांटते हुए वो बात कह दी जो अक्सर उनकी जुबान पर रहती थी।
“बहू! बस कर ये नाटक। विमला बाहर मेहमानों को संभाल रही है, वो भी एक काम है। तुझसे ज़रा सा काम क्या कह दिया, तेरी जान निकल रही है? और सुन… तू छोटे परिवार से है… तुझे क्या मालूम रिश्तेदारी क्या होती है? तेरे मायके में तो तीन लोग थे, सन्नाटे में रहने की आदत है तुझे। यहाँ हर किसी का मन रखना पड़ता है, इसे ही ‘परिवार’ कहते हैं। अगर यहाँ रहना है तो यह भीड़ और यह शोर बर्दाश्त करना सीख ले, वरना…”
आव्या की आँखों में आंसू आ गए। उसने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुकाकर वापस रोटियां बेलने लगी। उसे हमेशा यही सुनने को मिलता था कि चूँकि वह छोटे परिवार से है, इसलिए वह “स्वार्थी” है और उसे “त्याग” का मतलब नहीं पता।
दिवाली के दो दिन पहले, घर में एक बड़ा हादसा हुआ।
सावित्री देवी के पति, रामेश्वर जी, जो पिछले कुछ दिनों से सीने में हल्का दर्द महसूस कर रहे थे, अचानक बाथरूम में गिर पड़े। तेज़ आवाज़ सुनकर सबसे पहले आव्या दौड़ी।
“बाबूजी! बाबूजी!” आव्या ने दरवाज़ा खटखटाया। जब कोई जवाब नहीं मिला, तो उसने मयंक को आवाज़ लगाई।
दरवाज़ा तोड़ा गया। रामेश्वर जी बेहोश थे। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना ज़रूरी था।
घर में 40 लोग थे। जैसे ही यह खबर फैली, अफरा-तफरी मच गई। लेकिन मदद करने के बजाय, रिश्तेदारों का ड्रामा शुरू हो गया।
सुमित्रा बुआ चिल्लाईं, “हाय राम! दिवाली के मौके पर यह क्या अपशगुन हो गया? अब पूजा कैसे होगी?”
जेठानी विमला ने कहा, “अरे, अभी तो हलवाई आने वाला था शाम की पार्टी के लिए। अब उसे मना करना पड़ेगा क्या? सारे पैसे बर्बाद हो जाएंगे।”
सावित्री देवी का रो-रोकर बुरा हाल था। वह ज़मीन पर बैठकर छाती पीट रही थीं, “हाय! मेरा सुहाग… कोई डॉक्टर को बुलाओ!”
लेकिन कोई भी रिश्तेदार आगे नहीं आ रहा था। बड़े बेटे (जेठ) ने कहा, “माँ, मेरी गाड़ी गैराज में है। एम्बुलेंस आने में टाइम लगेगा। मैं टैक्सी देखता हूँ,” और वह फोन में व्यस्त हो गया। दूसरे रिश्तेदार अपनी-अपनी अटैची संभालने लगे कि कहीं माहौल ज्यादा खराब हुआ तो निकल लेंगे।
उस भीड़ में, उस “भरे-पूरे परिवार” में, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो तुरंत निर्णय ले सके। सब एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे।
तभी आव्या ने वो किया, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।
उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा। उसने मयंक की गाड़ी की चाबी छीनी (जो गैराज में नहीं, बल्कि बाहर ही खड़ी थी, जेठ झूठ बोल रहे थे क्योंकि उन्हें अस्पताल के चक्करों से बचना था)।
आव्या ने चिल्लाकर कहा, “मयंक! बाबूजी को उठाओ। और सुरेश भैया (जेठ), आप दरवाजा खोलिए। विमला दीदी, आप हटिए रास्ते से।”
उसकी आवाज़ में इतनी सख्ती थी कि पूरा हॉल सन्न रह गया। वो “शांत और छोटे परिवार वाली” बहू आज दुर्गा का रूप लग रही थी।
आव्या खुद ड्राइविंग सीट पर बैठी। मयंक और एक नौकर ने बाबूजी को पिछली सीट पर लिटाया। सावित्री देवी भी साथ जाने लगीं।
रास्ते भर सावित्री देवी रोती रहीं। आव्या ने बड़ी कुशलता से ट्रैफिक को चीरते हुए गाड़ी दौड़ाई। उसका पूरा ध्यान सड़क पर था।
अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टर्स ने रामेश्वर जी को आईसीयू में शिफ्ट किया। डॉक्टर ने बाहर आकर कहा, “मैसिव हार्ट अटैक था। अगर आप लोग 15 मिनट और देर करते, तो हम उन्हें नहीं बचा पाते।”
सावित्री देवी ने राहत की सांस ली। वे बेंच पर निढाल होकर बैठ गईं।
अगले 48 घंटे रामेश्वर जी के लिए बहुत नाजुक थे। आव्या और मयंक अस्पताल में ही डटे रहे।
लेकिन घर का हाल कुछ और ही था।
दूसरे दिन शाम को, आव्या घर आई ताकि सावित्री देवी के लिए कुछ कपड़े और दवाइयां ले जा सके। जब उसने घर में कदम रखा, तो वह हैरान रह गई।
ड्राइंग रूम में सुमित्रा बुआ, विमला और बाकी रिश्तेदार चाय-नाश्ता कर रहे थे। टीवी चल रहा था।
“अरे आव्या, आ गई? भाई साहब कैसे हैं?” बुआ ने समोसा खाते हुए पूछा। उनके चेहरे पर रत्ती भर भी चिंता नहीं थी।
“बाबूजी आईसीयू में हैं,” आव्या ने रूखे स्वर में कहा।
“ओह! भगवान सब ठीक करेगा,” विमला ने कहा। “वैसे आव्या, वो दिवाली की मिठाइयां जो आई थीं, वो कहाँ रखी हैं? बच्चे मांग रहे थे। अब भाई साहब बीमार हैं तो क्या हुआ, त्यौहार तो नहीं रोक सकते ना? बच्चे तो बच्चे हैं।”
आव्या का खून खौल उठा। वहां अस्पताल में बाबूजी मौत से लड़ रहे थे, और यहाँ इन “रिश्तेदारों” को मिठाइयों की पड़ी थी।
वह चुपचाप अपने कमरे में गई। उसने देखा कि उसकी अलमारी खुली हुई है। उसने चेक किया—दिवाली के लिए जो शगुन के लिफाफे और कुछ सोने के सिक्के उसने अलग रखे थे, वो गायब थे।
उसने पलटकर देखा। विमला दरवाजे पर खड़ी थी, थोड़ी घबराई हुई।
“वो… वो बुआ जी कह रही थीं कि घर में इतना खर्चा हो रहा है, और मेहमानों को विदा भी करना है, तो मैंने…”
आव्या समझ गई। इस “भीड़” ने मौका देखकर हाथ साफ कर लिया था।
आव्या ने कुछ नहीं कहा। उसने ज़रूरी सामान लिया और वापस अस्पताल चली गई।
तीन दिन बाद रामेश्वर जी को होश आया और एक हफ्ते बाद उन्हें डिस्चार्ज मिला।
जिस दिन रामेश्वर जी घर लौटे, घर का नज़ारा बदला हुआ था। आधे से ज्यादा मेहमान जा चुके थे। जो बचे थे, वो जाने की तैयारी में थे। किसी ने रामेश्वर जी की सेवा के लिए रुकने की जहमत नहीं उठाई, क्योंकि अब “जश्न” नहीं था, सिर्फ “बीमारी” थी।
सावित्री देवी ने देखा कि घर बिखरा पड़ा है। गंदे बर्तन, चादरें और कचरा।
शाम को जब सब बैठे थे, तो सुमित्रा बुआ ने अपना बैग उठाया। “अच्छा भाभी, अब हम चलते हैं। भाई साहब ठीक हैं, हमें तसल्ली हो गई। वैसे भी यहाँ रहकर हम क्या करेंगे, बोझ ही बनेंगे।”
सावित्री देवी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।
जब सब चले गए, तो घर में सन्नाटा पसर गया। वही सन्नाटा जिससे सावित्री देवी को नफरत थी। लेकिन आज उस सन्नाटे में एक अजीब सा सुकून था।
आव्या रसोई से आई। उसके हाथ में एक थाली थी। खिचड़ी और सूप।
उसने रामेश्वर जी को अपने हाथों से खाना खिलाना शुरू किया। फिर उसने सावित्री देवी के पैर दबाए।
“मांझी, आप भी कुछ खा लीजिये। आपने सुबह से कुछ नहीं खाया,” आव्या ने प्यार से कहा।
सावित्री देवी आव्या को देखती रहीं। पिछले दस दिनों में इस लड़की ने न अपनी नींद देखी थी, न भूख। अस्पताल में बेंच पर सोई, घर आकर इनके लिए खाना बनाया, और उन स्वार्थी रिश्तेदारों के ताने भी सहे।
सावित्री देवी की आँखों से आंसू गिरने लगे।
“क्या हुआ मांझी? बाबूजी की तबियत को लेकर चिंता हो रही है?” आव्या ने घबराकर पूछा।
सावित्री देवी ने आव्या का हाथ पकड़ लिया।
“नहीं बेटा,” सावित्री देवी की आवाज़ कांप रही थी। “मुझे अपनी सोच पर रोना आ रहा है।”
रामेश्वर जी, जो बिस्तर पर लेटे सब देख रहे थे, धीरे से बोले, “सावित्री, जिस भीड़ को तुम अपनी दौलत समझती थीं, वो तो मेला देखने आई थी। तमाशा खत्म हुआ, तो सब चले गए।”
सावित्री देवी ने सिसकते हुए कहा, “आव्या, मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं तुझे ताने देती रही कि तू छोटे परिवार से है, तुझे रिश्तेदारी मालूम नहीं। लेकिन आज मुझे समझ आ गया कि मेरा वो ‘बड़ा परिवार’ सिर्फ गिनती का था। असली रिश्ता तो तूने निभाया।”
सावित्री देवी ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात जारी रखी।
“उस दिन जब तेरे बाबूजी को दौरा पड़ा, तो वो 40 लोग तमाशबीन बने खड़े थे। किसी को अपनी गाड़ी की चिंता थी, किसी को पूजा की, किसी को मिठाई की। अगर तू नहीं होती… अगर तूने वो ‘छोटे परिवार वाली’ हिम्मत नहीं दिखाई होती, तो आज मैं विधवा हो गई होती।”
आव्या ने सिर झुका लिया। “मांझी, परिवार छोटा हो या बड़ा, यह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि मुसीबत में कौन किसके साथ खड़ा है। मेरे माता-पिता ने मुझे सिखाया था कि भीड़ इकट्ठी करना आसान है, लेकिन किसी एक इंसान का होकर रहना मुश्किल। मैंने बस अपना फ़र्ज़ निभाया।”
सावित्री देवी ने आव्या को गले लगा लिया।
“आज से इस घर का हर फैसला तू लेगी आव्या। तूने साबित कर दिया कि घर ईंट-पत्थरों या लोगों की सिर-गिनती से नहीं, बल्कि ‘परवाह’ और ‘समर्पण’ से बनता है। मेरा घर आज खाली ज़रूर है, पर खोखला नहीं है, क्योंकि तू है इसमें।”
उस रात के बाद रघुवंशी सदन के नियम बदल गए।
सावित्री देवी ने फालतू के दिखावे और रिश्तेदारों की खुशामद बंद कर दी। अब घर में शोर कम होता था, लेकिन हंसी ज़्यादा होती थी। जिस विमला (जेठानी) ने मुसीबत के वक़्त गहने और शगुन चुराए थे, सावित्री देवी ने उसे घर की तिजोरी की चाबी से बेदखल कर दिया और सारी ज़िम्मेदारी आव्या को सौंप दी।
एक दिन शाम को, जब सावित्री देवी और आव्या चाय पी रहे थे, तो सुमित्रा बुआ का फोन आया। वे फिर से किसी शादी के लिए पूरे परिवार को बुला रही थीं और ताना मार रही थीं कि “तुम लोग तो अब मिलते-जुलते ही नहीं हो।”
सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए फोन स्पीकर पर डाला और कहा, “सुमित्रा, अब हम ‘रिश्तेदारी’ नहीं, ‘रिश्ते’ निभा रहे हैं। और हाँ, मेरी बहू ‘छोटे परिवार’ से है, लेकिन उसका दिल तुम सबके मिलाए हुए दिलों से भी बहुत बड़ा है। अब हमें भीड़ की ज़रूरत नहीं है।”
सावित्री देवी ने फोन काट दिया। आव्या और सावित्री देवी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराईं। उस मुस्कान में एक नया सुकून था—एक ऐसा सुकून जो भीड़ के शोर में कहीं खो गया था, लेकिन अब इस ‘छोटे’ से अपनेपन में वापस मिल गया था।
कहानी का सार:
रिश्तों की खूबसूरती उनकी ‘तादाद’ में नहीं, बल्कि उनकी ‘तासीर’ में होती है। सौ मतलबपरस्त रिश्तेदारों से बेहतर है एक ऐसा इंसान जो बिना कहे आपका दर्द समझ सके। कभी भी किसी की परवरिश या उसके बैकग्राउंड का मज़ाक मत बनाइए, क्योंकि अक्सर वही “कमज़ोर” समझी जाने वाली नींव पूरी इमारत का बोझ उठाती है।
सवाल आपके लिए:
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मूल लेखिका : करुणा मलिक